करगिल, जो सिर्फ मुहावरा नहीं है (यात्रावृत्तांत ) : आलोक तोमर



(
यात्रावृत्तांत )



करगिल, जो सिर्फ मुहावरा नहीं है
आलोक तोमर




करगिल सिर्फ एक शहर का नाम या छोटी सी संज्ञा नही है। वैसे भी और 1999 के भारत-पाक युद्ध, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पता नहीं क्या सोच कर झगड़ा कहा था, के बाद करगिल का नाम लेते ही बोफर्स तोपों, सैनिकों की लाशों, नवाज शरीफ, परवेज मुशर्रफ और ओपरेशन विजय का नाम याद आ जाता है।



लेकिन यह बाद में। दुनिया के सबसे ऊँचे और संभवतः सबसे छोटे हवाई अड्डे पर जब आपका जहाज उतरता है, उसके पहले ही थकी हुई परिचालिकाएँ आपको याद दिला देती हैं कि यहाँ ऒक्सीजन का स्तर बहुत कम है और धीमी गति से चलिए और जितनी लंबी साँस ले सकते हैं, उतनी लीजिए। जहाँ आप ठहरते हैं, वहाँ के शुभचिंतक पूरे आठ घंटे तक सोने की सलाह देते हैं ताकि देह संसार की छत कहे जाने वाले इस इलाके से अच्छी तरह परिचित और अभ्यस्त हो सके।



लेह से करगिल का रास्ता काफी दूरी तक सिंधू नदी के किनारे चलता है और एक तरफ पहाड़ हैं और नीचे बहुत नीचे नदी बह रही है, जिसकी गति इतनी तेज है कि आवाज आप तक पहुँचती है। रास्ते में ढाबों और तिब्बती स्थानीय व्यंजनों के होटलों वाला एक बाजार आता है और उसके बाद सिर्फ ऒक्सीजन की कमी ही आपको दुखी नहीं करती। एक बहुत सँकरी सड़क पर लगातार आप ऊपर बढ़ते जाते हैं। पहाड़ का शिखर दिखाई पड़ता है और जब तक आप यह सोचे कि यह कितना ऊँचा होगा, तब तक आप इस पर होते हैं। फिर नीचे का सर्पित इलाका आपको समतल लगने वाले लेकिन लगभग उतनी ही ऊँचाई पर मौजूद गाँवों से होते हुए रास्ते के स्तूपों और कभी कभार दिखाई पड़ जाने वाली मस्जिदों वाले इलाकों में ले जाता है। बीच-बीच में बर्फ से पिघल कर आ रहे बने झरने आपको एकदम ठंडे और असली मिनिरल वाटर का स्वाद देते हैं और आगे जा कर लामा यारू गोंपा नाम का बौद्ध तीर्थ है, जहाँ आज के जमाने में भी डबल बैड का एक कमरा खाने के साथ दो सौ रुपए में मिल जाता है। लद्दाख की लोकल बीयर यानी छाँग पीना चाहें तो पच्चीस रुपए में एक पूरा जग प्लास्टिक वाला भर कर मिलता है। ठंडा करने की जरूरत नहीं क्योंकि दिन में भी मौसम दो या तीन डिग्री के आसपास होता है और रात में तो जून के महीने में भी दो मोटे कंबल ओढ़ कर सोना पड़ता है। प्रंसगवश लद्दाख ऐसा इलाका है, जहाँ अगर आपका सिर छाया में हो और पाँव धूप में तो पाँव झुलस जाएँगे और सिर ठंड पकड़ लेगा।



आगे आपकी मर्जी है कि बटालिक से होते हुए जाएँ या सीधे करगिल का पहाड़ी रास्ता पकड़ें। बटालिक से होते हुए जाने में लाभ यह है कि आप वे पहाडियाँ देख सकते है, जहाँ करगिल झगड़े के दौरान सबसे पहले चरवाहों की शक्ल में पाकिस्तानी सेना के घुसपैठियों को भारतीय चरवाहों ने पकड़ा था और इसी छावनी में खबर दी थी। यहाँ सिंध नदी पार करनी पड़ती है और वह भी एक झूलते हुए पुल से और जब तक यह हिंडोला खत्म नहीं हो जाता, तब तक बड़े-बड़े बहादुरों की साँस हलक में अटकी रहती है। चाहें जिस तरफ से जाएँ, पहाड़ से करगिल शहर बिछा हुआ दिखता है। एक लगभग नामालूम सा देहाती कस्बा, सिंध नदी जिसके किनारे से बह रही है और जिसके पार पाकिस्तान है। 1971 के युद्ध में भारत ने नदी के पार वाला इलाका भी जीत लिया था लेकिन रोते हुए जुल्फिकार अली भुट्टो को देख कर शिमला में इंदिरा गांधी का मन पसीज गया और यह हिस्सा उन्होंने पाकिस्तान को वापस कर दिया। तर्क समझ में नहीं आता। जब वह भी विवादित कश्मीर है तो उसे वापस करने की ऐसी क्या जल्दी आ पड़ी थी? दिलचस्प बात यह है कि सिंध नदी के पार जो करगिल है, वहाँ के लोग यहाँ के लोगों के लगातार संपर्क में रहते हैं और उन्होंने नदी पार करने के लिए बाँस के पुल बना रखे हैं। सेना के लोग कई बार आ कर इन पुलों को तोड़ जाते हैं लेकिन पुल नए सिरे से बन जाते हैं।



करगिल शहर में या उसे कस्बा कहिए, सबसे बड़ी मुसीबत शाकाहारी होना है। सड़क पर सरेआम बकरे और भेड़ की आंतों से बना हुआ कबाब बिकता है और लोगों की भीड़ लगी रहती है। उत्तर प्रदेश के जिला फर्रूखाबाद के एक भूतपूर्व फौजी की मेहरबानी है कि वह करगिल का एकमात्र शाकाहारी ढाबा चलाता है। इसके अलावा शहर के सबसे बड़े होटल सियाचिन में मिलने को शाही पनीर मिल जाता है लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उसके अंदर से हड्डियाँ नहीं निकलेंगी। करगिल में एक डिग्री कॊलेज है और सुना है कि लेह की तरह दिल्ली पब्लिक स्कूल की शाखा भी खुलने वाली है। मगर जो शहर शुरू होने से पहले खत्म हो जाता है और जहाँ आधुनिकता का प्रतीक दुकानों में बिकते हुए डीवीडी प्लेयर और एयरटेल तथा बीएसएनएल के सिम कार्ड हैं, वहाँ इतने अभिजात स्कूल में पढ़ने कौन आएगा?



करगिल से द्रास गए बगैर न पर्यटन और न ज्ञान दोनों के हिसाब से यह यात्रा संपन्न नहीं होगी। करगिल की असली लड़ाई तो द्रास के पहाड़ों और मैदानों में हुई थी और क्योंकि जिला करगिल पड़ता है इसीलिए इसे करगिल युद्ध की संज्ञा दी गई थी। द्रास में टाइगर हिल के ठीक नीचे और थ्री पीमपल्स यानी तीन मुहाँसे के नाम से चर्चित पहाड़ियों की श्रृंखला की तलहटी में एक स्मारक उन शहीदों का बनाया गया है, जो इस पागलपन के दौर में शहीद हुए। 26 जुलाई को हर साल यहाँ विजय दिवस मनाया जाता है। इस स्मारक में काले पत्थर पर सुनहरे अक्षरों से उन शहीदों के नाम भी लिखे हैं, जिन्होंने अपनी जान गँवाई और एक पत्थर युवा शहीद बिजयेंद्र थापर के पिता के हाथ का भी लगाया हुआ है। अटपटा सिर्फ यह लगता है कि स्मारक चिन्ह के नाम पर बीयर के मग मिलते हैं, जिनमें एक तरफ तोलोलिंग पहाड़ का चित्र है और दूसरी ओर टाइगर हिल का। शहीदों के नाम पर लोग उनकी अंतिम स्थली के चित्रों के साथ बीयर पीएँ, यह कुछ समझ में नहीं आता।



करगिल पहुँचाने के लिए लेह ही एकमात्र रास्ता नहीं है। एक रास्ता श्रीनगर से सोनमर्ग होते हुए, जो-जिला दर्रे में से जाता है और सोलह किलोमीटर का यह इलाका इतना भयानक है कि वहाँ पहुँचते ही आप भगवान को याद करने लगेंगे। नीचे बहुत गहरी खाई और वह भी इतनी गहरी कि वहाँ से गिरे तो आप सीधे अमरनाथ के रास्ते में आने वाले उस बालटाल में गिरेंगे, जहाँ से अमरनाथ का रास्ता जाता है। गिरे तो हड्डियाँ भी नहीं मिलेंगी। लेकिन यह रास्ता भी खूब चलता है। जम्मू कश्मीर राज्य परिवहन की बसों से ले कर पर्यटकों की गाडियाँ लदी-फदी करगिल की ओर जाती हैं। करगिल, जो हमारा सामरिक तीर्थ है। चलते-चलते करगिल की संस्कृति के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि वहाँ एक ही दुकान पर दलाई लामा और सद्दाम हुसैन दोनों के फोटो लगे मिल जाएँगे। यह बौद्ध और शिया पंथ को मानने वाले लोगों का इलाका है।

वैदिक धर्म और इस्लाम : अ ग्रेट इंटरफेथ डॊयलॊग (कलकत्तावासी भाग लें )




वैदिक धर्म और इस्लाम : अ ग्रेट इंटरफेथ डॊयलॊग




आज कलकत्ता में आयोजित होने जा रहे वैदिक धर्म और इस्लाम : अ ग्रेट इंटरफेथ डॊयलॊग कार्यक्रम में



इन दिनों भारत प्रवास पर आए



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समय - २९ मार्च २००९, रविवार, सायं बजे
स्थल - कला कुञ्ज (कला मन्दिर), ४८ शेक्सपियर सरणी, कलकत्ता -१७


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डॉ. मारिया नेज्यैशी की 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' संपन्न



डॉ. मारिया नेज्यैशी की 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' संपन्न









हैदराबाद, २७ मार्च २००९



"हंगरी की जनता को अपनी भाषा से अत्यधिक लगाव है। वह अपनी भाषा को सम्मान का प्रतीक मानती है इसीलिए उसने उसे बचा कर रखा है तथा सभी स्तरों पर सारे काम काज वहां हङ्गेरियन भाषा में ही किये जाते हैं। प्रारम्भिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की सभी विषयों की शिक्षा हङ्गेरियन में ही दी जाती है - चाहे वह अर्थ शास्त्र हो या भौतिक विज्ञान। वहां के छात्र भारत और भारतीय संस्कृति को समझने के लिए अत्यंत समर्पण भाव से हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन करते हैं। हंगरी के लोगों को हिंदी सीखने में अधिक कठिनाई नहीं होती और वे जल्दी ही अधिकार पूर्वक हिंदी में वार्तालाप करना सीख जाते हैं॥ मैं भारत की अपनी यात्राओं में सर्वत्र हिंदी में ही बोलती हूँ। और मेरी राय है कि हिंदी के सम्बन्ध में असुरक्षा भाव नहीं रखना चाहिए।"


ये विचार यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में आयोजित विशेष कार्यक्रम 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' में नगरद्वय के विविध भाषाभाषी लेखकों से बात करते हुए तथा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए डॉ.मारिया नेज्यैशी ने व्यक्त किये. डॉ. मारिया नेज्यैशी हंगरी के युटोस लोरांड विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर हैंतथा इन दिनों भारत प्रवास पर हैं. उनके नगरागमन पर आयोजित इस कार्यक्रम में हैदराबाद के हिंदी सेवियों और रचनाकारों की ओर से पुस्तकें समर्पित कर उनका सम्मान किया गया. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सचिव के.विजयन ने सभा-चिह्न से अलंकृत शाल पहनाकर डॉ.मारिया नेज्यैशी का अभिनन्दन किया.


आयोजन की अध्यक्षता करते हुए 'स्वतंत्र वार्ता ' के सम्पादक डॉ.राधे श्याम शुक्ल ने यूरोप में हंगरी तथा भारत में हैदराबाद की तुलना करते हुए कहा कि ये दोनों ही अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण अपने अपने क्षेत्र में दिल के समान माने जाते हैं. अतः यह आयोजन दो दिलों के मिलन जैसा आह्लादकारी और रोमांचक है. उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति के परस्पर संबंधों की चर्चा करते हुए बल देकर यह कहा कि भारतीयों को हंगरी से भाषा प्रेम और सांस्कृतिक स्वाभिमान की प्रेरणा लेनी चाहिए.


आरम्भ में मुख्य अतिथि डॉ. मारिया नेज्यैशी ने दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार, शिक्षण, प्रशिक्षण और शोध के सम्बन्ध में कई प्रकार की जिज्ञासाएँ प्रकट कीं जिनका समाधान करते हुए उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने हिंदी भाषा आन्दोलन के इतिहास, लक्ष्य, स्वरूप और संभावनाओं पर प्रकाश डाला. डॉ. मारिया नेज्यैशी ने हिंदी प्रचार में महिलाओं की भूमिका तथा द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी की पाठ्य पुस्तकों के निर्माण की प्रक्रिया में विशेष रुचि प्रकट की.


'गुफ्तगू' के दौरान डॉ.कविता वाचक्नवी, डॉ. रोहिताश्व, डॉ. राजकुमारी सिंह, डॉ. धर्म पाल पीहल और डॉ. पी माणिक्याम्बा ने मुख्य अतिथि से हंगरी भाषा, वहां के जनजीवन, रीति रिवाज़, साहित्य की प्रवृतियों, साहित्यकारों के सम्मान तथा हिंदी सीखने की सुविधा और बाधा जैसे विविध विषयों पर सवाल किए.


बातचीत में डॉ.तेजस्वी कट्टीमनी, डॉ. बी बालाजी, डॉ.रोहिताश्व, डॉ.कविता वाचकनवी, डॉ.रेखा शर्मा, डॉ..बलविंदर कौर, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.कांता बौद्ध, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल,, पवित्रा अग्रवाल, डॉ. अहिल्या मिश्र, संपत देवी मुरारका, डॉ. करण सिंह ऊटवाल , सीमा मेंडोस, श्रीनिवास सोमानी, आशादेवी सोमानी, पुष्पलता शर्मा, सविता सोनी, उमा देवी सोनी, डॉ.सुरेश दत्त अवस्थी. डॉ.आनंद राज वर्मा, डॉ.भास्कर राज सक्सेना, डॉ.विजय कुमार जाधव, के.नागेश्वर राव, रामकृष्णा तथा भगवान दास जोपट आदि ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.खुर्शीदा बेगम ने गीत प्रस्तुत किया.


कार्यक्रम के संयोजक तथा उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाधाक्ष्य प्रो. तेजस्वी कट्टीमनी के धन्यवाद प्रस्ताव के उपरांत ''साहित्यकारों से गुफ्तगू'' का यह विशेष आयोजन युगादि की शुभकामनाओं के आदान प्रदान के साथ संपन्न हुआ.

- ऋषभ देव शर्मा


हिंदी भाषा चिंतन : विरासत से विस्तार तक



पुस्तक चर्चा : ऋषभ देव शर्मा


हिंदी भाषा चिंतन : विरासत से विस्तार तक






यह संभव है कि विश्व की रचना किसी ईश्वर ने की हो , फिर भी यह तयशुदा है कि इसमें निहित वस्तुओं को नाम हम मनुष्यों ने दिए हैं और इसी से ये वस्तुएं हमारी चेतना का अंग बन पाई हैं. अलग अलग शब्दों में भारतीय भाषा चिंतन में यह दोहराया गया है कि हमारी शब्दावली को हमारे बाहरी और भीतरी विकास के साथ कदम से कदम मिला कर चलना पड़ता है. ऐसा न होने पर हमारी संकल्पनात्मक शक्ति धुंधली और अस्पष्ट होने लगती है.इस बात को आधुनिक भाषा चिंतकों ने भी माना है कि किसी समाज की प्रगति उसकी भाषा के आधुनिकीकरण से ही निर्धारित और निर्दिष्ट होती है. इसलिए भाषा विकास की यात्रा में हमें अपनी विरासत को संभालते हुए नै चुनौतियों के अनुरूप परिवर्तनों को आत्मसात करते चलना पड़ता है. हिन्दी इन दोनों पक्षों का संतुलन साधने में सक्षम होने के कारण ही स्थानीयता और वैश्विकता की शर्तों को एक साथ पूरा कर रही है..इसके लिए वह एक ओर जहाँ सस्कृत और लोकभाषा में निहित अपनी जड़ों से जुडी हुई है ,वहीं दूसरी ओर आधुनिक ज्ञान विज्ञान और व्यापार वाणिज्य के निमित्त अन्य देशी विदेशी भाषाओँ से भी शब्द ग्रहण करने में परहेज़ नहीं करती.


प्रो. दिलीप सिंह [१९५१] ने अपने ग्रन्थ ''हिन्दी भाषा चिंतन'' में हिन्दी भाषा के इस सतत विकासमान स्वरूप का सम्यक भाषावैज्ञानिक विवेचन किया है.


ग्रन्थ के पहले खंड 'धरोहर' में हिंदी के शब्द संसार की व्यापकता और शक्ति को डॉ. रघुवीर के कोष पर पुनर्विचार के सहारे रेखांकित करने के बाद हिन्दी व्याकरण के तीनों कालों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया गया है. विषद व्याकरण की ज़रुरत बताते हुए लेखक ने सावधान किया है कि हमें एक तो केवल स्थितियों को नियंत्रित करनेवाले भाषा के कामचलाऊ स्टार से बचना होगा तथा दूसरे,सामर्थ्यहीन, बनावटी, निर्जीव और संकीर्ण भाषा और शुद्धतावादी दृष्टिकोण के प्रति भी सावधान रहना होगा. ठीक भी है , वरना भाषा तो अपनी गति से प्रगति करती पहेगी और व्याकरण जड़ होकर पिछड़ जाएगा. यहीं लिखत और मौखिक भाषारूपों की भी चर्चा की गई है. इस खंड की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में हिन्दीभाषा विज्ञान में महिलाओं के योगदान के मूल्यांकन की चर्चा की जा सकती है.एक सुलझे हुए समाजभाषावैज्ञानिक के रूप में लेखक ने इस मूल्यांकन द्वारा स्त्री-विमर्श को भी व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ा है।


दूसरे खंड में समाज भाषा विज्ञान के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए भाषा प्रयोग की दिशाओं का जायजा लिया गया है. तीसरा खंड मानकीकरण को समर्पित है जबकि चौथे खंड में हिंदी भाषा और साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दो मुद्दे उठाए गए हैं.यहाँ लेखक ने ''दक्खिनी'' को हिंदी के विकास की मजबूत कड़ी के रूप में प्रस्तावित किया है और हिंदी तथा उर्दू के विवाद को बेमानी माना है.पांचवें खंड में स्वतंत्र भारत के सन्दर्भ में भाषा नियोजन का पक्ष विवेचित है. लेखक ने प्रयोजनमूलक हिंदी के नए नए रूपों के विस्तार को भी नियोजन का व्यावहारिक आयाम मानते हुए विविध ज्ञान शाखाओं और रोजगारपरक क्षेत्रों में प्रयुक्त भाषारूपों को भाषा की संप्रेषण शक्ति और जिजीविषा का प्रतीक माना है.इसीलिये हिन्दी की प्रयोजन मूलक शैलियों की विस्तृत चर्चा करते हुए छठे खंड में जहाँ व्यावसायिक हिंदी के विविध रूप वर्णित हैं , वहीं पत्रकारिता और साहित्य समीक्षा की भाषा के साथ पहली बार पाक-विधि की भाषा का सोदाहरण विवेचन करते हुए आधुनिक हिंदी के अभिव्यक्ति-सामर्थ्य का दृढ़ता पूर्वक प्रतिपादन किया गया है.


सातवें और अंतिम खंड ''हिंदी का विस्तार'' में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के योगदान का तटस्थ मूल्यांकन करने के साथ हिंदी भाषा के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य पर विचार किया गया है. इस प्रकार यहाँ हिंदी के स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक सभी सन्दर्भ विविध पक्षों के साथ उभर कर सामने आ सके हैं. इस प्रकार यह कृति इस तथ्य को भली भाँति असंदिग्ध रूप में प्रतिपादित करती है कि -


''हिंदी भाषा मात्र एक व्याकरणिक व्यवस्था नहीं है, वह हिंदी भाषा समुदाय में व्यवस्थाओं की व्यवस्था के रूप में प्रचलित और प्रयुक्त है ; इस तथ्य के प्रकाश में निर्मित हिंदी-व्याकरण ही भाषा के उन उपेक्षित धरातलों पर विचार कर सकेगा जो वास्तव में भाषा प्रयोक्ता के भाषाई कोष की धरोहर हैं. कोई भी जीवंत शब्द और जीवंत भाषा एक नदी की तरह विभिन्न क्षेत्रों से गुजरती और अनेक रंग-गंध वाली मिटटी को समेटती आगे बढ़ती है. हिंदी भी एक ऐसी ही जीती जागती भाषा है. इसके व्यावहारिक विकल्पों को व्याकरण में उभारना , यही एक तरीका है कि हम हिंदी को उसकी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय भूमिका में आगे ले जा सकते हैं.''




हिंदी भाषा चिंतन / प्रो. दिलीप सिंह /
वाणी प्रकाशन,
२१-ऐ, दरियागंज , नई
दिल्ली - ११०००२ /
२००९ / ४०० रुपये /
२८८ पृष्ठ -सजिल्द।

२३ मार्च की चिट्ठाचर्चा : कही न जाए, का कहिए


२३ मार्च की चिट्ठाचर्चा : कही न जाए, का कहिए

कविता वाचक्नवी




कल
२३ मार्च बलिदान दिवस के दिन सोमवार होने के कारण चिट्ठाचर्चा का नियत दिन मेरा था,जिसके लिए मनोयोगपूर्वक तैयार की गयी सामग्री को प्रकाशित करने में नाकों चने चबाने पड़ गएएक पोस्ट के लिए निरंतर लगभग ३२ घंटे की सिटिंग देना भी मेरा निरर्थक हो जाता, यदि अनूप जी ने अंत में उसे अपने यत्न से हल कर के रात को अंततः प्रकाशित करने में सफलता पाई होतीजाने क्या तकनीकी समस्या गयी थी कि बार बार एरर और ब्लोगर की अक्षमता का संदेश रहा था तथा पब्लिश या सेव करने पर संदेश उड़ जाता थाअस्तुसंभवतः कोई अज्ञातशक्ति ऐन मौके पर लगन और प्रतिबद्धता की सच्चाई की परीक्षा ले रही होगी| २३ मार्च व्यतीत होने से कुछ पूर्व ही प्रविष्टि लग पाई

किंतु उस प्रविष्टि के जिस दूसरे भाग को कल सायं लगाने की दृष्टि से मैंने सँजो कर रख लिया था, वह चित्रावली थीअब इसे आगामी सोमवार तक टालने की अपेक्षा यहीं प्रस्तुत कर रही हूँआशा है, सभी इस ऐतिहासिक महत्व की सामग्री को उपयोगी पाएँगे










भगतसिंह का परिवार (बाएँ से) -
माता हुकमकौर (चाची), माता विद्यावती(माँ), माता जयकौर (दादी), माता हरनामकौर (चाची)








माता विद्यावती का युवकों को संदेश






























भगतसिंह को मृत्युदंड के आदेश
































भगतसिंह के trial के आधिकारिक दस्तावेज़

































भगतसिंह का पंजाबी(गुरुमुखी) में लिखा पत्र















भगतसिंह का उर्दू में लिखा पत्र ----------------------भगतसिंह का गुरुमुखी पंजाबी में लिखा पत्र


























क्रांतिकारी सुखदेव की माँ----------------- क्रांतिकारी राजगुरु की माँ




























वीरबलिदानी चंद्रशेखर आजाद -------------------------------- चन्द्रशेखर आजाद की माँ




























हिन्दी हस्तलेख में लिखा गत सिंह का पत्र------------ उर्दू हस्तलेख में गतसिंह की प्रिय पंक्तियाँ *

















*
उर्दू हस्तलेख में भगतसिंह की प्रिय पंक्तियों का देवनागरी पाठ


यह न थी हमारी किस्मत जो विसाले यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तेज़ार होता

तेरे वादे पर जिऐं हम तो यह जान छूट जाना
कि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहदे फ़र्दा
कभी तू न तोड़ सकता अगर इस्तेवार होता

यह कहाँ की दोस्ती है (कि) बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म गुसार होता

कहूँ किससे मैं के क्या है शबे ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता
(ग़ालिब)

इशरते कत्ल गहे अहले तमन्ना मत पूछ
इदे-नज्जारा है शमशीर की उरियाँ होना

की तेरे क़त्ल के बाद उसने ज़फा होना
कि उस ज़ुद पशेमाँ का पशेमां होना

हैफ उस चारगिरह कपड़े की क़िस्मत ग़ालिब
जिस की किस्मत में लिखा हो आशिक़ का गरेबाँ होना
(ग़ालिब)

मैं शमाँ आखिर शब हूँ सुन सर गुज़श्त मेरी
फिर सुबह होने तक तो किस्सा ही मुख़्तसर है

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबाने अक़्ल
लेकिन कभी – कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सरेराह गुज़र बैठा सितमकशे इन्तेज़ार होगा

औरौं का पयाम और मेरा पयाम और है
इश्क के दर्दमन्दों का तरज़े कलाम और है
(इक़बाल)
अक्ल क्या चीज़ है एक वज़ा की पाबन्दी है
दिल को मुद्दत हुई इस कैद से आज़ाद किया

नशा पिला के गिराना तो सबको आता है
मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साकी
(ग़ालिब)

भला निभेगी तेरी हमसे क्यों कर ऍ वायज़
कि हम तो रस्में मोहब्बत को आम करते हैं
मैं उनकी महफ़िल-ए-इशरत से काँप जाता हूँ
जो घर को फूँक के दुनिया में नाम करते हैं।

कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले महफ़िल
चरागे सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।

आबो हवा में रहेगी ख़्याल की बिजली
यह मुश्ते ख़ाक है फ़ानी रहे न रहे

खुदा के आशिक़ तो हैं हजारों बनों में फिरते हैं मारे-मारे
मै उसका बन्दा बनूँगा जिसको खुदा के बन्दों से प्यार होगा

मैं वो चिराग हूँ जिसको फरोगेहस्ती में
करीब सुबह रौशन किया, बुझा भी दिया

तुझे, शाख-ए-गुल से तोडें जहेनसीब तेरे
तड़पते रह गए गुलज़ार में रक़ीब तेरे।

दहर को देते हैं मुए दीद-ए-गिरियाँ हम
आखिरी बादल हैं एक गुजरे हुए तूफाँ के हम

मैं ज़ुल्मते शब में ले के निकलूँगा अपने दर मांदा कारवाँ को
शरर फशाँ होगी आह मेरी नफ़स मेरा शोला बार होगा

जो शाख-ए- नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना पाएदार होगा।


सौजन्य : प्रो.चमनलाल



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