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रंगों की सीपी से निकला यह प्यार-भरा झिलमिल मोती (रंग परिशिष्ट)




भारत सदा से ही कृषिप्रधान व धरती पुत्रों का देश रहा है, जिसकी अपनी एक विराट् गौरवशाली व समृद्ध आदि-संस्कृति है। नवान्न आने पर नवसस्येष्टियज्ञ की परिपाटी व इसके साथ साथ ऋतु परिवर्तन का काल, उत्साह, उल्लास, उमंगों को दोलायमान करने को काफ़ी होता है। बहुत सारी कथाएँ समानांतर चलती आई हैं।

साहित्य की धारा में रंगों की गुनगुन-रुनझुन कई लहरों पर गीत गाती चलती आई है। उनमें से होली के बहाने कुछ रंग हम सभी के, मानवमात्र के ललाट पर शुभकामनाओं की भाग्य रेखा बन दमकें,इस शुभकामना के साथ प्रस्तुत हैं कुछ रंगों के झिलमिलाते मोती. निराला के कुछ रंग-चित्र टुकड़ों -टुकड़ों में बाँटने का लोभ इस अवसर पर सम्वरण नहीं करना चाहिए, सो उनकी कविता के रंगो की छटा के साथ कुछ अन्य कविताओं का आनन्द भी बाँट रही हूँ।
-------------------------------------------------------(कविता वाचक्नवी)









निराला : कुछ रंग-चित्र


१)

तिल नीलिमा को रहे स्नेह से भर
जग कर नई ज्योति उतरी धरा पर
रंग से भरी हैं, हरी हो उठी हर
तरु की, तरुण-तान शाखें

२)
खिली चमेली देह-गन्ध मृदु
अम्धकार शुचि केश कुटिल ऋजु
सहन-शीत-सित यौवन अविचल
मानव के मन की चिर कारा

३)
हँसता हुआ कभी आया जब
वन में ललित वसन्त
तरुण विटप सब हुए, लताएँ तरुणी
और पुरातन पल्लव-दल का
शाखाओं से अन्त

४)
पत्तों से लदी डाल
कहीं हरी, कहीं लाल
कहीं पड़ी है उर में
मंद-गंध-पुष्प-माल
पाट-पाट शोभा श्री
पट नहीं रही है

५)
फिर नवल-कमल-वन फूलें
फिर नयन वहाँ पथ भूलें
फिर फूलों नव वृन्तों पर
अनुकूलें अलि अनूकूलें





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होली: रंग और दिशाएँ
[एक एब्स्ट्रेक्ट पेंटिंग]


=========== ...(शमशेर बहादुर सिंह)


१.
जँगले जालियाँ,
स्तम्भ
धूप के संगमर्मर के,
ठोस तम के।
कँटीले तार हैं
गुलाबी बाडि़याँ।
दूर से आती हुई
एक चौपड़ की सड़क
अंतस में
खोई जा रही।

धूप केसर आरसी
......बाहें।
आँख अनझिप
खुलीं
वक्ष में।
स्तन
पुलक बन
उड़ते और
मुँदते।

पीले चाँद
खिड़कियाँ
आत्मा की।

गुलाल
धूल में
फैली
सुबहें।
मुख
सूर्य के टुकडे़
सघन घन में खुले-से,
या ढके
मौन,
अथवा
प्रखर
किरणों से।

जल
आइना।
सड़कें
विविध वर्ण:
बहुत गहरी।
पाट चारों ओर
दर्पण-
समय के अगणित चरण को।

घूमता जाता हुआ-सा कहीं, चारों ओर
वह
दिशाओं का हमारा
अनंत
दर्पण।



२.
चौखटे
द्वार
खिड़कियां:
सघन
पर्दे
गगन के-से:
हमीं हैं वो
हिल रहे हैं
एक विस्मय से:
अलग
हर एक
अपने आप:
[हँस रहे हैं
चौखटे द्वार
खिड़कियाँ जँगले
हम आप।]
केश
लहराते हैं दूर तक
हवा में:
थिरकती है रात
हम खो गए हैं
अलग-अलग
हरेक।


३.
कई धाराएं
खडी़ है स्तंभवत
गति में:
छुआ उनको,
गए।
कई दृश्य
मूर्त्त द्वापर
और सतयुग
झांकते हैं हमें
मध्ययुग से
खिल-खिलाकर
माँगते हैं हमें:
हमने सर निकाला खिड़कियों से
और हम
गए।
सौंदर्य
प्रकाश है।

पर्व
प्रकाश है
अपना।
हम मिल नहीं सकते:
मिले कि
खो गए।
आँच है रंग
तोड़ना उनका
बुझाना है
कहीं अपनी चेतना को।
लपट
फ़ूल हैं
कोमल
बर्फ़ से:
हृदय से उनको लगाना
सींझ देना है
वसंत बयार को
सांस में:
वो हृदय है स्वयं।
़ ़
एक ही ऋतु हम
जी सकेंगे,
एक ही सिल बर्फ़ की
धो सकेंगे
प्राण अपने।
[कौन कहता है?]

यहीं सब कुछ है।
इसी ऋतु में
इसी युग में
इसी
हम में। [१९५८]

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फिर लौट आया है बसन्त
( नरेन्द्र पुण्डरीक)


तुम्हें मालूम हो या न हो
लेकिन कलियों के जिस्म में
रंगों की धकापेल मचाता हुआ
फिर लौट आया है बसन्त,
पहले से कहीं ज्यादा !
गदराकर साफ़ हो गई है नदी,
धुल गया है आकाश,
हर तरफ़ पड़ रही है -
गुदगुदा रही है सूरज की रोशनी
जाड़े की सर्द,मादक
थपकियों से
धरती को धीरे-धीरे
गर्म करती हुई,
भरती हुई उसके जिस्म में एक चमक,
और हमारे खूनों में
वक्त के खिलाफ़ एक बेचैनी !

फिर लौट आया है बसन्त
पूरे साल की रोटी के सवाल को
अपनी गर्माहट से पकाता हुआ,
हमारी बेकल इच्छाओं की ओर,
हमारे सपनों के राग में
फिर लौट आया है बसन्त ।

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रंगों की परिभाषा

(डॊ. देवराज)


मुझ से मेरे मन ने पूछा
होली की क्या परिभाषा है
मैं बोला - केवल मादकता
बस इतना अर्थ जरा-सा है।


रंगों की सीपी से निकला
यह प्यार-भरा झिलमिल मोती
हम ज्यों ही गले मिले हँस दी
वह आँख अभी थी जो रोती
छंदों की भाषा मौन यहाँ
पलकों की मधुमय भाषा है।


गेहूँ की बाली का यौवन
सरसों के पग की बन पायल
लय- ताल साधता बेसुध हो
सबका अन्तर करता घायल
दीवारें सब बह जाती हैं
रंगों का अजब तमाशा है ।।

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धुआँ और गुलाल

( डॊ.ऋषभदेव शर्मा)



सिर पर धरे धुएँ की गठरी
मुँह पर मले गुलाल
चले हम
धोने रंज मलाल !



होली है पर्याय खुशी का
खुलें
और
खिल जाएँ हम;
होली है पर्याय नशे का -
पिएँ
और
भर जाएँ हम;
होली है पर्याय रंग का -
रँगें
और
रंग जाएँ हम;
होली है पर्याय प्रेम का -
मिलें
और
खो जाएँ हम;
होली है पर्याय क्षमा का -
घुलें
और
धुल जाएँ गम !

मन के घाव
सभी भर जाएँ,
मिटें द्वेष जंजाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !




होली है उल्लास
हास से भरी ठिठोली,
होली ही है रास
और है वंशी होली
होली स्वयम् मिठास
प्रेम की गाली है,
पके चने के खेत
गेहुँ की बाली है
सरसों के पीले सर में
लहरी हरियाली है,
यह रात पूर्णिमा वाली
पगली
मतवाली है।

मादकता में सब डूबें
नाचें
गलबहियाँ डालें;
तुम रहो न राजा
राजा
मैं आज नहीं कंगाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !




गाली दे तुम हँसो
और मैं तुमको गले लगाऊँ,
अभी कृष्ण मैं बनूँ
और फिर राधा भी बन जाऊँ;
पल में शिव-शंकर बन जाएँ
पल में भूत मंडली हो।


ढोल बजें,
थिरकें नट-नागर,
जनगण करें धमाल;
चले हम
धोने रंज मलाल !

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होली के दो छंद
( योगेन्द्र मौदगिल )


)
होली के बहाने करें गोरियों के गाल लाल
अंग पे अनंग की तरंग आज छाई सी
बसंत की उमंग मन होली के बहाने चढी
भंग की तरंग रंग ढंग बल खाई सी
सजना मलंग हुए सजनी मॄदंग हुई
रास रति रंग रत हवा लहराई सी
दंग हुए देख लोग प्रेम के प्रसंग आज
छुइ मुइ जोडियां भी कैसी मस्ताई सी

२)
मीठी मीठी बोलियों के भीगी भीगी चोलियों के
होली के नजारे सब आंखों को सुहाते हैं
रस रंग भाव रंग लय रंग ताल रंग
देख के उमंग को अनंग मुस्काते हैं
सारे मगरूर हुए भंग के नशे में चूर
प्रेम के पुजारी हो मलंग इठलाते हैं
लाग ना लपेट कोई ईर्ष्या ना द्वेष कोई
प्रेम के त्यौहार ही प्रसंग सुलझाते हैं




आगमन वसन्त का
( येव्गेनी येव्तुशंको )
सहयात्रा, मास्को हिन्दी महोत्सव-स्मारिका-२००७



धूप खिली थी
और रिमझिम वर्षा
छत पर ढोलकी-सी
बज रही थी
लगातार
सूर्य ने फैला रखी थी बाँहें अपनी
वह जीवन को आलिंगन में भरे
कर रहा था प्यार



नव अरुण की
ऊष्मा से
हिम सब पिघल गया था
जमा हुआ
जीवन सारा तब
जल में बदल गया था
बसन्त कहार बन
बहँगी लेकर
हिलत-डुलता आया ऐसे
दो बाल्टियों में
भर लाया हो
दो कम्पित सूरज जैसे ।

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रंगों की सीपी से निकला यह प्यार-भरा झिलमिल मोती (रंग परिशिष्ट) रंगों की सीपी से निकला यह प्यार-भरा झिलमिल मोती (रंग परिशिष्ट) Reviewed by Kavita Vachaknavee on Wednesday, March 19, 2008 Rating: 5

5 comments:

  1. 'रंग परिशिष्ट' मात्र परिशिष्ट नहीं , मुख्य कथन बन गया है -होली के अवसर का . निराला और शमशेर की चयित अभिव्यक्ति ने वसंत और फागुन के प्रकृति और जीवन के रंगों से मन को सराबोर कर दिया -इसमें संदेह नहीं .
    नरेन्द्र पुण्डरीक तथा डॉ . देवराज की कविताओं का रंग अनूठा है , तो योगेन्द्र मौद्गिल की पंक्तियाँ फाग की मस्ती में ऊभ -चूभ करते -करते रस में डूब - डूब जा रही हैं .
    रूसी कविता ने तो इस संचयन को सचमुच अन्तरराष्ट्रीय ही बना डाला है.
    इन सब के साथ अपनी रचना को देखना मेरे लिए सुखद है . आभार
    पर आपकी काव्य पंक्तियाँ इस होली के सन्दर्भ में अभी प्रतीक्षित हैं .उनके बिना यह चयन अधूरा है . हाँ ,आरंभ में प्रस्तुत टिप्पणी भी किसी कविता से कम नहीं .
    रंग पर्व की अनंत शुभकामनाएं

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  2. बहुत सुन्दर संकलन ! होली का यह उपहार विशिष्ट रहा ।
    इला

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  3. इला जी ,
    आपके `मेल' के बाद आप की टिप्पणी प्रतीक्षित ही थी| आज आपने समय निकालकर पुन: देखा है,अच्छा लगा|

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  4. एक सुन्‍दर संकलन.. और बहुमूल्‍य भी। निराला के रंग-चित्रों से आरम्‍भ होकर होली के बहाने अनेक कवियों की रचना-भंगिमा एक साथ देखने को मिली। अस्‍तु, साधुवाद।

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  5. धन्यवाद आशीष जी, क्रम बनाए रहें.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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