ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (३) : मौलिक-विज्ञानलेखन

 साप्ताहिक स्तम्भ


गतांक से आगे

ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (३)
(स्थाई दशा एवं प्रसारी सिद्धान्त)
विश्वमोहन तिवारी (पूर्व एयर वाइस मार्शल)



स्थायी दशा सिद्धान्त (स्टडी स्टेट थ्योरी)

तीसरे दशक के बाद अनेक वैज्ञानिक, जिनके मन को यह प्रसारी ब्रह्माण्ड नहीं भा रहा था, यह प्रश्न कर रहे थे कि यदि ब्रह्माण्ड का प्रारंभ हुआ था, तब उस क्षण के पहले क्या स्थिति थी? अत्यन्त विशाल ब्रह्माण्ड एक अत्यन्त सूक्ष्म बिन्दु में कैसे संकेन्द्रित हो सकता है? उस बिन्दु में समाहित पदार्थ का विस्फोट क्यों हुआ? उतना अकल्पनीय पदार्थ कहां से आ गया? और प्रसार या विस्तार के बाद ब्रह्माण्ड का अन्त क्या होगा? इनमें से कुछ प्रश्न तो मुख्यतया विज्ञान के प्रश्न नहीं वरन दर्शन विषय के प्रश्न हैं, अर्थात यह दर्शाता है कि वैज्ञानिक भी कभी कभी प्रत्यक्ष की तुलना में दार्शनिक अवधारणाओं को अधिक महत्व देते हैं। अस्तु! तीन वैज्ञानिकों गोल्ड, बान्डी तथा हॉयल ने 1948 में एक संवर्धित सिद्धान्त प्रस्तुत किया – ‘स्थायी दशा सिद्धान्त’। अथार्त यह ब्रह्माण्ड प्रत्येक काल में तथा हर दिशा में एक-सा ही रहता है, उसमें परिवर्तन नहीं होता। इस तरह उपरोक्त प्रश्नों को निरस्त्र कर दिया गया। क्योंकि इस सिद्धान्त के तहत ब्रह्माण्ड अनादि तथा अनन्त माना गया है। इसलिये इसमें न तो प्रारम्भ का प्रश्न है और न अन्त का। किन्तु प्रसारण तो तथ्य है, इसके कारण उत्पन्न विषमता को कैसे बराबर किया जा सकता है? ऐसे स्थायी ब्रह्माण्ड में मन्दाकिनियों के प्रसारण के कारण पदार्थ के वितरण में अन्तर अवश्य आएगा, क्योंकि प्रसार के केन्द्र में शून्य बनेगा, और् ज्यों‌ज्यों दूरियां बढेंगी, घनत्व कम होगा। इस आरोप से बचने के लिये उन्होंने घोषणा की कि ऐसे केन्द्र पर ऊर्जा स्वयं पदार्थ में बदल जाएगी और वह पदार्थों के लिये एक फव्वारे की तरह स्रोत बन जाएगा जो पदार्थ वितरण की एकरूपता को बनाकर रखेगा। यह अवधारणा भी अनेकों प्रश्न पैदा करती है। उस स्थान पर अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा कैसे आएगी, और अनन्तकाल तक कैसे आती रहेगी। ऐसे प्रश्नों को उन्होंने व्यर्थ तथा निरर्थक प्रश्न कहकर टाल दिया। और लगभग दस वर्ष तक यह सिद्धान्त अनेक वैज्ञानिकों में मान्य रहा क्योंकि इस सिद्धान्त ने ब्रह्माण्ड में हाइड्रोजन तथा हीलियम के बाहुल्य को, सुपरनोवा की कार्यप्रणाली के द्वारा समझाया था जिसे मूल प्रसारी सिद्धान्त नहीं समझा पाया था। इसे जार्ज गैमो ने बाद में क्वाण्टम सिद्धान्त के आधार पर ‘प्रसारी सिद्धान्त’ के तहत सिद्ध किया : प्रथम तीन मिनिटों में ड्यूटीरियम, तथा हीलियम एवं लिथियम के आइसोटोप घोषित अनुपात में बन गये थे। ‘स्थायी दशा सिद्धान्त’ को 1941 में घोषित किये गये व्हीलर तथा फाइनमान के एक अनोखे सिद्धान्त से भी बल मिला। इस सिद्धान्त में गणितीय सूत्रों के आधार पर यह माना गया कि समय पीछे की ओर भी चल सकता है, अर्थात भविष्य से भूतकाल की ओर चल सकता है। यह ब्रह्माण्ड के समय में समांग (सिमिट्रिक) होने की पुष्टि करता है। किन्तु अवलोकनों से प्राप्त तथ्यों के द्वारा स्थायी दशा सिद्धान्त के लिये कठिनाइयां उत्पन्न होती गईं। उनमें से एक है ‘रेडियो स्रोतों’ का अधिक दूरियों, अथार्त प्रारंभिक अवस्था में आज की अपेक्षा आधिक्य, अथार्त ब्रह्माण्ड की दशा में समय या दूरी के आधार पर अन्तर का होना, स्थाई न होना। 1966 में क्वेसारों की खोज हुई। क्वेसार परिमाण में छोटे किन्तु दीप्ति में बहुत तेज पिण्ड होते हैं, और ये केवल अधिक दूरी पर ही मिलते हैं। अथार्त कुछ सैकड़ों करोड़ों वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड की दशा बहुत भिन्न थी। और भी कि पृष्ठभूमिक सूक्ष्मतरंग विकिरण का तापक्रम प्रारम्भ से ही बदलता आया है।


पृष्ठभूमिक सूक्ष्मतरंग विकिरण

1965 में ब्रह्माण्ड में ‘पृष्ठभूमिक सूक्ष्मतरंग विकिरण’ (पृ सू वि) (बैकग्राउण्ड माइक्रोवेव रेडियेशन) की खोज हुई। पृ सू वि की खोज करने वाले दो वैज्ञानिकों पैन्जियास तथा विल्सन को 1978 में नोबेल पुरस्कार मिला, हालां कि मजे की बात यह है कि वे इनकी खोज ही‌ नहीं कर रहे थे। प्रसारी सिद्धान्त के अनुसार प्रारंभ में जब पदार्थ के सूक्ष्मतम तथा घनतम बिन्दु (अंड) का विस्फोट हुआ था, उस समय जो विकिरण हुए थे, सारे ब्रह्माण्ड में उनके अवशेष होना चाहिये। उन्हीं अवशेषों की एक पृष्ठभूमि की तरह उपस्थिति की खोज हुई। चूँकि यह सूक्ष्मतरंग विकिरण सभी दिशाओं में समान रूप से उपस्थित मिलता है, इसका नाम ‘पृष्ठभूमिक सूक्ष्म तरंग विकिरण’ रखा गया। यह प्रसारी सिद्धान्त का एक अकाट्य प्रमाण स्थापित हुआ और अधिकांश विद्वानों ने स्थायी दशा सिद्धान्त के बरअक्स ब्रह्माण्ड के विकास का प्रसारी सिद्धान्त स्वीकार किया। प्रसार का एक और प्रमाण महत्वपूर्ण है। पुणे स्थित खगोल विज्ञान एवं खगोल भौतिकी के अन्तर–विश्वविद्यालय केन्द्र के डा रघुनाथन. श्री आनन्द ने अपने साथियों के साथ एक क्वेसार से निकले प्रकाश का अध्ययन किया। उस समय ब्रह्माण्ड की आयु आज की आयु का पंचमांश थी। उस प्रकाश ने काबर्न के एक अणु को उद्दीप्त किया। इस उद्दीप्त कार्बन के अणु से विकिरित प्रकाश को उन्होंने पकड़ा जिससे उन्हें ज्ञात हुआ कि उस कार्बन का तापक्रम परमशून्य से 6 से 14 अंश कैल्विन अधिक था। आज तो ब्रह्माण्ड का तापक्रम 3 कैल्विन से भी कम है। यह न केवल दर्शाता है कि महाविस्फोट के पश्चात ब्रह्माण्ड का तापक्रम कम होता जा रहा है, वरन यह भी कि यह अन्तर प्रसारी सिद्धान्त के अनुकूल सही मात्रा में भी है, न कि स्थाई दशा के अनुसार अपरिवर्तनशील है।



ब्रह्माण्ड का विकास

प्रसारी सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड का विकास कैसे होता है। इस सिद्धान्त के निर्माण के लिये कुछ मूलभूत मान्यताओं से प्रारम्भ करते हैं; कि एड्विन हबल के अभिरक्त (अवरक्त या इन्फ़्रारेड) विस्थापन के अवलोकनों के आधार पर ब्रह्माण्ड का प्रसार हो रहा है, तथा दूरी के अनुपात में तीव्रतर होता जाता है। प्रसारी सिद्धान्त के यह दो –अवरक्त विस्थापन तथा प्रसार – वे आधार स्तम्भ हैं जिन पर प्रसारी सिद्धान्त खड़ा है। यह दो स्तम्भ स्वयं अन्य दो मान्यताओं के स्तंभ पर खड़े हैं कि ब्रह्माण्ड विशाल अर्थ में समांगी (होमोजीनियस – समान पदार्थों का समान वितरण) तथा समदैशिक (आइसोट्रोपिक -सभी दिशाओं में एक सा फ़ैलाव) है। तथा यह स्थिति न केवल आज है वरन विस्फोट की अवधि में भी थी। इसमें तथा स्थायी दशा सिद्धान्त की मान्यताओं में जो मुख्य अन्तर है वह यह कि प्रसारी सिद्धान्त के अनुसार ‘दिक्काल’ में ब्रह्माण्ड परिवर्तनीय है जबकि ‘स्थायीदशा’ में ‘दिक्काल’ में भी अपरिवर्तनीय है। इन सिद्धान्तों पर 1922 रूसी गणितज्ञ अलेक्सान्द्र फ्रीडमान ने कुछ गणितीय सूत्रों का निर्माण किया था जिनके द्वारा प्रसारी ब्रह्माण्ड की व्याख्या की जा सकती है। 1927 में बेल्जियन वैज्ञानिक ल मेत्र ने इन सूत्रों के आधार पर उस मूल क्षण का आकलन किया जब उस “आद्य अणु” (ब्रह्म–अण्ड) ने विस्फोट कर प्रसार प्रारंभ किया था और अणु, मन्दाकिनियां तथा तारों आदि का निर्माण प्रारंभ हुआ था। इस ‘महाविस्फोट’ (यह नाम मजाक में फ्रैड हॉयल ने दिया था) के सिद्धान्त को ‘फ्रीडमान–ल मेत्र’ सिद्धान्त कहते हैं।


मूलभूत बल


ब्रह्माण्ड में केवल चार बल हैं जो मूलभूत माने जाते हैं – गुरुत्वाकर्षण, विद्युत चुम्बकीय, दुर्बल एवं सशक्त नाभिक बल। विद्युतचुम्बकीय बल विद्युत, चुम्बकत्व तथा विद्युतचुम्बकीय विकिरण पर नियंत्रण रखता है। दुर्बल नाभिक बल अत्यंत कम दूरियों पर ही प्रभावी होता है तथा रेडियो एक्टिव क्षय का नियंत्रण करता है। सशक्त नाभिक बल नाभिक में प्रोटानों तथा न्यूट्रानों को बाँधकर रखता है। आइन्स्टाइन ने व्यापक आपेक्षिकी सिद्धान्त के उपरान्त शेष जीवन मुख्यतया इन्हीं चारों बलों को मूलरूप से एक ही सिद्ध करने के प्रयास में लगाया था, जिसे 'एकीकृत क्षेत्र सिद्धान्त' कहते हैं। (ऐसी अवधारणा भी मुण्डक उपनिषद में मिलती है - 'वह क्या है जिसे जानने से यह सब जाना जाता है?') आज कल मूलभूत बलों की संख्या, सिद्धान्तत: तीन ही रह गई है, विद्युत चुम्बकीय तथा दुबर्ल नाभिक बलों में सिद्धान्तत: एकता स्थापित की जा चुकी है। यह चारों बल मूल ब्रह्म–अण्ड में एकीकृत रूप में रहते थे और सहज ही आपस में परिवर्तनशील रहते थे तथा इसी तरह पदार्थ तथा ऊर्जा आपस में पूर्ण रूप से परिवर्तनशील थे। (स्विट्ज़ेरलैन्ड तथा फ़्रान्स स्थित सर्न (सी ई आर एन ) के 'विशाल हेड्रान कोलाइडर' में आजकल कुछ विशिष्ट प्रयोग हो रहे हैं जो इस विषय प उपयोगी प्रकाश डाल सकते हैं, कहा तो यह भॆ जा रहा है कि इन प्रयोगों से 'ईश्वर कण' ( गाड पार्टिकल) की‌ खोज हो सकेगी। वैसे इसका सही नाम ' 'हिग्ज़ बोसोन' है; बोसोन एक अद्भुत मूल कण है, और हिग्ज़ ऐसा क्षेत्र है जो कणों को द्रव्यमान देता है। समस्त् ब्रह्माण्ड हिग्ज़ क्षेत्र से पूर्ण है। इस पर विस्तृत चर्चा बाद में।) पदार्थ तथा ऊर्जा की तुल्यता (ई = एम.सी स्क्वेअर) सिद्ध करने के लिये आइन्स्टाइन को, सोलह वर्षों बाद, 1921 में नोबेल पुरस्कार मिला।


क्रमशः



व्यवसाय और हमारी भाषाएँ

 व्यवसाय और हमारी भाषाएँ 
 राहुल देव जी के सौजन्य से 



आमंत्रण व आलेख को बड़े आकार में पढ़ने के लिए एक एक कर तीनों पृष्ठ चित्रों पर क्लिक करें -



१)






२)




३)






पिंजरे वाली मुनिया

पिंजरे वाली मुनिया 


मन्ना डे के स्वर में गाया पिंजरे वाली मुनिया  मेरा एक पसंदीदा गीत है|

इसके साथ ही पसंद के कुछ अन्य गीत सुनिए आज -







साप्ताहिकी

साप्ताहिकी
Monday, December 14, 2009


 
विद्या विवादाय धनं मदाय, शक्ति परेषां परिपीडनाय (खलस्य)


कल रवि जी ने  श्री  देवाशीष   तथा  श्री रमण कौल  के एकल प्रयासों से बनी चिट्ठा निर्देशिका  का उल्लेख यहाँ किया तो कई चिट्ठाकारों ने अपना उल्लेख उसमें न होने की बात दुहराई| अब यदि कोई वहाँ रजिस्टर्ड ही नहीं हुआ स्वयं जा कर, तो वह स्वयं को वहाँ पाएगा कैसे ? इसलिए महत्वपूर्ण बात यह है कि चिट्ठाकार साथी अपने ब्लॉग को वहाँ रजिस्टर्ड करवाने के साथ ही साथ  आँकड़ों का एक विभाग तक भी जाएँ, अपने सम्बन्ध में जानकारी आदि दे कर तथ्यपूर्ण बनाएँ|  देखिए --

इस पोस्ट के बहाने सभी चिट्ठाकारों और चिट्ठे पढ़ने वालों और नेट पर हिन्दी के चाहने वालों से निवेदन हैं कि वे हिन्दी ब्लॉग्स चिट्ठादर्शिका पर पंजीकृत हों, अपने प्रोफाईल में सारी जानकारी भरें और यदि चिट्ठा लिखते हैं तो उसे निर्देशिका में जोड़ने के उपरांत उसे क्लेम भी करें। इससे हमें समय समय पर जाल पर हिन्दी प्रयोग और प्रयोक्ताओं के बारे में जानकारी मिलती रहेगी।


  उसे अद्यतन बनाने में अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह तो आप को व हमें ही करना है ना ! अस्तु !!


 गत  दिनों (बल्कि माहों) से हिन्दी चिट्ठा संसार पर मुख्यतः विग्रह, विवाद और वर्चस्व के बादल बहुधा छाए दिखाई देते रहे हैं| मेरे जैसा कड़े जी वाला व्यक्ति तक भी इस हाहाकार, छीना छपटी, अहमन्यता और पारस्परिक दोषारोपणों के जंजाल से विचलित ही नहीं विरक्त भी हो उठा मानो| जाने क्या तो बँट रहा है जिसके लिए युद्धक भूमिका में सब तने बैठे हैं ?  हम एक दूसरे की रेखा को छोटी कर के अपनी रेखा को बड़ा दिखाने के भ्रम में क्या तो पा लेंगे? पता नहीं !!



 आसपास के परिवेश, समय और परिस्थिति से अनजान समय और मनुष्य अपना कोई सकारात्मक योगदान देने की अपेक्षा किंचित भी संसाधनों और स्रोतों का दुरुपयोग करता है तो वह अपनी आने वाली नस्लों का अपराधी है| उदाहरण के लिए इस रिपोर्ट को देखें कि प्रति व्यक्ति की जाने वाली बर्बादी का दुष्परिणाम संसार के अलग अलग कोने में बैठे व्यक्तियों तक को कैसे भोगना पड़ जाता है | ऐसे में किसी का भी अनुत्तरदायी एक भी एक्शन (किसी भी कार्य/ व्यवहार का) बड़े भावी और समकालिक अर्थ रखता है|



स्वास्थ्य और विज्ञान में रूचि रखने वालों के लिए गत दिनों कुछ महत्वपूर्ण चीजें पढ़ने देखने को मिलीं| सर्वप्रथम आप अतिरिक्त भार को कम करने के प्रयास में जुटे एक व्यक्ति के प्रयासों और परिणाम  को सचित्र देखें-  ( चित्र मैंने सकारण हटा दिए हैं, आप लिंक पर ही उन्हें देखें ) |




दूसरा समाचार  मेडिकल से जुड़े हमारे साथी चिट्ठाकारों के साथ साथ स्वास्थ्य के प्रति सकारात्मक जागरूकता अपनाने वाले पाठकों  के लिए भी अतीव   महत्वपूर्ण शोध  है|


Alcohol consumption has long been linked to cancer and its spread, but the underlying mechanism has never been clear. Now, researchers at Rush University Medical Center have identified a cellular pathway that may explain the link.


हमारे साथी चिट्ठाकार बंधु ऐसे महत्त्व के विज्ञान लेखों का भी हिन्दी उल्था करके इतनी आवश्यक जानकारियों को निरंतर हिन्दी के पाठकों के लिए प्रस्तुत करने का काम करें तो लोक कल्याण की दृष्टि से व जन जागृति की दिशा में देश कुछ आगे बढ़े|



यहाँ अपनी भाषा के प्रति भावों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में एक ऐसी कल्पना का रूप निरख कर एक बार अवश्य आप का भी वाह वाह कहने का मन हो आएगा |


Apostrophe
Brackets
Colon
Comma
Dash
Ellipsis
Exclamation Point
Hyphen
Parentheses
Period

Question Mark
Quotes
Semicolon




अब  गत दिनों हिन्दी ब्लॉग जगत की कुछ पठनीय प्रविष्टियों पर एक दृष्टि डालें तो डॉ. पद्मजा शर्मा की यह कविता बरबस संवेदना से सराबोर कर देती है -

कविता

पिता की मृत्यु  के बाद

माँ बहुत रोती है पिताजी
बेटा  दफ्तर जाते समय
न मिले तो / आंसू
पोता न सुने कहानी
घर में हो ब्याह
या जाया हो नाती
हर मौके बस रोती / माँ


आप जानते हो पिताजी
आपके खाने से पहले
खाती नहीं थी माँ


जब तक आपसे  नहीं कर लेती थी तकरार
कहाँ शुरू होता था उसका दिन
आपका भी कहाँ लगता था मन
जब हो जाती थी नाराज
कितना मनाते थे आप


सुनाकर माँ को / मुझसे कहते थे-
' तेरी माँ का स्वभाव फूल सरीखा है
जो दूसरों को बांटकर सुगंध
बिख़र जाता है ख़ुद '


तब माँ फेर लेती थी पीढ़ा
और आँखों की कौर से
पौछती थी गीलापन


जब से आप गए हो / पिताजी
बैठी रहती है आपकी तस्वीर के आगे
बिना कुछ खाए पिए
काट देती  है सारा  दिन


माँ की आँखों से
हंसी ख़ुशी उदासी की
जो त्रिवेणी बहती है
कभी पलट कर देखो तो सही / पिताजी


पोते को हँसता बोलता देखकर
कभी कभी रोते हुए माँ
कहती है  धीरे से -
' तेरे पिता हंस रहे हैं '


पर आप पहले की तरह
सिर्फ माँ के लिए
कब हंसोगे पिताजी



गत दिनों नंदिनी की एक कविता पर कवि ओम की एक टिप्पणी से जिस प्रकार की गलतफहमियाँ हुई और उस प्रकरण में विलंबित उत्तर के चलते जिस प्रकार नंदिनी ने अपना ब्लॉग बंद किया, नंदिनी के ब्लॉग बंद होने के चलते कई जगह विचलित होकर प्रतिक्रियाएँ आदि हुई, वह सब  घटनाक्रम काफी अजीबोगरीब व क्विक रिएक्शन के साथ मुझे व्यक्तिगत स्तर पर बहुत विगलित भावुकता से पूर्ण व कमजोर मनःस्थिति का वाचक प्रतीत होता रहा है|  मेरे ऐसा प्रतीत होने की जी भर आलोचना की जा सकती है किन्तु इधर युवा संभावनाशील लेखन की जो हल्की-सी छवि बननी प्रारम्भ हुई थी, उसका गुलशन नंदा टाईप कायांतरण मेरे गले नहीं उतरता| लेखन अथवा सम्बन्ध व्यक्ति की शक्ति हैं, उन्हें अपनी कमजोरी के भार से दबा देना आत्मघाती ऐसा कदम हैं कि जिसके लिए दया नहीं, सहानुभूति नहीं अपितु आक्रोश भर जाता है मन में| कोरी भावुकता के चलते, लेखन के डगमग होने की छवि के चलते किसी का कोई कल्याण उसमें निहित नहीं है| अतः ऐसे प्रसंगों से किसी भवितव्यता की अपेक्षा नहीं जन्मती|





२ दिन पूर्व वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा जी ने वर्तमान की युवतियों और विवाह संबंधों पर बातों बातों में एक प्रसंग में मुझे कहा कि अमृता जी बहुत भाग्यशाली थीं जो उन्हें इमरोज जैसा व्यक्ति उनके जीवन में मिला; और साथ ही यह भी जोड़ा कि दुनिया में कौन लड़की उतनी सौभाग्यशाली होती है भला?


कल के एक महत्वपूर्ण पाठ्य को पढ़ कर सुधा जी की इस बात के सोलह आना खरे होने से आप पुनः सहमत होंगे-


अमृता -इमरोज और साझा नज्म

पंद्रह दिनों पहले अमृता एक बार फिर इमरोज़ के सपनों में आई, बादामी रंग का समीज सलवार पहने | 'सुनते हो ,कमरे में इतनी पेंटिंग क्यूँ इकठ्ठा कर रखी है ?अच्छा नहीं लग रहा ,कुछ कम कर दो "|अमृता कहें और इमरोज़ न माने ,ये तो कभी हुआ नहीं ,अब इमरोज़ ने कमरे से पेंटिंग कम कर दी हैं ,कमरे में फिर से रंगों रोगन करा दिया है |हाँ ,अपने बिस्तर के पैताने या कहें आँखों के दायरों तक ,और मेज़ पर रखे रंगों और ब्रशों के बीच अमृता की तस्वीरें टांग रखी है |इन तस्वीरों को देखकर यूँ लगता है जैसे हर वक़्त अमृता आज भी इमरोज़ की निगहबानी कर रही है ,इमरोज़ घर से बाहर कम जाते हैं ,क्यूँकर जाते ?

 

 


डॉ. अजित गुप्ता वर्तमान में मनुष्य के मन में बसे भय को तोल कर और टटोल कर देखती हैं-

 

डर कैसे बस गया जीवन में?

बचपन शहर से दूर रेत के समन्‍दर के बीच व्‍यतीत हुआ। साँप और बिच्‍छू जैसे जीव रोज के ही साथी थे। वे बेखौफ कभी भी घर में अतिथी बन जाते थे। लेकिन डर पास नहीं फटकता था। घर के आसपास रेत के टीले थे, रोज शाम को सहेलियों के साथ वहाँ जाकर टीलों के ऊपर बैठते थे। कभी-कभी तो किसी एक सहेली के साथ ही जाकर बैठ जाते थे, लेकिन डर नहीं लगता था। उस जमाने में मोपेड बाजार में आयी तो घर में भी भाई ने खरीदी। हम उनकी आँख बचाकर निकल जाते सूनी सुनसान सड़क पर। चारों तरफ रेत ही रेत और बीच में काली सड़क। लेकिन फिर भी डर नहीं लगता था। सायकिल से कॉलेज जाते, रास्‍ते में कोई बदमाश छेड़ देता तो सामने तनकर खड़े हो जाते, क्‍योंकि डर नहीं था।

 

 

जिन महिला चिट्ठाकारों ने अथक श्रम द्वारा कुछ ही समय में निरंतरता बनाए रखते हुए विविध प्रकार से अवदान दिया है, उनमें संगीता पुरी जी का नाम उल्लेखनीय है| ज्योतिष से इतर उन्होंने तकनीकी शब्दावली को नेट पर टाईप कर डालने का कार्य भी अपने बूते हाथ में लिया व अपने सगोत्री समाज पर केन्द्रित ब्लॉग भी वे निरंतर लिख रही हैं| जिन विषयों पर बहुधा वाह वाह नहीं मिल सकती वैसे विषय भी उन्होंने जिम्मे लिए | इसी प्रकार का एक विशेष लेख उनका कल मेरे पढने में आया -


क्‍या ईश्‍वर ने शूद्रो को सेवा करने के लिए ही जन्‍म दिया था ??

प्रारम्भ में वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर थी, पर धीरे-धीरे यह व्यवस्था जन्म आधारित होने लगी । पहले वर्ण के लोग विद्या , दूसरे वर्ण के लोग शक्ति और तीसरे वर्ण के लोग पैसों के बल पर अपना महत्‍व बनाए रखने में सक्षम हुए , पर चौथे वर्ण अर्थात् शूद्र की दुर्दशा प्रारम्भ हो गयी। अहम्, दुराग्रह और भेदभाव की आग भयावह रूप धरने लगी। लेकिन इसके बावजूद यह निश्चित है कि प्राचीन सामाजिक विभाजन ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों में था जिसका अन्तर्निहित उद्देश्य सामाजिक संगठन, समृद्धि, सुव्यवस्था को बनाये रखना था। समाज के हर वर्ग का अलग अलग महत्‍व था और एक वर्ग के बिना दूसरों का काम बिल्‍कुल नहीं चल पाता था।




 समय की सुई तेजी से बढ़ रही है|

अतः अंत में केवल कुछ और प्रविष्टियों के लिंक आप को थमा रही हूँ जो मुझे विचारणीय व महत्त्व के प्रतीत हुए ( आपकी पसंद व महत्त्व देने  की कसौटी नितांत भिन्न भी हो सकती है )|


पहला लेख पढने पर उसमें वर्णित शोध परिणाम के बारे में जान  मुझे अपनी पुस्तक कविता की जातीयता  का एक अध्याय स्मरण हो आया|  




धीरे-धीरे ये स्ट्रेस दिमाग़ के उस हिस्से (हाइपोथेलमस) पर असर डालता है जो हमारे शरीर के कई एक्शन्स को कंट्रोल करता है...। इस स्ट्रेस की वजह से शरीर में ऐसे हारमोन्स का रिसाव होने लगता है जो शरीर को कमज़ोर कर देते हैं और बुढ़ापा समय से पहले ही आ जाता है...।




मान लीजिए अगर आप किसी को धोखा देते हैं तो आपके मन में कहीं न कहीं इस बात का पछतावा रहता है..। चाहे आपको इस बात का मलाल भी न हो लेकिन कहीं न कहीं ये बात आपके दिमाग पर गुपचुप तरीके से असर डाल रही होती है...।




सतीश चंद्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित इस लेख को पढ़ कर मेरा तो मन जार जार रोने को हो आया था| शहीदों की चिताओं पर मेले लगना तो दूर ....


सोनिया गांधी और अंबिका सोनी की तस्वीरों से युक्त विज्ञापन प्रकाशित और प्रसारित किया गया। अब एक साल बाद सिर्फ 16 शहीदों के परिजनों का पता लगा पाना क्या कौम के खात्मे का गंभीर संकेत नहीं दे रहा? क्या पूंजीवाद और भूमंडलीकरण के दौर में राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्ति जैसी बातें अप्रासंगिक और दकियानूसी नहीं हो गई हैं? परंतु इस बात का जवाब भी तो सोचना पड़ेगा कि राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करके अमेरिका-इंग्लैंड ही नहीं, चीन और जापान भी कोई कदम क्यों नहीं नहीं उठाते? ऐसे में भारतीय व्यवस्था आखिर किनके हाथों में खेल रही है?
सवालों में इतिहासकार
इतिहास के पन्नों में सभी ने पढ़ा है कि 13 अप्रैल 1919 को 'वैशाखी वाले दिन' जनरल डॉयर के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज ने अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध फायरिंग की थी। हजारों की संख्या में लोग मारे गए थे। इतिहासकारों के पास इस बात का जवाब नहीं है कि किसे भ्रम में डालने के लिए और किसकी चापलूसी करते हुए पुस्तकों में 'वैशाखी वाले दिन' का इस्तेमाल किया गया। हकीकत यह है कि अमृतसर में वैशाखी मेला की कोई परंपरा नहीं है। पंजाब में वैशाखी का मेला आनंदपुर साहिब में लगता है। जलियांवाला बाग में न पहले कभी मेला लगता था और न आज ही कोई परंपरागत आयोजन होता है। कड़वी सचाई यह भी है कि आज के अमृतसर में पांच प्रतिशत लोग भी नहीं जानते कि मजदूर और मानवाधिकारों के विरोधी रॉलेट एक्ट के खिलाफ 31 मार्च और 6 अप्रैल को पूर्ण बंदी तथा 9 अप्रैल को रामनवमी के जुलूस में हिंदू-मुस्लिम एकता ने अंग्रेजों को हिला कर रख दिया था। आंदोलन प्रभावित करने के लिए 10 अप्रैल 1919 को प्रमुख नेता डा. सैफुद्दीन किचलू और डा. सत्यपाल को गिरफ्तार किया गया तो युवा हिंसक हो उठे। अंग्रेजों पर हमला बोला। स्टेशन, बैंक, डाकघर को निशाना बनाया। देशभक्तों पर हुई फायरिंग में 35 शहीद हुए। 13 अप्रैल को इसी सिलसिले में शोकसभा थी, जिसमें 20 हजार से अधिक लोग मौजूद थे। मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में सेवा समिति के दल ने 1500 से अधिक शहीदों की सूची तैयार की थी। उक्त सूची अब गायब है।



आचार्य रामचंद्र शुक्ल की १२५ वीं जयन्ती पर आयोजित एक गंभीर विमर्श की रिपोर्ट  तैयार की है अमिताभ त्रिपाठी जी ने इलाहाबाद से  |










अनंतिम



जाते जाते 
नेट पर हिन्दी लेखन के लिए दिए जाने वाले पुरस्कारों में सम्मिलित होइए, किन्तु कुछ तथ्य ध्यान में रखे रहते हुए|


आप का पूरा सप्ताह सर्व मंगल से परिपूर्ण हो |

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की १२५ वीं जयन्ती पर संगोष्ठी


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की १२५ वीं जयन्ती पर संगोष्ठी






आज दिनांक १३ दिसम्बर २००९ को महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद स्थित क्षेत्रीय केन्द्र में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के १२५ वीं जयन्ती के अवसर पर, ’आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और आलोचना का वर्तमान’ विषय पर एक संगोष्टी का आयोजन किया गया था। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रख्यात कथाकार एवं इलाहाबाद विवि के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष दूधनाथ सिंह ने की और म.गा.अ.हि.वि.वि. के कुलपति प्रसिद्ध साहित्यकार विभूति नारायण राय इसके मुख्य अतिथि रहे। प्रमुख वक्ताओं में अध्यक्ष एवं मुख्यअतिथि के अतिरिक्त गोपेश्वर सिंह, भारत भारद्वाज, मुश्ताक़ अली, राकेश, उपेन्द्र कुमार एवं महेश कटारे थे। इसका संयोजन संतोष भदौरिया ने किया|


विषय प्रवर्तन करते हुये दिल्ली से पधारे हुये गोपेश्वर सिंह ने शुक्ल जी के आलोचना की आलोचनाओं पर विशेष प्रकाश डाला और बहुत सीमा तक शुक्ल जी के पक्ष की रक्षा करते हुये भी दिखे। उन्होने शुक्ल जी पर लगने वाले ब्राह्मणवाद एवं साम्प्रदायिकता के आरोपों का भी शुक्ल-साहित्य के अन्तःसाक्ष्यों के आधार पर खण्डन किया। उन्होने जब शुक्ल जी के अन्तर्विरोधों का उल्लेख किया तो वर्तमान आलोचना के सबसे बड़े नाम के भी अन्तर्विरोधों का संकेत देने में नहीं चूके। नामवर जी ने मलयज जी और नीलकान्त जी के आचार्य शुक्ल सम्बन्धी अलग विवेचनाओं में परस्पर विरोधी मन्तव्य व्यक्त किया है इसे उन्होने उद्धरण सहित प्रदर्शित किया। संयोग से नीलकान्त जी वहाँ उपस्थित थे और मुख्य अतिथि महोदय के विशेष आग्रह पर उन्होने अपना पक्ष संक्षेप में रखा लेकिन वे भी गोपेश्वर जी के विचारों के प्रति सहिष्णु रहे। गोपेश्वर जी ने कहा कि बहुत से दलित चिंतक और अतिउत्साही मार्क्सवादी उनपर इतिहास दृष्टि से हीन होने तथा ब्राह्मणवाद और साम्प्रदायिकता का आरोप लगाते हैं। ब्राह्मणवाद को परिभाषित करते हुये गोपेश्वर जी का कहना था कि जो वर्णाश्रम, पुनर्जन्म, अवतार और वेदान्त को मानता हो वह ब्राह्मणवादी है और इस दृष्टि से वे महात्मा गांधी, विवेकानन्द आदि को भी ब्राह्मणवादी बताकर शुक्ल जी के विचारों का रक्षा करते दिखे। उन्होने शुक्ल जी के अवदानो को रेखांकित करते हुये उनके काव्य-विवेक का विशेष उल्लेख किया। हिन्दी ’साहित्य का इतिहास’ लिख कर जो कार्य शुक्ल जी ने किया वह बाद के लोगों के लिये मार्ग दर्शक बना। शुक्ल जी द्वारा सिद्धों और नाथों की परम्परा तथा कबीर की उपेक्षा का कारण वे उनकी शुद्धतावादी सोच को बताते हैं। वे रहस्यवादिता के पक्षधर नहीं हैं। शुक्ल जी के अनुसार जगत एक ब्रह्म की अभिव्यक्ति है और कविता जगत की अभिव्यक्ति है। शुक्ल जी ने आलोचना के जो मानदण्ड स्थापित किये उसकी उपेक्षा परवर्ती काल के आलोचक उनकी आलोचना करते हुये भी नहीं कर सके। गोपेश्वर जी ने राम विलास शर्मा का भी सन्दर्भ देते हुये बताया कि किस प्रकार शर्मा जी ने शुक्ल जी पर लगने वाले ब्राह्मणवाद के आरोप का खन्डन किया था।


गोपेश्वर जी के बाद मुख्य अतिथि महोदय को आमंत्रित किया गया। विभूति जी ने एक प्रकार से शुक्ल जी पर ब्राह्मणवादी होने और साम्प्रदायिक होने के वामपन्थी आरोपों की रक्षा की लेकिन दबे स्वर में। इसके लिये उन्होने समय के दबाव को कारण माना। परन्तु एक बात उन्होने मुक्त कंठ से स्वीकार की कि साहित्य के इतिहास का वैज्ञानिक लेखन शुक्ल जी की ही देन है। बाद के जितने भी आलोचक या साहित्येतिहाकार आये उन्होने या तो उससे बड़ी लकीर खींचने की कोशिश की या छोटी लेकिन वे मूल लकीर को प्रतिस्थापित नहीं कर पाये। इसीलिये आज १२५ वर्ष बाद भी हम उन्हे याद कर रहे हैं।


इसके बाद ग्वालियर के महेश कटारे जी ने वातावरण को हल्का करने का प्रयत्न किया कि आलोचना वही सही है जो समझ में आये। आलोचना में गूढ़ता की उन्होने आलोचना की। उनके वक्तव्य की दो बाते प्रमुख थीं एक तो वर्तमान आलोचना में ग़ज़लों को कोई स्थान नहीं दिया जाता और दूसरा कि आलोचनायें रचनाओं के प्रमोशन के उद्देश्य से हो रही हैं उनके मूल्यांकन के लिये नहीं।


इसके बाद विवि के विशेष कार्याधिकारी राकेश जी का क्रम था। राकेश जी मुख्यरूप से रंगमच से जुड़े हैं। उन्होने भी अपनी पीड़ा व्यक्त की कि नाटकों को साहित्य की मुख्यविधा नहीं माना जाता और इस पर गम्भीर आलोचना नहीं होती। इसी क्रम में उन्होने आलोचना को अनवश्यक भी बता दिया।


राकेश जी के बाद उपेन्द्र कुमार एवं मुश्ताक़ अली का भी वक्तव्य हुआ जिसे मैं कतिपय कारणों से नहीं सुन पाया। जब मैं दुबारा सभागार में पहुँचा तो मुश्ताक़ जी अपना वक्तव्य समाप्त कर रहे थे जो सम्भवतः लम्बा खिंच गया था। ऐसा सचालक के बाद में दिये गये संकेतों से पता चला।


अब बारी थी भारत भारद्वाज की। भारत जी वर्धा विवि से प्रकाशित द्वैमासिक पत्रिका पुस्तक वार्ता के सम्पादक भी हैं। उन्होने इसके नवीनतम अंक(सितम्बर-अक्तूबर) में ’हिन्दी आलोचना के हिमालय : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ के नाम से सम्पादकीय लिखा है जो रोचक व पठनीय है। भारत जी अपने उद्बोधन में भावुक और किंचित विचलित से दिखे। सम्भवतः वे शुक्ल जी पर हो रही आलोचनात्मक टिप्पणियों से आहत थे। अपने वक्तव्य में उन्होने लगभग वही बातें कहीं जो उन्होने अपने संपादकीय में लिखी हैं अतः उन्हे यहाँ दुहराना उचित नहीं होगा(भारत जी से सम्पर्क का पता दे रहा हूँ इच्छुक जन उनसे सम्पर्क करके शायद सामग्री प्राप्त कर सकें)। अन्त में उन्होने यह कह कर अपनी बात समाप्त की कि शुक्ल जी के हिमालय पर चढ़ने का यत्न तो बहुतों ने किया लेकिन लौट कर कोई नहीं आया।
(इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप में संपर्क सूत्र सदा के लिए टाँक देना सुरक्षा कारणों से उचित न होने के कारण उन्हें हटा दिया है| क.वा.)


अन्त में अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में दूधनाथ जी ने आरम्भ में ही स्थापना दी कि शुक्ल जी के निश्कर्षों का दायरा अन्तर्विरोधी है। उन्होने शुक्ल जी के उस विचार के बारे में भी बताया कि कविता के आस्वाद और विश्लेषण में अन्तर है। अच्छा लगना ही अच्छी कविता का मानदण्ड नहीं है।


दूधनाथ जी ने साहित्य के क्रमबद्ध इतिहास का श्रेय शुक्ल जी को ही दिया। उनके इतिहास लेखन पर प्रकाश डालते हुये उन्होने कहा कि रासो साहित्य को शुक्ल जी ने इतिहास में इसलिये शामिल किया क्योंकि उनका मानना था कि प्रसिद्धि भी किसी काल के लोकप्रवृत्ति की प्रतिध्वनि है। जो प्रासंगिक नहीं है वह महत्त्वपूर्ण नहीं होता तथा साहित्य इतिहास के अन्दर का इतिहास है जैसी उक्तियाँ भी दूधनाथ जी से सुनने को मिलीं।


दूधनाथ जी का यह भी कहना था कि उनके अनुसार विषय था ’आचार्य शुक्ल और आलोचना का वर्तमान’ लेकिन चर्चा शुक्ल जी को लेकर ज्यादा हुई आलोचना को लेकर कम। उनके अनुसार शुक्ल जी के पूर्व हिन्दी साहित्य में आलोचना थी ही नहीं। किसी वक्ता के द्वारा एक नाम याद दिलाने पर उन्होने उसे महत्त्व नहीं दिया। शुक्ल जी के कुछ पूर्वाग्रहों की चर्चा करते हुये उन्होने कहा कि शुक्ल जी सिद्धों के रहस्यवादी वचनों को साहित्य नहीं मानते लेकिन गोरखनाथ को वे एक हिन्दू योगी मानते हैं। यहाँ वे गोरखनाथ को वज्रयानियों या तंत्रमार्गियों से अलग करते हैं। शुक्ल जी के ब्राह्मणवाद की रक्षा तो दूधनाथ जी नहीं करते लेकिन साम्प्रदायिकता के आरोप से बहुत विद्वतापूर्ण ढंग से उन्हे निकालने का प्रयत्न करते हैं। इसके लिये वे मुस्लिम शासकों के समय शासन में जन की भागीदारी के अभाव को कारण मानते हैं। इसीलिये वे भक्तिकाल के साहित्य को जन के मौन को भंग करने का साहित्य मानते हैं। भक्ति को शुक्ल जी धर्म की भावात्मक अनुभूति कहते हैं। दूधनाथ जी के अनुसार सारा मध्यकालीन साहित्य वेदान्त के त्रिकोण (प्रस्थानत्रयी) पर टिका है। अतः भक्तिकालीन इतिहास लिखते समय शुक्ल जी ने तत्कालीन प्रवृत्तियों को प्रदर्शित किया है। अध्यक्ष महोदय ने छायावादी कवियों के बारे में शुक्ल जी के दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुये बताया वे पन्त को चित्रभाषा का कवि कहते हैं। महादेवी के बारे में उन्होने इतिहास के पहले लेखन में स्थान नहीं दिया था लेकिन बाद में उन्होने उनके दो उल्लेख किये हैं एक बार उन्होने कहा है कि ’लगता है महादेवी को पीड़ा का चस्का लग गया है।’और दूसरी बार कहा है कि ’यह बताना मुश्किल है कि यह पीड़ा वास्तविक है या पीड़ा की रमणीय कल्पना’। दूधनाथ जी दूसरी बात से इसलिए असमत हैं कि केवल अनुभव से लिखना तो अनुभववाद हो जायेगा। यदि कल्पना नहीं होगी तो कविता ही सम्भव नहीं होगी। उन्होने छायावाद के दो प्रमुख लक्षण बताये एक - चित्रछवि, दो - रहस्यानुभूति। इसी आधार पर दूधनाथ जी के अनुसार शुक्ल जी ने बाद मे महादेवी को सर्वश्रेष्ठ छायावादी कवि माना है। (दूधनाथ जी ने महादेवी वर्मा पर अभी एक पुस्तक लिखी है) लेकिन वे कहते हैं कि यदि शुक्ल जी को ’निराला’ की बाद की कवितायें पढ़ने का अवसर मिला होता तो वे निश्चित ही ’निराला’ को श्रेष्ठ छायावादी कवि बताते। यहाँ जो कारण दूधनाथ जी ने बताया वह चौंकाने वाला था। उन्होने कहा कि शुक्ल जी वेदान्तवादी और ब्राह्मणवादी थे, तुलसीदास भी थे और मुझे अब लगने लगा है कि निराला भी अपने अन्तिम दिनो में ब्राह्मणवादी हो गये थे। अतः निराला भी तुलसीदास की तरह प्रिय कवि होते। इसके पूर्व उन्होने निराला के उन दो लेखों की भी चर्चा की थी जिसके द्वारा उन्होने शुक्ल जी के आलोचना की खबर ली थी और उन्हे खूब खरी-खोटी सुनाई थी।


शुक्ल जी के अलोचना की पुनः चर्चा करते हुये उन्होने समय की कठिनाइयों का वर्णन भी किया कि उन्हे किस प्रकार तत्कालीन साहित्यकारों की मुखर आलोचना से बचना होता था और किस प्रकार बाबू श्याम सुन्दरदास चाहते थे कि हिन्दी साहित्य का इतिहास उन्ही के(श्याम सुन्दर दास) के नाम से छपे (इस सम्बन्ध में भारत भारद्वाज का सम्पादकीय पठनीय है) आदि। तत्कालीन परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनो के आधार पर उन्होने हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन का जो कार्य किया उसे बाद के इतिहास लेखकों ने भी अपनाया। बहुत से लोगों ने नया लिखने का दम भरते हुये भी शुक्ल जी की ही नकल की, वे कोई मौलिक कार्य नहीं कर सके।


और भी बहुत कुछ कहा गया इस अवसर पर परन्तु स्मृति, समय एवं स्थान की सीमा के कारण इतना ही।


सबसे अन्त में संयोजक और संचालक संतोष भदौरिया जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया और स्वल्पाहार के बाद यह गोष्ठी सम्पन्न हुई। यह अनुभव किया गया कि गोष्ठी लम्बी हो गयी। कई आमंत्रित श्रोता अन्त तक धैर्य धारण नहीं कर सके। कुछ के पास वापस जाने सही जुगाड़ नहीं था इसलिये देर होती देख किसी के साथ लटक कर निकल लिये।


मेरे लिये यह अनुभव लाभकारी रहा। मैं विशेष रूप से भारत भारद्वाज और दूधनाथ जी को सुनने आया था परन्तु गोपेश्वर जी को भी सुनना एक सुखद अनुभव था। किसी साहित्यकार को यदि उसके जन्म के १२५ वर्ष बाद भी याद किया जाता है तो लगता है कि बन्दे में था दम। हिन्दी आलोचना और इतिहास की जब भी चर्चा होगी तो उसके आदिपुरुष के रूप में उन्हे याद किया जायेगा।

वर्धा विवि को मैं ऐसे कार्यक्रम के लिये धन्यवाद देता हूँ।


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