मणिपुरी कविता -डॉ. देवराज [iv]


मणिपुरी कविता-डॉ. देवराज [iv]=======================



मणिपुरी भाषा को भले ही विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक न भी मानें, तो भी यह कहा जा सकता है कि यह भारत की उन प्राचीन भाषाओं में से है जिनका विकास ईसा की प्रथम शताब्दी से प्रारम्भ हो चुका था। यह और बात है कि देश की स्वतंत्रता के ३०-३५ वर्ष तक भी इस भाषा की ओर सरकार का ध्यान नहीं गया, जबकि मणिपुरी के निर्माण और इतिहास का शोध कार्य विदेशी विद्वानॊं का ध्यान आकर्षित कर चुका था।
किसी भी भाषाके विकास को समझने के लिए उसकी लिपि और प्रदेश के इतिहास में झाँकना ज़रूरी है . आइये, डॉ.देवराज के माध्यम से मणिपुर के इतिहास की एक झलक पायें।
"मणिपुरी भाषा की अपनी लिपि है, जिसे ‘मितै मयेक’ कहा जाता है। इसका विकास ब्राह्मी-लिपि से माना जाता है। यह लिपि कब अस्तित्व में आई, इस विषय में विवाद बना हुआ है। विद्वानों का एक वर्ग इसे सातवीं शताब्दी और दूसरा ग्यारहवीं शताब्दी के अंत अथवा बारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में विकसित मानता है। मणिपुरी का प्राचीन एवं मध्यकालीन साहित्य प्राचीन लिपि [मीतै मयेक] में ही उपलब्ध है। कालान्तर में इस लिपि का प्रयोग बन्द हो गया और लेखन का माध्यम बङ्ला-असमीया लिपि हो गई।"
"मणिपुरी भाषा के विकास के सम्बन्ध में मान्यता है कि वर्तमान मानक-मणिपुरी भाषा विभिन्न राजवंशों द्वारा प्रयुक्त बोलियों के मिश्रण का विकसित रूप है। एक समय मणिपुर घाटी सात छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त थी, जिन पर सात राजवंशों का शासन था। इन वंशों को खाबा, चेङ्लै, लुवाङ्, खुमन, मोइराङ्, अङोम और निङथौजा के नाम से जाना जाता है। साहित्येतिहासकार सी-एच.मनिहार सिंह का मानना है कि इनमें से निङथौजा राजवंश सर्वाधिक शक्तिशाली था, यही मीतै का प्रतिनिधि था और सत्तारूढ़ था।...स्वाभाविक रूप से इम्फाल [कङ्ला] में बोली जानेवाली बोली [जिसे निङ्थौजा राजवंश का संरक्षण मिलने के कारण अन्य वंशों की बोलियों पर वरीयता प्राप्त थी] पूरी मणिपुरी घाटी की सम्पर्क बोली बन गई और वही मानक-मणिपुरी कहलाई।"
"मणिपुरी भाषा के विकासात्मक इतिहास के सम्बन्ध में एक सर्वथा भिन्न तथ्य डॉ. इबोहल सिंह काङ्जम ने अपने शोध-ग्रंथ, ‘हिन्दी-मणिपुरी क्रिया संरचना’ में प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि "मणिपुरी भाषा के विकास का मूल आधार स्थानीय बोली, ‘चेङ्लै’ है। विकास का प्रारम्भ ईसा की प्रथम शताब्दी के आसपास माना जाता है। इसका प्रमाण मणिपुरी की पुरानी हस्तलिखित रचनाएँ है।" उन्होंने एक अन्य कार्य मणिपुरी भाषा के विकास के विभिन्न चरणों को प्रस्तुत करने का भी किया है। उनके अनुसार मणिपुरी भाषा के विकास को ‘तीन मुख्य कालों में विभाजित किया जा सकता है: १.प्राचीन काल [प्रथम शताब्दी ई. से १७३०ई. तक] , २. मध्य काल [१७३० ई. से १८९० ई. तक], ३.आधुनिक काल [१८९० ई. से अब तक]।’ इनमें से प्रथम काल में मणिपुरी के अधिकांश शब्द देशज थे, किन्तु यह स्थानीय और क्षेत्रीय बोलियों के साथ ही चीनी तथा बर्मी भाषाओं से भी शब्दों को ग्रहण कर रही थी। डॉ. इबोहल सिंह के अनुसार इस काल के अंतिम चरण तक आते-आते इस भाषा में कई बोलियाँ लुप्त हो गई। मध्यकाल में मणिपुर का सम्पर्क हिन्दू धर्म और संस्कृत भाषा से हुआ। इससे भाषाई एवं साहित्यिक स्तर पर व्यापक परिवर्तन आया। इस काल में बङ्ला भाषा ने भी मणिपुरी को प्रभावित किया। आधुनिक काल में मणिपुरी भाषा का सम्पर्क अंग्रेज़ी, हिन्दी और दूसरी अनेक भाषाओं के साथ ही आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न धाराओं से हुआ, जिससे यह एक विकसित तथा परिमार्जित भाषा बन गई."
(क्रमशः)
प्रस्तुति - चंद्रमौलेश्वर प्रसाद

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