रसांतर : न इधर के न उधर के - राजकिशोर


रसांतर


न इधर के न उधर के : राजकिशोर


ओलंपिक वह जगह है जहां से भारत कभी संतुष्ट हो कर नहीं लौटता। शायद वह संतुष्ट हो कर लौटना चाहता भी नहीं। नहीं तो क्या वजह है कि इस प्रतियोगिता स्थल से हम अभी तक लगातार निराश ही वापस आते रहे हैं? अगर हम देश के आर्थिक विकास के लिए हर पांचवें साल अरबों रुपयों की एक महायोजना बना सकते हैं और गरीबी हटाने के लिए एक दर्जन से ज्यादा कार्यक्रम साल भर चला सकते हैं, तो हर चौथे साल होनेवाले ओलंपिक खेलों में सफलता पाने के लिए एक छोटी-सी योजना भी नहीं बना सकते? हमारे लिए अभी भी क्रिकेट ही सर्वोत्तम खेल है, जिसमें जय-पराजय हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान की कुंजी है। इसका मुख्य कारण क्या यह है कि क्रिकेट में पैसा और ग्लैमर है? इन दोनों चीजों के कारण कोई भी खेल खेल नहीं रह जाता। वह उद्योग या धंधा बन जाता है। ओलंपिक खेलों का चरित्र उस तरह से औद्योगिक नहीं बन पाया है जैसे क्रिकेट का। मजेदार बात यह है कि इसके बावजूद औद्योगिक रूप से समृद्ध देश ही ओलंपिक में बाजी मारते हैं। शायद इसलिए कि वे इतने समर्थ हैं कि जीवन और खेल का वास्तविक आनंद ले पाते हैं।



इस बार का ओलंपिक भारत के लिए कुछ अच्छा रहा। ओलंपिक के ---- वर्षों के पूरे इतिहास में इस बार उसका काम सर्वश्रेष्ठ था । लेकिन यह उपलब्धि भी कितनी है? एक स्वर्ण और दो कांस्य पदक! जबकि हमसे बहुत छोटे-छोटे देशों ने हमसे कहीं अधिक पदक प्राप्त किए। स्वर्ण पदक पाने पर देश भर में जो आनंद आलोड़न मचा, वह देखने लायक था। स्वर्ण पदक विजेता पर रुपयों की बरसात होने लगी। मानो प्रशंसा करने और बधाई देने का अब एक ही उपाय रह गया हो। अवसर ऐसा था जैसे किसी राजपरिवार में दस लड़कियों के बाद एक लड़का पैदा हो गया हो। यह उत्सव का माहौल नहीं, उत्सव प्रदर्शन का माहौल था। जीत अप्रत्याशित थी, इसलिए अपने आकार से बड़ी लग रही थी। सच है, इसके पहले ओलंपिक में हमने सोना कभी देखा ही नहीं था। लेकिन हम यह भुला रहे थे कि सोना देखने का हमने कोई उद्योग भी नहीं किया था। हम इस तरह खुशी मना रहे थे जैसे हमारे नाम लॉटरी निकल आई हो। यह लॉटरी थी नहीं, क्योंकि इस सोने के लिए अभिनव नाम के युवक ने लंबे समय से साधना की थी। कहा जा सकता है कि यह एक व्यक्तिगत उत्कर्ष था। उसमें किसी प्रकार का राष्ट्रीय उत्कर्ष देखना उचित नहीं है।


राष्ट्रीय उत्कर्ष तो यह चीन और अमेरिका का है। यह अकारण नहीं कि ये ही दोनों देश ही इस समय वि·ा अर्थव्यवस्था का नेतृत्व कर रहे हैं। ध्यान देने की बात है कि चीन में सर्वसत्तावाद है और किसी प्रकार के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए अनुमति नहीं है। दूसरी ओर, अमेरिका पूंजीवाद का सरगना माना जाता है। लेकिन वि·ा स्तर पर दोनों ही महत्वाकांक्षी देश हैं। इससे पता चलता है कि इन दोनों ही देशों के मानस को कुछ स्वप्न संचालित कर रहे हैं। चीन का सर्वसत्तावाद है तो एक दल या संगठन का शासन, लेकिन यह शासन राष्ट्रीय आकांक्षाओं से मुक्त नहीं है। वह देखना चाहता है कि चीन कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में आगे बढ़े। यह हाल अमेरिका का है। वहां प्रचुरता और लोकतंत्र ने कुछ राष्ट्रीय स्वप्न पैदा किए हैं। इन स्वप्नों की वजह से ही यह संभव हुआ कि ओलंपिक में चीन और अमेरिका क्रमश: नंबर एक और दो पर रहे। यह स्वप्नसंपन्नता जिन-जिन बड़े या छोटे देशों में एक राष्ट्रीय आकांक्षा के रूप में है, उन-उन देशों ने ओलंपिक खेलों में अपना कौशल दिखाया। भारत इसलिए उन पचास पिछड़े देशों के समूह में रहा, जो हर तरह से लद्धड़ हैं।


ओलंपिक खेलों का हम आदर करते हैं और उन खिलाड़ियों को सलाम करते हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा, कौशल तथा तैयारी का परिचय दिया। लेकिन हम यह बात भी कहे बिना नहीं रह सकते कि इस तरह की समारोहिता के फलस्वरूप प्रामाणिक खेल संस्कृति की क्षति होती है। यह सच है कि प्रतियोगिता खिलाड़ियों की प्रतिभा में धार लाती है, उन्हें अपनी स्थिति समझने में मदद करती है। लेकिन खेल को पेशा बनना का कोई अच्छा अर्थ नहीं है। खेल उत्पादन नहीं है -- मनोरंजन है, व्यायाम है, समय बिताने का एक रचनात्मक माध्यम है और है इस सत्य का प्रतीक कि जीवन सिर्फ कमाना और पेट भरना नहीं है। बोरियत से मुक्ति की इच्छा जैसे मनुष्य को साहित्य, कला आदि की ओर ले जाती है, वैसे ही खेल की ओर भी। इसका अर्थ यह हुआ कि हर व्यक्ति को खेलना चाहिए। लेकिन जब खेलने को कोई व्यक्ति या समूह अपना पेशा या व्यवसाय बना लेता है, तो वह जीवन के एक पहलू को पूरा जीवन मान बैठता है। इस तरह की अवधारणा में कोई बुनियादी गड़बड़ी है। शरीर को स्वस्थ और मजबूत रखना चाहिए, लेकिन पहलवान बनना किसी भी सोच-विचारवाले आदमी का लक्ष्य नहीं हो सकता। पहलवान शारीरिक बल की साधना करता है, लेकिन इसका लक्ष्य क्या है? कला के लिए कला तो फिर भी हो सकती, लेकिन बल के लिए बल एक अर्थहीन धारणा है। तीरंदाजी, वजन उठाना, लंबी कूद, ऊंची कूद आदि भिन्न-भिन्न प्रकार के कौशल हैं। लेकिन यह क्या बात हुई कि कोई आदमी जीवन के अन्य सभी पहलुओं की उपेक्षा कर जिंदगी भर तीरंदाजी का ही अभ्यास करता रहे? यह भी कोई बात नहीं है कि कोई जीवन भर ऊंची या लंबी छलांग लगाता रहे। इस तरह के कौशल जीवन का अंग होना चाहिए, न कि किसी का पूरा जीवन कि वह किसी अन्य काम या कौशल में दिलचस्पी ही न ले।


जब ओलंपिक खेलों की शुरुआत हुई थी, तब वे पैसा, यश और राजकीय अनुग्रह के साधन थे। समाज सामंती था और तरह-तरह के करतब दिखा कर कोई अपने समाज में स्थान बना सकता था। लेकिन इस वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और बहुआयामी समय में ऐसे पेशों को इतना अधिक प्रेत्साहन नहीं मिलना चाहिए कि वे जीवन दर्शन से छिटक कर मात्र प्रदर्शन हो जाएं। जीवन किसी प्रकार के प्रदर्शन के लिए नहीं है। वह अपनी सर्वांगीणता में जीने के लिए है। यह चिंता की बात है कि सभी कुछ बदल रहा है, मगर हम अभी भी ऐसी रस्मों और परंपराओं से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं जो जीवन को एकांगी बनाती हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो ओलंपिक में भारत के कमजोर प्रदर्शन पर आंसू बहाने जैसी कोई बात नहीं है। लेकिन यह बात तभी कही जा सकती है जब हमारा समाज जीवन की सर्वांगीण साधना की ओर बढ़ रहा हो। हमारी हालत यह है कि हम न इधर के हैं, न उधर के। चीन और अमेरिका कहीं तो सर्वोत्तमता की साधना में लगे हुए हैं। क्या बीजिंग के इस सबक को हम आत्मसात कर सकेंगे?


(लेखक इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज,नई दिल्ली में वरिष्ठ फेलो हैं।)



3 comments:

  1. राष्ट्रीय आकांक्षा और स्वप्नसम्पन्नता के अभाव के कारण ही हम संसाधनसंपन्न होकर भी विपन्न राष्ट्र ही हैं.

    अत्यन्त विचारोत्तेजक आलेख उपलब्ध कराने के लिए आभार !

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  2. “जब खेलने को कोई व्यक्ति या समूह अपना पेशा या व्यवसाय बना लेता है, तो वह जीवन के एक पहलू को पूरा जीवन मान बैठता है। इस तरह की अवधारणा में कोई बुनियादी गड़बड़ी है। शरीर को स्वस्थ और मजबूत रखना चाहिए, लेकिन पहलवान बनना किसी भी सोच-विचारवाले आदमी का लक्ष्य नहीं हो सकता।”

    अब इस गहराई में सोचने वाले हों तो हम ओलम्पिक में नंगे ही अच्छे... हम तो समझते थे कि खेल प्रतिस्पर्धाएं व्यक्ति के क्षमता संवर्द्धन के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती हैं, लेकिन यहाँ तो संतोषी सदा सुखी टाइप विचार जमा हुआ है। जमाये रहिए जी...

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  3. धन्यवाद ऋषभ जी व सिद्धार्थ जी.
    सन्तोषी सदा सुखी की स्थापना में जमे हुए जैसा लगना सम्भवतः कोडीकरण और डिकोडीकरण में छूटे रह जाने जैसा है. यहाँ तो सीधे सीधे कुन्द पड़े राष्ट्रीय खेल-चरित्र के बाजारीकरण जैसे मुद्दों पर तीखी चोट है, बन्धु!

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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