भारत में अन्तरिक्ष युग का उदय : मौलिक विज्ञानलेखन






गतांक पर उठे कुछ प्रश्नों के समाधान तिवारी जी ने ईमेल से सीधे प्रश्नकर्ताओं को भी यद्यपि भेज दिए हैं पुनरपि उन शंकाओं के उत्तर उस आलेख से अगली इस कड़ी के साथ भी देने की अनिवार्यता के कारण प्रथम उन उत्तरों को ही देखें, पश्चात अगली कड़ी को यहाँ प्रश्नोत्तर के नीचे  पढ़ें |  


सत्यनारायण शर्मा कमल जी ने  हिन्दी-भारत याहूसमूह  में ईमेल द्वारा  पूछा था -
 क 
 डा० रघुनाथन ने क्वेसार से निकले तापक्रम की जब खोज की थी  बताया जा रहा है की उस समय ब्रह्माण्ड  की आयु आज की पंचमांश थी | यह कथन  समझ में न आया |

क्या ब्रह्माण्ड की आयु में डा० रघुनाथन के प्रयोगों के समय से अब तक की अल्पावधि में ब्रह्माण्ड की आयु पंचगुनी बढ़ गई है ? ऐसा संभव तो नहीं लगता | इसका स्पष्टीकरण आवश्यक है |
कमल 

प्रश्नोत्तर  हैं

१) 
डा० रघुनाथन ने क्वेसार से निकले तापक्रम की जब खोज की थी  बताया जा रहा है की उस समय ब्रह्माण की आयु आज की पंचमांश थी | यह कथन समझ में न आया |

उत्तर : आज ब्रह्माण्ड की आयु १३.७ अरब वर्ष है, अत: उस समय उसकी आयु २.७ अरब वर्ष थी.

२)
क्या ब्रह्माण्ड की आयु में डा० रघुनाथन के प्रयोगों के समय से अब तक की अल्पावधि में ब्रह्माण्ड की आयु पंचगुनी बढ़ गई है ? ऐसा संभव तो नहीं लगता | इसका स्पष्टीकरण आवश्यक है |
उत्तर :  उपरोक्त उत्तर से इस शंका का भी निवारण हो जाता है. पंचमांश कहने का अर्थ उसकी शिशुता के  बोध को दर्शाना था कि इतनी कम आयु में ऐसा हुआ. क्वेसार ब्रह्माण्ड कि शैशव अवस्था में अधिक मिलते हैं..

धन्यवाद कि आपने यह प्रश्न पूछा क्योंक शायद अन्य के मन में ऐसे प्रश्न हो सकते हैं.
विश्व मोहन तिवारी 

 ख
अर्कजेश ने पूछा -

लेकिन आइन्स्टीन को नोबेल पुरस्कार फोटो इलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट पर मिला था, जिसका आधार क्वांटम सिद्धान्त था। न कि ई = एमसी स्क्वायर पर । 

उत्तर :  
अर्कजेश का कथन सत्य है।
उऩ्हें नोबेल पुरस्कार प्रकाश विद्युत प्रभाव पर ही मिला था।शायद यहाँ यह बतलाना उचित होगा कि ई = एम सी स्क्वएअर सूत्र का उऩ्होने प्रकाश विद्युत प्रभाव वाले प्रपत्र भेजने के तुरंत बाद ही उसी के सिद्धान्त पर आविष्कार किया था। और उसे तुरंत ही प्रकाशन के लिये भेज दिया था इस अनुरोध के साथ कि उसे प्रकाश विद्युत प्रभाव के प्रपत्र के साथ ही प्रकाशित किया जाए। किन्तु तब तक वह प्रपत्र प्रकाशित हो चुका था अतएव वह एक स्वतंत्र प्रपत्र के रूप में प्रकाशित हुआ। 

------------------------------------------------------------------------------



भारत में अन्तरिक्ष युग का उदय



मानव जाति का अन्तरिक्ष में विचरण आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की महानतम उपलब्धि है। इससे पहले अन्तरिक्ष सम्बन्धी अनेक किंवदन्तियाँ तथा काल्पनिक अथवा पौराणिक कथाएँ प्रचलित थीं।ऋग्वेद के दसवें मंडल के एक सौ इक्कीसवे सूक्त का दूसरा मंत्र जो अर्थ देता है, उस पर सहसा विश्वास नहीं होता। उसका जो भाष्य मैंने किया है उसे मानक अर्थ के बाद दिया है : पहला मानक अर्थ – ‘जहाँ सूर्य चंद्रादि पिण्ड विद्यमान हैं, जहाँ सूर्य रश्मियो का क्षय नहीं होता, ऐसे अन्तरिक्ष में चमकरहित विशिष्ट गेरुए वस्त्र धारण कर, मुनि वायु की रस्सी द्वारा प्रदत्त संवेग के अनुसार गमन करते हैं। मेरा भाष्य - जहाँ  सूर्य चंद्रादि पिण्ड विद्यमान हैं, जहाँ वातावरण न होने के कारण सूर्य की रश्मियों का क्षय नहीं होता, ऐसे अन्तरिक्ष में सूर्य किरणो को सोखकर, उनसे सौर पटलो की तरह अधिकांश ऊर्जा सोखने वाले चमकरहित विशिष्ट गेरुए स्पेस धारण कर मुनि निर्गत गैसो का रस्सी के समान अथार्त निर्गत गैसो के बल का उपयोग कर गमन करते हैं।



वैदिक युग में राकैट की अभिकल्पना :

     इस मंत्र के अर्थ में आधुनिक विज्ञान के मूलभूत सिद्वान्त छिपे लगते हैं। ‘सूर्यरश्मियों का क्षय नहीं होता’ इससे दो अर्थ निकल सकते हैं, एक तो यह कि ऊर्जा का विनाश नहीं होता और दूसरा यह कि जैसे प्रकाश किरणों का पृथ्वी पर वायुमण्डल के कारण क्षय होता है, वैसा क्षय अन्तरिक्ष में नहीं होता अथार्त वहाँ शून्य है। ‘मुनि वायु की रस्सी के द्वारा’ इसका अर्थ अतिशक्तिशाली रॉकेटो के प्रमोचन को देखने के पहले वैज्ञानिक ढंग से समझ में नहीं आता। किन्तु जिसने भी उपग्रहो का रॉकेट द्वारा प्रमोचन देखा है वह समझ जायेगा कि रॉकेट वास्तव में निर्गत गैसो (वायु की रस्सी) पर कैसे चढ़ता है। इस अर्थ की पुष्टि आगे फिर होती है – ‘वायु द्वारा प्रदत्त संवेग के अनुसार गमन करते हैं’ अथार्त रॉकेट से निर्गत गैसें जो प्रतिक्रिया (वेग तथा दिशा में) रॉकेट को देती हैं, रॉकेट उसी के अनुसार गमन करता है। यहाँ न्यूटन का तीसरा नियम लग रहा है जो कहता है कि प्रत्येक क्रिया की ठीक बराबर ही प्रतिक्रिया होती है। इस अर्थ की गहराई पर सहसा विश्वास नहीं होता, इसे पुष्ट करने के लिए और भी शोध की आवश्यकता है कि क्या उऩ्हे सच ही न्यूटन के इस तीसरे नियम का ज्ञान था।



अन्तरिक्ष में यात्रा करने के लिए हमें यह अहसास तो होना चाहिए कि अन्तरिक्ष में जो नक्षत्र टिमटिमा रहे हैं वे मात्र प्रकाश–पिण्ड नहीं हैं वरन उनमें लोको की संभावना है। यह अनुभूति तो हमारे ऋषियों को विश्व में सर्वप्रथम हुई किन्तु तब भी यह अन्तरिक्ष के विभिन्न लोकों में विचरण की कथाएँ मिथक ही हैं, वे मिथक चाहे मिथक के रूप में प्रातिभ रुप से अत्यंत शक्तिशाली क्यो न हो। यह भी कम आश्चर्य नहीं कि उन्हें समय के सापेक्ष होने का स्पष्ट आभास भी था। हमारे हजारों वर्ष पुराने मिथको में अन्तरिक्ष यात्राओं के वर्णन के बरअक्स यूनान में ईसा की दूसरी शती में सामीसटा के लूसियन ने चन्द्रयात्रा पर पूर्णत: काल्पनिक व्यंगात्मक पुस्तिका लिखी थी। बारहवीं शती में भास्कराचार्य ने पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति के होने की घोषणा की थी किन्तु वह एक वैचारिक अवधारणा थी चाहे वह कितनी भी अद्भुत, मौलिक एवं क्रांतिकारी थी। उन्होने गुरुत्वाकर्षण को गणितीय नियमो में पूर्णत: व्याख्यायित नहीं किया था।



न्यूटन का अंतरिक्ष में प्रवेश :  
जो नियम न्यूटन (1642–1727) ने सत्रहवीं शती में खोजे थे वह पृथ्वी पर होने वाली घटनाओं के लिए पूर्ण सत्य उतरते थे किन्तु पृथ्वी से थोड़ी दूर, उदाहरणार्थ बुध ग्रह की गतियो के लिए भी वे कामचलाऊ हो जाते थे। पूर्ण परिशुद्धता के लिए बीसवीं शती में आइन्स्टाइन द्वारा खोजे गए नियमो की आवश्यकता थी, बिना इन नियमों की जानकारी के अन्तरिक्ष में निकटतम पिण्ड चन्द्र तक भी यात्रा नहीं की जा सकती। अतएव अब तक की वैज्ञानिक सोच समझ से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि पुरातन शास्त्रो, मिथको, महाकाव्यो में वर्णित विमान तथा अन्तरिक्ष यात्राएं यथार्थ नहीं कल्पना अथवा मिथक हैं, जिनका उस पुरातन काल में वर्णन अद्वितीय कल्पना शक्ति के होने को प्रमाणित अवश्य करता है।



प्रौद्योगिकी को कितना उन्नत होना चाहिए अन्तरिक्ष में उड़ान भरने के लिए, उसका अनुमान रॉकेटों से तो लगता ही है, एक और छोटी सी बात से भी लगता है कि एक प्रक्षेपकयान में 5–6 लाख कलपुर्जे होते हैं और इनका संयोजन जटिल होता है। आज के अन्तरिक्ष उड़ान की नींव, ऐसा कह सकते हैं, लगभग एक हजार वर्ष पूर्व पड़ी थी जब बारूद से उड़ने वाला रॉकेट बना। हम गर्व से कह सकते हैं कि विस्फोटक पदार्थों का निर्माण भारत में ईसा से 200 वर्ष पूर्व हो चुका था। शुक्रनीति ग्रन्थ में अग्नि चूर्ण नाम से इसका वर्णन है। रॉकेट विज्ञान के विषय में निश्चित प्रमाण भारत में नहीं मिलते यद्यपि अग्नि बाण अथवा अग्नि–आयुधो की चर्चा पुराणो में मिलती है। 1232 ई. में चीन के होनान प्रांत की राजधानी काई फैंग को जब मंगोलो ने घेर लिया था तब चीनियो ने प्राथमिक रॉकेट तथा बमो का उपयोग किया था और इसके तुरंत बाद ही रॉकेट यूरोप में उपयोग किए गए थे। मानव की अन्तरिक्ष में विचरण करने की मिथकीय एवं उदात्त महत्वाकांक्षा, तथा पिछली शताब्दी की चांद तक उड़ने की मूखर्तापूर्ण लगने वाली कथाएं अब अदम्य साहसी वास्तविकता में बदल चुकी हैं और साहसी एवं जिज्ञासु मानव की ज्ञान–पिपासा को पूर्ण करने के लिए अब अन्तरिक्ष खुल गया है। यही शुद्ध जिज्ञासा मनुष्य के ज्ञानवृद्धि के विकास एवं सभ्यता के विकास की आधारशिला है। विज्ञान–गल्प और तथ्य साहित्यिको की कल्पना की उड़ानें यदा–कदा बाद में वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक तथ्य बन जाते हैं। सन् 1865 में जूल्सवर्न ने ‘पृथ्वी से चन्द्र तक’ नामक उपन्यास लिखा और उसमें जो अनुमान उसने लगाए उनमें से अनेक बाद में सत्य निकले। इसके कुछ वर्षों बाद एक और लेखक एडवर्ड हेल ने सन् 1870 में ‘ब्रिकमून’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें उसने पहली बार कृत्रिम उपग्रहो की स्थापना की बात की और सुझाया कि इनका उपयोग समुद्र यात्रा में दिक्–संचालन के लिए किया जा सकेगा। सन् 1901 में एच. जी. वैल्स की प्रसिद्ध पुस्तक ‘चन्द्र पर पहला आदमी’ आई।



विज्ञान का अंतरिक्ष में प्रवेश : 
सन 1895 में एक रूसी वैज्ञानिक तथा गणित के शिक्षक त्सिओलकोव्स्की ने एक आलेख प्रकाशित किया था, जिसमें उसने सर्वप्रथम ठोस ईंधन के स्थान पर तरल ईंधन के उपयोग को अधिक प्रभावी सिद्ध किया। उसने अन्तरिक्षयानों के अभिकल्प सिद्धान्त स्थापित किए तथा बहुत लम्बी अन्तरिक्ष यात्राओं के लिए अन्तरिक्षयानो में आक्सीजन प्राप्त करने के लिए पौधो के उगाने का भी सुझाव दिया। अमेरिका में गोडार्ड ने भी स्वतंत्र रूप से इसी दिशा में क्रांतिकारी अनुसंधान किए तथा नवीन रॉकेटो की रचना की । सन् 1926 में उसने सर्वप्रथम तरल–ईंधन का उपयोग करने वाले रॉकेट का प्रमोचन किया। बाद में एक आलेख में चन्द्र तक पहुँचने की संभावना दर्शाई। लगभग इसी काल में एक जर्मन आविष्कारक गांसविन्ट ने प्रमोदन का नया तरीका सुझाया और वह पहला वैज्ञानिक है जिसने रॉकेटो द्वारा पृथ्वी से ‘पलायन–वेग’ (वह वेग जिसे प्राप्त कर रॉकेट या अन्तरिक्षयान पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के बाहर जा सकते हैं। यह वेग 40,000 किमी प्रति घंटा या 11 किमी प्रति सैकेंड है) की संभावना की वैज्ञानिक चर्चा की।सन 1928 में त्सिओल्कोवस्की ने सौरमंडल में भ्रमण की भविष्यवाणी की गोडार्ड , त्सिओल्कोवस्की तथा वॉन ब्राउन की त्रिमूर्ति को अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी का पायोनियर माना जाता है। रॉकेट प्रौद्योगिकी ने सबसे अधिक प्रगति द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी में वान ब्राउन के नेतृत्व में की। वी–2 रॉकेट के निर्माता वान ब्राउन ने अमेरिका जाकर महत्वपूर्ण कार्य किए और फिर निर्माण हुआ भयंकर अन्तर्महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों का यथा पोलेरिस, माइन्यूटमैन, पोज़ाइडान आदि का । इन्हीं अन्तर्महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रो का अन्तरिक्षयानो के लिए अभिवर्धक (बूस्टर इंजन) की तरह उपयोग किया गया । पृथ्वी की सतह से लगभग 400–500 किमी की ऊँचाई अर्थात वायुमंडल के बाद अन्तरिक्ष ही अन्तरिक्ष माना जाता है। मौसम की जानकारी के लिए भी रॉकेटों का उपयोग सन् 1946 से प्रारंभ हुआ। परिज्ञापन रॉकेट द्वारा वायुमंडल में तापक्रम, दबाव, वायुवेग इत्यादि गुणों को मौसम की जानकारी के लिए मापा जाता है।



थुम्बा गाँव का अंतरिक्ष : 
भारत में सन् 1963 में संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता से अरब सागर के तट पर त्रिवेन्द्रम शहर से 10 किलोमीटर दूर थुम्बा भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रमोचन केन्द्र स्थापत किया गया। चुम्बकीय भूमध्यरेखा के अत्यन्त समीप होने के कारण इस स्थान से पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का अध्ययन करना एक विशेष महत्व रखता है। थुम्बा से सर्वप्रथम अमेरीका से प्राप्त रॉकेट, नाइक–अपाची को 21 नवम्बर, 1963 को प्रमोचित किया गया। थुम्बा के इस प्रमोचन स्थल को सन् 1968 में संयुक्त राष्ट्र संघ को समर्पित किया गया। भारत में रोहिणी शृंखला के अनेक मॉडल के परिज्ञापन रॉकेटों का विकास किया गया, जिनमें से प्रमुख हैं आर. एच.–200, आर. एच–300 एवं आर. एच–560। इसमें आर. एच. अक्षरों को रोहिणी शब्द के लिए प्रयोग किया गया, तथा साथ अंक में दी गयी संख्या रॉकेट के व्यास (मिलीमीटर में) का सूचक है। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन का विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केन्द्र (थिरुअनन्तपुरम) परिज्ञापन रॉकेटों के विकास का मुख्य केन्द्र है। यहाँ के विकसित रॉकेटों का उपयोग जर्मनी, इंग्लैड, रुस, फ्रांस, जापान तथा बुल्गेरिया के वैज्ञानिकों ने किया है । सन १९९८ तक यहाँ से 500 से अधिक राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रयोग सम्पर्क हो चुके हैं। शार केन्द्र से 6 अप्रैल, 1997 को रोहिणी शृंखला के मॉडल के समुन्नत रॉकेट का प्रमोचन किया । यह नवीनतम उच्च–क्षमतावाला रॉकेट अपनी प्रायौगिक उड़ान में 102 किलोग्राम नीतभार 464 किलोमीटर की ऊँचाई तक ले गया । आर. एच. – 200 की क्षमता 10 किलोग्राम नीतभार को 75 किलोमीटर तक तथा आर. एच.–300 की क्षमता 60 किलोग्राम ऊँचाई तक ले जाने की है।





‘अन्तरिक्ष–युग’ : 
  4 अक्तूबर, 1957 को अन्तरिक्ष–विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली जब सोवियत संघ ने पहला अन्तरिक्ष यान ‘स्पुतनिक–1’ अन्तरिक्ष में भेजा। कुछ ही महीनो के अन्दर, जनवरी 1958 में अमेरिका ने भी एक उपग्रह ‘एक्सप्लोरर’ अन्तरिक्ष में भेजा। इसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा और अन्तरिक्ष में विभिन्न प्रकार के उपग्रहो की बाढ़ सी आ गई। फ्रांस, जापान, चीन, ब्रिटेन और भारत आदि देशो ने भी अन्तरिक्षयान बनाए और अन्तरिक्ष में पदार्पण किया। बाद में विशेष प्रयोजनो के लिए विशिष्ट उपग्रहो का विकास किया गया। पृथ्वी तथा जीव की उत्पत्ति, मौसम, प्राकृतिक विपदाओं की पूर्व—सूचना, संचार व्यवस्था, टी. वी. प्रसारण सेवा, आसूचना एकत्र करना, सामरिक सर्वेक्षण तथा निरीक्षण इत्यादि कार्यों में उपग्रह प्रणाली ने क्रांति ला दी। आज उपग्रह–संचार–व्यवस्था ने इस विशाल विश्व को एक गांव–सा बना दिया है। वह दिन दूर नहीं जब भारत में एक सुदूर गांव में बैठा व्यक्ति सैकड़ो–हजारो मील दूर वांछित व्यक्ति से केवल फोन पर बात ही नहीं कर सकेगा, वरन पर्दे पर उसका चित्र भी देख सकेगा–जैसे आमने–सामने वार्तालाप हो रहा हो। विदेशो में तो वीडियो फोन की सुविधा उपलब्ध हो ही गई है। अत: इस युग को ‘अन्तरिक्ष–युग’ कहना उचित है। सन 1945 में विज्ञान कथाकार आर्थर क्लार्क ने लिखा था कि यदि भू–स्थिर कक्षा में समान दूरी पर मात्र तीन उपग्रह स्थापित कर दिए जाएं तो विश्व भर में दूरसंचार संभव हो सकेगा। उसने जो स्वप्न देखा था, वह तब पूरा हुआ जब उसकी इस सोच को कार्यान्वित कर सन 1964 में एक साथ लाखो अमरीकी घरो में '(रियल टाइम ) तत्काल टी. वी.' पर टोकियो ओलम्पिक देखा गया।



भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम :   
भारत ने अन्तरिक्ष अनुसंधान के कार्यक्रम का शुभारंभ सन् 1957 में किया। इस दिशा में प्रथम प्रयास था नैनीताल स्थित वेधशाला में प्रकाशीय अनुवर्तन केन्द्र की (टेलिस्कोप द्वारा उपग्रहों का अनुवर्तन करना) स्थापना। इस छोटी सी शुरूआत के बाद भारतीय वैज्ञानिको ने 23 वर्ष की अवधि में ही 18 जुलाई 1980 को रोहिणी–1, का प्रमोचन कर अन्तरिक्ष खोज की दौड़ में भारत को विकसित राष्ट्रो की श्रेणी में पहुँचा दिया। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम की योजनाबद्ध शुरूआत सन 1961 में हुई जब ‘परमाणु ऊर्जा आयोग’ में ‘अन्तरिक्ष अनुसंधान अनुभाग’ की स्थापना हुई। सन् 1969 में इसने एक विशाल संस्था का रूप ले लिया और उसका नाम रखा गया ‘भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (इण्डियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइज़ेशन–आई.एस.आर.ओ.–इसरो)। सन् 1962 में ‘भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान अनुभाग’ ने थुम्बा ‘भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रमोचन केन्द्र’ का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया। सन् 1963 में थुम्बा में ‘अन्तरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केन्द्र’ की स्थापना हुई। सन् 1972 में ‘अन्तरिक्ष आयोग’ (स्पेस कमीशन) की स्थापना हुई। 1972 से 1976 तक विभिÙ वैमानिक दूर–संवेदन प्रयोग किये गये।



19 अप्रैल, 1975 को भारत ने सोवियत संघ की सहायता से अपना पहला उपग्रह आर्यभट्ट छोड़ा और उसके बाद जून 1979 में भास्कर–1 का प्रमोचन हुआ। 18 जुलाई 1980 को इसरो ने भारत भूमि से एस. एल. वी–3 की सहायता से रोहिणी–1 उपग्रह छोड़ा। सन् 1980 तक भारत ने विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयुक्त उपग्रहों के विकास की दिशा मैं पर्याप्त योग्यता प्राप्त कर ली थी परन्तु रॉकेट के विकास में हमारी क्षमता सीमित ही रही। उपग्रह प्रमोचन के क्षेत्र में हम अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग पर ही निर्भर रहे। थुम्बा में ‘भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रमोचन केन्द्र की स्थापना’, ‘उपग्रह प्रशिक्षण टी. वी – प्रयोग’ (सैटेलाइट इन्स्ट्रक्शनल. टी. वी. एक्सपैरीमेन्ट्स–साइट), ‘सिम्फोनी दूर–संचार प्रयोग’ (सिम्फोनी टेलीक्म्युनीकेशन एक्सपैरीमैन्ट–स्टैप), ‘आर्यभट्ट’, ‘भास्कर–प्रथम’ तथा ‘द्वितीय’, आई. आर. एस. श्रेणी उपग्रह, ‘एपल’, तथा ‘इन्सैट’ श्रेणी के उपग्रह छोड़ने में विभन्न देशों का सहयोग रहा। उनमें विशेष हैं अमरीका, सोवियत यूनियन, फ्रांस, जर्मनी तथा यूरोपियन स्पेस एजेन्सी। प्रारम्भिक समय में भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम की उन्नति में तत्कालीन सोवियत संघ ने विशेष सहायता की। भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम के लिए नब्बे का दशक अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।



मई 1994 में ए एस. एल. वी.–डी 4, अक्तूबर 1994 में – पोलार सैटेलाइट लांच व्हीकिल–पी. एस. एल. वी.–डी2, दिसम्बर 1995 में इन्सैट–2 सी, मार्च 1996 में पी. एस. एल. वी.–डी 3 के प्रमोचन। ए. एस. एल. वी. – डी 4 ने 115 किलोग्राम का एक उपग्रह निम्न–भू कक्षा में स्थापित किया तथा उसके प्रमोचन सम्बन्धी सभी तकनीकी कलपुर्जों का सफल परीक्षण किया। ए. एस. एल. वी. की पहली दो (1987 तथा 1988 की) असफलताओं तथा 1992 की आंशिक सफलता के पश्चात यह एक अत्यन्त हर्ष का विषय था।



दिसम्बर 1995 में इन्सैट–2सी, जून 1997 में इन्सैट–2डी, अप्रैल 1999 में इन्सैट–2 मई के सफल प्रमोचन से भारत की अन्तरिक्ष–प्रौद्योगिकी में चार चाँद लग गए। सन् 1993 में पी. एस. एल. वी–डी 1 का प्रथम परीक्षण भी असफल रहा था पर अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने हिम्मत न हारी। अक्तूबर 1994 में 283 टन के 44 मीटर लम्बे पी.. एस. एल. वी –डी 2 ने 870 किलोग्राम के भारतीय सुदूर – संवेदन उपग्रह (इण्डियन रिमोट सैन्सिंग सैटैलाइट) आई.. आर. एस. को 817 किलोमीटर ऊँची पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करके विश्व में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। ऐसी क्षमता केवल चार अन्य राष्ट्रों (रुस, पश्चिमी यूरोप, चीन, तथा अमरीका) में ही विकसित है।



मार्च 1996 में पी. एस. एल. वी. –सी 1 द्वारा आई. आर. एस. – 1 डी का प्रमोचन करके इस श्रेणी के उपग्रहों के प्रमोचन के लिए भारत की विदेशी निर्भरता समाप्त हो गई।



मई 1999 में पी. एस. एल. वी–सी 2 द्वारा एक साथ तीन उपग्रहों (दो विदेशी ) को अन्तरिक्ष में स्थापित करके विश्व में एक अग्रणी राष्ट्र हो गया। इस प्रमोचन से भारत ने इस प्रौद्योगिकी को वाणिज्यक रूप दिया।



अप्रैल २००१ में ‘भू–समकालिक उपग्रह प्रमोचनयान’ (जियोसिन्क्रोनस सैटैलाइट लांच व्हीकिल) १. के द्वारा जी सैट १ का सफ़ल प्रमोचन किया गया जिसका नियत भार था १५३० किग्रा. और इसने उस उपग्रह को ३६००० किमी. की ऊँचाई पर स्थापित किया। इसके बाद अनेक बेहतर उपग्रहों के प्रमोचन किए गए।



जनवरी २००७ की विशेषता थी कि ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान सी ७ के द्वारा चार उपग्रहो का एक साथ प्रमोचन किया गया था, जिसमें एक तो हमारा कार्टोसैट् २ था, दो विदेशी थे, और एक अति विशिष्ट प्रयोग था - अंतरिक्ष संपुट (कैप्स्यूल) के अंतरिक्ष से लौटने के पश्चात वातावरण में उसका पुनर्प्रवेश। इसी जनवरी माह उस पुनर्प्रवेश संपुटिका को सफ़लतापूर्वक बंगाल की खाडी में उतारा गया और मार्च में इन्सैट ४ बी और अप्रैल २००७ में इटली के एक खगोलीय उपग्रह का सफ़ल प्रमोचन भी किया गया । सितम्बर माह में इन्सैट ४ सी आर की सफ़ल स्थापना की ।


२००८ अत्यंत विशिष्ट था : एक उपग्रह तो वाणिज्य अनुबन्ध के अनुसार स्थापित किया गया, दूसरा, ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान के द्वारा १० उपग्रहो का एक साथ प्रमोचन किया गया । और इसी वर्ष इतिहास में स्वर्ण अक्षरो से लिखा जाने वाला 'चन्द्रयान' का सफ़ल प्रमोचन किया गया । यद्यपि चन्द्रयान अपना पूरा जीवन नहीं जी सका किन्तु उसने अल्प काल में ही अधिकांश कार्य कर लिया था, और् उसने चन्द्रयान २ के लिये भारत को बहुत उपयोगी जानकारी दी।



२००९ के अप्रैल माह में ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान 'सी १२'के द्वारा २ उपग्रहॊं का, और सितंबर माह में एक साथ ७ उपग्रहो का प्रमोचन किया गया ।



भारत निकट भविष्य में इज़राइलियो के लिये एक समुन्नत खगोलीय उपग्रह का प्रमोचन करने वाला है। चन्द्र की परिक्रमा करने के बाद अब भारत की 'आदित्य' उपग्रह के द्वारा सूर्य की परिक्रमा करने की भी योजना है।



भारत उपग्रह के अंतरिक्ष की दौड में अग्रिम पन्क्ति में आ गया है । अन्तरिक्ष अनुसंधान में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग .आनिवार्य है क्योकि इस ‘अन्तरिक्ष यान – पृथ्वी’ पर हम सब अन्तरिक्ष के यात्री हैं। अन्तरिक्ष सहयोग को पारस्परिक सामरिक स्पर्धा से पृथक रखना आवश्यक है। क्या हम आशा करें कि अन्तरिक्ष अनुसंधान तथा उपग्रह की उड़ानें सभी देशो के लिए शांति तथा सह–अस्तित्व की स्थापना करेंगी। प्रत्येक देश का आम नागरिक एक दूसरे की सहायता करने को तत्पर है, स्वयं शांति चाहता है तथा दूसरो के लिए शांति की कामना करता है। कोई युद्ध नहीं चाहता। कोई नहीं चाहता कि प्रेक्षपास्त्रो या बमो से मानव जाति का विनाश हो, परन्तु इसके लिए सभी देशो में लालच के स्थान पर आवश्यकता, प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग, तथा भय के स्थान पर प्रेम का होना आवश्यक है।



अन्तरिक्ष प्रयोगशालाएँ : 
अन्तरिक्ष स्टेशनो को अन्तरिक्ष प्रयोगशालाएँ, अन्तरिक्ष प्लेटफार्म आदि कई नामो से जाना जाता है। ये वे बड़े–बड़े यान हैं, जो लगातार पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं और इनके अन्दर कई यात्री महीनो तक कई तरह के प्रयोग कर अत्यन्त उपयोगी जानकारियां इकठ्ठी करते हैं। इन स्टेशनो की मुख्य विशेषता यह भी है कि इनमें ‘डॉकिंग’ (आपस में जुड़ने) की सुविधा है। पृथ्वी से भेजे यान इनसे जुड़ जाते हैं और साजो–सामान और यात्रियो की अदला–बदली के बाद ये यान पृथ्वी पर वापस आ जाते हैं। अन्तरिक्ष में तैरते इन विशाल भवनो का मुख्य उद्देश्य है, अन्तरिक्ष की व्यापक खोज। इनकी सहायता से अनेक वैज्ञानिक प्रयोग किये जाते हैं। प्रतिकूल स्थितियो में मनुष्यो, पौधो, जानवरो, और जीव–जन्तुओं पर पड़नेवाले प्रभावो का अध्ययन किया जाता है। संक्षेप में कहा जाये तो इन कामो में वे सभी अध्ययन हैं जो कि सुदूर ग्रहो की यात्रा तथा वहाँ मानव बस्तियाँ बसाना संभव बना सकेंगे, और साथ ही इस पृथ्वी की समस्याओं के हल निकालना भी। हालांकि अन्तरिक्ष स्टेशनो को पृथ्वी के इर्द गिर्द स्थापित करने की कोशिश में सोवियत संघ और अमेरिका दोनो प्रयासरत थे, फिर भी सोवियत संघ ने यहाँ भी मैदान मार लिया था किन्तु बहुत बडी कीमत पर । अप्रैल 1971 में रूस ने सल्युत–1 नामक अन्तरिक्ष स्टेशन को स्थापित करने में सफलता पायी। कुछ ही समय बाद सोयुज–11 यान द्वारा तीन यात्री इसमें पहुंचा दिये गये, जिन्होंने 24 दिनो तक मनुष्य व पौधों पर भारहीनता के प्रयोग किये। दुर्भाग्य से पृथ्वी पर वापस आते समय इन यात्रियो की मृत्यु हो गयी। 1972 में सल्युत–2 अन्तरिक्ष में गया, मगर वह भी विस्फोट में नष्ट हो गया। फिर 1984 तक सोवियत संघ ने 5 और स्थापित किये। इनमें सल्युत–4 अन्तरिक्ष में पाँच वर्षों तक रहा जिसमें 16 अन्तरिक्ष यात्रियो ने क्रिस्टल, जैवचिकित्सा तथा खगोल भौतिकी सहित कई महत्वपूर्ण काम किये। सन् 1976 एक बडा कदम सोवियत संघ ने उठाया और इन स्टेशनों में चल रहे प्रयोगों में अपने मित्र देशो के वैज्ञानिकों को भी शामिल किया।




14 मई, 1973 को अमेरिकी अन्तरिक्ष–वैज्ञानिकों ने ‘स्काईलैब’ नाम का स्टेशन अन्तरिक्ष में छोड़ा। तीन–तीन अन्तरिक्ष यात्रियो के तीन दल बारी–बारी से वहाँ गये और क्रमश: 28, 60 तथा 84 दिन रहकर प्रयोग करते रहे। बाद में सौर–झंझावातो के कारण स्काईलैब अपने परिपथ (ऑरबिट) से भटक गया और पृथ्वी के वातावरण में जलकर खाक हो गया। मगर इससे पहले कई प्रयोग सफल हुए और सूर्य की 30,000 तस्वीरें ली गयी। इन प्रयोगों से यह भी पता लगा कि अन्तरिक्ष में मांसपेशियाँ, दिल तथा हड्डडियाँ कमजोर होती हैं और इसके लिए खास व्यायामो की जरूरत है। एक बच्चे के सुझाव पर पता लगाया गया कि 'क्या मकड़ी अन्तरिक्ष में जाला बुन सकती है'। 70 के दशक में ही अमरीका और सोवियत संघ ने कुछ साझे प्रयोग भी किए। इन अन्तरिक्ष – स्टेशनो के बाद सोवियत संघ और अमरीकी प्रयास तो और भी ज्यादा बड़े और महत्वाकांक्षी हो गये। इसके तहत ‘अमेरिकी स्पेसलैब परियोजना’ उल्लेखनीय है, जिसे यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सहयोग में बनाया गया। पहली स्पेसलैब को कोलंबिया द्वारा 28 नबम्बर, 1983 को अन्तरिक्ष में भेजा गया। स्पेसलैब प्रोजेक्ट में बन्दरो, चूहो, मछलियो व मधुमक्खियों पर विशेष अध्ययन हुए। इधर सल्युत शृंखला के बाद सोवियत संघ ने ‘मीर’ नामक स्टेशन को अन्तरिक्ष में बैठा दिया। फरवरी 1986 में भेजे गए इस स्टेशन ने अद्भुत काम किये हैं। मीर 11 वर्षों तक अत्यन्त उपयोगी शोध कार्य करने के बाद जीर्ण—शीर्ण हो गया था। अमेरिका ने एक विशाल स्टेशन स्थापित करने की योजना बनाईम - ‘फ्रीडम’। यह १९८६ में प्रारम्भ की गई ।यह स्टेशन इतना बड़ा होगा कि इसे कई किश्तो में प्रक्षेपित किया जायेगा और अन्तरिक्ष में इन खंडो से समूचा अन्तरिक्ष स्टेशन बनाया जायेगा। किन्तु अरर्बों डालर खर्च करने के बाद 'फ़्रीडम' को १९९३ में बन्द करना पडा । यह स्पष्ट दर्शाता है कि खगोलीय योजनाओं के खर्च भी 'खगोलीय' मात्रा में ही होते हैं । तब भी अन्तरिक्ष स्टेशन आज उन सभी समस्याओं के निदान और समाधान में लगे हैं, जिससे मनुष्य मंगल या अन्य ग्रहों तक जा सकेगा और साथ–साथ पृथ्वी की समस्याओं के वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक हल भी खोजेगा । अन्तरिक्ष में उपग्रह छोड़ने अथवा अन्तरिक्ष से अनचाहे उपग्रह हटाने का भी काम होगा । गौरतलब है कि पौधों की नई किस्म, एकदम गोलाकार कण, अथवा एकदम शुद्ध धातुएँ हमें अन्तरिक्ष ही दे पायेगा।



सोवियत अन्तरिक्षयान में प्रथम भारतीय : 
 भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान के प्रारंभिक चरणों में सोवियत संघ की तकनीकी सहायता अत्यन्त सराहनीय रही है। भारतीय वायु – सेना के स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा तथा विंग कमाण्डर रवीश मेहरोत्रा को मास्को के पास स्थित सोवियत स्टार सिटी में एक लम्बे समय तक प्रशिक्षण दिया गया और अन्तत: राकेश शर्मा को अन्तरिक्ष यात्रा के लिए चुना गया। 13 अप्रैल, 1984 को सोयूज़ टी – 11 नामक अन्तरिक्षयान राकेश शर्मा को ले उड़ा और फलस्वरूप वह अन्तरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय हुए। उन्होंने अन्य सहयात्रियों के सहयोग से सल्युत – 7 में विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोग किए, जिनमें प्रमुख था अन्तरिक्ष में मांसपेशियों की क्षीणता रोकने के लिए योग–आसनों का प्रभाव। उन्होंने चाँदी तथा जर्मेनियम तत्वों को मिला कर एक नई मिश्र धातु का निर्माण किया, जो पृथ्वी पर नहीं हो सकता था। इस मिश्र धातु का उपयोग विद्युत–शक्ति के प्रवाह के लिए विशेष लाभदायक है। उन्होंने भारतवर्ष के साठ प्रतिशत क्षेत्र के चित्र भी खींचे। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से दूर–संचार के माध्यम से बातचीत भी की।और 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' गीत भी गाया .




स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा की अन्तरिक्ष यात्रा के तेरह वर्ष बाद डा. कल्पना चावला को भारतीय मूल की प्रथम महिला (प्रथम एशियाई महिला भी) अन्तरिक्षयात्री होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। करनाल (हरियाणा) में जन्मी कल्पना ने सन् 1982 में चंडीगढ़ से इंजिनियरी तथा सन् 1988 में कोलोरैडो (अमरीका) से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की । सन 1994 में अन्तरिक्ष अभियान के लिए नासा द्वारा 3000 अभ्यार्थियों में से चुने गये 19 विशिष्टों में से वह एक थीं। टेक्सास के जोनसन अन्तरिक्ष केन्द्र में इस विषम कार्य के लिए उन्होंने गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। डा चावला ने अभियान विशेषज्ञ की हैसियत से 19 नवम्बर, 1997 को भारतीय समयानुसार प्रात: 1:16 बजे कोलम्बिया एस. टी. एस. – 87 अन्तरिक्ष शटलयान में 16 दिनों की अन्तरिक्ष यात्रा के लिए प्रयाण किया । यह कोलम्बिया शटलयान की 88 वीं अन्तरिक्ष यात्रा थी। सोलह दिनो की यात्रा के पश्चात वह पाँच अन्य सहयात्रियो के साथ आवश्यक वैज्ञानिक परीक्षण करके पृथ्वी पर सकुशल वापस आ गयीं। इस अभियान का मुख्य ध्येय अन्तरिक्ष के सूक्ष्म–गुरुत्वीय (माइक्रो ग्रैविटी) वातावरण में विभिन्न पदार्थों के विभिन्न गुणो का अध्ययन करना था। यद्यपि पृथ्वी पर संबन्धित प्रयोग तो किये जा चुके थे पर विचार था कि पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण संभवत: प्रायौगिक परिणामो में कुछ आंशिक त्रुटि रह गई हो। अन्तरिक्षयान की भारहीनता के वातावरण में संभव है कि भौतिक गुणो तथा प्रक्रियाओं के बारे में कुछ अतिरिक्त जानकारी प्राप्त हो सके जो पृथ्वी पर संभव न हुई हो, जिससे अनुसंधानकर्त्ता को नयी राह दिखे तथा प्रकृति के कुछ अन्य गूढ़ रहस्य खुलें। इस कार्य के लिए कोलम्बिया शटलयान पृथ्वी से 10 लाख मील तथा सूर्य से 920 लाख मील दूरी पर था, जोकि ऐसा स्थान है जहाँ पृथ्वी तथा सूर्य दोनो की गुरुत्वाकर्षण शक्तियों का प्रभाव एक दूसरे को निरस्त कर देता है।


मालदीव में भारतीय सहायता से उपग्रह टी. वी सेवा मालदीव के शहर ‘माले’ में भारतीय दूरदर्शन ने 7. 5 मीटर का ‘एस –बैंड’ एन्टैना लगाया है जिससे वहाँ उपग्रह द्वारा प्रसारित टी वी कार्यक्रम देखना संभव हो सका है। दूरदर्शन अपने नैटवर्क में प्राय: 6.1 मीटर का ‘डिश एन्टैना’ लगाते हैं पर उन्होंने माले के लिए विशेष रूप से एक बड़ा एन्टैना विकसित किया जिसके द्वारा मालदीव में प्राप्त क्षीण टी वी संकेत भी ग्राह्य हों। यह भारतीय दूरदर्शन के लिए किसी भी अन्य देश के लिये प्रथम परियोजना थी।



सोवियत अन्तरिक्ष स्टेशन मीर में अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री : विश्व के इतिहास में पहली बार नासा के एक अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री नार्मन थेगार्ड को कज़ाकिस्तान के बैकोनूर अन्तरिक्ष केन्द्र से सोयूज़ नामक रूसी राकेट द्वारा 14 मार्च, 1995 को अन्तरिक्ष यात्रा पर भेजा गया। साथ में दो रूसी अन्तरिक्ष यात्री, व्लादिमीर डेजुरोव तथा गेनाडी स्ट्रेकलोव भी थे। इस यान से वे अन्तरिक्ष में स्थापित ‘मीर अन्तरिक्ष केन्द्र’ गए और तीन माह तक वैज्ञानिक प्रयोग करते रहे। अन्तरिक्ष में पूर्व-स्थापित सल्युत नामक प्रयोगशाला में कार्यरत लोगों को ‘मीर’ में स्थानान्तरित करने के लिए ‘मीर’ का केन्द्रीय सारभाग फरवरी, 1986 अन्तरिक्ष में भेजा गया था, जो कि पिछले लगभग ग्यारह वर्षों से पृथ्वी की उसी कक्षा में है। सोयूज़ निश्चित समय पर पृथ्वी की कक्षा में घूमते हुए मीर के समीप आया, अन्तरिक्ष यात्रियों ने मीर से अपने यान को जोड़ने से सम्बन्धित यंत्रों की जाँच की और यान का दरवाजा खोल कर तैरते हुए मीर में चले गए। सारी प्रक्रिया स्वचालित थी। मीर में पहले से उपस्थित तीन अन्तरिक्ष यात्रियों ने भी उल्लासपूर्वक सोयूज यान को धीरे–धीरे अपने समीप आते देखा। व्लादीमीर पोल्याकोव, (जो उस समय मीर में एक वर्ष से अधिक समय से थे) के लिए विशेष रूप से यह एक हर्ष का क्षण था। विश्व में अन्तरिक्ष में सर्वाधिक समय तक रहने का उन्होंने कीर्तिमान स्थापित किया है। अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री, थैगार्ड, मीर पर जाने वाले 44 वें व्यक्ति तथा 13 वें विदेशी थे। मीर (का अर्थ शान्ति) अन्तरिक्ष प्रयोगशाला में 1997 फरवरी में एक आक्सीजन उत्पादन संयंत्र में आग लग गई, जिससे अन्तरिक्ष स्टेशन में धुँआ हो गया था। इसको ठीक करने के बाद मार्च 1997 में दोनों आक्सीजन उत्पादन संयंत्रों ने फ़िर काम ही बन्द कर दिया। अप्रैल 1997 में पहले शीतकरण संयंत्र में त्रुटि आ गयी, जिससे मीर के अन्दर का तापक्रम यकायक बढ़ गया और अन्तरिक्ष यात्रियो को साँस लेने में भी कष्ट होने लगा, फिर वायु–शुद्धिकरण संयंत्र में त्रुटि आ गई। 25 जून, 1997 को तो एक बड़ी अप्रत्याशित दुर्घटना घटी। ‘प्रोग्रेस’ आपूर्ति यान, जो पृथ्वी से मीर के लिए आवश्यक सामग्री ले गया था, डाकिंग के समय टकरा गया, जिससे मीर के माड्यूल में एक छेद हो गया। अन्तरिक्ष यात्रियों ने उस छेद के रिसन को शीघ्रता से बन्द तो कर दिया परन्तु इस प्रयास में मीर अन्तरिक्ष स्टेशन को विद्युत–ऊर्जा आपूर्ति करने वाली केबल का सम्बन्ध–विच्छेद हो गया। इसकी मरम्मत करने के अथक प्रयास किये गये। भू–केन्द्र में विभिन्न तरीके सोचे गये जिन्हें अन्तरिक्ष में कार्यान्वित करने का प्रयास किया गया। चूँकि इस यान में एक अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री भी था, रूस के अतिरिक्त अमरीका में भी बड़ी खलबली मची। सभी परेशान थे कि मीर कैसे ठीक किया जाए और अन्तरिक्ष–दल को कैसे बचा कर पृथ्वी पर वापस लाया जाए। इसी बीच मीर के कम्प्यूटर में भी खराबी आ गयी। इस बूढ़े मीर को अब तक अन्तरिक्ष में रखने के फैसले पर भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगने लगे। रूसी वैज्ञानिकों ने हौसला रखा तथा इस कार्य को करने के लिए अगस्त 1997 में दूसरा अन्तरिक्ष–दल मीर भेजा और पुराने दल को पृथ्वी पर वापस बुला लिया। इस नये दल ने मीर को अपने साथ ले गए उपकरणों की सहायता से ठीक कर लिया। अक्तूबर 1997 में अमरीकी सहयात्री माइकेल फोल पृथ्वी पर सकुशल वापस आ गये। अक्तूबर 1997 में ही एक मानव–रहित अन्तरिक्ष–यान, प्रोगेस एम –36 नये कम्प्यूटर, विभिन्न वैज्ञानिक उपकरण, ईंधन, पेयजल तथा अन्य सामग्री लेकर मीर पहुँचा। इन सभी उपकरणों की सहायता से मीर फिर से कार्यशील हो गया। मीर का दूसरा अर्थ 'विश्व' भी‌है। विश्व में यह अकेला अन्तरिक्ष–स्टेशन है और अपने समय का सबसे विशाल था। इसमें विभिन्न राष्ट्रों के अन्तरिक्ष यात्रियो को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। रूस में जनवरी 1999 में हुए फैसले के अनुसार मीर का जीवन काल तीन वर्ष और बढ़ा दिया गया था क्योंकि इस पर होने वाले व्यय की जिम्मेदारी कुछ व्यक्तिगत संस्थाओं ने ले ली है। इसे पुन: जीवन दान दिया गया और अन्त में २३ मार्च २००१ को इस वयोवृद्ध मीर को सेवानिवृत्त किया गया। इसे अंतरिक्ष परिपथ से हटाया गया और दक्षिणी प्रशान्त महासागर में इसे जल समाधि दी गई ।




अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन :  
 मुख्यत्: यह यूएस ए की पहल से १९९८ से प्रारम्भ किया गया अंतर्राष्ट्रीय (रूस, यूरोप, कैनेडा तथा जापान आदि ) सहयोग से निर्मित विश्व का विशालतम (इसे हम बिना दूरबीनों के भी रात्रि में देख सकते हैं) अन्तरिक्ष अनुसंधान स्टेशन है, यद्यपि इसका निम्न भू कक्षा (२७८ से ४६० किमी.ऊपर) में ही निर्माण किया जा रहा है जिसके २०११ तक पूरे होने की योजना है । इसके सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में होने वाले अनुसंधान के क्षेत्र होगे - जैव शास्त्र, मानव जैव शास्त्र, भौतिकी, खगोल शास्त्र, मौसमविज्ञान। इसमें स्वभावत: अन्तरिक्ष यानों की सुरक्षा, उनकी दक्षता तथा विश्वसनीयता के परीक्षण भी होंगे। किसी भी अन्तरिक्ष यान के लिये यह तीन गुण अत्यंत मह्त्वपूर्ण हैं। कुछ उदाहरण दिये जा रहे हैं. अभी तक के अनुसंधान से यह निष्कर्ष निकला है कि दीर्घ कालीन अंतरिक्ष यात्रा के बाद यदि दिक्चालक (एस्ट्रोनाट) किसी ग्रह पर उतरेंगे तब उनकी अस्थियो के टूटने का खतरा अधिक होगा । इसमें जो दूरचालित पराश्रव्य क्रम्वीक्षण (अल्ट्रासाउन्ड् स्कैन) का अनुसंधान किया गया है उसकी जानकारी से दिक्चालकों को तो लाभ होगा ही, भूस्थित रोगियों को भी बहुत लाभ होगा। भू वातावरण में एरोसोल, ओज़ोन, वाष्प और ऒक्साइड के प्रभावों को परखा जाएगा। और निश्चित ही ब्रह्माण्ड किरणों, अन्तरिक्ष धूल, प्रति पदार्थ, अदृश्य पदार्थ आदि पर अनुसंधान होंगे । ऐसा नहीं है कि अन्तरिक्ष कार्यक्रमो का उपयोग केवल रक्षा विभाग तथा अत्यंत समृद्ध देशो की विलासिता की निशानी है; इसके अनेकनेक उपयोग समान्य जन को भी मिल रहे हैं और मिलेंगे । भारत को इस दिशा में प्रयत्नशील रहना आवश्यक है, क्योकि आज के विश्व में जो भी देश अनुसंधान में पिछड गया वह पिछडा ही रहेगा ।



इस प्रकार का संयुक्त अन्तरिक्ष कार्यक्रम, वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान–वर्धन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग तथा मित्रता के अनूठे उदाहरण हैं। अन्तरिक्ष के रहस्योद्घाटनो के लिए परस्पर सहयोग अत्यन्त आवश्यक है। विश्व की महाशक्तियों के मध्य स्पर्धा व द्वेष समाप्त हो जाने से आशा है कि भविष्य में इस सहकारिता की दिशा में निरन्तर प्रगति होगी, और रक्षा विभाग पर कम खर्च होगा ।



द्यौ शान्ति:, अन्तरिक्षं शान्ति:, पृथिवी शान्ति:



विश्वमोहन तिवारी, पूर्व एयर वाइस मार्शल
ई 143/21, नौएडा 201301







विश्व पटल पर हिंदी : अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी


विश्व पटल पर हिंदी 
हिंदी विभाग, चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ


इन दिनों जब देश में महाकुंभ का आयोजन हो रहा है, जिसमें देश-विदेश के लोग भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव और जिज्ञासा रखते हुए भारत में आ रहे हैं। इसी तरह से चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के ‘बृहस्पति भवन’ में हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी   ( १२/१३/१४ फरवरी २०१० )   में देश-विदेश से आए हुए हिन्दी विद्वानों का समागम हुआ। 




संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 एस0के0 काक ने कहा कि भाषा सिर्फ एक माध्यम है, एक दूसरे से जुड़ने का, उसे आपस में बाँटने का माध्यम न बनाया जाए। हर भाषा को अपना विकास करने की स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए। उनका कहना था कि भाषा का प्रयोग हमें विश्व स्तर पर निजी पहचान और अस्मिता को प्रमाणित करने के लिए करना चाहिए और हिन्दी की अभिवृद्धि के लिए प्रयास की ओर अग्रसर होना होगा, यदि हम सरकार के भरोसे रहे तो हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में 62 साल तो बीत गए और भी कई साल ओर लगेंगे। कार्यक्रम में उद्घाटन वक्तव्य देते हुए हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार श्री हिमांशु जोशी ने कहा कि आज हिन्दी दुनियाँ के 157 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है और आँकड़े बताते है कि आज हिन्दी ने अंग्रेजी भाषा को बहुत पीछे छोड़ दिया है। उन्होंने कहा कि भारत आज एक अजीब संक्रमण काल के दौर से गुजर रहा है। एक ओर हम विकास के नए आँकड़ों को तो छू रहे हैं लेकिन नैतिकता के स्तर पर पिछड़ते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी जो आज विश्व के 132 देशों में फैली हुई है और 3 करोड़ अप्रवासी जिसे बोलते हैं, उस बोली का विकास मेरठ के गली कूचों में हुआ है। उन्होंने आँकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि फीजी, मॉरीशस, गयाना, सूरीनाम, इंग्लैण्ड, नेपाल, थाईलैण्ड जैसे देशों में हिन्दी का व्यापक प्रचार-प्रसार हो रहा है। उन्होंने कहा कि हिन्दी का सोया हुआ शेर अब जाग रहा है और इसकी दहाड़ पूरी दुनियाँ सुन रही है। उन्होंने कहा कि हिन्दी का व्याकरण सर्वाधिक वैज्ञानिक है और हिन्दी की शब्द संख्या भी अंग्रेजी के मुकाबले कहीं ज्यादा है। अंग्रेजी में केवल 10 हजार शब्द है जबकि हिन्दी की शब्द सम्पदा 2.50 लाख है। उन्होंने कहा कि अतीत हमारा था, वर्तमान हमारा है और भविष्य भी हमारा होगा। इजरायल का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी समाज को अपनी आत्मालोचना करनी चाहिए कि हम आज तक हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचारित नहीं कर पाए हैं। आज वक्त आ गया है कि सरकारों के भरोसे न रहकर अपने भरोसे हिन्दी का दीपक जलाएं। काका कालेलकर का उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘जो जितना अ-सरकारी वो उतना असरकारी’’। इस अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन के लिए मेरठ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि कैंची वालों के शहर ने वो किया है जो दिल वालों का शहर दिल्ली नही कर पाया।




विशिष्ट अतिथि इजरायल से आए हिन्दी विभागाध्यक्ष, प्रो0 गेनाडी स्लाम्पोर ने आर्थिक उदारीकरण के दौर में हिन्दी की ताकत के बारे में बताते हुए कहा कि हिन्दी के कारण बहुत से लोगों को रोजगार मिलने लगा। हिन्दी पढ़ाते हुए मुझे काफी उपलब्धि हुई। अक्षरम् और भारत सरकार द्वारा भी पुरस्कृत किया गया लेकिन मैं उन सभी पुरस्कारों को मिलने के पश्चात् न तो अक्षरम् और न भारत सरकार के प्रति कृतज्ञ हूँ बल्कि मैं तो अपने छात्रों के प्रति कृतज्ञ हूँ जिनकी वजह से मुझे रोजगार मिला हुआ है और इस काम से मुझे आत्मसंतुष्टि मिलती है। उनका यह भी कहना था कि अंग्रेजी में हम दिमाग की बात तो कह सकते हैं लेकिन दिल की बात नहीं। हिन्दी के अनेक रूपों की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान शिव की तरह हिन्दी के भी कई सारे रूप हैं। मेरे जैसे विदेशी की समझ में नहीं आता कि मैं अपने बच्चों को मानक हिन्दी पढाऊँ या बोलचाल की हिन्दी। इन दोनों में इतना अधिक अन्तर है कि मानो यह दो भाषाएं हो। भारतीयों के सामने ये चुनौती है कि वह इन दोनों के बीच की कोई भाषा हमें बताएं जिसे हम दुनियाँ भर में पढ़ा सके। मेरठ के सांसद और संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य श्री राजेन्द्र अग्रवाल ने कहा कि अभिव्यक्ति, सामर्थ्य और साहित्य की दृष्टि से हिन्दी विश्व की सर्वाधिक समर्थ भाषा है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है आज भी इस देश के कार्यालयों में राजभाषा की स्थिति की समीक्षा करने के लिए किसी समिति की आवश्यकता पड़ती है यह हमारे देश के राजनैतिक नेतृत्व की कमजोरी की ओर संकेत करता है। हमारे नेतृत्व में इच्छा शक्ति का अभाव है। अंग्रेजी में भाषण देने वाले सांसदों को चुनौती देते हुए उन्होंने कहा कि जो सांसद संसद में भाषण देते हैं वे अपने चुनाव क्षेत्र में अंग्रेजी में भाषण देकर दिखाए। आज तन्त्र की भाषा गण की भाषा से अलग हो गई है। इससे जनता और सरकार के बीच संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गई है। मैं हिन्दी के विश्व भाषा बनने के प्रति शत-प्रतिशत आश्वस्त हूँ। बाजार के साथ-साथ हिन्दी का भी निरन्तर विकास होगा। उन्होंने कहा कि हिन्दी देश की तो माँ है लेकिन मेरठ की बेटी है इसलिए हिन्दी को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए मेरठ के लोगों को विशेष प्रयास करना होगा।लंदन से आए वरिष्ठ हिन्दी लेखक श्री नरेश भारतीय ने कहा कि मैं 1964 से विदेश में रह रहा हूँ और 46 वर्षों से पश्चिम के झरोखे से भारत को देखने का अभ्यस्त हो चुका हूँ। अंग्रेजों की नजर में आज भी भारत सपेरों और जादूगरों का देश है। भूमंडलीकरण का श्रेय भी अंग्रेज खुद को ही लेते है जबकि वे भूल जाते हैं कि भारतीय संस्कृति सदा से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्श का पालन करती आई है। जिसका एक संक्षिप्त स्वरूप आज का वैश्वीकरण है। उन्होंने हिन्दी को अंग्रेजी की दासी बनाने की आलोचना करते हुए कहा कि हिन्दी भाषा को अंग्रेजी का पल्लू छोड़कर स्वावलम्बी रूप से विकसित होना होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा निश्चित रूप से हिन्दी को होना चाहिए लेकिन क्या उससे पहले हिन्दी को सच्चे अर्थों में राष्ट्र भाषा नहीं बनना चाहिए। मैं जब युवाओं से हिन्दी के अध्ययन के बारे में पूछता हूँ तो वो कहते हैं कि इससे ज्ञानार्जन तो कर सकते है किन्तु धनार्जन नहीं। आज हिन्दी को अपने ही देश में परायेपन का शिकार होना पड़ रहा है। पहले हमें स्वयं स्वाभिमानपूर्वक हिन्दी का सम्मान करना होगा। फिर देश के बाहर विदेशों में हिन्दी को स्थापित करने का प्रयास स्वतः ही सफल होता चला जायेगा। उन्होंने प्रवासी, अप्रवासी और अनिवासी शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति जताते हुए कहा कि हम आज भी हृदय से भारतवासी है। इन शब्दों के प्रयोग से हमें पराया करने की जगह हमें भारतवंशी कहकर अपनी जड़ों से जुड़े रहने का सौभाग्य प्रदान करना चाहिए। आज हिन्दी भारतीय संस्कृति की संवाहिका बन चुकी है। अगर हम अपने देश में ही संस्कृति की दुर्गति दिखाई देगी तो अपने देश में हम क्या संदेश लेकर जायेंगे और अपनी युवा पीढ़ी को क्या आदर्श प्रदान करेंगे?कनाडा से प्रकाशित होने वाली ‘वसुधा’ पत्रिका की सम्पादक श्रीमती स्नेह ठाकुर ने श्री नरेश भारतीय की बात का समर्थन करते हुए कहा कि हम भारतवंशी लोगों को वनवास दे दिया गया है। राजा रामचन्द्र तो 14 वर्ष बाद वनवास से लौट आये थे लेकिन हमें आज तक लौटने का मौका नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के समय महात्मा गाँधी से लेकर सुभाषचन्द्र बोस तक सब ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मानने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अब हम सभी को अपनी कथनी को अपनी करनी बनाने का दायित्व निभाना है। अगर हम अकेले-अकेले भी चले तो अनेक ऐसे लोग जुड़ जायेंगे कि उनका एक समुदाय बन जायेगा। हिन्दी के उत्थान का दायित्व हम सभी का है और सभी को इसे आगे बढ़ाना होगा, भारतवंशियों को भी और भारतीयों को भी। अगर अपने देश में हिन्दी आगे नहीं बढ़ेगी तो हम बाहर इसका प्रचार-प्रसार कैसे करेंगे, हम एकदिन शिखर अवश्य छू लेंगे। कर्म पर डटे रहकर ही हम संशय को दूर कर सकते हैं।






वरिष्ठ साहित्यकार श्री से.रा. यात्री ने हिन्दी के विश्व भाषा बनने के मार्ग की बाधाओं का जिक्र करते हुए कहा कि मेरठ खड़ीबोली का गढ़ है और इसी गढ़ के विश्वविद्यालय में 36 वषों तक हिन्दी का पाठ्यक्रम प्रारम्भ नहीं हुआ। हमें इसके कारणों की पड़ताल करनी होगी। बात दरअसल यह है कि हमने राजनीतिक स्वतन्त्रता तो प्राप्त कर ली लेकिन सांस्कृतिक स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं की। हम अपनी संस्कृति की अच्छी बातों को बाहर के देशों द्वारा पहचानी जाने के बाद ही स्वीकार करते हैं। आज हमारे देश में आदमी क्षेत्र भाषा और अपने स्वार्थों में बंटा हुआ है। जिसके कारण हिन्दी सही मायनों में राष्ट्रभाषा नहीं बन पा रही है। उन्होंने कहा कि हिन्दीभाषी लोगों में भी किसी अन्य भारतीय भाषा को सीखने के प्रति उत्सुकता नहीं है। इसका परिणाम यह होता है कि थर्डग्रेड भाषा होने के बाद भी हिन्दी आज राज्य के कार्यों की भाषा बनी हुई है। हिन्दी वालों को स्वयं को बदलना चाहिए। अंग्रेजी को अन्य प्रदेश इसलिए स्वीकार करते हैं कि हिन्दी वाले उनके परिवेश, उनकी भाषा को उस तरह से स्वीकार नहीं करते हैं। आज स्थिति यह है कि हिन्दी के अध्यापक भी अपने बच्चों को ऊँचे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाते हैं। हमें यह मानसिकता बदलनी होगी। ब्रिटेन में पूर्व हिन्दी अताशे तथा वर्तमान में राजभाषा में सहायक निदेशक श्री राकेश दुबे ने प्रोजेक्टर प्रजेन्टेशन के माध्यम से हिन्दी की निरन्तर होती वृद्धि को दर्शकों के सम्मुख प्रस्तुत किया। श्री दुबे ने हिन्दी की दुनिया के व्यापक परिप्रेक्ष्य को दर्शाते हुए लगभग 150 देशों में हिन्दी प्रयोग पर तथ्यात्मक प्रस्तुती दी। देश में हिन्दी भाषी राज्यों तथा पत्रकारिता एवं मीडिया जगत् में हिन्दी की स्थिति पर भी उन्होंने विस्तृत विवरण प्रस्तुत किए।उद्घाटन सत्र के अन्त में चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने समस्त अतिथियों और आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित किया।‘गैर हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी’ नामक द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रो0 गंगाप्रसाद ‘विमल’ ने की। विशिष्ट वक्ताओं और अतिथियों में प्रो0 ललितम्बा, अखिल कर्नाटक साहित्य अकादमी, बंगलौर, प्रो0 वी0के0 मिश्रा, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, अगरतला, डॉ0 नजमा मलिक, हिन्दी विभाग, गुजरात विश्वविद्यालय, गुजरात, डॉ0 गुरमीत, डॉ0 अशोक कुमार, हिन्दी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंड़ीगढ़, प्रो0 देवराज, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, मणिपुर विश्वविद्यालय, इम्फाल तथा डॉ0 प्रवीणा, हिन्दी विभाग, चेन्नई विश्वविद्यालय, हैदराबाद ने सहभागिता की। 






प्रो0 देवराज ने हिन्दी भाषा और भूमंडलीकरण के अखिल भारतीय स्वरूप को लेकर कहा कि जिस नवजागरण के दम पर हम आजादी पाने का दम्भ भरते हैं उसमें सम्पूर्ण भारत की अवधारणा थी और हमें उसे स्वीकार करना होगा। हिन्दी के जिस विकास पर हम गर्व कर रहे हैं। उसको बनाने में देशीय भाषाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। कोई भी भारतीय परम्परा तब तक भारतीय नहीं है जब तक उसमें असम और कन्याकुमारी नहीं हैं। गैर हिन्दी प्रदेशों में हिन्दी की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि हम उन लोगों के बारे में क्या धारणा रखते हैं? भूमंडलीकरण की अवधारणा को लेकर उनका कहना था कि भूमंडलीकरण एक आर्थिक अवधारणा है, मूलतः बाजार की अवधारणा। वैश्वीकरण का अर्थ एक मायने में अमेरिकी बाजार का प्रसार है। हिन्दुस्तान में तो वैश्वीकरण एक मायने में पहले ही आ चुका था। एक समग्रता की कल्पना भारत में पहले ही रही है। यदि हम भक्ति आन्दोलन को भी देखे तो पूर्वोत्तर को समझे बिना हम भक्ति आन्दोलन को नहीं समझ सकते। अगर हिन्दी के विकास को आप आगे बढ़ाना चाहते हैं तो तुलनात्मक अध्ययन पद्धति को अपनाना होगा। इस अवसर पर प्रो0 देवराज ने कहा कि भूमंडलीकरण के दौर में भाषाओं की स्थिति को लेकर हिन्दी भाषा के सामने चुनौतियाँ तो हैं पर संकट नहीं। प्रौद्योगिकी और बाजार के साथ हिन्दी जितना सामंजस्य स्थापित करेगी उतनी ही तीव्र गति से वृद्धि करेगी। उन्होंने कहा कि हिन्दी के मठाधीश पूर्वोत्तर क्षेत्रों की पूर्ण रूप से उपेक्षा करते हैं और जब तक पूर्वोत्तर में हिन्दी की स्थिति का सम्यक् विश्लेषण नहीं किया जाएगा तब तक हिन्दी के प्रति सम्पूर्ण समझ विकसित नहीं हो सकती।गुजरात विश्वविद्यालय से आयी हुई डॉ0 नजमा मलिक ने गुजरात में हिन्दी की भूमिका और संत काव्य परम्परा में गुजरात के योगदान की ओर इंगित किया। उनका मानना था कि गुजरात का भक्ति आन्दोलन में बहुत बड़ा योगदान है और हमें इसे समझना होगा, नहीं तो हमारी समझ हिन्दी को लेकर अधूरी रह जाएगी। चीजों को सम्पूर्णता में समझने की आवश्यकता है।डॉ0 गुरमीत, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्ड़ीगढ का कहना था कि आज वैश्वीकरण के युग में हम अंग्रेजी के बिना अपना जीवन नहीं चला सकते। अंग्रेजी को भी भारतीय भाषाओं के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। अंग्रेजी के लडने के बहाने हम क्षेत्रीय भाषाओं से भी दूर हो गए हैं। भारतीय भाषाओं के लेखकों को भी हिन्दी में शामिल किया जाए। पंजाबी और हिन्दी को भी हमें एक साथ समझना होगा। हिन्दी को परंपरागत आधारों से आगे बढ़ना होगा अर्थात सूर, कबीर, तुलसी पर हम ज्यादा दिन तक टिके नहीं रह सकते। आज हिन्दी तब बढ़ेगी जब वह बाजार की भाषा बनेगी। बहुविविधता और बहुलता की आज अत्यन्त आवश्यकता है। हमें हिन्दी के आकाश को अनिवार्य रूप से विस्तार देना होगा। नहीं तो हिन्दी दायरों में सिमट कर रह जाएगी। मुक्तिबोध के साथ अवतार सिंह पास को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता है और दक्षिण से भी नए कवियों को शामिल कर हम हिन्दी को महत्वपूर्ण रूप दे सकते हैं। उनका कहना था कि भाषाओं में अखिल भारतीयता का पुट होना अत्यंत आवश्यक है। वक्त की जरूरत के अनुसार भाषा को बाजार से भी जोड़ना होगा। हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में अखिल भारतीय भाषाओं के उत्कृष्ट अनुवाद को भी शामिल किया जाना चाहिए।  






डॉ0 अशोक कुमार, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ ने कहा कि आज जो हिन्दी का अस्तित्व है वह इस बात पर निर्भर करता है कि उसको आगे तक ले जाने वाले लोग कितने हैं? हमें दायरों से बाहर निकलना होगा। आज जो हिन्दुस्तान एशिया का नेतृत्व कर रहा है उसमें हिन्दी का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने आधुनिक युग में कबीर की जरूरत की ओर ध्यान दिलाया। अन्त में वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ग्लोबलाइजेशन के युग में हिन्दी बनी रहेगी यदि प्राणपन से लगे रहें।अन्य विशिष्ट वक्ताओं में प्रो0 वी0के0 मिश्रा, (हिन्दी विभाग, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, अगरतला) ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति उत्साहजनक है। अरूणाचल प्रदेश में हिन्दी में काफी काम हो रहा है। यदि हमें अखण्ड भारत की कल्पना करनी है तो हम किसी एक प्रदेश के दायरों से बाहर निकलकर सम्पूर्ण भारत को एक नजरिये से देखना होगा और हमें एक यात्री की तरह होना होगा। हिन्दी सरकारी मशीनरी से आगे न बढ़ी है और न बढ़ पाएगी बल्कि यह तो श्रमवीरों की भाषा है और श्रम से ही आगे बढ़ पाएगी। उन्होंने कहा कि हिन्दी भाषा इस वजह से आगे नहीं बढ़ रही है कि सरकार इसके प्रचार-प्रसार में योगदान दे रही है बल्कि यह तो दूरदराज के क्षेत्रों में फैले हुए मनीषियों की साधना का परिणाम है।विशिष्ट वक्ता प्रो0 ललितम्बा (अखिल कर्नाटक हिन्दी साहित्य अकादमी, बेंगलुरू) का कहना था कि मैं हिन्दी की पक्षधर इसलिए हूँ कि भारतीय संस्कृति को हिन्दी ने जोड़ा है। एक अखिल भारतीय समाज हिन्दी में व्याप्त है। अंग्रेजी का इतिहास गुलामी के इतिहास से जुड़ा हुआ है और यह एक दूरागत भाषा है। दक्षिण में हिन्दी की स्थिति बेहतर है और तमिलनाडु आदि को भी इसी नजरिए से समझ सकते हैं। दक्षिण की हिन्दी बिल्कुल वक्त के साथ चल रही है। आधुनिक विषयों पर साहित्य में शोध हो रहा है। कोई रचना यदि इस वर्ष प्रकाशित होती है तो अगले वर्ष हिन्दी में उस पर शोध करा दिया जाता है। लेकिन हमें इस बात को भी समझना होगा कि रामचन्द्र शुक्ल के बाद कोई बड़ा इतिहास ग्रन्थ हिन्दी में नहीं लिखा गया, जिसमें समग्रता हो। हमें हिन्दी को आधुनिक दृष्टिकोण से देखना होगा।डॉ0 प्रवीणा (हिन्दी विभाग, चेन्नई विश्वविद्यालय, हैदराबाद) का मानना था कि हिन्दी पट्टी से अलग हिन्दी में काम करने वाले लोगों को कई समस्याओं से जूझना पड़ता है। मेरा मानना है कि हिन्दी से बैर मत करो हिन्दी अपनी भाषा है यदि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच बैर मिटाना है तो जोड़ने वाली भाषा का प्रयोग करो और यह कनेक्टिंग भाषा हिन्दी हो सकती है।सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध कहानीकार (भूतपूर्व प्राध्यापक, जे0एन0यू0, दिल्ली) का मानना था हिन्दी को हिन्दी पट्टी की संकीर्णता से मुक्त करना होगा। हमें भाषा को लचीला रखना होगा और यह भी ध्यान रखना होगा कि अन्य देशों की हिन्दी को भी उनकी निज पहचान के साथ स्वीकार करें क्योंकि सूरीनामी हिन्दी और मॉरीशस की मॉरीशसी हिन्दी को मेरठ की हिन्दी के पैमानों से नहीं समझा जा सकता।हमें तुलनात्मक साहित्य और तुलनात्मक अध्ययन को बढ़ावा देना होगा। अनुवाद इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। ग्लोबल आधार पर अनुवाद रोजगार का बड़ा माध्यम है और हम अंग्रेजी का भी विरोध नहीं कर सकते। अंग्रेजी आज यंत्र माध्यम और विश्व की भाषा है। हमें अंग्रेजी के मैकनिज्म को समझना होगा। भाषाओं का अपना मिजाज होता है और भाषाएं दबाव के द्वारा नहीं फैलती बल्कि जनभावनाओं के द्वारा आगे बढ़ती है और हमें हिन्दी पट्टी के बाहर उन जनभावनाओं को उत्पन्न करना होगा जो हिन्दी की स्वीकार्यता को संभव बना सके।धन्यवाद ज्ञापन देते हुए इस संगोष्ठी के संयोजक और हिन्दी विभागाध्यक्ष, चौ0 चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि मेरठ विश्वविद्यालय ने अपने पाठ्यक्रम में हिन्दी के अखिल भारतीय स्वरूप का ध्यान रखा है और संत गंगादास जैसे कवियों को भी शामिल किया है जो अपने स्वरूप में अखिल भारतीय है।न केवल क्षेत्रीय साहित्य बल्कि प्रवासी साहित्य को भी विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में समाहित किया गया है और ग्लोबलाइजेशन के दौर में रोजगार की दृष्टि से जनसंचार के पाठ्यक्रम को भी चलाने की योजना है। उन्होंने सभी देश-विदेश से आयें अतिथियों का आभार व्यक्त किया। 






सत्र का संचालन डॉ0 अशोक मिश्र ने किया। सत्र का संचालन करते हुए उन्होंने वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी की स्थिति को उत्साहवर्धक बताया क्योंकि हिन्दी आज बाजार की भाषा है और हिन्दी को बाजार बहुत आगे लेकर जाएगा। इस सत्र में लगभग 250 प्रतिभागी और विभिन्न छात्रों और शोधार्थियों ने हिस्सा लिया, जिनमें विपिन शर्मा, अजय, मोनू, राजेश, अंचल, अँन्जू, गजेन्द्र, ललित, अमित आदि विद्यार्थी शामिल थे।इसी दिन सायं 6ः00 बजे ‘बृहस्पति भवन’ में ‘कवि गोष्ठी’ का आयोजन किया गया। जिसमें श्रीमती जय वर्मा, स्नेह ठाकुर, प्रो0 ललितम्बा, प्रो0 देवराज, डॉ0 सिद्धेश्वर तथा मेरठ के कवियों में श्री ओंकार ‘गुलशन’, डॉ0 रामगोपाल ‘भारतीय’, शिवकुमार शुक्ल, डॉ0 मौ0 असलम सिद्दीकी आदि ने अपना काव्य-पाठ कर श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर दिया। कवि गोष्ठी का संचालन ‘अमित भारतीय’ ने किया।






13 फरवरी 2010 को अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन प्रातः 09ः30 बजे तृतीय सत्र ‘वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिन्दी’ विषय पर केन्द्रित रहा। सत्र की अध्यक्षता अमेरिका से आए कहानीकार और मीडिया विशेषज्ञ श्री उमेश अग्निहोत्री ने की। बीज वक्तव्य देते हुए सर्जनात्मक लेखन महात्मा गांधी केन्द्र मोकान, मॉरीशस के अध्यक्ष श्री हेमराज सुन्दर ने कहा कि मॉरीशस में प्रकाशन गृहों के अभाव के कारण हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बाधा उत्पन्न हो रही है। यद्यपि वहाँ के विद्यार्थी भारतीय संस्कृति और हिन्दी भाषा में अत्यंत रूचि लेते हैं। वहाँ विश्वविद्यालय स्तर पर हिन्दी में शोध की सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं। लंदन से आई कवयित्री और लेखिका डॉ. कविता वाचक्नवी  ने कहा कि भूमंडलीकरण के दौर में हिन्दी में विकास की अपार संभावनाएं हैं। भारत के बाहर हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक लेखन गुण की दृष्टि से मॉरीशस में तथा संख्या की दृष्टि से यू0के0 में हो रहा है। आज जिस वैश्वीकरण की बात हो रही है वह बाज़ार से प्रेरित है जबकि भारतीय परंपरा में भी सदियों से ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के रूप में यह प्रक्रिया जारी रही है। लेकिन हमारी परंपरा एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य को जोड़ने वाली है, व्यक्ति को अलगाव में डालने वाली नहीं है। ब्रिटेन से पधारे कवि श्रीराम शर्मा ‘मीत’ ने कहा की इंग्लैड में आबादी का 04 प्रतिशत हिस्सा अप्रवासियों का है जिनमें भारतीयों की सबसे ज्यादा संख्या है। हिन्दी की स्थिति पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि विदेशों में रहने वाले भारतीय खुद की मातृभाषा पंजाबी, बंगाली आदि बताते हैं; हिन्दी नहीं। हिन्दी को विश्व भाषा बनाने से पहले हमें सच्चे अर्थों में पहले उसे राष्ट्रभाषा बनाना होगा। ब्रिटेन से आई कवयित्री श्रीमती जया वर्मा ने भी ब्रिटेन में हिन्दी की स्थिति पर प्रकाश डाला उन्होंने आशा प्रकट की कि अपने प्राण एवं जीवन शक्ति के बल पर हिन्दी शीघ्र ही विश्वभाषा के स्थान पर आसीन होगी। श्री हरजेन्द्र चौधरी ने कहा कि यदि देश ऊपर उठेगा तो भाषा भी ताकतवर होगी। ‘अक्षरम्’ संस्था के अध्यक्ष श्री अनिल जोशी ने कहा कि आज विश्व की बड़ी भाषाएं व्यावसायिक होती जा रही हैं। आज हिन्दी के क्षेत्र में सबसे बड़ी क्रान्ति यह होगी कि हिन्दी को इन्टरनेट की भाषा बनाया जाए। सत्र की अध्यक्षता करते हुए अमेरिका से आए श्री उमेश अग्निहोत्री ने कहा की हिन्दी ऐसी भाषा है जो कभी मर नहीं सकती। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी ने कहा था कि यदि अंग्रेजी न होती तो हिन्दी संपर्क भाषा होती।




चतुर्थ सत्र ‘सूचना प्रौद्योगिकी एवं हिन्दी’ की अध्यक्षता बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झाँसी के कुलपति प्रो0 एस0वी0एस0 राणा ने की। बीज वक्तव्य देते हुए इग्नू के हिन्दी एवं मानविकी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 वी0रा0 जगन्नाथन ने कहा कि मशीन आधुनिक समय में काफी परिवर्तन और क्रांतिकारी अवधारणाओं को संभव बना सकती है। इसका उपयोग हम हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कर सकते हैं। हिन्दी को हमें सूचना प्रौद्योगिकी से जोड़ना होगा। आज भारत में अनेक ऐसी संस्थाएं कार्यरत हैं जो इस कार्य को अत्यंत निष्काम भाव से संपन्न कर रही हैं। प्रसिद्ध प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ श्री विजय कुमार मल्होत्रा ने कहा कि आज कम्प्यूटर के व्यापक प्रयोग के बावजूद हिन्दी वाले उससे वंचित हैं। हिन्दी में साहित्य से इतर अन्य विधाओं तथा पत्रकारिता, विज्ञान आदि का जिक्र न के बराबर होता है। उन्होंने बताया कि आज ऐसे अनेक कम्प्यूटर प्रोग्राम एवं कम्प्यूटर सॉटवेयर मौजूद हैं जो हिन्दी में कार्य करने में पूर्णतः सक्षम हैं। उन्होंने अपने प्रस्तुतीकरण के माधयम से लोगों की ऑंखे खोल दीं । ब्रिटेन में भारत के पूर्व संस्कृति एवं हिन्दी अताशे श्री राकेश दुबे ने कहा कि संस्कृत का तिरस्कार करके हमने उसे पीछे डाल दिया है जबकि वह कम्प्यूटर के लिए उपयुक्त भाषा है। इसको भविष्य में अपनाना ही होगा जिससे कि पूरे भारतीय भाषाओं के लिए हमें एक विशिष्ट भाषा रूप मिल सके । सत्र के अध्यक्ष प्रो0 एस0वी0एस0 राणा ने उम्मीद जताई कि जैसी सुविधाएं कम्प्यूटर आदि सूचना तंत्र में अंग्रेजी में मौजूद हैं शीघ्र ही हिन्दी में भी यही स्थिति होगी।






पंचम सत्र ‘अनुवाद और हिन्दी’ की अध्यक्षता प्रसिद्ध भाषाशास्त्री एवं एम0डी0यू0, रोहतक से पधारे के प्रो0 नरेश मिश्र ने की। बीज वक्तक्य देते हुए कुमायूं विश्वविविद्यालय से पधारे डॉ0 सिद्धेश्वर ने कहा कि हिन्दी में अनुवाद और अनुवादक को वह महत्व नहीं मिलता जो एक मूल रचनाकार को मिलता है, जबकि अनुवाद भी एक रचनात्मक कार्य है। दूसरी भाषाओं के साहित्य से हम अनुवाद के माध्यम से ही परिचित हो पाते हैं। उन्होंने अनुवादक की पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा कि यदि हिन्दी की अनुवादित पुस्तकों में कहीं अनुवाद का नाम दिया भी जाता है तो वह अत्यंत छोटे शब्दों में होता है। महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के साहित्य संकायाध्यक्ष प्रो0 सूरज पालीवाल ने अनुवाद साहित्य में किए गए कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज हिन्दी साहित्य में एक लाख पृष्ठों का साहित्य इन्टरनेट पर उपलब्ध करा दिया गया है। हम अनुवाद को दोयम दर्जे का कार्य मानते हैं जिसके कारण विस्तृत पैमाने पर अनुवाद नहीं हो पा रहा है। लेखिका एवं प्रख्यात लेखक खुशवन्त सिंह की रचनाओं की अनुवादक श्रीमती उषा महाजन ने कहा कि बिना संवेदनाओं को पकड़े किसी भी साहित्यिक कृति का सच्चे अर्थों में अनुवाद नहीं हो सकता। अनुवादक को मूल भाषा और स्रोत भाषा की छोटी-छोटी बारीकियों का ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने अपने अनुवाद संबंधी संस्मरणों को साझा किया तथा भाषा एवं भाव के अनुवाद पर प्रभावों की भी विस्तृत चर्चा की ।महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक के हिन्दी के आचार्य एवं सत्र के अध्यक्ष प्रो0 नरेश मिश्र ने कहा कि यदि अनुवादक में उस विधा को पकड़ने की सहृदयता नहीं है तो अनुवाद व्यर्थ हो जाता है। अनुवाद दो भाषाओं का संगम और समागम है। अनुवाद का कार्य एक तपस्या का कार्य है उसे दो भाषाओं में डूबना पड़ता है। जो अनुवादक दोनों भाषाओं में जीकर अनुवाद करता है वही श्रेष्ठ अनुवादक होता है।






संगोष्ठी में देश विदेश से आए अनेक विद्वान/शिक्षक/विषय विशेषज्ञों/शोधार्थियों/छात्र-छात्राओं की सहभागिता रही। 14 फरवरी 2010 को अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन षष्ठ सत्र ‘हिन्दी में विधाओं का विकास’ को लेकर अलग-अलग विधाओं को लेकर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। सत्र में बीज व्याख्यान देते हुए पटना विश्वविद्वालय में हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो0 महेन्द्र मधुकर ने हिन्दी में कविता के विकास को लेकर अपना वक्तव्य दिया। उन्होंने श्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक समारोह का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘‘हिन्दी की बात तो हम करते हैं किन्तु हिन्दी में बात नहीं करते।’’ भूमंडलीकरण को उन्होंने अमेरिका जैसे कुछ देशों के द्वारा मुनाफे के लिए बनाया गया एक तंत्र बताया जो पूंजीवादियों के लिए मुनाफे का माध्यम है। उन्होंने भूमंडलीकरण को ही उत्तर आधुनिकता के जन्म का कारण बताया। जिसने उपभोक्तावाद को जन्म दिया। उन्होंने बताया कि भूमंडलीकरण उत्तर आधुनिकता का एक बौद्धिक कक्ष हैं। उन्होंने कविता को मानव समाज की देन कहा जो समाज की कोख से पैदा होती है। भूमंडलीकरण की जड़ें उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति में खोजी और कहा की हमारी संस्कृति ‘वसुधैव कुटम्बकम’ को अपने अन्दर समाहित करके ही सदा से चली है इसलिए भूमंडलीकरण भारत में कोई नहीं संकल्पना नई है अपितु यह बहुत प्राचीन पद्धति है। उन्होंने उत्तर आधुनिकता का जन्म भी प्राचीन काव्य सिद्धांतों में खोजने की बात कही। अन्त में उन्होंने कविता पर वक्तव्य देते हुए कहा कि कविता सर्वकाल से समकाल की ओर जाती है तथा आज की कविता व्यंजनात्मक है। महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ0 रोहिणी अग्रवाल ने उपन्यास विधा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मैं अपनी बात वहाँ से शुरू करूँगी जहाँ पर इतिहास की किताबें रूक जाती हैं। उपन्यास विधा में उन्होंने कथ्य के स्तर को जोड़ते हुए उपन्यास में परिवर्तन बिन्दुओं को रेखांकित किया। उन्होंने कमलेश्वर के उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ को संर्दभित करते हुए कहा कि उपन्यास में पुराने वर्णनात्मक और किस्सागो शैली तनाव संघर्ष को अभिव्यक्त करने में नाकाफी है। इसीलिए कमलेश्वर ने अपने उपन्यास में फैंटैसी, कल्पना, पटकथा, रिपोर्ट का एक अद्भुत प्रयोग करते हुए इतिहास को विश्लेषित किया। उन्होंने आज के उपन्यासकारों को रेखांकित करते हुए कहा कि अब उपन्यासकार केवल वक्त पर ही टिप्पणी नहीं करते अपितु उन्हें निर्मित करने वाले कारकों और उनके पीछे छिपे तथ्यों की भी पड़ताल करते हैं। कमलेश भट्ट ‘कमल’ ने ‘हाइकू’ पर अपने विचार रखते हुए कहा कि ‘हाइकू’ दुनिया की सबसे छोटी कविता है, जिसका जिक्र 1916 ई0 में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार ‘हिन्दुस्तान’ पत्र में किया। हिन्दी में ‘हाइकू’ की शुरूआत करने वाले अज्ञेय हैं, जिन्होंने ‘अरी ओ करूणा प्रभामय’ में 1959 में ‘हाइकू’ के नूतन प्रयोग किए। आज ‘हाइकू’ दुनिया की हर भाषा में लिखे जा रहे हैं तथा इन्टरनेट पर इसकी हजारों वेबसाइटें मौजूद हैं। उन्होंने ‘हाइकू’ और ‘गजल’ के समानान्तर विकास की बात भी कही। हिन्दी में दो सौ पचास संकलन ‘हाइकू’ को लेकर आ चुके हैं। ‘हाइकू’ सत्रह शब्दों में जीवन की किसी गंभीर या शाश्वत सत्य को रेखांकित करने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने ‘हाइकू’ के अनेक उदाहरण देकर इस विधा की गंभीरता को भी रेखांकित किया यथा:समुद्र नहीं/परछाई खुद की/लांघो तो जाने कौन मानेगा/सबसे कठिन है/सरल होना यह विधा केवल साहित्यिक विधा तक ही सीमित नहीं है अपितु यह व्यावसायिक, श्रमिक उद्योग, कांच उद्योग आदि को भी सटीक ढंग से अभिव्यक्त करने में सक्षम है। दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के आचार्य प्रो0 गोपेश्वर सिंह ने आलोचना पर अपना वक्तव्य केन्द्रित करते हुए कहा कि आलोचना का संबंध विश्वविद्यालय से घनिष्ठ रूप से जुड़ा होता है क्योंकि इसका जन्म यहीं से होता है किन्तु हिन्दी साहित्य के विद्वानों ने आलोचना को उपेक्षित दृष्टि से देखा। राजेन्द्र यादव, वाजपेयी आदि लेखकों ने इसे प्राध्यापकीय/विश्वविद्यालीय आलोचना कहकर इस विधा का मजाक उड़ाया है। अन्तोन चेखव ने भी आलोचना को घोड़े की टांग की मक्खी बताया है तथा यशपाल ने भी आलोचना को गाड़ी के नीचे चलने वाला एक कुत्ता बताया है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस विधा का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है किन्तु प्रो0 गोपेश्वर सिंह का मानना है कि आलोचना हिन्दी साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण विधा है जो किसी भी कृति के गुणदोषों का सम्यक् मूल्यांकन कर पाठकों को परिचित कराती है तथा यह लेखक और पाठक के बीच सेतु का कार्य भी करती है। आलोचना के बिना हिन्दी साहित्य की सही दिशा का निर्धारण करना संभव नहीं है। उन्होंने स्वतंत्रता पूर्व की आलोचना को परिपाटीबद्ध बताया जो अपने-अपने सीखचों में बन्द थी किन्तु आज की आलोचना खेमेबाजी से युक्त प्रगतिशील आलोचना है। जो साहित्य का बिना किसी पूर्वाग्रह, बिना किसी खलनायक, बिना किसी की हत्या किए अपना पक्ष रखती है। उन्होंने स्वतंत्रता पूर्व की आलोचना को बंद मन की मानसिकता जो स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, जनजातीय विमर्श को स्पेस नहीं देती जबकि आज की आलोचना इन सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त है। उन्होंने दूधनाथ सिंह की पुस्तक ‘महादेवी एक अध्ययन’ का उदाहरण भी अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए रखा। सत्र की अध्यक्ष एवं युद्धरत ‘आम आदमी’ पत्रिका की सम्पादक रमणिका गुप्ता ने सभी के विचारों का समन्वय करते हुए अन्त में साहित्य में स्त्री दलित, आदिवासी की संवेदनाओं को समझने एवं अभिव्यक्त करने पर बल दिया। उन्होने कहा कि उत्तर आधुनिकता कहती है कि विचार का, साहित्य का, इतिहास का अन्त हो गया, जबकि यह पश्चिम का राग है। इतिहास में दर्ज हाशिए के लोग तो अब केन्द्र में आए हैं जबकि यह इतिहास के अन्त की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी साहित्य अब तक व्यक्तिगत कुंठाओं की बानगी था किन्तु आज परिदृश्य बदला, मूल्य बदले तथा हाशिए के लोगों को भी अपनी बात करने का साहित्य में मौका मिला। उन्होंने आलोचना को खेमेबंदी से दूर रखकर पूर्वागृहों से मुक्त होकर सम्यक् दृष्टि से विश्लेषित करने पर बल दिया। साहित्य में अब तक चारण, चापलूसी आदि की प्रवृत्ति हावी रही किन्तु आज साहित्य इन संकीर्णताओं से मुक्त होकर लिखा जा रहा है। अंत में उन्होंने हिन्दी साहित्य में स्त्री आत्मकथा तथा दलित आत्मकथाओं को एक नई शुरूआत बताया और कहा कि साहित्य जितना सरल लिखा जाएगा उतना ही पाठकों के करीब पहुँचेगा।


संगोष्ठी के समापन सत्र में कार्यक्रम अधिशासी दूरदर्शन, नई दिल्ली डॉ0 अमर नाथ ‘अमर’ ने भूमंडलीकरण के दौर में भाषाओं, बोलियों पर केन्द्रित अपना वक्तव्य रखा। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम से पहले की पत्रकारिता पूर्णतः आजादी से संबद्ध रही किन्तु आजादी के बाद यह एक व्यवसाय बन गई। साथ ही साथ उन्होंने समय-समय पर भाषा और बोलियों के परिवर्तन के कारणों की भी पड़ताल की। उत्तराखण्ड भाषा संस्थान की निदेशक डॉ0 सविता मोहन ने कहा कि हम हिन्दी साहित्य की बात करते हुए प्रायः पाठक को विस्मृत कर देते हैं जबकि वही साहित्य जीवित रहता है जो जनमानस को केन्द्र में रखकर रचा जाता है। उन्होंने साहित्य को दलित, स्त्री आदि खेमों में न बांट कर सम्रगता में देखनें की आवश्यकता जताई। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के निदेशक हिन्दी तथा गगनांचल पत्रिका के संपादक डॉ0 अजय गुप्ता ने हिन्दी भाषा को राजनीतिक सपोर्ट करने पर तथा संसद में इस आवाज को बुलन्द करने पर जोर दिया तथा उन्होंने मणिपुर के विधायकों का उदाहरण देते हुए कहा कि यह कार्य वे संसद में भलीभांति कर रहे हैं। अंत में उन्होंने कहा कि यह साहित्य का कुंभ सफल रहा तथा यदि इस सभागार में शेक्सपियर भी आया होता तो वह भी हिन्दीमय होकर जाता। सूचना विभाग के पूर्व महादिनदेशक डॉ0 श्याम सिंह ‘शशि’ ने अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि यह विश्वकुंभ है तथा मुझे यहाँ बहुत ही सुखद आश्चर्य अनुभव हुआ। उन्होंने कहा कि हिन्दी भाषा को लेकर जो कार्य हमने शुरू किए थे उसे प्रो0 लोहनी और उनकी पीढ़ी आगे ले जाएगी। उन्होंने हिन्दी के क्षेत्रीय रूपान्तरण को लेकर भी अपने विचार रखे तथा क्षेत्रीय भाषाओं को हिन्दी के लिए खतरे की घंटी बताया तथा हिन्दी के बिगड़ते स्वरूप को लेकर, समाचार पत्रों, टीवी चैनलों आदि पर चिन्ता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि भाषा का अपना निज स्वरूप होता है। उसे इस कद्र नहीं बिगाड़ा जाना चाहिए कि उसका संतुलन ही बिगड़ जाए। उन्होंने हिन्दी के विकास में गैर हिन्दी भाषियों तिलक, दयानन्द सरस्वती, के.एम. मुंशी, राजगोपालाचारी आदि के योगदान की भी चर्चा की तथा हिन्दी अनुवाद में गुणवत्ता पर भी जोर दिया तथा कहा कि तभी यह भाषा विश्व भाषा बनेगी और विश्व हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा जा सकेगा। इन सत्रों का संचालन विभाग के शोधार्थी विपिन कुमार शर्मा ने किया।


अंत में विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी अतिथियों को प्रतीक चिह्न देकर सभी का आभार व्यक्त किया तथा माननीय कुलपति प्रो0 एस0के0 काक ने धन्यवाद ज्ञापन देते हुए इस संगोष्ठी से एक सफल मुहिम और हिन्दी के प्रचार-प्रसार की संभावना को व्यक्त किया। माननीय कुलपति, प्रो0 एस0के0 काक ने कहा कि हिन्दी तभी अपना समुचित विकास कर सकेगी जब यह क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों को भी अपनाएगी । संगोष्ठी में उपस्थित प्रतिभागियों/श्रोताओं से खचाखच भरे सभागार को देखकर माननीय कुलपति ने संगोष्ठी के सफल आयोजन पर विभागाध्यक्ष प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी को बधाई दी। प्रो0 नवीन चन्द्र लोहनी ने कहा कि इस संगोष्ठी को सफल बनाने में विभाग के शिक्षकों, कर्मचारियों/ छात्र-छात्राओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं।





प्रस्तुतकर्ता विवेक सिंह

गणतंत्र के अक्षुण रहने व समर्थ बनने/ बनाने हेतु











 !!भारत के सभी वीरगति पाए महानायकों व संस्कृति पुरुषों की स्मृति !!
 को



!! विनम्र प्रणाम !!





 गणतंत्र दिवस पर भारतीय गणतंत्र के अक्षुण रहने व समर्थ बनने/ बनाने  हेतु शुभकामनाएँ.


लम्बे समय बाद नेट पर बैठ कर कुछ संवाद का सुयोग हो पाया है.



वस्तुतः ३१ दिसंबर से यात्राओं और भारत- प्रवास पर हूँ. यात्राओं के इस क्रम में 11 जनवरी से 21 जनवरी तक दिल्ली ( + पानीपत व यमुनानगर) रह कर परसों हैदराबाद पहुँची हूँ,  29 जनवरी को बैंगलोर के लिए प्रस्थान करना है व पुनः 5 से 17 फरवरी दिल्ली में रहूँगी. पश्चात एक सप्ताह पुनः हैदराबाद.



 हैदराबाद में सत्यनारायण शर्मा कमल जी के सुपुत्र के निवास पर उनसे भेंट के क्षण अतीव हर्षदायक व सुखद रहे. लम्बे अरसे बाद उन से भेंट कर मन मानो खिल उठा. उनकी कर्मठता व निरंतरता श्लाघनीय है व प्रेरणाप्रद भी. वे इसी प्रकार निरंतर लेखन रत रहें व सक्रिय भी. प्रो. ऋषभ देव शर्मा जी, डॉ.राधेश्याम शुक्ला जी, द्वारका प्रसाद मायछ जी आदि स्नेही आत्मीयों से मिलना अतीव हर्षातिरेक से भरता रहा है.



अन्य भी कई गतिविधियाँ व कई मित्रों-परिचितों से ( सर्व श्री वेदप्रताप वैदिक जी, रमणिका गुप्ता जी, राजकिशोर जी, अनामिका जी, अशोक चक्रधर जी, ब्रजेन्द्र त्रिपाठी जी, प्रो. गोपेश्वर सिंह जी, सुरेश नीरव जी, सुभाष नीरव जी, सुरेश यादव जी, अविनाश वाचस्पति जी, हरेप्रकाश उपाध्याय जी, डॉ. स्मिता मिश्रा जी, कनिष्क कश्यप जी, योगेन्द्र मौदगिल जी, आदि से मेलजोल / गपशप व सार्थक प्रश्नों पर चर्चाएँ, काव्यास्वादन व कार्यशाला आदि हुईं. भारतीय भाषाओं के साहित्य में स्त्रीमुक्ति और स्त्री लेखन पर प्रतीक्षित २ पुस्तकों ( काव्य पक्ष व गद्य पक्ष) की अंतिम तैयारी के काम का आनंद लिया.



( सम्पूर्ण प्रवास पर फिर कभी, लन्दन लौट कर, समयानुसार, विस्तार से व सचित्र ) लिखूँगी. अभी जिस विशेष उद्देश्य से प्रथम अवसर व नेट मिलते ही यह सन्देश समूह पर भेज रही हूँ उसका कारण है, हैदराबाद के वयोवृद्ध व नितांत आत्मीय श्री चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद जी के विषय में आप सभी को सूचित करना. गत लगभग ६ माह से वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते हुए भी इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति निरंतर पूर्ववत बनाए हुए थे. किन्तु लगभग १५-२० दिन से वे अत्यधिक रुग्ण हैं व कल तक ICU में भर्ती रहे हैं, कल उन्हें वहाँ से प्राईवेट कक्ष में स्थानांतरित कर दिया गया है. अभी लगभग ८-१० दिन वे और अस्पताल में रहेंगे. वे आँतों में अल्सर की गंभीर समस्या से लड़ रहे हैं व काफी क्षीण व दुर्बल हो चुके हैं. कल उनसे अस्पताल में भेंट करने के बाद से मन बहुत कष्ट पाता रहा है, वे वहाँ भी मुस्कुरा रहे थे. और सभी को अपना अभिवादन भी प्रेषित करने को कह रहे थे.



इस तात्कालिक नोट द्वारा मैं उनके शीघ्र स्वास्थ्य की कामना करते हुए पुनः आप सभी को गणतंत्र की शुभ कामनाएँ देती हूँ.





अब देश में रात को भी विशाल ध्वजदंड पर फहराया जा सकेगा राष्ट्रीय ध्वज






सांसद श्री नवीन जिंदल ने रचा एक और इतिहास
अब देश में रात को भी विशाल ध्वजदंड पर फहराया जा सकेगा राष्ट्रीय ध्वज

 


गृह मंत्रालय ने श्री जिंदल के प्रस्ताव को दी अनुमतिनई दिल्ली, दिसंबर 23, 2009। सांसद श्री नवीन जिंदल ने फिर इतिहास रच दिया जब 22 दिसंबर 2009 को गृह मंत्रालय ने श्री जिंदल के देश में राष्ट्रीय ध्वज रात को भी विशाल ध्वज दंड पर फहराने के प्रस्ताव को दी अनुमति दे दी।

जून 2009 में गृह मंत्रालय को लिखे गए पत्र में श्री जिंदल ने यह अनुमति मांगी थी कि देश में रात को भी विशाल ध्वज दंड पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जा सके। विश्व के विभिन्न देशों जेसे मलेशिया, जार्डन, आबुधाबी, उत्त्री कोरिया, ब्राज़ील, मैक्सिको व तुर्कमेनिस्मान का हवाला देते हुए कहा था कि इन देशों में विशाल घ्वज दंडों पर रात में भी राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है।

गत 22 दिसंबर 2009 को गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में श्री जिंदल को सूचित करते हुए कहा कि उनके प्र्रस्ताव पर गंभीर विचार करने के पश्चात् गृह मंत्रालय ने यह निर्णय लिया है कि अब से देश में राष्ट्रीय ध्वज रात को भी विशाल ध्वज दंड पर फहराया जा सकेगा।

श्री नवीन जिंदल, सांसद ने कैथल और लाड़वा (कुरूक्षेत्र), हिसार व कुरूक्षेत्र में देश के सबसे ऊंचे राष्ट्रीय ध्वज को फहराया है। यह राष्ट्रीय ध्वज 206 फुट ऊंचा है और इसकी चैड़ाई 48 फुट एवं लंबाई 72 फुट है। राष्ट्रीय ध्वज का कुल वजन 40 किलोग्राम है।

श्री जिंदल द्वारा लड़ी गई एक दशक की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था जिसमें कहा गया था कि देश के प्रत्येक नागरिक को आदर, प्रतिष्ठा एवं सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार है और इस प्रकार यह प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार बना है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद केंद्रिय मंत्रीमंडल ने फ्लैग कोड में संशोघन किया था।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से प्रेरणा पाते हुए श्री नवीन जिंदल ने ‘फ्लैग फाउंडेशन आॅफ इंडिया’ की स्थापना की जिसके माध्यम से वह देश के प्रत्येक नागरिक को तिरंगे के साथ जोड़ना और अत्यधिक गर्व की भावना के साथ अधिकाधिक भारतीयों के बीच तिरंगे के प्रदर्शन को लोकप्रिय बनाना चाहते हैं। फ्लैग फाउंडेशन आज के युवा वर्ग का तिंरगे के साथ एक नाता बनाने का एक निष्ठावान प्रयास है ताकि यह हमारे स्वतंत्रता संग्राम का एक शक्तिशाली प्रतीक बने और असंख्य भारतीयों के लिए प्रेरणा का एक महान स्रोत बने जो पूरी दुनिया में फैले हुए हैं और देश को सम्मान दिलवा रहे हैं भले वे किसी भी क्षेत्र में हों।

आज का भारत युवाओं का देश है, आज 75%से अधिक व्यक्ति 40 साल से कम उम्र के हैं, जीवन के सबसे उपार्जक साल जहां व्यक्ति अपने सपनों को हकीकत में बदल सकता है। युवाओं की शक्ति को समझते हुए श्री नवीन जिंदल ने, जो खुद एक युवा हैं, राष्ट्र के युवाओं के लिए एक जन आंदोलन आरंभ किया है जो ”युवा हिंदुस्तानी“ कहलाता है। यह क्रांतिकारी आंदोलन तेजस्वी युवाओं को एक साथ इकट्ठा करना है और इसका ध्येय भारत एवं उसके लोगों को गौरवान्वित, सुखी एवं समृद्ध बनाने के लिए परिवर्तन का माध्यम बनना है।

अधिक जानकारी के लिए, कृपया संपर्क करें: विवेक शर्मा / 9818552437


एक और हजार का फर्क



एक और हजार का फर्क
डा. वेदप्रताप वैदिक





भारत में गरीब होने का अर्थ जैसा है, वैसा शायद दुनिया में कहीं नही है| भारत में जिसकी आय 20 रू. से कम है, सिर्फ वही गरीब है| बाकी सब ? यदि सरकार और हमारे अर्थशास्त्रियों की मानें तो बाकी सब अमीर हैं| 25 रू. रोज़ से 25 लाख रू. रोज तक कमानेवाले सभी एक श्रेणी में हैं| इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है ? ये लोग गरीबी की रेखा के उपर हैं| जो नीचे हैं, उनकी संख्या भी तेंदुलकर-कमेटी के अनुसार 37 करोड़ 20 लाख हैं| ये 37 करोड़ लोग, हम ज़रा सोचें, 20 रू. रोज़ में क्या-क्या कर सकते हैं ? अगर कोई इन्सान इन्सान की तरह नहीं, जानवर की तरह भी रहना चाहे तो उसे कम से कम क्या-क्या चाहिए? रोटी, कपड़ा और मकान तो चाहिए ही चाहिए| बीमार पड़ने पर दवा भी चाहिए| और अगर मिल सके तो अपने बच्चों के लिए शिक्षा भी चाहिए| क्या 20 रू. रोज में आज कोई व्यक्ति अपना पेट भी भर सकता है ? आजकल गाय और भैंस 20 रू. से ज्यादा की घास खा जाती हैं| क्या हमें पता है कि देश के करोड़ों वनवासी ऐसे भी हैं, जिन्हें गेहूँ  और चावल भी नसीब नहीं होते| इस देश के जानवर शायद भरपेट खाते हों लेकिन इन्सान तो भूखे ही सोते हैं| वे इसलिए भी भूखे सोते हैं कि वे इन्सान हैं| वे एक-दूसरे का भोजन छीनते-छपटते नहीं| गरीब परिवारों में कभी बाप भूखा सोता है तो कभी मॉं और कभी-कभी बच्चों को भी अपने पेट पर पट्रटी बाँधनी  होती है| जहाँ तक कपड़ों और मकान का सवाल है, भोजन के मुकाबले उनका महत्व नणण्य है| किसी तरह तन ढक जाए और रात को लेटने की जगह मिल जाए, इतना काफी है| ऐसे 37 करोड़ लोगों का देश दुनिया में कोई और नहीं है| दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब लोग अगर कहीं रहते हैं तो भारत में ही रहते हैं|


यह तो सरकारी आंकड़ा है लेकिन असलियत क्या है ? असलियत का अंदाज तो सेनगुप्ता-कमेटी की रपट से मिलता है| उसके अनुसार भारत के लगभग 80 करोड़ लोग 20 रू. रोज़ पर गुजारा करते हैं| यहाँ  तेंदुलकर-रपट सिर के बल खड़ी है| किसे सही माना जाए ? तेंदुलकर को या सेनगुप्ता को ? भारत का तथाकथित मध्यम-वर्ग यदि 25-30 करोड़ लोगों का है तो शेष 80 करोड़ लोग आखिर किस वर्ग में होंगे ? उन्हें निम्न या निम्न-मध्यम वर्ग ही तो कहेंगे| उनकी दशा क्या है ? क्या वे इंसानों की जिंदगी जी रहे हैं ? उनकी जिदंगी जानवरों से भी बदतर है| वे गरीबी नहीं, गुलामी का जीवन जी रहे हैं| वे लोग कौन हैं ?
 
 

ये वे लोग हैं, जो गावों में रहते हैं, शारीरिक श्रम करते हैं, पिछड़ी और अस्पृश्य जातियों के हैं, शहरों में मजदूरी करते हैं, शिक्षा और चिकित्सा से वंचित हैं और जिन्हें सिर्फ पेट भरने, तन ढकने और सोने की सुविधा है| इन्हें वोट का अधिकार तो है लेकिन पेट का अधिकार नहीं है| यह भारत है| यह भूखा और नंगा है| और वह इंडिया है| उसमें वही 25-30 करोड़ लोग रहते हैं| ये नागरिक हैं, सभ्य हैं, स्वामी हैं| कौन हैं, ये लोग ? ये शहरी हैं, ऊँची जातियों के हैं, अंग्रेजीदाँ हैं| राजनीति, व्यापार और ऊँची नौकरियों पर इन्हीं का कब्जा है| इन्हीं के लिए चिकनी-चिकनी सड़कें, रेल, हवाई जहाज, कारें बनती हैं| बड़े-बड़े स्कूल, अस्पताल और कालोनियाँ  खड़ी की जाती हैं| इनका संसार अपना है और अलग है| यही वर्ग तय करता है कि गरीबी क्या है और गरीबी कैसे हटाई जाए ? इसीलिए यह फतवा जारी कर देता है कि जो 20 रू. से ज्यादा कमाता है, वह गरीब नहीं है और जो गरीब नहीं है, वह चिल्लाए क्यों और उसके लिए कुछ खास क्यों किया जाए ? याने देश के 80 करोड़ लोगों के बारे में विशेष चिंता की कोई बात नहीं है, क्योंकि ये लोग गरीबी की रेखा के उपर हैं| जिन 37 करोड़ लोगों की चिंता है, उनकी गरीबी दूर करने के प्रयास जरूर होते हैं लेकिन वे सतही और तात्कालिक होते हैं और उनमें से ज्यादातर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाते हैं| सस्ते राशन और 'नरेगा' (ग्रामीण रोजगार) से क्या वाकई गरीबी हटाई जा सकती है ? ये काम भी यदि ईमानदारी से किए जाएँ तो थोड़ी देर के लिए गरीबी हटती जरूर है लेकिन वह मिटती बिल्कुल भी नहीं| उसकी जड़ पर प्रहार होना तो बहुत दूर की बात है| सरकारी प्रयास तो उसकी जड़ को छूते तक नहीं|


हमारी सरकारों ने गरीबी की जड़ उखाड़ने की बात कभी सोची ही नहीं| हजारों बरस से चली आ रही हमारी गरीबी का मूल कारण जातिवाद है| कुछ जातियाँ दिमाग का काम करेंगी और कुछ हाथ -पाँव  का ! दिमागवाली जातियाँ  मलाई खाएँगी  और हाथ-पाँववाली जूठन ! इस तिकड़म को बरकरार रखने के लिए हमने सूत्र यह चलाया कि दिमागी काम की क़ीमत ज्यादा और शारीरिक काम की क़ीमत कम ! कुर्सीतोड़ काम महत्वपूर्ण और हाथ-तोड़ काम महत्वहीन ! ऊँची जातियाँ  शहरी लोगों और अंग्रेजीदानों ने कुर्सीतोड़ काम पकड लिए और ग्रामीणों, पिछड़ी जातियों और गरीबों ने हाड़-तोड़ काम ! यहीं इंडिया और भारत की खाई खड़ी हो गई| यह खाई तभी पटेगी, जब दिमागी और जिस्मानी कामों में चला आ रहा जमीन-आसमान का अंतर खत्म होगा| आज तो एक और हजारों का अंतर है| मजदूर को 100 रू0 रोज मिलते हैं तो कंपनी बॉस को लाखों रू. रोज़ ! यह अंतर एक और 10 का करने की हिम्मत जिस सरकार की होगी, वह गरीबी की जड़ पर पहला प्रहार करेगी| इसी प्रकार देश में से दो प्रकार की शिक्षा और दो प्रकार की चिकित्सा का तुरंत खात्मा होना चाहिए| यदि अंग्रेजी की अनिवार्यता नौकरियों और शिक्षा से एक दम हट जाए तो गरीबों के बच्चों को अपना जौहर दिखाने का सच्चा मौका मिलेगा| आरक्षण, बेगारी भत्ता (ग्रामीण रोजगार), सस्ता अनाज आदि की अपमानजनक मेहरबानियाँ अपने आप अनावश्यक हो जाएँगी, अगर शिक्षा के बंद दरवाजे खोल दिए जाएँ| किताबें रटाने की बजाय बच्चों को काम-धंधे सिखाए जाएँ, छोटे-छोटे कर्जे़ देकर काम-धंधे खुलवाए जाएँ और अमीरों और नेताओं के अंधाधुंध खर्चों पर रोक लगाई जाए तो गरीबी कितने दिन टिकेगी ? हमारी सरकारें आमदनी पर तो टैक्स लगाती है, लेकिन खर्चों पर कोई सीधा टैक्स नहीं है| इसकी वजह से समाज में जबर्दस्त प्रतिस्पर्द्घा और भोगवाद को बढ़ावा मिलता है| लोग बचत करने की बजाय भ्रष्टाचार करने पर उतारू हो जाते है| यदि खर्च की सीमा बाँधी  जाए तो सामाजिक विषमता अपने आप घटेगी| गरीब को गरीबी उतनी नहीं चुभेगी| गरीबी अपने आप में ही अभिशाप है| जब तक उसे दूर नहीं किया जाता, लोकतंत्र और आर्थिक प्रगति कोरे दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं हैं|



ए-19 प्रेस एन्क्लेव नई दिल्ली-17-फोन-2686-7700, 2651-7295

Comments system

Disqus Shortname