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काश, कोई लुगो यहाँ भी होता - राजकिशोर

परत-दर-परत

काश, कोई लुगो यहाँ भी होता
- राजकिशोर


भारत का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, इस बारे में अनुमान लगाने की मशीन कभी खाली नहीं बैठती। इस पर विचार-विमर्श नहीं होता कि भारत का अगला प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिए? यह बहुत लोगों को मालूम है कि देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में महात्मा गांधी किसी दलित महिला को देखना चाहते थे। उनके अन्य सभी सपनों की तरह यह सपना भी उन्हीं के साथ राख में मिल गया। देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में गांधी जी ने जवाहरलाल नेहरू का चयन किया था -- इस आधार पर कि 'जब मैं नहीं रहूँगा, वह मेरी भाषा बोलेगा।' नेहरू की भाषा में ज्यादा फर्क तो नहीं आया, पर उन्होंने जिस भारत की नींव रखी, उसमें गरीबों के लिए जगह सबसे आखिर में थी। यह जगह अभी तक नहीं बदली है।



इतिहास की खूबी यह है कि वह बराबर हमारे सामने कुछ बेहतरीन उदाहरण रखता जाता है। यह हमारा अंधापन है कि हम इन उदाहरणों को देखना नहीं चाहते। इसका कारण यह है कि हमारी नजर में बहुत धूल जमी होती है। यह धूल यथास्थितिवाद (जैसा चल रहा है, चलने दो) की है। कुछ भी नया करने के लिए अपने को पूर्वाग्रहों से मुक्त करना होता है, नई दिशाओं में सोचना और करना होता है तथा प्रयोग करने का जोखिम लेना पड़ता है। सभी समयों में वही समाज आगे बढ़े हैं, जिन्होंने लीक से हट कर चलना सीखा। लैटिन अमेरिका के एक छोटे-से देश पराग्वे ने पूर्व-बिशप फरनांडो लुगो को अपना नया राष्ट्रपति चुन कर लीक से हट कर एक ऐसा ही काम किया है। सुखद संयोग यह है कि लुगो ने ठीक 15 अगस्त 2008 को राष्ट्रपति पद की शपथ ली। क्या हमारा भी कोई 15 अगस्त इतना सुहावना हो सकता है? हम भारतीय चाहें तो इस असाधारण घटना से बहुत कुछ सीख सकते हैं।



फरनांडो लुगो का बचपन बहुत गरीबी में बीता। जीविका के लिए उन्हें अनेक छोटे-मोटे काम करने पड़े, जैसा कि हमारे गरीब घरों के लड़कों को करना पड़ता है। फिर लुगो ने शिक्षक होने का प्रशिक्षण लिया। लेकिन उन्हें एक दूसरी तरह का शिक्षक बनना था -- उस ईश्वर का दूत, जिसे अमीरों के पुष्पगुच्छों की तुलना में गरीबों के आँसू प्रिय हैं। लैटिन अमेरिका के धार्मिक संगठनों में अरसे से यह बहस चल रही है कि जब चारों ओर भुखमरी हो, जुल्म और अन्याय हो, उस समय सच्चे ईसाई का कर्तव्य क्या है? क्या वह चर्च और बाइबल में खोया रहे या चर्च की दीवारों से बाहर निकल कर सड़क पर आए और अभावग्रस्त लोगों को मनुष्य की गरिमा लौटाने के लिए संघर्ष करे? इस द्वंद्व ने लुगो के संवेदनशील हृदय में खलबली मचा दी।



डिवाइन वर्ड मिशनरीज में शामिल होने के कुछ समय बाद लुगो का इक्वाडोर जाना हुआ, जहाँ उनकी मुलाकात रियोबांबा के बिशप प्रोआना से हुई। प्रोआना उन ईसाई पादरियों में हैं जिन्हें गरीब की झोपड़ी में ईश्वर ज्यादा नजदीक दिखाई देता है। लुगो को दिशा मिल गई। उन्होंने निर्धन और देशज लोगों के लिए काम करना शुरू कर दिया। लैटिन अमेरिका के अधिकांश देशों में देशज आबादी की हालत लगभग वैसी ही है जैसी हमारे यहाँ भूमिहीन मजदूरों, दलितों और जनजातियों की। 1994 में लुगो को सैन पेड्रो का बिशप बनाया गया। इसके साथ-साथ उनके जनवादी संघर्ष जारी रहे। लोग उन्हें प्यार से 'गरीबों का बिशप' कहने लगे। जल्द ही लुगो की समझ में आ गया कि अभावग्रस्त लोगों की जिंदगी बदलने के लिए उनकी छिटपुट सहायता और उनके हकों के लिए छिटपुट संघर्ष, जैसा कि सभी एनजीओ करते हैं, काफी नहीं हैं। इसके लिए राजनीतिक सत्ता का चरित्र बदलना जरूरी है। आज राजनीति ही हमारी नियति की सबसे बड़ी निर्धारक शक्ति है। इस शक्ति को ऐयाशों, (प्रगट या छद्म) तानाशाहों और गुंडों के हाथ में क्यों छोड़ दिया जाए?



दिसंबर 2006 में फरनांडो लुगो ने पराग्वे के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का अहम फैसला किया। इसके लिए बिशप के पद से मुक्त होना जरूरी था। चर्च से अपना इस्तीफा लिखते हुए लुडो ने कैथलिक ईसाइयों के मुख्यालय वेटिकन को लिखा कि आज से पूरा देश ही मेरा कैथेड्रल है। वेटिकन से रूढ़िग्रस्त जवाब आया कि आप इस्तीफा नहीं दे सकते, क्योंकि जो एक बार पादरी हो गया, उसे जीवन भर पादरी रहना होता है। लुगो ने गांधी जैसी सच्चाई और ईमानदारी का उदाहरण पेश किया -- 'राजनीति में तो अब मैं आ ही गया हूं। आप या तो मेरा इस्तीफा मंजूर करें या मुझे सजा दें।' वेटिकन पसोपेश में पड़ा रहा। जब लुगो अपने देश के राष्ट्रपति चुन लिए गए, ते पोप ने उन्हें पादरी पद से मुक्त कर दिया। ज्ञात इतिहास में यह इस तरह की शायद पहली घटना है।

फरनांडो लुगो ने 15 अगस्त 2008 को जब राष्ट्रपति पद की शपथ ली, वे एक मामूली-सी सफेद कमीज पहने हुए थे और उनके पैरों में बूट नहीं, चप्पलें थीं। अगर मैं वहां मौजूद होता, तो उन चप्पलों की धूल अपने ललाट पर लगा लेता। पराग्वे के राष्ट्रपति को वेतन के रूप में 40,000 डॉलर सालाना मिलते हैं। लुगो ने घोषणा की कि वे वेतन के रूप में एक पेंस भी नहीं लेंगे और अपने छोटे-से घर में ही रहेंगे। लुगो ने एक ऐसी युवती को देशज मामलों का मंत्री बनाया है जिसे बचपन में बलात श्रम करने के लिए बेच दिया गया था और जो अब हाई स्कूल का इम्तहान देने की तैयारी कर रही है।


गरीबों का राष्ट्रपति कैसा होता है? अगर यह तुरंत सामने नहीं आ जाता, तो बाद में इसकी संभावना धूमिल होती जाती है। फरनांडो लुगो ने 15 अगस्त 2008 को जब राष्ट्रपति पद की शपथ ली, वे एक मामूली-सी सफेद कमीज पहने हुए थे और उनके पैरों में बूट नहीं, चप्पलें थीं। अगर मैं वहां मौजूद होता, तो उन चप्पलों की धूल अपने ललाट पर लगा लेता। पराग्वे के राष्ट्रपति को वेतन के रूप में 40,000 डॉलर सालाना मिलते हैं। लुगो ने घोषणा की कि वे वेतन के रूप में एक पेंस भी नहीं लेंगे और अपने छोटे-से घर में ही रहेंगे। लुगो ने एक ऐसी युवती को देशज मामलों का मंत्री बनाया है जिसे बचपन में बलात श्रम करने के लिए बेच दिया गया था और जो अब हाई स्कूल का इम्तहान देने की तैयारी कर रही है। आनेवाले दिनों में हमें ऐसे बहुत-से सुखद समाचार पढ़ने को मिलेंगे।


वे कौन हैं जो भारत की तरक्की की दिशा तय करने के लिए अमेरिका और यूरोप पर निगाह टिकाए रखते हैं? कौन हैं वे जिन्हें भारत जैसे गरीब देश में लोगों की नहीं, टेक्नोलॉजी की बेहतरी चाहिए? ये हमें साठ वर्षों में जहाँ तक ला सकते थे, ले आए हैं। इन्हें धन्यवाद। पर आगे का रास्ता 'गरीबों के बिशप' लुगो जैसे नेता ही दिखा सकते हैं। दक्षिण एशिया के बाशिंदों को लैटिन अमेरिकी देशों के घटनाक्रम पर निगाह रखनी चाहिए। वहाँ कई-कई स्वतंत्रता संघर्ष एक साथ चल रहे हैं।


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काश, कोई लुगो यहाँ भी होता - राजकिशोर काश, कोई लुगो यहाँ  भी होता      - राजकिशोर Reviewed by Kavita Vachaknavee on Monday, September 22, 2008 Rating: 5

1 comment:

आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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