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भारतीय भाषाओं का भविष्य : राहुल देव

प्रिय मित्र,
भारत के वर्तमान और भविष्य से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण विषय के बारे में आपसे दो बातें करने के लिए पत्र लिख रहा हूँ। आश्चर्य यह है कि विषय जितना महत्वपूर्ण है उतना ही उपेक्षित भी।
विषय है हमारी सभी भारतीय भाषाओं का भविष्य।

भारत, कम से कम शिक्षित, शहरी भारत, संसार की एक महाशक्ति बनने के सपने देख रहा है। दुनिया भी अब मानने लगी है कि भारत में महाशक्ति बनने की इच्छा, क्षमता और संभावनाएं तीनों मौजूद हैं। यह परिदृश्य हर भारतीय के मन में एक नई आशा, उत्साह और आत्मविश्वास का संचार करता है। हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, योजना आयोग, ज्ञान आयोग, देशी विदेशी विद्वान, अर्थशास्त्री, लेखक, चिंतक, उद्योगपति आदि सब ज्ञान युग में भारत की बौद्धिक शक्ति और उद्यमशीलता की संयुक्त संभावनाओं के ही आधार पर यह कल्पना साकार होती देखते हैं।

इस बौद्धिक शक्ति का साक्षात हमारी शिक्षा करेगी इस पर भी सब सहमत हैं। शिक्षा व्यवस्था को संसाधनों, गुणवत्ता और सुलभता से संपन्न बनाने की बड़ी बड़ी योजनाएं बन रही हैं। ज्ञान आयोग ने शिक्षा संबंधी जो कई सिफारिशें प्रधानमंत्री से की हैं उनमें एक यह भी है कि पूरे देश में अंग्रेजी को पहली कक्षा से पढ़ाना शुरू किया जाय। पूरे देश में बच्चों को बढ़िया अंग्रेज़ी शिक्षा मिल सके उसके लिए अंग्रेज़ी शिक्षकों को प्रशिक्षित करने और 6 लाख नए अंग्रेज़ी शिक्षक तैयार करने की भी उन्होंने सिफारिश की है।

आज देश का हर गाँव, ज़रा भी शिक्षा का महत्व जानने वाला ग़रीब से ग़रीब नागरिक अपने बच्चों के लिए अंग्रेज़ी शिक्षा माँग रहा है। राज्य सरकारों पर ज़बर्दस्त दबाव है कि सरकारी स्कूलों में भी अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई जल्दी से जल्दी शुरू की जाय। कई राज्य यह कर चुके हैं। बाकी भी करेंगे। सब चाहते हैं कि प्रगति और वैश्वीकरण की इस भाषा से कोई वंचित न रहे। सबने मान लिया है कि भारत के महाशक्ति बनने में अंग्रेज़ी सबसे बड़ा साधन है और होगी।

अंग्रेज़ी-माहात्म्य की इस जयजयकार के नक्कारखाने में हम एक तूती की आवाज़ उठाना चाहते हैं।

- अगर यह ऐसे ही चलता रहा तो दो पीढ़ियों के बाद भारत की सारी भाषाओं की स्थिति क्या होगी?

- उनमें पढ़ने, लिखने और बोलने वाले कौन होंगे?

- क्या ये सभी भाषाएं सिर्फ़ बोलियाँ बन जाएंगी?

- या भरी-पूरी, अपने बेहद समृद्ध अतीत की तरह अपने-अपने समाजों की रचनात्मक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, शैक्षिक, साहित्यिक अभिव्यक्ति और संवाद की सहज भाषाएं बनी रहेंगी?

- क्या आज से दो पीढ़ियों बाद के शिक्षित भारतीय इन भाषाओं में वह सब करेंगे जो आज करते हैं, अब तक करते रहे हैं?

नहीं?
तो क्या आपको भी हमारी तरह यह दिखता है कि 20-30 साल आगे का शिक्षित भारत ज्यादातर हर गंभीर, महत्वपूर्ण काम अंग्रेज़ी में करेगा या करने की जीतोड़ कोशिश में लगा होगा?


अगर हाँ, तो तब इन सारी भाषाओं की स्थिति, व्यवहार के तरीके और क्षेत्र, प्रभाव, शक्ति, प्रतिष्ठा आदि क्या होंगे?

उनकी देश के व्यापक शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक, बौद्धिक, साहित्यिक, कलात्मक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक आदि सभी ज्ञानात्मक क्षेत्रों में जगह क्या होगी?

जब लगभग हर शिक्षित भारतीय पढ़ने, लिखने और गंभीर बातचीत में सिर्फ़ अंग्रेज़ी का प्रयोग करेगा, ये सारे काम अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाओं या पारंपरिक मातृभाषाओं में सहजता से करने में असमर्थ होगा, वैसे ही जैसे आज भी केवल अंग्रेज़ी माध्यम घरों-स्कूलों से निकले बच्चे असमर्थ होते जा रहे हैं, तब --

-कैसा होगा वह भारत?

-कैसे होंगे वे भारतीय?

-कितने और किस तरह के भारतीय होंगे वे?

-इन सारी भाषाओं में जो अमूल्य धरोहर, संवेदनाएं, संस्कार, ज्ञान, जातीय स्मृतियाँ संचित हैं और अब तक हर भारतीय को मातृभाषा के माध्यम से सहज ही मिलती रही हैं उनका क्या होगा?

-सिर्फ या ज्यादातर अंग्रेज़ी पढ़ने, लिखने, बोलने वाले महाशक्ति भारत के इन निर्माताओं की सोच, संस्कार, जीवन शैली, सपने, मनोरंजन के तरीके, शौक, महत्वाकांक्षाएं, पहनावा, खानपान, मूल्यबोध, एक भारतीय होने का आत्मबोध – ये सब कैसे होंगे?

-भाषा व्यवहार, स्थितियों और भाषाओं के आपसी रिश्तों में यह जो देशव्यापी, विराट और गहरा परिवर्तन लगभग अलक्षित ही घट रहा है क्या देश ने इस पर इसी गहराई से विचार भी करना शुरू किया है?

-क्या हमें यह प्रक्रिया दिख भी रही है?

-क्या यह विचार-योग्य है?

-क्या इन भाषाओं के आसन्न भविष्य के बारे में कुछ करने की ज़रूरत है?

-अगर है तो क्या किया जा सकता है?

-आपकी हमारी भूमिका इसमें क्या हो सकती है?

हम कुछ मित्र इन प्रश्नों पर चिंतित हैं।

इसे समूची भारतीयता पर घिरता संकट मानते हैं।

काश हम और हमारे ये भय ग़लत और निराधार साबित हों। लेकिन हम इन सवालों पर मिल कर विचार करना चाहते हैं। इस परिवर्तन और इसके निहितार्थों, इससे निकलती संभावनाओं को समझना चाहते हैं।

हम देश के हर प्रमुख भाषाभाषी समाज के साथ यह विचार मंथन और विमर्श करना चाहते हैं। क्योंकि हमें लगता है कि ये सिर्फ़ हिन्दी नहीं हर भारतीय भाषा के सामने खड़े प्रश्न हैं। शायद जीवन-मरण के, अस्तित्व की शर्तों और स्थितियों को बदलने वाले प्रश्न हैं।

हम चिंतित हैं निराश नहीं। कुछ अस्पष्ट रणनीतियाँ, कुछ विचार हमारे मन में हैं। उन्हें मित्रों के सामने रख कर, उनसे समझ, सुझाव और सामर्थ्य प्राप्त करना चाहते हैं।

इस विमर्श में शामिल होने का हम आपको निमंत्रण देते हैं। आपसे सहयोग की भी प्रार्थना करते हैं। इस विमर्श में बहुत सारे लोग, संसाधन, धन लगेंगे। आपकी प्रतिक्रिया का हम इंतज़ार करेंगे।

इस विमर्श की शुरूआत हम शनिवार, 17 मई, 2008 को शाम 6 से 8.30 बजे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कांफ्रेंस कक्ष 2 में एक बातचीत से कर रहे हैं। आप सादर आमंत्रित हैं।


आपका
राहुल देव
सम्यक् न्यास
के-13, ग्रीन पार्क एक्सटेंशन,
नई दिल्ली 110016
फोन +91 11 2619 1670
फैक्स +91 11 2617 6539
भारतीय भाषाओं का भविष्य : राहुल देव भारतीय भाषाओं का भविष्य :  राहुल देव Reviewed by Kavita Vachaknavee on Monday, May 12, 2008 Rating: 5

5 comments:

  1. राहुल देव की चिंता हर स्व भाषा प्रेमी भारतीय की चिंता है. आशा है , इस विचार मंथन से कोई ठोस कार्य योजना सामने आ सकेगी जिससे अंगेजी के अंधे मोह पर लगाम कसी जा सके.

    अभियान की सफलता हेतु शुभ कामनाएं !!

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  2. राहुल देवजी को पहलीबार अंतर्जाल पर संपूर्ण उपस्थिति देखी, बहुत खुशी हुई. सबसे बड़ी खुशी हिंदी पर विमर्श के लिए. राहुल जी, आप ही की तरह चिंतित मैं भी हूं, पर निराश कतई नहीं, क्योंकि आप हिंदी में विमर्श करने के लिए तैयार हैं. आज सैंकड़ों लोग हैं तो अपने ब्लॉग के माध्यम से उपयोगी और सारगर्भित जानकारी दे रहे हैं. अंग्रेजी पढ़ने वाले बच्चे जब हिंदी में इतनी सारगर्भित चीजें देखेंगे तो उनका अंग्रेजी के प्रति मोह टूट जाएगा. जहां तक सरकार की बात है तो उसमें इतनी क्षमता नहीं रह गई है कि वह अपने बल पर हिंदी को जन-जन तक पहुंचा सके. हिंदी का उद्धार व्यक्तिगत प्रयास और जानकारी के आदान प्रदान से ही संभव होगा.

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  3. राहुलदेवजी जैसे लोग इस तरह के अभियान शुरू कर रहे हैं। अच्छी बात है। लेकिन, राहुलजी की ज्यादातर आशंका मुझे सच होती दिख रही है।

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  4. ऋषभजी,
    आपकी शुभकामनाओं हेतु आभार.


    सत्याजीत जी,
    आपकी बात से सहमत हूँ कि हिंदी का उद्धार व्यक्तिगत प्रयास और जानकारी के आदान प्रदान से ही संभव होगा.किन्तु यह अभी दूर की कौड़ी है कि नेट पर हिन्दी में बच्चों के लिए सार्थक व सारगर्भित तथा गम्भीर सामग्री उपलब्ध है. नेट पर ९० प्रतिशत लेखन केवल छपास की पूर्ति का माध्यम-भर है. बच्चों के लिए आवश्यक है कि उन्हें वैचारिक दिशा देने वाला श्रेष्ठ साहित्य एवम् ज्ञान-विज्ञान उपलब्ध कराया जाए,एक अभियान चलाकर. आप चाहें तो इस प्रकार की एक पहल ‘बालसभा’ http://balsabhaa.blogspot.com पर देख सकते हैं . भविष्य में भी आपके विचारों का स्वागत है.आभार.


    हर्षवर्धन जी,
    आपकी आशंका आज प्रत्येक जागरूक विचारचेता की आशंका है.आपके विचारों का स्वागत है, आभार.

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  5. Rahul Dev ji,
    India needs a simple script for all languages or a attached script converter to the websites.
    As per Google Transliteration Gujanagari seems to be India's simplest nukta and Shirorekha free script along with Roman script resembling old Brahmi script.
    So Why not adopt Gujanagari script in writing Hindi?
    Also why not minimize the use of Nukta,chandrabidu and anuswar for an easy readable/teachable Roman transliteration ?

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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