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‘केदार सम्मान’ - २००७ निर्णीत

‘केदार सम्मान’ - २००७ निर्णीत



‘केदार शोध पीठ न्यास’ बान्दा द्वारा सन् १९९६ से प्रति वर्ष प्रतिष्ठित प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में दिए जाने वाले साहित्यिक ‘केदार-सम्मान’ का निर्णय हो गया है। वर्ष २००७ का केदार सम्मान कवयित्री सुश्री अनामिका को उनके काव्य-संग्रह ‘खुरदरी हथेलियाँ ’ के लिए प्रदान किए जाने का निर्णय किया गया है।

यह सम्मान प्रतिवर्ष ऐसी प्रतिभाओं को दिया जाता है जिन्होंने केदार की काव्यधारा को आगे बढ़ाने में अपनी रचनाशीलता द्वारा कोई अवदान दिया हो। प्रकृति-सौन्दर्य व मानवमूल्यों के प्रबल समर्थक कवि केदारनाथ अग्रवाल की ख्याति उनकी कविताओं के टटकेपने व अछूते बिम्बविधान के साथ साथ कविताओं की सादगी व सहजता के कारण विशिष्ट रही।


‘केदार शोध पीठ न्यास’ केदार जी के काव्य अवदान को आगामी पीढ़ी तक पहुँचाने व उनमे काव्य के उस स्तर की पहचान विनिर्मित करने के उद्देश्य से गठित की गई संस्था है। प्रति वर्ष सम्मान का निर्णय कविताओं की वस्तु व विन्यास की इसी कसौटी को ध्यान में रखते हुए ही किया जाता है। इसकी निर्णायक समिति में साहित्य के ५ मर्मज्ञ विद्वान सम्मिलित हैं। प्रति वर्ष सितम्बर में इस पुरस्कार के लिए देश-विदेश के हिन्दी रचनाकारों से प्रविष्टियाँ आमन्त्रित की जाती हैं।

अब तक यह पुरस्कार जिन रचनाकारों को प्रदान किया गया है, उनमे अनामिका तीसरी स्त्री रचनाकार हैं। इस से पूर्व सुश्री गगन गिल व सुश्री नीलेश रघुवंशी को इस श्रेणी में गिना जाता था।

सुश्री अनामिका का औपचारिक परिचय इस प्रकार है--


जन्म : 17 अगस्त 1961, मुजफ्फरपुर(बिहार)।
शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से अँग्रेजी में एम.ए., पी.एचडी.।अध्यापन- अँग्रेजी विभाग, सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।कृतियाँ : गलत पते की चिट्ठी(कविता), बीजाक्षर(कविता), अनुष्टुप(कविता),पोस्ट–एलियट पोएट्री (आलोचना),स्त्रीत्व का मानचित्र(आलोचना),कहती हैं औरतें(कविता–संपादन),एक ठो शहर : एक गो लड़की(शहरगाथा)पुरस्कार/सम्मान : राष्ट्रभाषा परिषद् पुरस्कार, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गिरिजाकुमार माथुर पुरस्कार, ऋतुराज सम्मान और साहित्यकार सम्मान

पूर्व वर्षों की भांति यह पुरस्कार आगामी अगस्त माह में बान्दा में आयोजित होने वाले एक भव्य समारोह में प्रदान किया जाएगा

इस पुरस्कार के लिए केदार सम्मान समिति, केदार शोधपीठ न्यास,‘विश्वम्भरा’, ‘हिन्दी भारत’ समूह व हमारी ओर से अनामिका जी को अनेकश: शुभकामनाएँ।

~कविता वाचक्नवी

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चौका
(अनामिका)



पृथ्वी
ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़
भूचाल बेलते हैं घर
सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समुंदर।

रोज सुबह सूरज में
एक नया उचकुन लगाकर
एक नई धाह फेंककर
मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी।
पृथ्वी– जो खुद एक लोई है
सूरज के हाथों में
रख दी गई है, पूरी की पूरी ही सामने
कि लो, इसे बेलो, पकाओ
जैसे मधुमक्खियाँ अपने पंखों की छांह
पकाती हैं शहद।

सारा शहर चुप है
धुल चुके हैं सारे चौकों के बर्तन।
बुझ चुकी है आखिरी चूल्हे की राख भी
और मैं
अपने ही वजूद की आंच के आगे
औचक हड़बड़ी में
खुद को ही सानती
खुद को ही गूंधती हुई बार-बार
खुश हूँ कि रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी।


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एक औरत का पहला राजकीय प्रवास
(अनामिका)


वह होटल के कमरे में दाखिल हुई
अपने अकेलेपन से उसने
बड़ी गर्मजोशी से हाथ मिलाया।
कमरे में अंधेरा था
घुप्प अंधेरा था कुएं का
उसके भीतर भी !

सारी दीवारें टटोली अंधेरे में
लेकिन ‘स्विच’ कहीं नहीं था
पूरा खुला था दरवाजा
बरामदे की रोशनी से ही काम चल रहा था
सामने से गुजरा जो ‘बेयरा’ तो
आर्त्तभाव से उसे देखा
उसने उलझन समझी और
बाहर खड़े-ही-खड़े
दरवाजा बंद कर दिया।

जैसे ही दरवाजा बंद हुआ
बल्बों में रोशनी के खिल गए सहस्रदल कमल !
“भला बंद होने से रोशनी का क्या है रिश्ता?” उसने सोचा।

डनलप पर लेटी
चटाई चुभी घर की, अंदर कहीं– रीढ़ के भीतर !
तो क्या एक राजकुमारी ही होती है हर औरत ?
सात गलीचों के भीतर भी
उसको चुभ जाता है
कोई मटरदाना आदम स्मृतियों का ?

पढ़ने को बहुत-कुछ धरा था
पर उसने बांची टेलीफोन तालिका
और जानना चाहा
अंतरराष्ट्रीय दूरभाष का ठीक-ठीक खर्चा।

फिर, अपनी सब डॉलरें खर्च करके
उसने किए तीन अलग-अलग कॉल।

सबसे पहले अपने बच्चे से कहा–
“हैलो-हैलो,बेटे–
पैकिंग के वक्त... सूटकेस में ही तुम ऊंघ गए थे कैसे...
सबसे ज्यादा याद आ रही है तुम्हारी
तुम हो मेरे सबसे प्यारे !”

अंतिम दो पंक्तियाँ अलग-अलग उसने कहीं
आफिस में खिन्न बैठे अंट-शंट सोचते अपने प्रिय से
फिर, चौके में चिंतित, बर्तन खटकती अपनी माँ से।

...अब उसकी हुई गिरफ्तारी
पेशी हुई खुदा के सामने
कि इसी एक जुबां से उसने
तीन-तीन लोगों से कैसे यह कहा–
“सबसे ज्यादा तुम हो प्यारे !
”यह तो सरासर है धोखा
सबसे ज्यादा माने सबसे ज्यादा !

लेकिन, खुदा ने कलम रख दी
और कहा–“औरत है, उसने यह गलत नहीं कहा !”

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कूड़ा बीनते बच्चे
(अनामिका)

उन्हें हमेशा जल्दी रहती है
उनके पेट में चूहे कूदते हैं
और खून में दौड़ती है गिलहरी!
बड़े-बड़े डग भरते
चलते हैं वे तो
उनका ढीला-ढाला कुर्ता
तन जाता है फूलकर उनके पीछे
जैसे कि हो पाल कश्ती का!
बोरियों में टनन-टनन गाती हुई
रम की बोतलें
उनकी झुकी पीठ की रीढ़ से
कभी-कभी कहती हैं-
‘ कैसी हो","कैसा है मंडी का हाल?"
बढ़ते-बढ़ते
चले जाते हैं वे
पाताल तक
और वहाँ लग्गी लगाकर
बैंगन तोड़ने वाले
बौनों के वास्ते
बना देते हैं
माचिस के खाली डिब्बों के
छोटे-छोटे कई घर
खुद तो वे कहीं नहीं रहते,
पर उन्हें पता है घर का मतलब!
वे देखते हैं कि अकसर
चींते भी कूड़े के ठोंगों से पेड़ा खुरचकर
ले जाते हैं अपने घर!
ईश्वर अपना चश्मा पोंछता है
सिगरेट की पन्नी उनसे ही लेकर।
‘केदार सम्मान’ - २००७ निर्णीत ‘केदार सम्मान’ - २००७  निर्णीत Reviewed by Kavita Vachaknavee on Sunday, April 06, 2008 Rating: 5

1 comment:

  1. केदार सम्‍मान-2007 अलंकरण हेतु अनामिका जी को बधाई।
    ...न च मे प्रवृत्ति: की तर्ज पर बुनी हुई कविता 'एक औरत का पहला राजकीय प्रवास' देर तक मन को कुलबुलाती

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