"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

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इस प्रेम पर विह्वल ही हो सकते हैं

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इस प्रेम पर विह्वल ही हो सकते हैं 

यह एक ऐसी कथा है, जो बरसों चलती हैं और प्रेम का वह रूप दिखाती है, जो दुर्लभ किन्तु कितना सहज व सरल है.

 और विस्तार से जानने की इच्छा रखने वालों के लिए यूट्यूब व नेट पर इसके विषय में हजारों पन्ने व वीडियो और मिल जाएँगे. यहाँ तक कि इस विषय में पुस्तक तक लिखनी पड़ीं


सम्पूर्ण व शुद्ध जन-गण-मन (अनुवाद व तीन लिपियों में) : कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर के स्वर में

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सम्पूर्ण जन-गण-मन ( अनुवाद व तीन लिपियों में) : कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर के स्वर में

- (डॉ.) कविता वाचक्नवी 



अभी अभी भारत का स्वाधीनता दिवस भारतीयों ने मनाया है और प्रत्येक आयोजन में राष्ट्रगान अवश्य गाया गया होगा, आयोजनों के अतिरिक्त भी गाया जाता है, गाया गया होगा. भारत के राष्ट्रगान के व सम्मान्य  रवीन्द्रनाथ ठाकुर के उक्त समूचे गीत के देवनागरी पाठ के लिए पूरा हिन्दी का नेट खंगालने के उपरांत भी मुझे कहीं भी यह अपने समूचे, सही व शुद्ध रूप में नहीं मिला. हिन्दी विकीपीडिया पर यह अधूरा है व पदों का क्रम भी आगे पीछे है, अन्य भी कुछ लिंक यथासामर्थ्य देखे, तो पाठ में कई मुख्य त्रुटियाँ मिलीं. "मागे" को "माँगे" व "आशिष" को "आशीष" लिखने की त्रुटि तो इतनी सामान्य है कि यदि सुधारने की बात उठे तो लोग "माँगे" के ही पक्ष में तर्क देंगे. इन सारी व्यथाओं से ऊभ-चूभ होते हुए मैंने ठाना कि इसका विधिवत्  सम्पूर्ण पाठ व तद्संबंधी मुख्य सभी जानकारियाँ हिन्दी के पाठकों के लिए एक स्थल पर व समग्र रूप में सहेज कर रखीं   जानी चाहिए. इस भावना व  घंटों की खोजबीन का फल भी निकला, जिसे आप सभी देखें-पढ़ें व मित्रों के साथ अधिकाधिक बाँटें.


कुल तथ्य यह हैं कि ईस्वी सन १९१३ में साहित्य के नोबल सम्मान से सम्मानित कृति `गीतांजली' में संकलित गीत `जन-गण-मन' की रचना कवीन्द्र रवीन्द्र ने मूलतः बाँग्ला में १९१० के अविभाजित किन्तु परतंत्र  भारत में की थी.


मूलतः पाँच पदों वाले इस गीत का पहला पद भारत के राष्ट्रगान के रूप में समादृत व गाया जाता है.

Capt Ram Singh Thakur
राष्ट्रगान के रूप में समादृत गीत की धुन को रचा था कैप्टन रामसिंह ठाकुर जी ने.

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के २७ दिसंबर १९११ के कोलकाता अधिवेशन में सर्वप्रथम इसे विधिवत्  गाया गया था.



File:Ram Singh Thakur playing violin.jpg
महात्मा गाँधी के सान्निध्य में कप्तान रामसिंह ठाकुर वायलिन पर राष्ट्रगान की धुन बजा रहे हैं



कवीन्द्र रवीन्द्र के स्वर में इसका पाठ भी सुना जा सकता है, जिसे मैंने यहाँ अपलोड किया है  (क्लिक करें)    -







यह तो रही तथ्यों व स्वर तथा धुन की बात.
अब ज़रा इसका सही, सम्पूर्ण, शुद्ध व क्रमवार पाठ भी एक एक कर देखें -

मूल बाँग्ला में पाठ 

 জনগণমন-অধিনায়ক জয় হে


স্বদেশ --- রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর


(1)
জনগণমন-অধিনায়ক জয় হে ভারতভাগ্যবিধাতা!
পঞ্জাব সিন্ধু গুজরাট মরাঠা দ্রাবিড় উত্‍‌কল বঙ্গ
বিন্ধ্য হিমাচল যমুনা গঙ্গা উচ্ছলজলধিতরঙ্গ
    তব শুভ নামে জাগে, তব শুভ আশিস মাগে,
        গাহে তব জয়গাথা।
জনগণমঙ্গলদায়ক জয় হে ভারতভাগ্যবিধাতা!
    জয় হে, জয় হে, জয় হে, জয় জয় জয়, জয় হে॥
(2)
অহরহ তব আহ্বান প্রচারিত, শুনি তব উদার বাণী
হিন্দু বৌদ্ধ শিখ জৈন পারসিক মুসলমান খৃস্টানী
    পূরপ পশ্চিম আসে তব সিঃহাসন-পাশে
        প্রেমহার হয় গাঁথা।
জনগণ-ঐক্য-বিধায়ক জয় হে ভারতভাগ্যবিধাতা!
    জয় হে, জয় হে, জয় হে, জয় জয় জয়, জয় হে॥
(3)
পতন-অভ্যুদয-বন্ধুর পন্থা, যুগ-যুগ ধাবিত যাত্রী।
হে চিরসারথি, তব রথচক্রে মুখরিত পথ দিনরাত্রি।
    দারুণ বিপ্লব-মাঝে তব শঙ্খধ্বনি বাজে
        সণ্কটদুঃখত্রাতা।
জনগণপথপরিচায়ক জয় হে ভারতভাগ্যবিধাতা!
    জয় হে, জয় হে, জয় হে, জয় জয় জয়, জয় হে॥
(4)
ঘোরতিমিরঘন নিবিড় নিশীথে পীড়িত মুর্ছিত দেশে
জাগ্রত ছিল তব অবিচল মঙ্গল নতনয়নে অনিমেষে।
    দুঃস্বপ্নে আতন্কে রক্ষা করিলে অন্কে
        স্নেহময়ী তুমি মাতা।
জনগণদুঃখত্রাযক জয় হে ভারতভাগ্যবিধাতা!
    জয় হে, জয় হে, জয় হে, জয় জয় জয়, জয় হে॥
(5)
রাত্রি প্রভাতিল, উদিল রবিচ্ছবি পূর্ব-উদয়গিরিভালে--
গাহে বিহঙ্গম, পূণ্য সমীরণ নবজীবনরস ঢালে
    তব করুণারুণরাগে নিদ্রিত ভারত জাগে
        তব চরণে নত মাথা
জয় জয় জয় হে, জয়রাজেশ্বর ভারতভাগ্যবিধাতা
    জয় হে, জয় হে, জয় হে, জয় জয় জয়, জয় হে॥






बाँग्ला के पाठ का रोमन लिप्यन्तरण  व अंग्रेजी रूपांतर 
अंग्रेजी अनुवाद : श्री सितांशु शेखर मित्र (साभार)



Jano Gano Mano Adhinaayako Jayo Hey
Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
Oh! the ruler of the mind of the people,
Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
Panjaabo Sindhu Gujaraato Maraathaa
Draabirho Utkalo Bango
Bindhyo Himaachalo Jamunaa Gangaa
Uchchhalo Jalodhi Tarango
Punjab, Sind, Gujrat, Maharastra,
Drabir (South India), Orissa, and Bengal,
the Bindhya, the Himalayas, the Jamuna, the Ganges,
and the oceans with foaming waves all around
Tabo Shubho Naamey Jaagey
Tabo Shubho Aashisho Maagey
Gaahey Tabo Jayogaathaa
Wake up listening to Your auspicious name,
ask for Your auspicious blessings,
And sing to Your glorious victory.
Jano Gano Mangalo Daayako
Jayo Hey Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
Oh! You who impart well being to the people!
Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,
Jayo Jayo Jayo Jayo Hey
Victory, victory, victory to Thee!
(refrain repeated five times)
(2)
Aharaho Tabo Awhbaano Prachaarito
Shuni Tabo Udaaro Baani
Hindu Bauddho Shikho Jaino
Parashiko Musholmaano Christaani
Your call is announced continuously,
we heed Your gracious call.
The Hindus, Buddhists, Sikhs, Jains,
Muslims, and Christians,





Purabo Pashchimo Aashey
Tabo Singhaasano Paashey
Premohaaro Hawye Gaanthaa
The East and the West come
to the side of Your throne
And weave the garland of love.
Jano Gano Oikyo Bidhaayako Jayo Hey
Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,
Jayo Jayo Jayo, Jayo Hey
Oh! You who bring in the unity of the people!
Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
(3)
Patano Abhyudayo Bandhuro Panthaa
Jugo Jugo Dhaabito Jaatri
Hey Chiro Saarothi, Tabo Ratha Chakrey
Mukharito Patho Dino Raatri
The way of life is somber as it moves through ups and downs.
But we, the pilgrims, have followed through ages.
Oh! Eternal Charioteer, the wheels of your chariot
echo day and night in the path
Daaruno Biplabo Maajhey
Tabo Shankhodhwoni Bajey
Sankato Duhkho Traataa
In the midst of fierce revolution
your conch shell sounds.
You save us from fear and misery.
Jano Gano Patho Parichaayako
Jayo Hey Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,
Jayo Jayo Jayo, Jayo Hey
Oh! You who guide the people through tortuous path!
Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
(4)
Ghoro Timiro Ghono Nibiro
Nishithey Pirhito Murchhito Deshey
Jagrato Chhilo Tabo Abichalo Mangalo
Nato Nayoney Animeshey
During the bleakest of nights,
when the whole country was sick and in swoon
Wakeful remained Your incessant blessings
through Your lowered but winkless eyes.
Duhswapney Aatankey
Rakkhaa Koriley Ankey
Snehamoyi Tumi Maataa
Through nightmares and fears
You protected us on Your lap
Oh Loving Mother.
Jano Gano Duhkho Trayako
Jayo Hey Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,
Jayo Jayo Jayo, Jayo Hey
Oh! You who have removed the misery of the people!
Victory be to You, dispenser of the destiny of India!
(5)
Raatri Prabhatilo Udilo Rabichhabi
Purbo Udayo Giri Bhaaley
Gaahey Bihangamo Punyo Samirano
Nabo Jibano Rasho Dhaley
The night is over, and the Sun has risen
over the eastern horizon.
The birds are singing, and a gentle auspicious breeze
is pouring the elixir of new life.
Tabo Karunaaruno Ragey
Nidrito Bhaarato Jagey
By the halo of Your compassion
India that was asleep is now waking
Jayo Jayo Jayo Hey, Jayo Rajeshwaro
Bhaarato Bhaagyo Bidhaataa
Jayo Hey, Jayo Hey, Jayo Hey,
Jayo Jayo Jayo, Jayo Hey
Victory be to You, the Supreme King!
dispenser of the destiny of India!


 देवनागरी पाठ 

(१)


जन-गण-मन-अधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग
विंध्य हिमाचल जमुना गंगा उच्छलजलधितरंग
तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष मागे
        गाहे तव जयगाथा
जन-गण-मंगलदायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे,जय हेजय हेजय जय जय हे

()

अहरह तव आह्वान प्रचारित सुनि तव उदार वाणी
हिंदु बौद्ध सिख जैन पारसिक मुसलमान खृस्तानी
पूरब पश्चिम आसे, तव सिंहासन पासे
प्रेमहार होय गाँथा
जन-गण-ऐक्य-विधायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे,जय हे,जय हे,जय जय जय हे

(३)


पतन-अभ्युदय-बंधुर पन्था,युग युग धावित यात्री
हे चिरसारथि,तव रथचक्रे मुखरित पथ दिनरात्रि
दारुण विप्लव माँझे तव शंखध्वनि बाजे
      संकट-दुःखत्राता
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे,जय हे जय हे,जय जय जय हे॥

(४)

घोरतिमिरघन निबिड़ निशीथे पीड़ित मूर्छित देशे
जाग्रत छिल तव अविचल मंगल नतनयने अनिमेषे
दुःस्वप्ने आतंके, रक्षा करिले अंके
   स्नेहमयी तुमि माता
जन-गण-दुःखत्रायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे,जय हे,जय हे,जय जय जय हे

(५)

रात्रि प्रभातिल उदिलो रविच्छवि पूर्व-उदयगिरिभाले
गाहे विहंगम पुण्य समीरण नव जीवन रस ढाले
तव करुणामय रागे, निद्रित भारत जागे
    तव चरणे नत माथा
जय जय जय हे जयराजेश्वर भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे,जय हे, जय जय जय हे


आशा है, इस सँजो कर रखी जाने वाली सामग्री का सदुपयोग आप राष्ट्रगान के प्रति बरती जानेवाली अतिरिक्त सतर्कता के साथ (व रचनाकार तथा राष्ट्र के प्रति ) ससम्मान करेंगे एवं भविष्य में इसके पाठ व उच्चारण संबंधी त्रुटियों के विरोध में सर्वदा  सतर्क रहेंगे.

जय भारत

***


अपडेट / 27 जनवरी 2012 
गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र ने इस लेख पर एक टिप्पणी लिख भेजी हैं व इसे मेरे मूल लेख के साथ देने का आग्रह किया है ताकि गीत के पाठ के समय लोग इन बिंदुओं का ध्यान भी रख सकें -

‘जन-गण-मन’ की रचना बंगला भाषा में हुई, जिसका उच्चारण,शब्दार्थ आदि संस्कृत/हिन्दी से कहीं-कहीं बिलकुल भिन्न है। देवनागरी में उसे उतारते समय हिन्दी की प्रकृति को यथासम्भव ध्यान में रखा गया है।
१.उदाहरण के लिए ‘अधिनायक’ का अर्थ बंगला में ‘कप्तान’ होता है,जबकि हिन्दी में ‘तानाशाह’।
२.संस्कृत की पारम्परिक उच्चारण –व्यवस्था (शब्दानुशासन) के अनुसार बंगला में भी शब्द के प्रारम्भ में आनेवाले ‘य’ का उच्चारण ‘ज’ होता है। इसी प्रकार, ‘दुःखत्राता’ का उच्चारण ‘दुःखत्त्राता’ के रूप में और ‘शंखध्वनि’ का ‘शंखद्ध्वनि’ के रूप में होगा। जो हिन्दी के अध्यापक इस संस्कृत शब्दानुशासन को नहीं जानते हैं,वे प्रसाद जी के प्रयाण-गीत ‘बढे चलो’ में ‘दृढप्रतिज्ञ’ का सही उच्चारण ‘दृढप्प्रतिज्ञ’ नहीं कर पाते हैं,जिससे उनके काव्यपाठ का प्रवाह बाधित होता है।
३.बंगला में ‘स’ ध्वनि का उच्चारण ‘श’ के रूप में होता है: आसे>आशे,सुनि>शुनि,सिन्धु>शिन्धु, स्वप्न>श्वप्नो आदि।
४.बंगला में सामान्यतः ‘अ’ का उच्चारण ‘ओ’ होता है,जबकि लिखा ‘अ’ ही जाता है,जैसे छिल>छिलो,बंधु>बोंधु, मंगल>मोंगोलो,बंग>बोंगो, तरंग>तरोंगो आदि।
५. मूल पाठ में बंगला की उच्चारण – व्यवस्था के अनुसार ‘गुजराट’ और ‘खृष्टानी’ शब्द हैं।
६.अन्य लोकभाषाओं की तरह बंगला में भी ह्रस्व-दीर्घ के उच्चारण में काफ़ी उदारता बरती जाती है। इस प्रकार ‘रात्रि’ में ‘त्रि’ को दीर्घ और ‘गाहे’ में ‘हे’ को ह्रस्व पढा जायेगा।


कवि गोपालदास नीरज : अभिनन्दन व काव्यपाठ : स्वाधीनता दिवस के अवसर पर

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कवि गोपालदास नीरज जी का अभिनन्दन व काव्यपाठ  :  वीडियो 
स्वाधीनता दिवस के अवसर पर 
- (डॉ.) कविता वाचक्नवी 



गत वर्ष २००९ के १५ अगस्त (स्वाधीनतादिवस) के अवसर पर  हैदराबाद में कवि गोपालदास नीरज जी के अभिनन्दन व काव्यपाठ का एक आयोजन रखा गया था. आयोजकों द्वारा मुझे भी आमंत्रण व सूचना मिली. उन दिनों हैदराबाद में ही थी व यूके के लिए प्रस्थान करने ही वाली थी. तिथियाँ तो ठीक से स्मरण नहीं किन्तु एकदम यात्रा सिर पर थी और अत्यंत भागदौड़ व मेलमिलाप की औपचारिकताओं का दबाव भी था. पुनरपि नीरज जी के काव्यपाठ का जादू अपने मोहपाश में काव्यप्रेमियों को खींचता ही है, इसलिए यह संभव ही नहीं था कि इस सुअवसर से वंचित रहा जाए. कार्यक्रम कई घंटे का व दो किश्तों में था. बीच में जलपान (जो लगभग रात्रिभोजन  सरीखा ही था) सहित  नीरज जी को मित्रों के साथ मिलकर सुनना एक बहुत ही स्मरणीय व आनंददायक संस्मरण के रूप में परिणित हुआ .



 नीरज जी व्हीलचेयर पर थे  पुनरपि अपनी उसी जिजीविषा व मस्ती में उन्होंने घंटो काव्यपाठ किया. साथ ही जीवन के इस दौर में बुढापे की अवस्था  में लिखी कई कविताएँ भी सुनाईं, जिनमें  जीवनदर्शन और जीवनानुभव का ताप सहज ही अनुभव किया जा सकता था. साहित्यिक अभिरुचि वाले श्रोताओं की इच्छा व माँग पर कई पुरानी रचनाओं का पाठ भी उन्होंने किया. फ़िल्मी लेखन के उनके जादू से प्रभावितों ने उनकी फिल्मों में प्रयोग हुई कई रचानाओं को मनोयोग पूर्वक आग्रह करके सुना. आश्चर्य की बात कि अपनी इस अवस्था में भी नीरज जी उतने ही सजग हैं व स्मरणशक्ति भी सचेत है कि लगभग ४-५  घंटों का कवि सम्मलेन व आयोजन वे सहज ही अपने दम पर निभा गए. सच में वह एक अविस्मरणीय साँझ थी.  मंचीय कविसम्मेलनों में साहित्यिक रचनाधर्मिता का युग जैसे नीरज जी पर आकार थम जाता है. आज की मंचीय कविता की जो गति-मति है, उसे तो कविता की श्रेणी में परिगणित करना भी अपराध है.  



दुर्भाग्य यह रहा कि मैं उनके काव्यपाठ के वीडियो  नहीं ले पाई. कार्यक्रम के पश्चात् संयोजकों-आयोजकों को संपर्क कर आग्रह किया कि वे नीरज जी के वीडियो उपलब्ध करवा दें, कोई सीडी हो तो उसकी कॉपी ले ली जाए (उन्होंने सम्पूर्ण कार्यक्रम की विधिवत्  रेकार्डिंग करवाई थी) ; किन्तु उनका रुख इस आयोजन के पीछे विशुद्ध व्यापारिक ही उजागर हुआ कि वे इसकी सीडी बनवा कर बाजार में उतारेंगे व तब मार्केट से खरीदी  जाएँ. वह कब संभव होगा का भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला; उलटे, दाता व याचक जैसी भंगिमा व स्वर ही सुनने देखने को मिले.



देश विदेश के कई मित्रों ने  उलाहना भी दिया कि `आज के सर्वसुविधासम्पन्न समय में  ऐसे अवसर के वीडियो तक आप नहीं जुटा पाईं, यह तो हद है'.


गत  दिनों उस कार्यक्रम के कुछ वीडियो मुझे दिखाई दे गए. अप्रैल से एक एक कर उन्हें सहेजते हुए रख रही थी. किन्तु सबको एकत्र कर प्रस्तुत कर पाना संभव ही नहीं हो पा रहा था. अब क्योंकि कल उस अवसर को एक वर्ष पूरा हुआ है, स्वाधीनता दिवस के उस काव्यपाठ की पहली वार्षिकी है ( व आगामी कुछ माह नेट को यदा कदा ही छूना हो पाएगा),  इसलिए आज सभी के अवलोकनार्थ नीरज जी के उस काव्यपाठ के टुकड़ा टुकड़ा अंश समेकित रूप में यहाँ प्रस्तुत हैं - 





































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