रूस की सर्दियों में भारत का बसंत





रूस की सर्दियों में भारत का बसंत
डॉ. वेदप्रताप वैदिक



प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह की मास्को-यात्रा की तुलना यदि उनकी वाशिंगटन-यात्रा से और ओबामा की पेइचिंग-यात्रा से की जाए तो माना जाएगा कि यह मास्को-यात्रा अधिक सगुण और अधिक सार्थक रही है| इस मास्को-यात्रा का कोई खास शोर-शराबा नहीं था, जैसा कि उल्लिखित दोनों यात्राओं का था लेकिन इस यात्रा में से जैसे समझौते और दिशा-निर्देश निकले हैं, वे सिर्फ भारत-रूस संबंधों में ही गर्माहट पैदा नहीं करेंगे, वे दक्षिण एशिया और विश्व-राजनीति पर भी अपना गहरा प्रभाव डालेंगे|


दो साल पहले प्रधानमंत्री की मास्को-यात्रा में जिस तरह का मोह-भंग हुआ था, उसने भारत-रूस संबंधों को लगभग बर्फ में जमा दिया था| गोर्शकोव-सौदा तो अधर में झूल ही रहा था, परमाणु-सौदे भी खटाई में पड़ गए थे| भारत को यह समझ ही नहीं पड़ रहा था कि अमेरिकी सौदा संपन्न होने के पहले वह रूस से सौदा करे या न करे| भारत-रूस व्यापार भी सिर्फ चार बिलियन डॉलर पर अटका हुआ था| इधर अमेरिका और रूस में परमाणु-छतरी को लेकर तनाव बढ़ गया था और भारत अमेरिका के नज़दीक जाने के लिए बेताब हो रहा था| यह भी पता नहीं चल रहा था कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान आदि के प्रति भारत और रूस के रवैए में कितनी समानता हो सकती है| लेकिन पिछले साल रूसी प्रधानमंत्री विक्तोर झिबकोव की भारत-यात्रा के दौरान जो हल्के-से संकेत उभरे थे, उन्हें हमारे प्रधानमंत्री की इस मास्को-यात्र ने गरज़ती हुई प्रतिध्वनियों में बदल दिया है| इधर भारत में मनमोहन सिंह दुबारा प्रधानमंत्री बने और उधर रूस में मई 2008 में व्लादिमीर पुतिन खुद प्रधानमंत्री बने और उन्होंने अपने शिष्य दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बना दिया| इस पट-परिवर्तन के साथ-साथ भारत-अमेरिकी परमाणु-सौदा भी संपन्न हो गया| इन घटनाओं ने भारत और रूस के सामने संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए| इसीलिए रूस के साथ हुआ परमाणु-सौदा अमेरिकी सौदे से भी काफी आगे निकल गया| रूस की सर्दियों में भारत का बसंत खिल गया|


भारत-अमेरिकी सौदे पर पाँच साल की खींचातानी के बावजूद प्रधानमंत्री की वाशिंगटन-यात्रा के दौरान परमाणु-ईंधन का मामला अधर में ही लटका रहा लेकिन मास्को-यात्रा के दौरान रूस ने भारत को वे रियायतें दे दी हैं, जो अमेरिका उसे सपने में भी नहीं दे सकता| अमेरिका की शर्त है कि अगर परमाणु-सौदा भंग होता है तो ईंधन की सप्लाई तुरंत बंद हो जाएगी और सारे संयंत्र लौटाने होंगे याने भारत ने यदि कोई परमाणु-विस्फोट कर दिया तो उसे लेने के देने पड़ जाएँगे | अमेरिकी ईंधन से चलनेवाले उसके संयंत्र ठप्प हो जाएँगे और अरबों रूपए के अमेरिकी संयंत्र उसे वापस लौटाने होंगे जबकि उसी स्थिति में रूसी ईंधन की सप्लाय जारी रहेगी| रूस जी-8 के उस प्रस्ताव को भी नहीं मानेगा जो कहता है कि भारत-जैसे परमाणु-अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं करनेवाले राष्ट्रों को ईंधन संशोधन और परिवर्द्धन की तकनीक न दी जाए| इसका अर्थ यह हुआ कि रूस ने भारत को व्यावहारिक तौर पर छठा परमाणु शक्तिसंपन्न राष्ट्र मान लिया है| अमेरिका के 123 समझौते ने जो बंधन भारत पर डाले हैं, उन्हें रूसी सौदे ने दरी के नीचे सरका दिया है| अब ऐसा लग रहा है कि दो साल पहले भारत और रूस जो अचानक ठिठक गए थे, वह उन्होंने ठीक ही किया था| अब अमेरिका सौदे ने भारत का मार्ग प्रशस्त कर दिया है| इसका लाभ उठाकर भारत ने फ्रांस, केनाडा, नामीबिया, मंगोलिया, कजाकिस्तान, नाइजीरिया आदि के साथ भी परमाणु संयंत्रें और ईंधन के समझौते कर लिये हैं| रूस के साथ हुआ यह समझौता न केवल भारत को छह नए परमाणु-संयंत्र देगा बल्कि लगभग 20 संयंत्र अलग-अलग प्रांतों में भी लगाएगा| राष्ट्रपति मेदवेदेव ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि भारत को परमाणु संयंत्र, तकनीक या ईंधन देते समय रूस किसी के दबाव में आनेवाला नहीं है और ये समझौते सिर्फ क्रय-विक्रय संबंधी नहीं हैं| इनके तहत दोनों देशों के बीच परमाणु-शोध और व्यापक उर्जा सहयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा| इसमें संदेह नहीं है कि रूस और फ्रांस ने परमाणु-उर्जा से बिजली बनाने के जो सफल प्रयोग किए हैं, उनका लाभ भारत को मिलेगा|


भारत ने सिर्फ परमाणु-उर्जा ही नहीं, तेल और गैस देने के लिए भी रूस को पटा लिया है| रूस के ताइमन पेचोरा क्षेत्र के त्रेब और तीतोव में भारत अब तेलोत्खनन करेगा और यह सुविधा उसे अब सखालिन-3 में भी मिल सकती है| अब भारत अपनी युद्ध-क्षमता बढ़ाने के लिए दुबारा रूस की तरफ अभिमुख हो रहा है| उसने यातायात और युद्धक विमान बनाने के नए समझौते तो किए ही हैं, विमानवाहक पोत गोर्शकोव का सौदा भी सुलझा लिया है| भारत रूस व्यापार को अगले कुछ वर्षों में तिगुना करने का संकल्प भी लिया गया है| दोनों देशों ने अफगानिस्तान की स्थिरता और पुनर्निर्माण पर भी विचार किया है| ईरान के बारे में दोनों देशों का रवैया अन्य महाशक्तियों से ज़रा भिन्न हैं और दोनों ने पाकिस्तान के आतंकवादी तत्वों पर खुले-आम उंगली उठाई है| भारत और रूस की इस लौटती हुई घनिष्टता से अमेरिका और चीन जैसे राष्ट्रों को चिंतित होने की जरूरत नहीं है, यह बात रूसी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री ने एकदम स्पष्ट कर दी है| चीन और अमेरिका के साथ रूस और भारत अपने द्विपक्षीय संबंध अपने-अपने ढंग से आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन इन दो पुराने मित्रों की घनिष्टता विश्व-राजनीति के दादाओं के कान खड़े कर सकती है| यह मित्रता विश्व-राजनीति को बहुध्रुवीय बनाने में तो सहायक होगी ही, वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर चलनेवाली अनेक अंतरराष्ट्रीय दादागीरियों पर ब्रेक लगाने में भी सक्षम हो सकती है| इस समय भारत को रूस की जितनी जरूरत है उतनी ही जरूरत रूस को भारत की है| पाँच-सात साल पहले तक रूस अपने गैस और तेल की उपलब्धि के दम पर भारत जैसे मित्रें को हाशिए में डालता चला जा रहा था| उसे न तो अपने पारंपरिक शस्त्र-बाजार की परवाह रह गई थी और न ही वह अपने पुराने परखे हुए संबंधों को निभाते रहना चाहता था| लेकिन अब जबकि तेल और गैस के अंतरराष्ट्रीय दाम काफी गिर गए हैं, रूस को अब अपने पुराने ग्राहकों, दोस्तों और भारत जैसी नई विश्व-शक्तियों का दुबारा ध्यान आ रहा है| साम्यवाद के चंगुल से छूटा हुआ रूस अभी तक अपनी नई ज़मीन नहीं तलाश पाया है| वह अब भी विचारधारा के शिशिर में ठिठुर रहा है| भारत का लोकतंत्र और प्रगति के पथ पर बढ़ता हुआ अर्थतंत्र रूस की सर्दियों में बसंत को खिला सकता है|

ए-19 प्रेस एन्क्लेव नई दिल्ली-17

लन्दन में भारतीय संस्कृति और संस्कृत

लन्दन में भारतीय संस्कृति और संस्कृत
















ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (२)

(साप्ताहिक स्तम्भ) 



गतांक से आगे

 ब्रह्माण्ड के खुलते रहस्य (२)
(रहस्य खोलने की चाबियाँ  )
विश्वमोहन तिवारी (पूर्व एयर वाइस मार्शल )



चाबियाँ

ब्रह्माण्ड का रहस्य खोलने के लिए दो चाबियाँ  नितान्त आवश्यक हैं। एक तो सैद्धान्तिक चाबी और दूसरे कोई दूरदर्शियों जैसे उपकरण जो ब्रह्माण्ड का वांछित अवलोकन कर सकें। और ये दोनों चाबियाँ अन्योन्याश्रित होती हैं। ब्रह्माण्ड के विषय में व्यापक आपेक्षिक सिद्धान्त 191५   में आइन्स्टाइन ने प्रतिपादित किया था, उसकी एक चाबी थी ‘ब्रह्माण्ड की स्थिर दशा’; सारे दिक में नक्षत्रों आदि के वितरण को देखते हुए बीसवीं शती के प्रारम्भ में वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष, निकाला था, सही कहें तब उनकी मान्यता या विश्वास था, कि ब्रह्माण्ड में तारे समांगी या समरूप से वितरित हैं। इनके वितरण की समरूपता में न तो दिक में और न तो काल में कोई विशेष अन्तर आता है। अर्थात अनन्त काल से ब्रह्माण्ड ऐसा ही है और अनन्त काल तक ऐसा ही रहेगा। उस समय की आधिकांश वैज्ञानिक सोच ब्रह्माण्ड की ‘स्थिर दशा’ को मानती थी। उस समय मन्दाकिनियों के प्रसारण का न तो किसी को ज्ञान था और न किसी ने कल्पना ही की थी। जब कि भारत के पुराणों में ऐसी कल्पनाएँ  बहुत मिलती‌ हैं।



मजे की बात यह कि 191५ में आइन्स्टाइन ने जब अपने क्रान्तिकारी व्यापक आपेक्षिकता के सिद्धान्त अर्थात आपेक्षिकी के आधार पर ब्रह्माण्ड का जो मॉडल प्रतिपादित किया था तब उसमें बह्माण्ड का प्रसारी होना स्वत: ही उद्भासित हो रहा था! किन्तु आइन्स्टाइन के मन में या विश्वास में ब्रह्माण्ड का माना हुआ मॉडल स्थिर समरूप तथा गोलीय ज्यामिति वाला था। अतएव आइन्स्टाइन ने अपने उस क्रान्तिकारी गणितीय सूत्र में प्रसार को रोकने के लिये एक ‘ब्रह्माण्डीय नियतांक घटक’ डाल दिया था। इस ब्रह्माण्डीय नियतांक घटक को प्रतिगुरुत्वाकर्षण प्रभाव कहा गया, अर्थात यह गुरुत्वाकर्षण को रोकता है। यह इसलिये भी उऩ्हें स्वीकार्य था कि यही तो ब्रह्माण्ड की गुरुत्वाकर्षण शक्ति द्वारा स्वयं ब्रह्माण्ड को सिमटाए जाने की प्रक्रिया को संतुलित कर सकता है, अन्यथा ब्रह्माण्ड की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उसे एक बिन्दु में समेट लेगी। आइन्स्टाइन ने यदि अपने गणितीय सूत्र पर भरोसा किया होता तब उस काल में ही ब्रह्माण्ड- विज्ञान ने कितनी प्रगति कर ली होती। बाद में आइन्स्टाइन ने उस क्रिया को अपने जीवन की सब से बड़ी गलती मानी। गौर से देखा जाए तब आइन्स्टाइन के सामने ऐसा कुछ भी नहीं था कि जिसके आधार पर वे स्थाई ब्रह्माण्ड की अवधारणा पर संदेह करते, सिवाय इसके कि उऩ्हें अपने सूत्रों पर अधिक विश्वास करना था। जब कि आइन्स्टाइन ऐसे व्यक्ति थे जिऩ्हें अपने सूत्रों पर पूरा विश्वास होता था| जैसे कि उस क्रान्तिकारी खोज के समय था, कि सूर्य का गुरुत्वाकर्षण प्रकाश की किरण का पथ बदल देगा, और जब शेष विश्व इसे नहीं मान रहा था।



ब्रह्माण्ड की निर्मिति या बनावट को समझने के लिये एक सैद्धान्तिक चाबी जिसे आज अधिकांश वैज्ञानिक मानते हैं, और जो बीसवीं सदी के तीसरे दशक में हबल के अवलोकनों तथा निष्कर्षों पर आधारित है, वह है ‘प्रसारी ब्रह्माण्ड सिद्धान्त’ (एक्स्पांडिंग यूनिवर्स थ्योरी)। इसके अनुसार विश्व या ब्रह्माण्ड का उद्भव एक बिन्दु में समाए समस्त ब्रह्माण्ड के विस्फोट से होता है। ब्रह्माण्ड के सभी पिण्ड तीव्र गति से भाग रहे हैं। इसीलिये इस सिद्धान्त का नाम ‘प्रसारी ब्रह्माण्ड’ रखा गया जिसे आम भाषा में ‘महाविस्फोट’ भी बोलते हैं। इस विस्तार को हम एक फूलते हुए गुब्बारे की तरह भी देख सकते हैं, यद्यपि इस उपमा की, सभी उपमाओं की तरह, सीमाएं हैं। इस ब्रह्माण्ड में जो पिण्ड जितनी दूर है वह उतनी ही तेजी से भाग रहा है। (यह भी दृष्टव्य है कि भारतीय शास्त्रों में ब्रह्म का एक अर्थ विस्तार या विस्तृत या विराट भी है। मुण्डक उपनिषद में (1.1.8 ‘तपसा चीयते ब्रह्म’) कहा है कि ‘तप’ से ब्रह्म का प्रसार होता है। (यह मंत्र संयोग मात्र नहीं है, किन्तु यह शोध का विषय है कि उनके पास ऐसी कौन सी शक्ति थी जिसके द्वारा वे यह जान सके।) हबल ने दूरी तथा वेग के अनुपात के नियतांक का मान भी निकाला था जो 100 था, इसका मान आधुनिकतम अवलोकनों तथा गणनाओं से 70–75 के बीच में माना जाता है। इस नियतांक का नाम हबल नियतांक है। हबल ने मन्दाकिनियों के वेग का निष्कर्ष डाप्लर सिद्धान्त के अनुसार ‘अवरक्त विस्थापन’ को मापकर निकाला।



अवरक्त – विस्थापन (इन्फ्रारेड शिफ्ट)

डॉ. हबल ने बीसवीं शती की तीसरी दशाब्दि में नक्षत्रों तथा मन्दाकिनियों का सूक्ष्म निरीक्षण किया। उस अवलोकन में वे उन तारों या मन्दाकिनियों के प्रकाशीय वर्णक्रम को बारीकी से परख रहे थे। प्रत्येक तारे में हाइड्रोजन, हीलियम आदि गैसें होती हैं जो प्रकाश के वर्णक्रम में कुछ चारित्रिक (फ्राउन हौफ़र) पंक्तियाँ देती हैं। कुछ निश्चित दशाओं में इन पंक्तियों का वर्णक्रम में स्थान निश्चित होता है। जब ये पंक्तियाँ अपने स्थानों पर नहीं होतीं तब वे विस्थापित कही जाती हैं। किन्तु, सभी पिण्डों के वर्णक्रम में उन्होंने भिन्न मात्राओं में अवरक्त विस्थापन पाया। जिस तरह आती हुई रेल की सीटी की ध्वनि का तारत्व (आवृत्ति) बढ़ जाता है, और जाती हुई रेल की सीटी ध्वनि का तारत्व कम होता सुनाई देता है, उसी तरह जब प्रकाश का स्रोत जैसे मन्दाकिनी जब हम से तेजी से दूर भागती है तब प्रकाश–तंरगों की आवृत्ति कम होती है अर्थात वह लाल रंग की तरफ विस्थापित होती है।और यदि वह पास आ रही हो तो नीले रंग (ब्लू शिफ़्ट) की तरफ विस्थापित होती है। डॉप्लर के इसी सिद्धान्त के आधार पर इस अवरक्त विस्थापन का अर्थ उन्होंने निकाला कि ब्रह्माण्ड में सभी पिण्ड तेजी से एक दूसरे से दूर भाग रहे हैं। यह खगोल विज्ञान में बीसवीं शती की सर्वाधिक क्रान्तिकारी खोज थी कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। हबल ने पिछली शती के तीसरे दशक में किये अपने दीर्धकालीन अवलोकनों के आधार पर एक नियम बनाया कि, 'जो मन्दाकिनी जितनी दूर है वह उतनी ही तेजी से भाग रही है।'



हबल के नियम के अनेक क्रान्तिकारी परिणाम थे, उनमें यह भी था कि ब्रह्माण्ड का जो प्रसार हो रहा है, वह अनन्तकाल से तो नहीं हो सकता, अथार्त उसका किसी क्षण प्रारंभ हुआ होगा। उस उद्भव के क्षण की गणना की जा सकती है। तथा इस सिद्धान्त के अनुसार उस क्षण ब्रह्माण्ड का समस्त पदार्थ सुई की नोक से भी अत्यन्त छोटे बिन्दु में समाहित था। मैंने कहा था न कि ब्रह्माण्ड की बातें कल्पनातीत लगती हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि करोड़ों करोड़ों और इस तरह से हम ऐसा एक करोड़ बार कहें उतने सूर्यों के पदार्थों से भी अधिक पदार्थ सुई की नोक से भी छोटे बिन्दु में समाया था – सुई की नोक से कितना छोटा – सुई की नोक के बराबर के बिन्दु के एक करोड़ के करोड़वें हिस्से से भी छोटा! (कठोपनिषद 1.2.20 में लिखा है, अणोरणीयान महतो महीयान. . . अर्थात वह (ब्रह्म) अणुओं का भी अणु है और महत का भी महत है, महान विस्फोट की इस जानकारी के बाद कठोपनिषद के इस मंत्र का अर्थ प्रचलित अर्थ के अतिरिक्त एक नए रूप में दृष्टिगत होता है।) और आज वही पदार्थ अकल्पनीय रूप से विराट दिक या जगह में फैला हुआ है। कितना विराट ? प्रकाश एक सैकैण्ड में 3 लाख किलोमीटर की यात्रा करता है, तथा एक वर्ष में लगभग साढ़े नौ लाख करोड़ किमी की यात्रा करता है। ब्रह्माण्ड की त्रिज्या इतनी लम्बी है कि उसे किलोमीटर में नहीं नापते वरन प्रकाश–वर्षों में नापते हैं। ब्रह्माण्ड का उद्भव बिन्दु लगभग 1370 करोड़ प्रकाशवर्ष दूर है,. हम अभी तक ब्रह्माण्ड (लगभग दस करोड़ प्रकाशवर्ष) को लगभग 1000 करोड प्रकाश वर्ष की दूरी तक ही देख सके हैं। ब्रह्माण्ड की सीमा का निरन्तर प्रसार हो रहा है। क्या भारतीय शास्त्रों में इसीलिये ब्रह्म को निस्सीम कहते हैं?


ब्रह्माण्ड विज्ञान या ब्रह्माण्डिकी के मुख्य प्रश्न हैं, ब्रह्माण्ड का उदभव, आयु तथा विस्तार, ब्रह्माण्ड में पदार्थ की संरचना, प्रकार तथा परिमाण, तथा ब्रह्माण्ड की दशा अर्थात ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है, किस गति से हो रहा है, कब तक होता रहेगा आदि।
( क्रमशः )


सिर्फ फौज की वापसी ही समाधान नहीं




सिर्फ फौज की वापसी ही समाधान नहीं
डा. वेदप्रताप वैदिक
  

 
 
ओबामा की नई अफगान-नीति में नया क्या है ? उसमें ऐसा क्या है, जिसके कारण उसे बुश से अलग कहा जा सके ? सिर्फ एक बात है| वह यह कि अब से 18 माह बाद अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी शुरू हो जाएगी| वापसी की बात कभी बुश के दिमाग में आई ही नहीं| शायद इतनी दूर की बात सोचने की क्षमता बुश में थी ही नहीं| ओबामा बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने यह घोषणा की| उन्होंने ''डेढ़ साल'' कहा है और मैंने ''एक साल'' कहा था| वास्तव में वह अवधि व्यावहारिक रूप में एक साल की ही होगी, क्योंकि 30 हजार नए फौजियों को अफगानिस्तान पहुँचते पहुँचते छह माह लग जाएँगे | दूसरे शब्दों में अमेरिका के लगभग एक लाख जवानों और नाटों के लगभग 50 हजार जवानों को एक साल की मोहलत मिली है कि वे इस युद्घ को जीत कर दिखाएँ !


  
ओबामा के प्रतिद्वंद्वी मेककैन ने वापसी की घोषणा को गलत बताया है| उनका तर्क है कि वापसी की घोषणा की वजह से अफगान सरकार, फौज और जनता का मनोबल भी गिरेगा| तालिबान डेढ़ साल तक चुप बैठ जाएँगे और वापसी शुरू होते ही अफगान सरकार पर टूट पड़ेंगे| मेककैन के ये तर्क बिल्कुल गलत हैं| अमेरिकी वापसी की घोषणा का सबसे पहला असर अफगानिस्तान की जनता पर यह होगा कि अमेरिका की छवि सुधरेगी| यह धारणा निर्मूल होगी कि अमेरिका अफगानिस्तान को अनंत काल तक कब्जाए रहेगा| वे अब जानेंगे कि अमेरिका जिस सीमित उद्देश्य के लिए अफगानिस्तान में आया था, उसके पूरे होते ही वापस चला जाएगा| यों भी आम अफगानों के मन में पश्चिमी फौजों (इसाफ) के लिए सराहना का वह उत्कट भाव अब नहीं है, जो 2001 में था| दूसरा, पश्चिमी फौजों की उपस्थिति ही तालिबान की वापसी का सबसे बड़ा कारण है| तालिबान बड़ी तरकीब से काम ले रहे हैं| वे अफगानों को समझा रहे हैं कि ब्रिटिश और सोवियत फौजों की तरह अमेरिकी फौजों ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है और काबुल में उन्होंने कठपुतली सरकार बिठा रखी है| यह लड़ाई सिर्फ इस्लामी जिहाद की ही नहीं है, अफगानिस्तान की आज़ादी की भी है| अब ओबामा की घोषणा से यह तर्क अपने आप गल जाएगा| तीसरा, वापसी की घोषणा अफगान सरकार को अपनी कमर कसने पर मजबूर करेगी| ओबामा ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि अब 'ब्लेंक चेक' का ज़माना लद गया है याने 'करो या मरो'| यदि अगले एक-डेढ़ साल में अफगान सरकार अपने पाँव पर खड़ी नहीं हो सकी तो उसे हटना पड़ेगा| इस चुनौती के कारण उसे कठोर निर्णय लेने ही पड़ेंगे| चौथा, पश्चिमी (इसाफ) सेनाओं को अब किसी भी बहानेबाजी का मौका नहीं मिलेगा| उन्हें पता चल गया है कि अब एक-डेढ़ साल में उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त करना है| पाँचवाँ, ओबामा की वापसी की घोषणा से आम अमेरिकी को काफी सांत्वना मिल रही है| उन्हें एराक़ और अफगानिस्तान की अंधी सुरंगों के पार अब आशा की किरण दिखाई पड़ने लगी है|

   
 
अमेरिकी वापसी की सराहना में मैंने ये तर्क जरूर दिए हैं लेकिन क्या फौजी वापसी अपने आप में कोई समाधान है ? नहीं है| क्यों ? पहला, अमेरिका और नाटो के डेढ़ लाख जवान सफल कैसे होंगे ? वे अल़-क़ायदा और तालिबान को कैसे हराएँगे  ? यदि एक लाख उन्हें नहीं हरा सके तो डेढ़ लाख क्या कर लेंगे ? पश्चिमी जवान आमने-सामने लड़ने से बहुत घबराते हैं| उन्हें न तो स्थानीय भूगोल का पता होता है, न स्थानीय भाषा आती है, न स्थानीय लोग उनका साथ देते हैं, न यथेष्ट गुप्त सूचनाएँ उनके पास होती हैं और न ही अफगान सैनिकों के साथ उनका जरूरी ताल-मेल होता है| इस साल के शुरू में ही ओबामा ने लगभग 20 हजार नए फौजी भिजवा दिए थे लेकिन इस साल जितने अमेरिकी फौजी मारे गए, पहले कभी नहीं मारे गए| तालिबान प्रवक्ता ने अब 30 हजार नए जवानों की घोषणा के बाद कहा है कि वे अमेरिका को और ज्यादा कड़ुआ पाठ पढ़ाएँगे  इसमें शक नहीं कि 30 साल से लगातार गृह-युद्घ में फँसे अफगानिस्तान को काबू करने के लिए एक लाख फौजी काफी नहीं हैं लेकिन सिर्फ 30 हजार जवान बढ़ाने से क्या होगा ? तालिबान का असर अब उत्तर और पश्चिमी अफगानिस्तान में भी फैल रहा है| इस समय कम से कम दो लाख जवानों की जरूरत है| अब से 36 साल पहले जब जाहिरशाह ने काबुल छोड़ा था, उनके पास दो लाख से भी ज्यादा जवान और सिपाही थे| हर अफगान नौजवान के लिए सैन्य-शिक्षा अनिवार्य थी| यदि ओबामा कोशिश करते तो पिछले एक साल में वे दर्जनों एशियाई और अफ्रीकी देशों को तैयार कर लेते, जो एक लाख से भी ज्यादा जवान काबुल भिजवा देते| ये जवान सस्ते भी पड़ते और लड़ते भी बेहतर ! लेकिन ओबामा ने मूलत: बुश की राह ही पकड़ी है| जवानों की संख्या बढ़ाने के अलावा उन्होंने जीत की कौनसी रणनीति बनाई है? उनके सलाहकारों ने साल भर पहाड़ खोदा और उसमें से निकाली चुहिया !

   
 
ओबामा ने न तो राष्ट्रीय अफगान सेना के बड़े पैमाने पर नव-निर्माण की बात कहीं है और न ही अफगान-सरकार को समस्त सैन्य-गतिविधियों के संचालन का अधिकार दिया है| यदि अब भी वे पांच लाख जवानों की स्थानीय फौज खड़ी करने का संकल्प करें तो अफगानिस्तान में बेकार नौजवानों को ढूँढना मुश्किल हो जाएगा| तालिबान को जिहादी कहाँ से मिलेंगे ? इसी प्रकार ओबामा ने अफगान अफीम के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा है| जब तक जिहादियों का पैसों का स्त्रेत आप नहीं सुखाएँगे|  आप उन पर काबू कैसे पाएँगे  ? अफगानिस्तान में राजनीतिक दलों के अभाव तथा अन्य लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में भी ओबामा मौन रहे| उन्होंने फौज पर 30 बिलियन डॉलर (लगभग सवाल लाख करोड़ रू.) के नए खर्च की घोषणा तो कर दी लेकिन अगर एक साल में वे सिर्फ 20 बिलियन डॉलर विकास-कार्यों के लिए दे देते तो चमत्कार हो जाता| विदेशों से मिलनेवाली मदद फौजी खर्च के मुकाबले नगण्य है और उसका भी सिर्फ चार-पांच प्रतिशत ही काबुल-सरकार के हाथों में होता है| यह स्थिति उलटनी चाहिए थी|

   
 
अफगानिस्तान के पुननिर्माण में भारत ने अदभुत भूमिका निभाई है| यही भूमिका अब उसे अफगानिस्तान की रक्षा में निभानी चाहिए| पांच लाख की अफगान-फौज खड़ी करने का जिम्मा भारत को लेना चाहिए| ओबामा ने अपने भाषण में पाकिस्तान को काफी थपकी दी है| वह जरूरी भी है लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो आज उनका सिरदर्द है, डेढ़ साल बाद, वह भारत का सिरदर्द बनेगा| क्या ओबामा अफगानिस्तान को पाकिस्तान की दया पर छोड़कर वापस लौटना चाहते हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि ओबामा अफगान-चक्रव्यूह में बुश से भी अधिक गहरे उलझ जाएँगे ? मुझे डर यही है कि ओबामा कहीं बुश से भी बड़े अभिमन्यु सिद्घ न हों ? अफगानिस्तान कहीं उन्हें ही न ले बैठे ?

 
(लेखक, अफगान मामलों के प्रसिद्घ विशेषज्ञ हैं| वे पिछले 40 साल में दर्जनों बार अफगानिस्तान की यात्रा कर चुके हैं और वे प्रमुख अफगान नेताओं के साथ सतत संपर्क में रहे है)
ए-19 प्रेस एन्क्लेव नई दिल्ली-17

रोमांचकारी `मास्टरपीस' by ए. आर. रहमान

ए. आर. रहमान द्वारा निर्मित इस रोमांचकारी `मास्टरपीस' को देखना सुनना आप को रुला सकता है, भावविह्वल कर सकता है| भारत के सभी श्रेष्ठ गायक और वादक स्वयं इसमें सम्मिलित हैं और शब्द हैं कवीन्द्र रवीन्द्र के |








राष्‍ट्र–गान जन-गण-मन गाने के लिए नियम
साभार : हिन्दी मीडिया

भारत का राष्‍ट्र गान अनेक अवसरों पर बजाया या गाया जाता है। राष्‍ट्र गान के सही संस्‍करण के बारे में समय समय पर अनुदेश जारी किए गए हैं, इनमें वे अवसर जिन पर इसे बजाया या गाया जाना चाहिए और इन अवसरों पर उचित गौरव का पालन करने के लिए राष्‍ट्र गान को सम्‍मान देने की आवश्‍यकता के बारे में बताया जाता है। सामान्‍य सूचना और मार्गदर्शन के लिए इस सूचना पत्र में इन अनुदेशों का सारांश निहित किया गया है।

उपरोक्‍त राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण है और इसकी कुल अवधि लगभग 52 सेकंड है।

राष्‍ट्र गान की पहली और अंतिम पंक्तियों के साथ एक संक्षिप्‍त संस्‍करण भी कुछ विशिष्‍ट अवसरों पर बजाया जाता है। इसे इस प्रकार पढ़ा जाता है:


जन-गण-मन अधिनायक, जय हे
भारत-भाग्‍य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे।

 
संक्षिप्‍त संस्‍करण को चलाने की अवधि लगभग 20 सेकंड है।
जिन अवसरों पर इसका पूर्ण संस्‍करण या संक्षिप्‍त संस्‍करण चलाया जाए, उनकी जानकारी इन अनुदेशों में उपयुक्‍त स्‍थानों पर दी गई है।



राष्‍ट्र गान बजाना

1.    राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण निम्‍नलिखित अवसरों पर बजाया जाएगा:

i.    नागरिक और सैन्‍य अधिष्‍ठापन;
ii.    जब राष्‍ट्र सलामी देता है (अर्थात इसका अर्थ है राष्‍ट्रपति या संबंधित राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों के अंदर राज्‍यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर को विशेष अवसरों पर राष्‍ट्र गान के साथ राष्‍ट्रीय सलामी - सलामी शस्‍त्र प्रस्‍तुत किया जाता है);

iii.    परेड के दौरान - चाहे उपरोक्‍त (ii) में संदर्भित विशिष्‍ट अतिथि उपस्थित हों या नहीं;

iv.    औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों और सरकार द्वारा आयोजित अन्‍य कार्यक्रमों में राष्‍ट्रपति के आगमन पर और सामूहिक कार्यक्रमों में तथा इन कार्यक्रमों से उनके वापस जाने के अवसर पर ;

v.    ऑल इंडिया रेडियो पर राष्‍ट्रपति के राष्‍ट्र को संबोधन से तत्‍काल पूर्व और उसके पश्‍चात;

vi.    राज्‍यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर के उनके राज्‍य/संघ राज्‍य के अंदर औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों में आगमन पर तथा इन कार्यक्रमों से उनके वापस जाने के समय;

vii.    जब राष्‍ट्रीय ध्‍वज को परेड में लाया जाए;

viii.    जब रेजीमेंट के रंग प्रस्‍तुत किए जाते हैं;

ix.    नौ सेना के रंगों को फहराने के लिए।

2.    राष्‍ट्र गान का संक्षिप्‍त संस्‍करण मेस में सलामती की शुभकामना देते समय बजाया जाएगा।

3.    राष्‍ट्र गान उन अन्‍य अवसरों पर बजाया जाएगा जिनके लिए भारत सरकार द्वारा विशेष आदेश जारी किए गए हैं।

4.    आम तौर पर राष्‍ट्र गान प्रधानमंत्री के लिए नहीं बजाया जाएगा जबकि ऐसा विशेष अवसर हो सकते हैं जब इसे बजाया जाए।

5.    जब राष्‍ट्र गान एक बैंड द्वारा बजाया जाता है तो राष्‍ट्र गान के पहले श्रोताओं की सहायता हेतु ड्रमों का एक क्रम बजाया जाएगा ताकि वे जान सकें कि अब राष्‍ट्र गान आरंभ होने वाला है। अन्‍यथा इसके कुछ विशेष संकेत होने चाहिए कि अब राष्‍ट्र गान को बजाना आरंभ होने वाला है। उदाहरण के लिए जब राष्‍ट्र गान बजाने से पहले एक विशेष प्रकार की धूमधाम की ध्‍वनि निकाली जाए या जब राष्‍ट्र गान के साथ सलामती की शुभकामनाएं भेजी जाएं या जब राष्‍ट्र गान गार्ड ऑफ ओनर द्वारा दी जाने वाली राष्‍ट्रीय सलामी का भाग हो। मार्चिंग ड्रिल के संदर्भ में रोल की अवधि धीमे मार्च में सात कदम होगी। यह रोल धीरे से आरंभ होगा, ध्‍वनि के तेज स्‍तर तक जितना अधिक संभव हो ऊंचा उठेगा और तब धीरे से मूल कोमलता तक कम हो जाएगा, किन्‍तु सातवीं बीट तक सुनाई देने योग्‍य बना रहेगा। तब राष्‍ट्र गान आरंभ करने से पहले एक बीट का विश्राम लिया जाएगा।


राष्‍ट्र गान को सामूहिक रूप से गाना

1.    राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण निम्‍नलिखित अवसरों पर सामूहिक गान के साथ बजाया जाएगा:

i.    राष्‍ट्रीय ध्‍वज को फहराने के अवसर पर, सांस्‍कृतिक अवसरों पर या परेड के अलावा अन्‍य समारोह पूर्ण कार्यक्रमों में। (इसकी व्‍यवस्‍था एक कॉयर या पर्याप्‍त आकार के, उपयुक्‍त रूप से स्‍थापित तरीके से की जा सकती है, जिसे बैंड आदि के साथ इसके गाने का समन्‍वय करने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। इसमें पर्याप्‍त सार्वजनिक श्रव्‍य प्रणाली होगी ताकि कॉयर के साथ मिलकर विभिन्‍न अवसरों पर जनसमूह गा सके);

ii.    सरकारी या सार्वजनिक कार्यक्रम में राष्‍ट्रपति के आगमन के अवसर पर (परंतु औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों और सामूहिक कार्यक्रमों के अलावा) और इन कार्यक्रमों से उनके विदा होने के तत्‍काल पहले।

2.    राष्‍ट्र गान को गाने के सभी अवसरों पर सामूहिक गान के साथ इसके पूर्ण संस्‍करण का उच्‍चारण किया जाएगा।

3.    राष्‍ट्र गान उन अवसरों पर गाया जाए, जो पूरी तरह से समारोह के रूप में न हो, तथापि इनका कुछ महत्‍व हो, जिसमें मंत्रियों आदि की उपस्थिति शामिल है। इन अवसरों पर राष्‍ट्र गान को गाने के साथ (संगीत वाद्यों के साथ या इनके बिना) सामूहिक रूप से गायन वांछित होता है।

4.    यह संभव नहीं है कि अवसरों की कोई एक सूची दी जाए, जिन अवसरों पर राष्‍ट्र गान को गाना (बजाने से अलग) गाने की अनुमति दी जा सकती है। परन्‍तु सामूहिक गान के साथ राष्‍ट्र गान को गाने पर तब तक कोई आपत्ति नहीं है जब तक इसे मातृ भूमि को सलामी देते हुए आदर के साथ गाया जाए और इसकी उचित ग‍रिमा को बनाए रखा जाए।

5.    विद्यालयों में, दिन के कार्यों में राष्‍ट्र गान को सामूहिक रूप से गा कर आरंभ किया जा सकता है। विद्यालय के प्राधिकारियों को राष्‍ट्र गान के गायन को लोकप्रिय बनाने के लिए अपने कार्यक्रमों में पर्याप्‍त प्रावधान करने चाहिए तथा उन्‍हें छात्रों के बीच राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रति सम्‍मान की भावना को प्रोत्‍साहन देना चाहिए।




सामान्‍य


1.    जब राष्‍ट्र गान गाया या बजाया जाता है तो श्रोताओं को सावधान की मुद्रा में खड़े रहना चाहिए। यद्यपि जब किसी चल चित्र के भाग के रूप में राष्‍ट्र गान को किसी समाचार की गतिविधि या संक्षिप्‍त चलचित्र के दौरान बजाया जाए तो श्रोताओं से अपेक्षित नहीं है कि वे खड़े हो जाएं, क्‍योंकि उनके खड़े होने से फिल्‍म के प्रदर्शन में बाधा आएगी और एक असंतुलन और भ्रम पैदा होगा तथा राष्‍ट्र गान की गरिमा में वृद्धि नहीं होगी।

2.    जैसा कि राष्‍ट्र ध्‍वज को फहराने के मामले में होता है, यह लोगों की अच्‍छी भावना के लिए छोड दिया गया है कि वे राष्‍ट्र गान को गाते या बजाते समय किसी अनुचित गतिविधि में संलग्‍न नहीं हों।




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