"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

" - हिन्दी भारत - " (भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों, हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ), भाषिक मंतव्यों, जीवनमूल्यों, पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु) ***** हिन्दी भारत ***** "

रोमन कथा वाया बाईपास अर्थात् हिन्दी पर एक और आक्रमण

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रोमन का रोमांस


श्री असगर वजाहत के इस आह्वान को स्वीकार करते हुए मुझे प्रसन्नता है कि 'आज समय का तकाजा है कि हम हिन्दी भाषा की लिपि पर विचार करें और इस संबंध में जनमत बनाने पर विचार करें।' मेरा खयाल है, विचार करने पर कोई नई बात सामने आती है, तभी जनमत बनाने का सवाल उठता है। स्वयं असगर ने बताया है कि इस प्रश्न पर पहले भी काफी विचार हुआ था, लेकिन इस प्रस्ताव के पक्ष में कभी हवा नहीं बनी कि हिन्दी भाषा को रोमन लिपि में लिखा जाए। दरअसल, यह प्रस्ताव कमजोर और तर्कहीन होने के अलावा इतना बोदा और क्रूर था कि इस पर गंभीरतपूर्वक विचार करना बुद्धि का अपमान होता। तब हिन्दी की स्थिति आज जैसी बुरी नहीं थी । शेर पर वार करना कठिन होता है। चींटी को तो कोई भी कुचल देगा। हिन्दी अब गरीब की भौजाई हो चुकी है। यही वजह है कि आज हिन्दी को रोमन लिपि में लिखने की सलाह दी जा रही है।


इस सिलसिले में प्रगतिशील लेखक संघ आंदोलन द्वारा कभी दी गई यह सलाह दिलचस्प है कि सभी भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि स्वीकार कर लेनी चाहिए। इस सलाह के बारे मे ज्यादातर लोगों को मालूम नहीं है, वरना इस किस्म की प्रगतिशीलता की आलोचना करने का एक और कारण उपलब्ध हो जाता। कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रगतिशील लेखक संघ आंदोलन के दौरान सभी भारतीय भाषाओं को रूसी लिपि अपनाने की सलाह दी गई थी और असगर वजाहत की याददाश्त उन्हें धोखा दे रही है? लेकिन हो सकता है, असगर ठीक ही कह रहे हों, क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी, देश की दूसरी पार्टियों की तरह ही, अंग्रेजीपरस्त रही है। कम्युनिस्ट पार्टियों के सभी दस्तावेज आज भी अंग्रेजी में ही तैयार होते हैं। यहाँ तक कि नक्सलवादी समूहों के भी, जो जमीन से ज्यादा जुड़े हुए हैं। कम्युनिस्टों की इस परंपरा पर ज्यादा चिंता इसलिए प्रगट की जानी चाहिए कि वे अपने को देश भर में सबसे ज्यादा लाकतांत्रिक और जन-हितैषी भी मानते हैं। काश, जिन प्रगतिशील लोगों ने रोमन लिपि अपनाने की सलाह दी थी, उन्होंने अपनी सलाह पर खुद अमल करना शुरू कर दिया होता। भारत का समकालीन इतिहास अनेक मजेदार दृश्यों से वंचित रह गया।


कमाल अतातुर्क एकमात्र शासक थे, जिन्होंने अपने देश की भाषा तुर्की के लिए रोमन लिपि अपनाने का चलन शुरू किया। जैसा कि असगर वजाहत ने खुद बताया है, यह किसी जन आंदोलन का परिणाम नहीं था। न ही इसके लिए व्यापक विचार-विमर्श किया गया था। कमाल अतातुर्क के मात्र एक आदेश से इतना मूलभूत परिवर्तन हो गया। उन्होंने तुर्की को एक आधुनिक - उनकी आधुनिकता पूर्ण पश्चिमीकरण पर आधारित थी - राष्ट्र बनाने की दिशा में अथक प्रयास किया, पर तुर्की को रोमन में लिखने का आदेश तानाशाही का एक उदाहरण है। किसी भी शासक को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी भाषा की लिपि बदल डाले। यह सुधार नहीं, ज्यादती है। शुक्र है कि किसी और देश के शासक या शासकों ने यह ज्यादती दुहराने की हिम्मत नहीं की। यह भारत के नए तानाशाह मिजाज का ही एक उदाहरण है कि हिन्दी की लिपि बदलने की मुहिम शुरू हो गई दिखती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि या तो यह तानाशाही रहेगी या नागरी रहेगी।


दुख को कैसे खुशी में बदला जा सकता है, इसका उदाहरण भी असगर वजाहत के इस लेख में मिलता है। लेख के पहले भाग में बार-बार यह रोना रोया गया है कि हिन्दी की हालत रोज-ब-रोज खस्ता होती जा रही है। यह न अकादमिक भाषा बन सकी, न प्रशासनिक। विश्व भाषा बनने का तो सवाल ही नहीं उठता। हाँ, विज्ञापन जगत ने हिन्दी को जरूर अपना लिया है, जिसके बारे में बताया गया है कि यह तेरह हजार करोड़ रुपए का उद्योग है। लेकिन 'महत्वपूर्ण बात यह है कि विज्ञापन की भाषा में हिन्दी तो आई है, पर नागरी लिपि नहीं आई। विज्ञापन की हिन्दी रोमन लिपि में ही सामने आती है।' लेकिन इसमें खुश होने की बात क्या है? विज्ञापनदाता ठहरा व्यापारी। उसे न भाषा से मतलब है न लिपि से। वह सिर्फ एक भाषा जानता है - रुपए पर छापे गए अंकों की। उसके लिए भाषा की अपनी ध्वनियों का कोई महत्व नहीं है। वह सिर्फ एक ही ध्वनि को पहचानता है, वह है सिक्के की ठनठन। उसे तो अपना माल बेचना है। कल अगर भोजपुरी भारत की राष्ट्रभाषा हो गई, तो उसके विज्ञापन भोजपुरी में दिखाई-सुनाई देने लगेंगे। क्या अब वही हमारा एकमात्र पथ-प्रदर्शक रह गया है?


यह सूचना मानीखेज है कि '...पिछले पचीस-तीस सालों में हिन्दी समझनेवालों की संख्या में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई है लेकिन नागरी लिपि का ज्ञान उतनी तेजी से नहीं बढ़ा है।' इस भयावह तथ्य के दो पहलू हैं। पहली बात का संबंध भारत में शिक्षा के कम फैलाव से है। जब भारत में साक्षरता निम्नतम स्तर पर थी, तब भी हिन्दी समझनेवालों की संख्या बहुत ज्यादा थी, पर नागरी लिपि जाननेवाले बहुत कम थे। लोग रामचरितमानस और कबीर वाणी पढ़ते नहीं थे, सुनते थे। कहते हैं, कबीर तो नागरी क्या, किसी भी लिपि में नहीं लिख सकते थे, हालाँकि इस पर मुझे यकीन नहीं है। आज अगर देश में हिन्दी समझनेवालों की संख्या ज्यादा है, पर हिन्दी लिख सकनेवालों की संख्या कम, तो इसका मतलब यह है कि अब भी साक्षरता की कमी है। इतने करोड़ लोगों का हिन्दी जानना, पर उसकी लिपि से अपरिचित रहना कोई स्वाभाविक घटना नहीं है, लोगों को पिछड़ा रखने के राष्ट्रीय षड्यंत्र का नतीजा है।


दूसरा पहलू भी कम चिंताजनक नहीं है। सोनिया गाँधी, मनमोहन सिंह, सैम पित्रोदा और प्रकाश करात जैसे लोग हिन्दी समझ लेते हैं, पर हिन्दी न ठीक से पढ़ सकते हैं न लिख सकते हैं। इनकी तिजारत हिन्दी से चलती है, इसलिए ये हिन्दी में बोल लेते हैं, पर हिन्दी के भले से इन्हें कोई मतलब नहीं है। टीवी पर विचार-विमर्श के दौरान अंग्रेजीदाँ लोगों को हम अकसर टूटी-फूटी हिन्दी में अपनी बात रखते हुए सुनते हैं। यह उनका हिन्दी-प्रेम नहीं, व्यावसायिकता का दबाव है। टीवी और एफएम चैनलों में भी तमाम फैसले अंग्रेजी में होते हैं, पर गाया-बजाया हिन्दी में जाता है। लेकिन हिन्दी प्रदेश के नेताओं का, जो अमूमन अंग्रेजी नहीं जानते, हाल भी अच्छा नहीं है। जहाँ तक मुझे पता है, लालू-मुलायम-मायावती जैसे नेता, जिनकी रोटी ही हिन्दी से चलती है, दो-चार लाइनें हिन्दी में भले ही लिख लें, पर बारह शब्दों की एक लाइन में पाँच में से सात गलतियाँजरूर होंगी। यह दुरवस्था किसी भी अन्य भारतीय भाषा में नहीं है। जहाँ तक भारत को त्याग कर विदेश में रहनेवाले तथाकथित सफल लोगों का सवाल है, उन्हें न अपने देश से प्यार है, न अपनी भाषा से। उनकी मजबूरी यह है कि भारत के अपने 'कम विकसित' रिश्तेदारों से संवाद करने के लिए हिन्दी में लिखना पड़ता है। यही वे विदेशी भारतीय हैं जो रोमन में हिन्दी लिखते हैं। रोमन में हिन्दी लिखवाने का कुछ दोष हिन्दीवालों का भी है। उन्होंने न वर्तनी का मानकीकरण किया न कंप्यूटर के कुंजी पटल का। ऐसे में और हो ही क्या हो सकता था? पर इस कारण हम भगोड़ों की नकल क्यों करने लगें? क्या हमें पागल कुत्ते ने काटा है?



मैं ठीक से नहीं जानता कि भाषा और लिपि का संबंध किस तरह का है। मुझे इतना जरूर पता है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा छपनेवाली किताब बाइबल, जो मूल रूप से हिब्रू (ओल्ड टेस्टामेंट) और ग्रीक (न्यू टेस्टामेंट) में है, का अन्य भाषाओं में अनुवाद हुआ है, तो उस भाषा की लिपि को भी स्वीकार किया गया है। भारत की सभी भाषाओं में बाइबल का अनुवाद हो चुका है, पर एक भी अनुवाद रोमन लिपि में नहीं छपा है। यह फर्क तिजारत और राजनीति तथा समाज और संस्कृति का है। व्यापारी उस भाषा का इस्तेमाल करता है जिस भाषा में माल ज्यादा बिक सकता है। इसीलिए न केवल हिन्दी में अंग्रेजी डाली जा रही है (ये दिल माँगे मोर) बल्कि अंग्रेजी में भी हिन्दी डाली जा रही है -सन बोले हैव फन। । पत्रकारिता में टाइम्स ऑफ इंडिया ने सबसे पहले यह भाषाई संकरता शुरू की थी। अब उसकी नकल लगभग सारे अखबार कर रहे हैं । अंग्रेजी और वर्नाकुलर, दोनों का मजा एक साथ। कीमत सिर्फ तीन रुपए।


यह शुद्ध भ्रम है कि रोमन में लिखने से हिन्दी की लोकप्रियता बढ़ेगी और उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल सकेगी। कहते हैं, एक अधेड़ आदमी को नजदीक का चश्मा देते हुए डाक्टर ने कहा, अब आप आसानी से पढ़-लिख सकते हैं। वह आदमी बहुत खुश हुआ। उसने जवाब दिया, आपकी मेहरबानी से यह सहूलियत हो गई, वरना मैं तो अनपढ़ हूं। चश्मा किसी को साक्षर नहीं बना सकता। मुझे नहीं लगता कि रोमन में लिखी हिन्दी को अमेरिका के ओबामा या फ्रांस के सरकोजी समझ जाएँगे। यही बात रोमन में लिखी चीनी या जापानी के बारे में भी कही जा सकती है। नागरी में लिखी उर्दू हम कुछ-कुछ समझ लेते हैं, क्योंकि इतनी उर्दू हमें पहले से ही आती है। यह जरूर है कि नागरी में लिखने पर विदेशियों को हिन्दी पढ़ाना आसान हो जाएगा, पर यह हमारा इतना बड़ा सरोकार क्यों हो कि हम अपनी लिपि ही बदल डालें? इसके पहले क्या यह जरूरी नहीं है कि हिन्दी बोलनेवालों को हिन्दी पढ़ा दी जाए? तब हो सकता है कि असगर वजाहत के खूबसूरत उपन्यासों और कहानियों को पढ़नेवालों की तादाद बढ़ जाए।


यह बात सही नहीं है कि 'नागरी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि भविष्य में चुनौतियाँ देगी।' ये चुनौतियाँ नहीं होंगी, नागरी लिपि के साथ बलात्कार होगा। इसे स्वीकार कर लेने के पीछे यही मनोभाव हो सकता है कि बलात्कार को रोक नहीं सको, तो उसका मजा लेना शुरू कर दो। इसी तरह यह व्याख्या भी उचित नहीं है कि 'ऐतिहासिक शक्तियाँ परिवर्तन की भूमिका निभाती रहेंगी।' ऐसा कहने के पीछे इतिहास की प्रभुतावादी अवधारणा है। हो सकता है, ऐतिहासिक शक्तियों ने भारत को अंग्रेजों का गुलाम बनाया, पर वे शक्तियाँ भी कम ऐतिहासिक नहीं थीं जिन्होंने अंग्रेजों को भारत से भगा कर छोड़ा। 'अंग्रेजी हटाओ आंदोलन' के पीछे ऐतिहासिक शक्तियाँ हैं, तो कामनवेल्थ खेलों जैसी गुलामी की परंपरा को ढोनेवाली घटना के पीछे भी ऐतिहासिक शक्तियाँ हैं। सवाल यह है कि हमें किन ऐसिहासिक शक्तियों का साथ देना चाहिए और किन ऐतिहासिक शक्तियों का विरोध करना चाहिए। मार्क्स के अनुसार, इतिहास की गति इकहरी नहीं, द्वंद्वात्मक है। इतिहास उससे उलटी दिशा में भी जा रहा है जिसकी ओर असगर वजाहत ने संकेत किया है। इसका एक प्रमाण यह है कि जब 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ, तो उसका चार्टर पाँच भाषाओं (चीनी, फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी और स्पेनिश) में लिखा गया था। पर 1980 में अरबी को भी राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाना पड़ा।

एक बात मैं जरूर मानता हूँ और चाहता भी हूँ। किसी एक भाषा को विश्व भाषा बनाया जाना चाहिए। पता नहीं यह कभी संभव होगा या नहीं। जिस दिन यह होगा, वह दिन 'विश्व मानवता दिवस' मनाने लायक होगा। हो सकता है, उस भाषा की एक ही लिपि हो। तब तक मैं जीवित रहूँगा, तो इसका हार्दिक स्वागत करूँगा। एस्पेरेंटो को विश्व भाषा के रूप में विकसित करने का प्रयोग किया गया है, पर यह प्रयास अभी भी शैशवावस्था में है। नोम चॉम्स्की की यह स्थापना सही है कि दुनिया की सभी भाषाओं का मूल ढांचा एक है। ऐसा इसलिए है कि दुनिया का ढांचा भी सभी जगह एक ही है। इस आधार पर भाषाई एकता की कल्पना की जा सकती है। जरूरी नहीं कि वह लिपि रोमन ही हो। किसी भी कसौटी का इस्तेमाल करें, नागरी लिपि रोमन लिपि से ज्यादा वैज्ञानिक है। यों ही नहीं था कि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपनी वसीयत का एक हिस्सा अंग्रेजी भाषा को सुधारने के लिए रख छोड़ा था।


लेकिन आज के वातावरण में, जब अंग्रेजी और रोमन लिपि भारत में विध्वंसक की भूमिका निभा रही हैं तथा सभी भारतीय भाषाओं का भविष्य खतरे में है, हिन्दी को या कि किसी भी अन्य भारतीय भाषा को रोमन लिपि अपनाने की सलाह देना कटे में नमक छिड़कने की तरह है। मैं तो इसी विचार के विरोध में ही जनमत बनाने की कोशिश करूँगा। मैं समझता हूँ, यही वैज्ञानिक भी है। आज रोमन लिपि का इस्तेमाल करनेवालों के हाथ में विज्ञान की नियामतें केंद्रित हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका, इंग्लैंड या दूसरे यूरोपीय देश जो कुछ कर रहे हैं, वह भी वैज्ञानिक है। ऐसी वैज्ञानिकता से खुदा बचाए।
राजकिशोर

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पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की अपील

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आतंकवादी ऐसे बनाती है पुलिस



मुझे इस बात के लिए माफ किया जाए कि मैं कई बार अपने खिलाफ चल रहे मामले की चर्चा कर चुका हूँ । मामला अब भी अदालत में हैं और वहाँ जो फैसला होगा सो होगा, मैं अपने पाठकों की अदालत में अपने दोषी या निर्दोष होने की यह अपील कर रहा हूँ ।


2005 के फरवरी महीने में दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी थाने में मेरे खिलाफ एक मामला दर्ज हुआ था एफआईआर कहती है कि हेड कांस्टेबल मोहम्मद लोनी और हेड कांस्टेबल सलीम डिफेंस कॉलोनी क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। वहाँ एक सिंह न्यूज एजेंसी पर उनकी नजर सीनियर इंडिया नामक पत्रिका पर पड़ी जिसके मुख पृष्ठ पर बापू की वासना शीर्षक से एक लेख छपा था। सलीम और लोनी को एफआईआर के अनुसार बहुत उत्सुकता हुई और उन्होंने पत्रिका पढ़ना शुरू कर दिया। अंदर सातवें पन्ने पर नीचे एक तीन पैराग्राफ का लेख था जिसका शीर्षक था `अपने अपने भगवान', जिसमें एक छोटी-सी फोटो भी छपी थी जिसमें पगड़ी पर पटाखा  बना हुआ था।


एफआईआर के अनुसार फोटो बहुत छोटा था लेकिन फिर भी इन गुणी हवलदारों ने पढ़ लिया कि पगड़ी के माथे पर कुरान की पहली आयत ला इलाह इल्लिलाह, या रसूल अल्लाह अरबी भाषा में लिखा है। दिल्ली पुलिस में अरबी भाषा के इतने विद्वान को सिर्फ हवलदार बना कर रखा गया है। यह हैरत की बात है एफआईआर कहती है कि कार्टून छापना मुस्लिम समुदाय का अपमान करना है और लेख की भाषा भी मुस्लिम संप्रदाय के खिलाफ है। इसलिए यह धारा 295 के तहत किया गया गंभीर अपराध था। इसकी सूचना सब इंस्पेक्टर के पी सिंह को दी गई और के पी सिंह ने थाने से एक बजे रवानगी डाल कर 22 फरवरी 2006 को खुद डिफेंस कॉलोनी में यह पत्रिका देखी और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। वरिष्ठ अधिकारी यानी दिल्ली पुलिस के पुलिस आयुक्त डॉक्टर कृष्ण कांत पॉल तैयार बैठे थे। उन्होंने तुरंत दिल्ली के उप राज्यपाल के नाम एक संदेश बनाया जिसमें पत्रिकाएँ जब्त करने और संपादक यानी मुझे गिरफ्तार करने की अधिसूचना जारी करने का अनुरोध था। अधिसूचना फौरन जारी कर दी गई और इसे श्री पॉल ने गृह मंत्रालय से भी जारी करवा दिया। 


मेरे जिस लेख पर मुस्लिम भावनाएँ भड़कने वाली थीं, उसके तीन पैरे भी लगे हाथ पढ़ लीजिए। मैने लिखा था- हाल ही में पैगंबर हजरत मोहम्मद जो इस्लाम के संस्थापक हैं, के डेनमार्क में कार्टून प्रकाशित होने पर बहुत हंगामा और बहुत जुलूस निकले। इस अखबार ने इसके पहले जीसस क्राइस्ड के कार्टून छापने से इंकार कर दिया था क्योंकि उसकी राय में यह आपत्तिजनक हैं। 


इसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का बयान आया जिसमें कहा गया कि वे डेनमार्क के साथ है और यूरोप तथा अमेरिका मे रहने वाले सभी इस्लाम धर्म के अनुयायियों को स्थानीय जीवन शैली और रिवाज मानने पड़ेंगे। सिर्फ इस बयान से जाहिर हो जाता है कि अमेरिका के असली इरादे क्या है? अमेरिका अपने स्वंयभू बुद्विजीवियों की मदद से संस्कृतियों के टकराव का सिद्वांत प्रचारित करने में लगा हुआ है और इस तरह के बयानाें के बाद किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए कि और भी जगह चिंगारिया भड़के। तथ्य यह है कि धर्म का मूल प्रश्न तेल और जमीन के मामले से हट कर अब धर्म के मूल आधार का माखौल उड़ाने पर आ कर
टिक गया है और स्वाभाविक है इस्लामी शक्तियां इसे पसंद नहीं करेगी। यह ठीक है कि किसी भी धर्म की महानता इस बात में निहित है कि वह मजाक को कितना सहन कर सकता है मगर यदि कोई धर्म या उसके अनुयायी इसे मंजूर नहीं करते तो उन्हें अपने रास्ते छोड़ देना चाहिए। 


यह वह लेख था जिसे इस्लामी भावनाए आहत करने वाला बताया जा रहा था। रातों रात मुझे गिरफ्तार किया गया, रात को तीन बजे तक पूछताछ की गई। पूछा गया कि डेनमार्क वाला यह कार्टून कितने में और कहां से खरीदा था? पूछने वाले एक पढ़े लिखे आईपीएस अधिकारी थे जिन्हें पता था कि इंटरनेट पर चार बटन दबाने से सारे कार्टून सामने आ जाते हैं और इन पर कोई कॉपीराइट नहीं है। मगर साहब तो बड़े साहब यानी के के पॉल का हुक्म बजा रहे थे और पॉल इसलिए दुखी थे क्योंकि हमने उनके वकील बेटे को दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित तमाम अभियुक्तों को अदालत में बचाते और औकात से कई गुनी ज्यादा फीस वसूलते पकड़ लिया था।


तिहाड़ जेल में बारह दिन बंद रहने के बाद जमानत मिली और जमानत के आदेश में एक एक पैरा पर टिप्पणी की गई थी कि इससे कोई मुस्लिम भावना आहत नहीं होती। मगर पॉल तब भी दिल्ली पुलिस के आयुक्त थे और उनके आदेश पर जमानत रद्द करने की अपील की गई जो अब भी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि एफआईआर लिखवाने के लिए भी के के पॉल दो मुस्लिम हवलदारों को ले कर आए। अदालत में कहा गया कि इस लेख पर दंगा हो सकता है इसलिए अभियुक्त यानी मुझे सीधे तिहाड़ जेल भेज दिया जाए। यह सब गृह मंत्री शिवराज पाटिल की जानकारी में हो रहा था और यह बात खुद पाटिल ने बहुत बाद में अपने घर मेरे सामने स्वीकार की। संसद में सवाल किया गया मगर कोई जवाब नहीं मिला। कई पेशियाँ  हो चुकी हैं। एक सीधे सपाट मामले में चौदह जाँच अधिकारी बदले जा चुके हैं। जो चार्ज शीट दाखिल की गई है उसे अदालत ने बहस के लायक नहीं समझा। सबसे गंभीर धारा 295 उच्च न्यायालय ने पाया कि इस मामले में लागू ही नहीं होती। मगर मामला चल रहा है। 


मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ बहुत सारे मामले इन्हीं धाराओं में चले और खारिज होते रहे। हुसैन का बहुत
नाम हैं और उनका एक दस्तखत लाखों में बिकता है। मगर निचली से ले कर उच्च न्यायालय तक अब तक लाखों रुपए मैं अदालती ताम झाम में खर्च कर चुका हूँ । अब तो उच्च न्यायालय ने उस मामले को जिसमें मेरी गिरफ्तारी इतनी अनिवार्य मानी गई थी, साधारण सूची में डाल दिया है जिसमें तारीख दस साल बाद भी पड़ सकती है। आप ही बताए कि भारत की न्याय प्रक्रिया में मेरा विश्वास क्यों कायम रह जाना चाहिए? अभी तक तो कायम हैं लेकिन न्याय के नाम पर सत्ता और प्रतिष्ठान जिस तरह की दादागीरी करते हैं उसी से आहत और  हताश हो कर लोग अपराधी बन जाते हैं। 


दिलचस्प बात यह भी है कि मुझ पर इस्लाम के खिलाफ मामला भड़काने का आरोप लगा था। फिर भी तिहाड़ जेल में मुझे उस हाई सिक्योरिटी हिस्से में रखा गया जहाँ जैश ए मोहम्मद और लश्कर ए तैयबा के खूंखार आतंकवादी भी मौजूद थे। ईमानदारी से कहे तो आतंकवाद के आरोप में बंद ये लोग पुलिस से ज्यादा इंसानियत बरतते नजर आए और उन्होंने बहुत गौर से मेरी बात सुनी और अपने साथ बिठा कर खाना खिलाया। फिर भी भारत सरकार का मैं अभियुक्त हूँ । उस सरकार का जो उस संविधान से चलती हैं जहाँ  अभिव्यक्ति की आजादी और न्याय नागरिक का मूल अधिकार है।

आलोक तोमर 

पंद्रह साल से क्या होगा

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पंद्रह साल से क्या होगा



संसद में अल्पसंख्यकों के अलावा और किसी प्रकार का आरक्षण नहीं होना चाहिए, यह मानते हुए भी मेरी समझ में नहीं आता कि स्त्रियों के लिए आरक्षण के जिस विधेयक पर इतना शोर बरपा हुआ है, उसकी अवधि सिर्फ पंद्रह साल क्यों है। मजे की बात यह है कि इस पंद्रह साल वाले प्रावधान पर कोई चर्चा भी नहीं हो रही है। मानो आरक्षण कोई हीरा हो जो अभी मिल रहा है तो ले लो -- पंद्रह साल बाद जब यह हीरा काँच में बदल जाएगा तब देखा जाएगा! लेनेवालों की जैसी मानसिकता है, पानेवालों की मानसिकता भी उससे कुछ कम अल्पकालिक नहीं लगती। महिला आरक्षण को सिर्फ पंद्रह साल तक सीमित करके (जिसमें दो या तीन टर्म तक ही साटें आरक्षित हो सकेंगी) सत्तारूढ़ दल ने यह साबित कर दिया है कि उसकी मंशा राजनीति में कोई टिकाऊ परिवर्तन लाना नहीं, बल्कि स्त्रियों को लॉलीपॉप थमा कर अपने को महिला-हितैषी साबित कर देना भर है।



संसद और विधान सभाओं में महिला आरक्षण की तुलना अकसर पंचायतों में महिलाओं को दिए गए आरक्षण से की जाती है। लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। खास तौर पर दो बातें गौर करने लायक हैं। पहली बात यह है कि पंचायतों में आरक्षण की कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है। यानी जब तक पंचायतें हैं, तब तक उनमें महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण मिलता रहेगा। अपने आपमें यह व्यवस्था भी ठीक नहीं है, क्योंकि कुछ समय के बाद सामाजिक स्थितियाँ ऐसी हो जानी चाहिए कि पंचायत में चुने जाने के लिए किसी स्त्री को आरक्षण की बैसाखी की जरूरत न रह जाए। परमानेंट आरक्षण किसी भी वर्ग को पंगु ही बनाएगा। दूसरी तरफ, विधायिका में महिला आरक्षण की अवधि इतनी छोटी रखी गई है कि इससे सामाजिक समानीकरण को कोई विशेष फायदा नहीं पहुंचेगा। पंद्रह साल तो देखते-देखते बीत जाएँगे। उसके बाद महिलाएँ ठगी गई-सी महसूस करेंगी। तब फिर एक अभियान चलाया जाएगा कि आरक्षण की अवधि को और बढ़ाया जाए। यह काम अभी ही क्यों नहीं हो सकता?



दूसरी बात यह है कि गाँवों की सत्ता संरचना में फर्क इसलिए नहीं आया है कि एक-तिहाई सीटों पर महिलाएँ चुनी जा रही हैं। ज्यादा फर्क इस बात से आया है कि महिलाओं के लिए आरक्षण सभी पदों पर भी लागू किया गया है। यानी गाँव, ब्लॉक और जिला, तीनों स्तरों पर सभी पदों (अध्यक्ष और उपाध्यक्ष) का तैंतीस प्रतिशत भी महिलाओं के लिए आरक्षित है। किसी गाँव पंचायत में एक-तिहाई पंच महिलाएँ हैं, इसकी बनिस्बत यह ज्यादा असरदार होता है कि कोई महिला सरपंच हो। जहाँ भी उल्लेखनीय परिवर्तन आया है, इसलिए आया है कि सरपंच कोई महिला थी। इसके विपरीत, प्रस्तुत महिला आरक्षण विधेयक में सिर्फ सीटें आरक्षित की जा रही हैं, पद नहीं। इससे भी परिवर्तन होगा, लेकिन ज्यादा और तेज परिवर्तन इससे होगा कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, स्पीकर और मंत्रियों के पदों में भी एक-तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाएँ। संसद और विधान सभाओं की सदस्यता में से कुछ हिस्सा महिलाओं के लिए छोड़ देना भी त्याग है, लेकिन असली त्याग तो वह कहलाएगा जो सत्ता के वास्तविक केंद्रों में किया जाएगा। प्रधानमंत्री के रूप में यह मनमोहन सिंह का दूसरा टर्म है। तीसरा टर्म किसी महिला को क्यों नहीं मिलना चाहिए ? क्या सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह का कलेजा इतना बड़ा है?



अगर इस तर्क को मान लिया जाता है कि आरक्षण का उद्देश्य समानता लाना है, ताकि एक निश्चित समय के बाद किसी को भी आरक्षण की जरूरत न रह जाए, तो इस 'निश्चित समय' को परिभाषित करना भी जरूरी है। अनुसूचित जातियों और जनजातियों को संसद में आरक्षण दिया गया था तो इसकी अवधि दस साल रखी गई थी। इसके पीछे उम्मीद यह थी कि दस साल में इन समूहों के लिए इतना सघन काम किया जाएगा कि इन्हें संसद में आने के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं रह जाएगी। लेकिन आलम यह है कि हर दस साल के बाद संविधान में संशोधन कर आरक्षण की अवधि को बढ़ाया जाता रहा है। अब महिलाओं को सिर्फ पंद्रह वर्षों के लिए आरक्षण दिया जा रहा है। क्या यह अवधि ऊँट के मुंह में जीरे की तरह नहीं है ? मेरा अनुमान यह है कि यह अवधि पचीस साल से कम नहीं होनी चाहिए।



यह सुझाव मान लेने पर यादव बंधुओं को भी खुश किया जा सकता है। यों कि इन पचीस वर्षों में पहले दस वर्ष की आधी (मैं तो कहूँगा, सारी की सारी) सीटें ओबीसी के लिए आरक्षित कर दी जाएँ। दस वर्ष की इस अवधि में ओबीसी कल्याण के लिए भरपूर प्रयास किए जाएँ। उसके बाद सारी आरक्षित सीटें सभी वर्गों के लिए खोल दी जाएँ। अगर इस पर भी यादव बंधु राजी नहीं होते हैं, तो इस फार्मूले के आधार पर महिला आरक्षण विधेयक पारित कर दिया जाए, चाहे इसके लिए मार्शल का ही सहारा क्यों न लेना पड़े।



आरक्षण अपने आपमें कोई लक्ष्य नहीं है। यह सामाजिक समता स्थापित करने का एक साधन है। इसलिए आरक्षण की अवधि का उपयोग महिलाओं की स्थिति को पुरुषों के समकक्ष लाने का आंदोलन चलाने के लिए होना चाहिए। यह आंदोलन सरकारी और गैरसरकारी, दोनों स्तरों पर चलाना होगा। तभी महिला आरक्षण टोटका मात्र न रह कर परिवर्तन का एक सक्षम औजार बन सकेगा। फिलहाल तो इसकी हैसियत झुनझुने से ज्यादा नहीं है।
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राजकिशोर

शमा पर क्यों जलते हैं परवाने

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शमा पर क्यों जलते हैं परवाने


दाग का एक शेर इस विषय पर सटीक बैठता है जो उन्होंने तेरह वर्ष की उम्र में लिखा था :

शमा ने सर पे रखी आग कसम खाने को
बखुदा जलाया नहीं मैंने परवाने को।
तब परवान जला कैसे? परवाना खुद ही अपनी आग में जल गया। कम से कम शमा ने परवाने को नहीं जलाया। मैंने जब यह शेर पढ़ा था तब मैं कालेज में विज्ञान का विद्यार्थी था। मैंने भी सोचा कि परवाने को क्या पड़ी थी शमा पर जल जाने की। प्रकृति परवानों के साथ ऐसा अन्याय नहीं कर सकती। तब यह क्या रहस्य है कि परवाने प्रकृति के नियमों के विरूद्ध शमा पर जल जाते हैं? मैंने सोचा कि परवानों को विशेषकर नर और मादा को रात में ही मिलना होता है तब वे किस तरह एक दूसरे से मिल सकते हैं। जब पतंगे शमा की लव के पास आते हैं तब वे अधिकांशतया उसमें सीधे न जाकर उसकी परिक्रमा अंडाकार में करते हैं कुछ उसी तरह कि जिस तरह पुच्छलतारे सूर्य के आकर्षण से खिचे चले आते हैं किन्तु परिक्रमा अंडाकार में करते हैं। उस समय मुझे नहीं मालूम था कि मादा कीट अपनी विशेष गंध के कण हवा में छोड़ती है। और नर अपनी तीव्र घ्राण शक्ति के बल पर उसे सैकड़ों मीटर दूर से सूंघ लेता है। मैंने सोचा था कि नर और मादा दोनों प्रकाश के तीव्र स्रोत के पास पहुँचते हैं अथार्त शमा उनका मिलन विन्दु होता है। वे वहाँ  अंडाकार में परिक्रमा करते हैं किन्तु कुछ परवाने अपनी व्याकुलता में और मिलन की आशा की तेजी में शमा से टकरा जाते हैं।
सक्रिय वैज्ञानिक और अधिक गहराई में सोचते हैं क्योंकि उन्हें अपनी अवधारणा को प्रयोगों द्वारा सिद्ध भी करना पड़ता है। जां हैनरी फाव्र उन्नीसवीं शती के बहुत प्रसिद्ध कीट विज्ञानी हो गये हैं। मई की एक सुबह उनके घर में अपने कोश में से एक अति सुन्दर पतंगा निकला। उसकी जाति का नाम ही सुन्दर है ‘ग्रेट पीकाक’ ‘बड़ा मयूर’। उन्होंने इसे तुरंत ही जली कक्ष में बन्द कर दिया। उस कक्ष की एक खिड़की खुली रह गई थी। रात के नौ बजे उस कमरे में पतंगे ही पतंगे भर गये यही कोई चालीस पतंगे। वे सब नर पतंगे थे जो उस नवयौवना ग्रेट पीकाक से मिलने आये थे। फाव्र ने प्रश्न किया कि वे पतंगे वहां किस तरह आये उन्हें मादा की उपस्थिति कैसे ज्ञात हुई? रात का अंधेरा थाク खिड़की भी हारियाली से ढंकी हुई थी और पतंगे पक्षियों की तरह गाना भी नहीं गाते। तब फाव्र ने सोचा कि इतनी सारी गंधों के बीच उनकी गंध भी काम नहीं कर सकती। अतएव अवश्य ही मादा ने कोई बेतार के समान संदेश भेजा होगा। उस समय बेतार द्वारा संदेश भेजना बहुत लोक प्रिय हो रहा था। फाव्र की इस अवधारणा को वैज्ञानिकों ने मान्यता नहीं दी किन्तु बाद में इस अवधारणा का एक अन्य रूप में जन्म होता है। फाव्र रात में पतंगों को देखने के लिये जब मोमबत्ती लेकर गये थे तब सारे पतंगे मादा के जालीदार कक्ष को छोड़कर मतवालों की तरह बत्ती की तरफ भागे थे। फाव्र को पतंगों का यह विचित्र व्यवहार समझ में नहीं आया कि क्योंकर पतंगे मादा को छोड़कर बत्ती के पास जाना चाहेंगे?  

पतंगों की कृत्रिम प्रकाश स्रोतों के लिये यह व्याकुलता वैज्ञानिकों की समझ में नहीं आती। पतंगे इस दुनिया में करोड़ों वर्षाें से हैं जब कि कृत्रिम प्रकाश स्रोत कुछ लाख वर्षों से ही हैं। अथार्त पतंगे करोड़ों वर्षों से बिना कृत्रिम प्रकाश के सफलतापूर्वक मिलते आये हैं। 1930 के दशक के अन्त में कीट विशेषज्ञ वान बुडेनब्रॉक ने एक अवधारणा प्रस्तुत की। पतंगे रात में दिकचालन के लिये चंद्रमा का उपयोग करते हैं। वे चन्द्रमा को एक उपयुक्त कोण पर रखकर उड़ते हैं और इस तरह वे सीधी रेखा में उड़ सकते हैं। पतंगे बत्ती को उपयुक्त परिस्थिति में चन्द्रमा समझ बैठते हैं। और उन्होंने आगे कहा कि जब वे ऐसा करेंगे तब वे उस बत्ती की परिक्रमा ही करेंगे न कि सीधी रेखा में उड़ेंगे और उनकी उड़ान कुण्डलीकार हो जायेगी तथा अन्त में वे बत्ती में जायेंगे। पतंगे का बत्ती की चांद मानकर उड़ने में गोलाकार या दीर्घगोलाकार उड़ान भरना तो गणित से सिद्ध किया जा सकता है किन्तु छोटी होती हुई कुण्डली में उड़ना तर्कसंगत नहीं है। 

इस दिशा में अंग्रेज कीट विज्ञानी राबिन बेकर ने बहुत चतुर प्रयोग किये। उन्होंने सिद्ध किया कि उजियारी रातों में ‘लार्ज यलो अडरविंग’ ‘विशाल पीत पंख’ जाति के पतंगे चांद की सहायता से सीधी रेखा में उड़ते हैं। उस प्रयोग में उन्होंने चांद के प्रकाश को एक विशाल पर्दे की सहायता से रोका था और देखा था कि तुरंत ही पतंगे भटकने लगे थे। उसी प्रयोग में जब चाँद घने वृक्षों के पीछे छिपा तब उन्होंने उपयुक्त स्थान पर एक बल्ब जलाया और तब उन पतंगों ने अपनी दिशा बदल दी थी। पतंगे ऐसा तब ही करते हैं जब कृत्रिम प्रकाश उन्हें चांद की तरह दिखे जो कि बत्ती के आकार और माप तथा पतंगे से दूरी और कोण पर निर्भर करता है।
  
एक अन्य कीट विज्ञानी एच एस सियाओ ने एक चतुर प्रयोग किया और सिद्ध किया कि अधिकांश पतंगे कृत्रिम स्रोत के चारों तरफ कुण्डलाकार में नहीं उड़ते वरन वे प्रकाश के निकट दो तरफ जाते हैं। पतंगे पकड़ने वाले पतंगे पकड़ने के लिये इस युक्ति का उपयोग करते हैं और दो बड़े थैलों में उन्हें एकत्रित करते हैं। किन्तु इस अवधारणा से यह समझ में नहीं आता कि पतंगे शमा की लव में अपने को क्यों जला देते हैं।
1960 के दशक में कीट विज्ञानी फिलिप कैलाहन ने इस विषय पर एक विचित्र अवधारणा प्रस्तुत की : मादा द्वारा छोड़े गये सुगiन्धत फैरोमोन के कण अवरक्त किरणों का विकिरण करते हैं। इन कणों पर जब रात की निम्न ऊर्जा वाली परावैंगनी किरणें गिरती हैं तब वे फैंरोमोन के कण उसे (पराबैंगनी किरणों को) अवरक्त किरणों में बदलकर पुनर्विकरित करते हैं। अवरक्त किरणों को हम ताप के रूप में अनुभव करते हैं। नर पतंगे इन किरणों के लिये विशेष संवेदनशील होते हैं और वे इन किरणों के सहारे मादा तक पहुंचते हैं। कैलाहन ने यह अवधारणा पतंगों के एंटैनाओं के सूक्ष्म वैज्ञानिक अध्ययन के बाद प्रस्तुत की थी। कैलाहन ने प्रस्तुत किया कि पतंगे शमा या बुनसैन बर्नर या मोमवत्ती पर आकर्षित होते हैं क्योंकि इनकी अवरक्त किरणें मादा द्वारा विकिरित किरणों के समान होती हैं। किन्तु नर पतंगे कोलमैन लैन्टर्न की तरफ आकर्षित नहीं होते। कैलाहन ने प्रयोगों द्वारा दशार्या कि इन लैंटर्न की अवरक्त किरणें बुनसैन बर्नर या मोमवत्ती द्वारा विकिरित किरणों से नितान्त भिन्न  होती हैं।

अधिकांश वैज्ञानिक कैलाहन की अवधारणा से सहमत नहीं हैं। अभी तक कैलाहन या अन्य वैज्ञानिक ने प्रयोगों द्वारा नहीं दशार्या है कि मादा द्वारा छोड़े गये फैरोमोन कणों से विशिष्ट अवरक्त किरणें विकरित होती हैं। साथ ही टौरेन्टो विश्वविद्यालय के मार्टिन मस्कोवित्स के तर्क है कि एक तो मादा ऐसे अनेक फैरोमेन कण हवा में छोड़ती है जिसके फलस्वरूप नर पतंगों को एक के स्थान पर सैकड़ों मादाएं दिखेंगी। और दूसरे अवरक्त किरणों से सारा वातावरण भरा पड़ा है अतएव पतंगों को मादा की वह विशेष अवरक्त किरण ढूढ़ने में बहुत कठिनाई होगी। उनका पहला तर्क तो सही है किन्तु दूसरा तर्क सही नहीं है क्योंकि उस विशेष अवरक्त किरण को पकड़ने के लिये प्रकृति एक विशेष फिल्टर बना सकती है जैसे रंगों से भरी दुनिया में कीट विशेष रंग चुन लेते हैं। प्रसिद्ध विज्ञान लेखक जे इन्ग्रैम का कहना है कि कैलाहन की अवधारणा यह तथ्य भी नहीं समझा पाती कि पतंगे अन्त में दिये की लव से हटकर थोड़े दूर क्यों चले जाते हैं।

जहाँ  विज्ञान ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति जैसे गूढ़ रहस्यों की खोज में आश्चर्यजनक प्रगति की है वहीं विज्ञान ने इस रहस्य को रहस्य ही रहने दिया है। विज्ञान में खोज करने के लिये अवसर हमेशा होते हैं।
                        विश्वमोहन तिवारी,  पूर्व एयर वाइस मार्शल

व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिन्दी

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 व्यापक प्रौद्योगिकी और प्रयोजनमूलक हिन्दी
डॉ. ओम विकास







प्रौद्योगिकी और संस्कृति
मानव सभ्यता में बेहतर और गुणवत्ता के लिए सतत प्रतिस्पर्धात्मक विकास होते रहे हैं । शक्ति के मशीनीकरण से औद्योगिक क्रांति हुई, उत्पादन बढ़ा, टिकाऊ, सुन्दर उत्पाद कम कीमत पर सुलभ हुए । पहाड़ में सुरंग बनाकर नदी का प्रवाह मोड़ना संभव हुआ । ट्रेन, बस, वायुयान यातायात के साधन सुलभ हुए । बिजली के अविष्कार से प्रकाश मिला, और ऊर्जा का स्रोत भी । कोयला, पेट्रोलियम ईंधन और बिजली ऊर्जा के स्रोत बने । परमाणु ऊर्जा से बिजली उत्पादन सस्ता हुआ । शक्ति के मशीनीकरण से अन्य नए-नए अविष्कारों के लिए अवसर खुले । लेन-देन की गणना की मशीनें बनीं । ट्रांजिस्टर के अविष्कार से कंप्यूटर बने । कालांतर में इनका आकार छोटा होता गया । इनकी गणना शक्ति (प्रोसेसिंग पावर) और स्मृति कोश (मेमोरी) प्रति वर्ष बढ़ती गई । भविष्य में आज से 10 साल बाद आज के मूल्य पर ही प्रोसेसिंग पावर 100 गुणी, मेमोरी 1,000 गुणी, बैंडविड्थ 10,000 गुणी मिल सकेगी । 1970 के दशक में कंप्यूटर का प्रयोग हर क्षेत्र में संभव बनाकर उत्पादकता और गुणवत्ता को बढ़ा दिया । सूचना का महत्व इस कदर बढ़ा कि डिजिटल इकोनोमी (सूचना-परक अर्थव्यवस्था) और अब नॉलेज इकोनोमी (ज्ञान-परक अर्थव्यवस्था) विश्व अर्थ-व्यवस्था की आधार स्तम्भ बनी है । टैक्नोलॉजी में बदलाव तेजी से हो रहे हैं - न्यूनतर आकार और बृहत्तर क्षमता के बेहतर उत्पाद कम कीमत पर सुलभ हो रहे हैं, आम आदमी तक की पहुँच में आने लगे हैं । निर्विवाद है कि आधुनिक तकनीकी उत्पादों से समाज में जीवंतता आई है, गति भी बढी़ है, और नए ढंग से कुछ सोचने और करने की प्रवृत्ति भी जगी है । मोबाइल सैल फोन से ग्रामीण समाज की अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहे हैं । टी.वी., रेडियो और अब इंटरनेट से देशी और विदेशी जानकारी आसानी से ले पा रहे हैं । जानकारी का आदान-प्रदान कंप्यूटर से सुगम बनता जा रहा है । अलबत्ता अपनी भाषा में कंप्यूटर के प्रयोग का प्रशिक्षण आवश्यक है ।


 

  विज्ञान और प्रौद्योगिकी के उत्तरोत्तर विकास और प्रचलन से जीवन स्तर में सुधार हुआ । मानव-मशीन की परस्परता और निर्भरता बढ़ रही है । लेकिन मानव-मानव संबंधों में शिथिलता आ रही है । मानव शक्ति और मानव गणना की क्षमता की अपेक्षा मशीनें कई गुणा समर्थ होती जा रही हैं। बढ़ती बेरोजगारी परोक्ष परिणाम है । नई सोच की जरूरत है, जिससे मानव को रचनात्मकता और नवाचार में मशीन की मदद आसानी से मिल सके । प्रौद्योगिकी और संस्कृति (Technology and Culture) का वृहद क्षेत्र प्रशस्त किए जाने की आवश्यकता है । संस्कृति समाज में व्यवहृत ज्ञान, विज्ञान, कला, संगीत, जीवन पद्धतियाँ, वैचारिक दर्शन और सामाजिक क्रियाकलापों की समष्टिगत अभिव्यंजना है । संस्कृति के इन पक्षों को प्रबल बनाने में टैक्नोलॉजी अर्थात् प्रौद्योगिकी / तकनीकी की अहम भूमिका होगी । प्रौद्योगिकी अथवा तकनीकी के अनेक प्रयोग क्षेत्र हैं - उद्योग, वाणिज्य, व्यापार, बैंक, यातायात, मीडिया, ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन इत्यादि। उनमें भाषा का प्रयोजनमूलक स्वरूप तदनुसार होगा ।

 

  भारत में सकल अग्र शिक्षा अनुपात (18-24 आयु वर्ग में) GER 12.9% है, विश्व औसत GER 26% है , USA में 34% . भारत की 113 करोड़ जनसंख्या में 70 करोड़ कम आय की श्रेणी में हैं, 30 करोड़ मध्यम आय वर्ग में है, 7.5 करोड़ ही कॉलेज तक पहुँच  पाते हैं । 75% गरीब गाँवों में रहते हैं । भारत में गरीब 37.2% हैं (41.8% गावों में, 25.7% शहरों में) । मानव विकास सूचकांक (HDI) भारत का 0.595, चीन का 0.745, यूएसए का HDI 0.939 . HDI की गणना औसत आयु, ज्ञान और आय के आधार पर करते हैं (World Economic Forum: Global Competitiveness Report, 2003-04). NASSCOM रिपोर्ट के अनुसार केवल 15-20% इंजीनियरिंग ग्रेज्युएट इंडस्ट्री में काम करने लायक होते हैं । शिक्षा में गुणवत्ता का अभाव है । टेक्नीशियन स्तर पर गुणवत्ता निम्नतर है। भारत में साक्षरता कम है, प्रतिद्वंदता और उद्यमता की भी कमी है ।



आधुनिक भारत में तकनीकी विकास तेजी से किए जाने के लिए अंग्रेजी को संबल बनाया गया। गैर सरकारी संस्था ‘प्रथम’ की वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट, 2009 में 6-14 आयु वर्ग के 7 लाख ग्रामीण बच्चों के सर्वेक्षण के अनुसार दाखिले बढ़े । लेकिन उपस्थिति 75% रही । गुणा-भाग का सरल गणना कौशल (मैथ्स) में गिरता जा रहा । इंग्लिश ज्ञान कक्षा-5 में 25.7% ही सरल वाक्य पढ़ सकते हैं । सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्राथमिक शिक्षा मे इंग्लिश ज्ञान की कमी पर चिंता जतायी है (Mint & Times of India,16 जनवरी 2010) । विडम्बना है कि लोक भाषा ज्ञान, वैज्ञानिक प्रवृति और विश्लेषण क्षमता के बारे में ‘प्रथम’ का सर्वेक्षण मौन है ।


 
लोक भाषा हिन्दी लोक कथा, कहानी, कविताओं तक सीमित रह गई । अखबार की हिन्दी भी कुछ अंग्रेजी जानने वालों को ही समझ आती है । नीति निर्माता कहते हैं कि हिन्दी तकनीकी शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए समर्थ नहीं है । लेकिन राजनीति स्तर पर हिन्दी का ढ़ोल पीटने के लिए अलग-थलग प्रशासनिक संस्थाएं हैं, लेकिन उनमें तालमेल नहीं, राष्ट्रीय नीति में समवेत स्वर होकर हिन्दी की सामर्थ्य का दावा नहीं कर पाते । इससे बहुसंख्य आम आदमी असहाय है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नए अनुसंधानों के बारे में सामान्य जानकारी से भी वंचित है । प्रौद्योगिकी की व्यापकता उद्योग, वाणिज्य, बैंक, व्यापार, यातायात, ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, पर्यटन, मीडिया, इत्यादि सभी क्षेत्रों में है । प्रौद्योगिकी के प्रयोग क्षेत्र में प्रयोजन के अनुसार भाषा का स्वरूप - शब्द भंडार, प्रयुक्तियाँ आदि विकसित होते हैं ।  

 


  3 जनवरी 2010 को माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 97वें इंडियन साइंस कांग्रेस अधिवेशन के उद्घाटन भाषाण में कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं । अधिक महिलाएँ वैज्ञानिक बनें, ब्रेन ड्रेन को ब्रेन गेन बनाएँ, सौर ऊर्जा को बढ़ाएँ; स्वास्थ्य, जल, खाद्यान्न सुरक्षा, यातायात, सार्व. ढ़ांचा आदि के लिए समुचित तकनीकी विकसित करें । आम आदमी की भागेदारी को ध्यान में रखकर तीन मुद्दे प्रमुख हैं । इनके लिए हमारी लोकभाषाओं में पर्याप्त ज्ञान-सामग्री हो, शिक्षण-प्रशिक्षण की सुविधा हो ।

 


1.            ब्रेन ड्रेन को ब्रेन गेन बनाना ।  इसके विशद् अभिप्राय है कि ब्रेन ड्रेन अर्थात्  जो प्रतिभा विदेशों को पलायन कर गईं, और ब्रेन ड्रॉप अर्थात् जो प्रतिभा देश में ही कुंठित रह गईं, दोनों को ब्रेन गेन अर्थात् प्रतिभा-पुंज बनाकर अग्रणी भारत के निर्माण में लगाना । टेक्नीशियन स्तर पर गुणवत्ता निम्नतर है । ब्रेन ड्रेन की अपेक्षा ब्रेन ड्रॉप  अर्थात् कुंठित प्रतिभा बहुत अधिक है ।  चिंता का विषय है ।  ब्रेन ड्रॉप को लोकभाषा के माध्यम से प्रशिक्षण देकर ही ब्रेन गेन में बदल सकते हैं ।  

2.         विज्ञान में महिलाएँ  रूचि लें, उनमें वैज्ञानिक सोच और अविष्कारोन्मुखी प्रवृत्ति को पनपाएँ, बढ़ावा दें। यह कार्य भी लोकभाषा के माध्यम से ही संभव है ।


3.
       सरकार ने 2010-2020 दशक को नवाचार दशक ( डिकेड ऑफ इन्नोवेशन ) घोषित किया है । इन्नोवेशन आलीशान प्रयोगशालाओं में डिग्री होल्डरों तक ही सीमित न हो । इन्नोवेशन सार्वभौमिक प्रक्रिया है, कहीं ही, कोई भी इसमें योगदान कर सकता है- किसान भी, मजदूर भी, गाँव की महिला भी । आम आदमी को नवाचारयुत अविष्कारोन्मुखी बनाना लोकभाषा के माध्यम से ही संभव है ।



लगभग 60 प्रतिशत लोग हिन्दी में तकनीकी काम सीख सकते हैं, जानकारी का आदान-प्रदान कर सकते है । प्रयोजन के अनुसार भाषा का शब्द भंडार, प्रयुक्तियाँ और बहु लिपि समावेश नीति निर्धारित करते हैं । ऐसा न होने से मशीन या टूल्स पर प्रशिक्षण रटन्त होगा, वैज्ञानिक सिद्धांतों की समझ न हो सकेगी । इससे उनमें इन्नोवेशन करने की क्षमता भी नगण्य होगी । नवाचार दशक की परिकल्पना कोरी कल्पना भर रह जाएगी । सरकार ने संकल्प लिया है, साधन और अवसर भी उपलब्ध कराने को कटिबद्ध है । लेकिन दायित्व हमारा है लोकभाषा को विज्ञान सम्मत बनाने का, व्यवसाय परक शब्द भंडार और प्रयुक्तियाँ तैयार करने का । आज के संदर्भ में लोकभाषा हिन्दी के प्रयोजनमूलक स्वरूप को सबल बनाने की आवश्यकता है ।



आम आदमी के योगदान से सकल नवाचार सूचकांक (ग्रॉस इन्नोवेशन इंडेक्स) को पूर्णांक बनाना संभव है । इस प्रतिभा के बल पर भारत को 2020 तक विश्व-अग्रणी बनाने का संकल्प साकार हो सकता है ।


 


दृष्टांत -  जापानी भाषा का प्रयोजनमूलक स्वरूप

जापान विश्व की प्रमुख ‘आर्थिक शक्ति’ के रूप में उभर चुका है । टैक्नोलॉजी व्यापार का घरेलू बाजार भी सशक्त है । लेकिन ज्ञातव्य है कि जापान में अंग्रेजी का प्रयोग कार्य-व्यवहार में नहीं होता है। अंग्रेजी का प्रयोग केवल निर्यात संबंधी व्यापार तक सीमित है । जापानी लोग अंग्रेजी न जानने पर अपने को हेय नहीं समझते । उन्हें जापानी भाषा, जापानी कार्य-प्रणाली और जापानी गुणवत्ता पर गर्व है । जापानी मैनेजमेंट पश्चिमी देशों में शोध और व्यवहार का विषय बन गया हैं । एयरपोर्ट, बैंक, रेलसेवा, विपणन (रिटेल व डिस्ट्रीब्यूशन), स्वास्थ्य केन्द्रों, कारखानों और कार्यालयों आदि सभी स्थानों पर जापानी भाषा में ही काम होता है और जापानी भाषा में ही उत्पादकता बढ़ाने वाले कंप्यूटर आदि मशीनों का प्रयोग होता है । विज्ञान और टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में विकास एवं शोध कार्य के प्रकाशन मूलत: जापानी भाषा में किए जाते हैं । उनका मानना है कि 90 प्रतिशत काम जापानी लोगों के द्वारा और उनके बीच होता है, जो जापानी भाषा में ही सहज, सुगम और सस्ता होता है । बहुत कम काम रह जाता है जिसे अनुवादकों की सहायता से पूरा करते हैं । ऐसा करना व्यावहारिक दृष्टि से आसान है और आर्थिक दृष्टि से भी किफायती है।


जापान में जापानी भाषा का व्यवहार भी उदाहरणीय है । जापानी भाषा में
जापानी सोच और परंपरा से जुड़े मूल शब्दों को हीरागाना लिपि में लिखते हैं, विदेशी मूल के शब्दों को काताकाना लिपि में, और चीन से प्रभावित संकल्पनाओं को चीनी रूपाक्षरों अर्थात् कांजी (लिपि) में लिखते हैं । तीन लिपियों का संगम - स्वदेशी, विदेशी और पड़ोसी – प्रगत देश की संस्कृति की अभिव्यक्ति का अनूठा संगम है । इससे राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा होती है, विदेशी ज्ञान को विदेशी पहचान के साथ अपने ढंग से आत्मसात करने का प्रयास होता है । चीनी प्रभाव से संकल्पनाओं को कांजी रूपाक्षरों के रूप में रखकर स्वतंत्र और हीरागाना से संयुक्त अभिव्यक्ति देते हैं । इन तीन लिपियों के अतिरिक्त अंग्रेजी के संक्षोपाक्षरों, जैसे WHO, UNDP, WIPO, को रोमन में लिखते हैं । भाषा का यह मिला-जुला स्वरूप उद्योगों और व्यापार को अधिकाधिक गतिमान बनाने में सहायक सिद्ध होता है ।


पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए टूरिस्ट डायरी उपलब्ध हैं: फ्रैंच से रोमन जापानी, जर्मन से जापानी, अंग्रेजी से जापानी आदि । विदेशियों को आपानी अध्ययन सुगम बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक डिक्शनरी हैं जिनमें 220,000 या अधिक मूल प्रविष्टियाँ और उनके संदर्भगत अर्थ है । इलेक्ट्रॉनिक डिक्शनरी प्रयोग क्षेत्र विषयक भी हैं । विदेशियों को उद्योग-व्यापार परक जापानी भाषा प्रशिक्षण AOTS संस्था के द्वारा विदेशों में आयोजित किए जाते है । उत्पादकता संवर्धन, बेहतर प्रबंधन, अलग-अलग दूरस्थ स्थानों पर समकालिक समन्वयन के लिए कंप्यूटर का प्रयोग व्यापक बन गया है । इन सभी में जापानी भाषा में सूचना संसाधन करते हैं । कार्यालय के अंदर इंट्रानेट और दूरस्थ कार्यालयों के बीच इंटरनेट पर संदेश, फाइल आदि का आदान-प्रदान जापानी भाषा में ही करते हैं । वेबसाइट पर कंपनी-सूचना जापानी भाषा में होती है । इस प्रकार जापानी भाषा के प्रयोजनमूलक स्वरूप को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर समकालिक आधार पर कम कीमत पर उपलब्ध कराया गया है । टैक्नोलॉजी का विकास विभिन्न देशों में बहुत तेज गति से हो रहा है, इसकी अद्यतन जानकारी का जापानी अनुवाद तीन माह के अंदर उपलब्ध कराते है । जानकारी ‘बिजनेस’ का अंग है, इसलिए इसका मूल्य है और इस प्रकार ‘अनुवाद-इंडस्ट्री’ चलती है ।




जापान के समान फ्रांस, जर्मनी देशों में भी टैक्नोलॉजी और व्यापार का विकास उनकी अपनी भाषाओं में ही हो रहा हैं । अलबत्ता उनकी भाषा की लिपि रोमन है, इसलिए तकनीकी दृष्टि से व्यवहार में सरल है । लेकिन उनका यूरोपियन कमीशन और आर्थिक संघ सभी भाषाओं के सामान व्यवहार को बढ़ावा देता है । पारस्परिक मशीनी अनुवाद को भी बढ़ावा मिला है । इन भाषाओं के प्रयोजनमूलक स्वरूप इंटरफेस बनाने में बहुत सहायक सिद्ध होते हैं ।


 


अंग्रेजी का प्रयोजनमूलक प्रसार

राजनीतिक एवं औपनिवेशिक विस्तार से अंग्रेजी को मान्यता मिली । बहुसंख्यक समाज के लिए प्रयोजनमूलक अंग्रेजी को बढ़ावा दिया गया, अंग्रेजी का प्रयोग उत्पादकता बढ़ाने और एकरूपता लाने के उद्देश्य से किया गया । कालांतर में अंग्रेजी प्रयोग की बारंबरता सामाजिक स्वीकृति और सुगमता में बदलने लगी । ब्रिटिश काउन्सिल ने प्रयोजनमूलक अंग्रेजी के विकास और प्रसार के लिए महत्वपूर्ण योजनाएँ चलाई हैं । ‘पुस्तक-से-पोर’ नीति के अंतर्गत मोटी पुस्तकों की बृहद जानकारी को डिजिटल रूप में अंगुली के पोर पर संक्षिप्त रूप में लाने के प्रयास किए गए । संक्षिप्त डिक्शनरी, नर्सिंग शब्दावली, इलेक्ट्रॉनिक शब्दावली, विज्ञान शब्दावली, तकनीकी लेखन आदि विविध प्रयोजनमूलक शब्दकोश वेब पर उपलब्ध हैं । प्रयोजनमूलक अंग्रेजी सीखने के कोर्स भी आयोजित किए जाते हैं ।

 


हिन्दी के लिए सुगम सूचना टैक्नोलॉजी
बेहतर प्रस्तुति, संग्रह, उत्तरोत्तर संशोधन सुविधा, शैली परिष्कार, तुलनात्मक विश्लेषण, अनुवाद-स्वरूप सूचना टैक्नोलॉजी, अर्थात् कंप्यूटर, कम्यूनिकेशन और (मल्टीमीडिया) कंटेंट की संगम टैक्नोलॉजी के प्रयोग से संभव हो सकते हैं । हिन्दी में शब्द संसाधन संभव है, डाटाबेस बनाए जा सकते हैं । हिन्दी में विविध फौंट चुनकर आकर्षक प्रकाशन किया जा रहा है, सीमित स्तर पर कंप्यूटर से अनुवाद प्रारूप तैयार किए जा सकते हैं । हिन्दी के कंप्यूटर के संदेश देश-विदेश में भेजे जा सकते है । हिन्दी के कंप्यूटर, इलेक्टॉनिक डायरी, प्रिंटर, वर्ण पहचान यंत्र आदि उपलब्ध हो रहे है । आवश्यकता है इन यंत्रों के प्रयोग संवर्धन की, जिससे और बेहतर टैक्नोलॉजी का विकास संभव हो और हिन्दी लेखन में सृजनात्मकता और शैली सौष्ठव बढे़, संप्रेषणीयता और रोचकता बढ़े ।



टैक्नोलॉजी ट्रांसफर (अंतरण), टैक्नोलॉजी व्यापार और प्रशासनिक कार्यों में हिन्दी के व्यवहार संवर्धन में अंग्रेजी-हिन्दी मशीनी अनुवाद प्रणाली महत्वपूर्ण सिद्ध होगी । हिन्दी में विविध फौंटों के साथ प्रकाशन-सॉफ्टवेयर पैकेज भी उपलब्ध हैं जिनमें सुंदर, सस्ता, शीघ्र पकाशन संभव हो गया है । अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भी अंग्रेजी, फ्रांसीसी, जर्मन, जापानी, रूसी आदि विदेशी भाषाओं की तकनीकी और व्यापारिक ज्ञान सामग्री को अधिकांश भारतीयों तक हिन्दी के माध्यम से पहुँचाना युक्ति संगत होगा । संयुक्त राष्ट्र संघ में सूचना टैक्नोलॉजी के माध्यम से हिन्दी को सार्थक स्थान दिलाया जा सकता है । विश्व के कई देशों में बसे प्रवासी भारतीयों को हिन्दी के लिए उपलब्ध सूचना टैक्नोलॉजी की जानकारी पहुँचाना भी उपयोगी होगा ताकि वे कंप्यूटर पर हिन्दी में शब्द संसाधन, डाटाबेस प्रबंधन, प्रकाशन, पेजन आदि कर सकें । इसके अतिरिक्त मल्टीलिंग्वल मल्टीमीडिया में और कल्पायन ( Semantic Web ) इंटरनेट पर हिन्दी प्रयोग संवर्धन के लिए विकास कार्य किए जाएँ ।



हिन्दी में ई-मैग्जीन भी आने लगी हैं, कुछ मासिक भी हैं । ब्लॉग, फेस बुक, ट्विटर, ऑर्कट ने भूले बिसरे, दूरस्थ जनों को नजदीक ला दिया है । प्राय: लोग ‘कंप्यूटर पर हिन्दी’ को ‘तकनीकी हिन्दी’ से भ्रमित कर बैठते हैं । लेकिन कंप्यूटर मात्र एक सहायक उपादान है, उत्पादकता उन्नायक टैक्नोलॉजी है । कंप्यूटर प्रयोग की जानकारी सभी प्रयोजनमूलक पाठ्यक्रमों में बहुत उपयोगी सिद्ध होगी ।

 


प्रयोजनमूलक हिन्दी का स्वरूप



साहित्यिक हिन्दी से इतर प्रयोग-क्षेत्र के अनुसार प्रयोजनमूलक हिन्दी का विकास और व्यवहार टैक्नोलॉजी सघन अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है । ‘सबके लिए सब कुछ’ की भाषायी नीति से काम नहीं चलेगा । ‘जैसी माँग वैसी भाषा’ की नीति के अनुसार प्रयोजनमूलक हिन्दी का विकास, व्यवहार, शिक्षण, प्रशिक्षण किए जाने की आवश्यकता है ।

 
प्रयोजमूलक हिन्दी का स्वरूप कैसा हो ? सरल और सर्वग्राह्य हो । दिल्ली में सरल हिन्दी का अभिप्राय होता है येन केन प्रकारेण अंग्रेजी- उर्दू शब्दों का बाहुल्य । शैली, भाषा-सौष्ठव और संप्रेषण के आधार पर इस मिश्रण की कोई कसौटी नही है । ऐसी भाषा महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल, कर्नाटक, केरल आदि के लोगों को सुगम हो, ऐसा भी नहीं है । आसानी से समझे जाने वाले संस्कृत के तत्सम, तद्भव अथवा अपभ्रंश शब्दों का प्रयोग और प्रांत विशिष्ट शब्दों का समावेश बहुग्राह्य होगा । अंग्रेजी के संक्षेपाक्षर (WHO, WIPO, WTO, UNDO, IQ आदि), रासायनिक फार्मूले, (H2O, CH3, CUSO4 आदि), अंतरराष्ट्रीय तकनीकी मापन संक्षेपाक्षर ( Hz, Mbps, KB आदि ) और विदेशी रोमन आधारित विशिष्ट शब्द रोमन में ही लिए जाएँ । संक्षेपाक्षरों का देवनागरीकरण शब्द विस्तार में सहायक नहीं होगा । प्रयोग क्षेत्र की विशिष्ट शब्दावली और अभिव्यक्ति-पैटर्न के प्रयोग से कम से कम समय में संप्रेषण-प्रभावी प्रस्तुति का आकर्षक प्रिंट मिल सके । संप्रेषण और प्रस्तुति की गुणवत्ता पर विशेष बल दिया जाए ।



समाज, टैक्नोलॉजी, राजतंत्र और व्यापार के प्रयोग क्षेत्र के अनुसार
प्रयोगजनमूलक हिन्दी के प्रमुख भेद इस प्रकार हैं:
1. मीडिया और जन संचार की हिन्दी,
2. तकनीकी हिन्दी,
3. प्रशासनिक हिन्दी और
4. वाणिज्यिक हिन्दी ।



मीडिया से तात्पर्य है अखबार, विज्ञापन, फिल्म, टी.बी. (दूरदर्शन), रेडियों, इलेक्ट्रॉनिक बुलेटिन, इंटरनेट आदि। इसका उद्देश्य है कम शब्दों में तुरंत प्रभाव। सामान्यत: इस हिन्दी की विधा स्थायी नहीं हैं, परिवर्तनशील है । भाषा शैली और शब्दों का सातत्व भी प्रधान नहीं है जिससे समाज पर बिनबोझिल प्रभाव हो । यदि विज्ञापन कंपनियों को सही, सामयिक दिशा व सहयोग मिल जाए तो फिल्मों की भांति इनका भी महत्व है हिंदी को सहज ग्राह्य बनाने में ।




विज्ञापन की भाषा उत्पाद-प्रधान होती है, जबकि पत्रकारिता / जन संचार की भाषा संप्रेषण प्रधान होती है और नई टैक्नोलॉजी और उत्पादों के प्रति समाज के ग्राह्यता स्तर के अनुसार परिवर्तनशील होती है । समाज ज्यों-ज्यों टैक्नोलॉजी को आत्मसात करता जाता है, जन संचार की भाषा भी त्यों-त्यों परिष्कृत और परिपक्व होती जाती है।




तकनीकी हिन्दी में अनुवाद की शुद्धता, विषय की जानकारी, स्पष्ट अभिव्यक्ति और संप्रेषणीयता महत्वपूर्ण होते है । विज्ञान और टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में सूचना टैक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी, मटीरियल साइंस, मैन्यूफैक्चरिंग साइंस, जेनेटिक इंजीनियरिंग इत्यादि नए विषय विकसित होते जा रहे हैं । इस प्रकार विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुवाद नितांत आवश्यक हो गया है । अनुवाद की गुणवत्ता बनाए रखना भी जरूरी है । बहुधा अटपटा अनुवाद दिखाई देता है, जिसमें शब्दानुशब्द पर बल दिया जाता है, प्राय: प्रयोक्ता-परिवेश से मेल नहीं खाता, भाव और संदर्भ उपेक्षित रहते हैं । ऐसे अनुवाद की संप्रेषणीयता और तदनुसार उपादेयता बहुत कम होती है । तकनीकी अनुवाद इंटेलीजेंट ट्रांसलेशन हो, जो सुबोध, संप्रेषणीय और रोचक हो । मशीन सह अनुसृजन (IMtHT : Integrated Machine translation and Human Transcreation) से कम समय में सुबोध अनुसृजन संभव है ।




राजतंत्र में प्रशासनिक हिन्दी राजभाषा अधिनियम के अंतर्गत प्रयोजनमूलक हिन्दी के रूप में विकसित हुई है । यह तथ्य परक है । सभी केन्द्रीय कार्यालयों में प्रशासनिक हिन्दी का प्रयोग वांछनीय है, अनुवाद भी इसका प्रमुख अंग है । क्षेत्रीय शब्दों का समुचित समावेश हिन्दी को सहज ग्राह्य बना देगा । अधिनियम के अनुसार केन्द्र में आतंरिक फाइल प्रोसेसिंग हिन्दी में 35 प्रतिशत हो, अहिन्दी भाषी प्रांतों से फाइल आदान-प्रदान हिन्दी में 10 प्रतिशत हो ।



वाणिज्य और वित्त बड़े क्षेत्र है। इनका अपना विशाल शब्द कोश है । बिजनेस के विस्तार में वाणिज्यिक हिन्दी का प्रयोग महत्वपूर्ण है । इस क्षेत्र में भी सुबोध अनुवाद / अनुसृजन की आवश्यकता पड़ती है ।

 


प्रयोजनमूलक लेखन का मूल्यांकन


 

1. वाक्य-पदीय

वर्ण.  अक्षर, शब्द, वर्तनी, पद, वाक्य. संक्षेपाक्षर.
शब्द स्वयं परिभाषित हों, प्रयोजन क्षेत्र में अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग हो लेकिन इन शब्दों के परिभाषा द्योतक हिन्दी में समानार्थी शब्द भी कम से कम पहली बार अंग्रेजी के शब्द के साथ देने विषय-बोध सुगम होगा । टैक्नोलॉजी के साथ प्रयुक्त अंग्रेजी, जर्मन आदि विदेशी शब्दों को सरल ढंग से समझाया जाए । जैसे- आगम-निर्गम (Input-Output), अंतक (Terminal), क्रमादेश (Program), कल्पायन (Semantic web) आदि । संक्षेपाक्षर रोमन में रहें, अन्तर-राष्ट्रीय मान्य रासायनिक सूत्र ( जैसे H2O, CH4 ) रोमन में ही रहें । संख्या रोमन अंक में हो । वाक्य छोटे हों, सरल हों । जटिल अन्तर-संबंधित प्रक्रियाओं को समझाने की दृष्टि से विज्ञान-प्रयोग, प्रविधि, उत्पाद-सेवा परियोजना प्रबंधन के चित्र, आरेखों का प्रयोग किया जाए ।

  वर्तनी का मानक व्यवहार अक्षर-परक ध्वन्यात्मक वैशिष्ट्य को बनाए रखे । द्वितीय में ‘द्वि’ अक्षर को ‘द् वि’ लिखना केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने मानक माना है, यह ध्वनि सिद्धांतत: गलत है ।

 


2. शैली

तथ्यपरक, उदाहरण, केस स्टडी, सरस-सार्थक शीर्षक, प्रयोग-प्रसंग, कड़ी-दर-कड़ी विषय-प्रतिपादन .
प्रयोजन मूलक लेखन तथ्य परक होता है। इसे रोचक बनाने के लिए डिजिटल (खड़ी) अभिव्यक्ति की अपेक्षा लयात्मक अभिव्यक्ति पर बल दिया जाए । उदाहरण और केस स्टडी से विषय-प्रतिपादन सुगम होगा। यथा-स्थान संदर्भों को दर्शाया जाए । एक साथ ढ़ेर सारे संदर्भ देने की प्रथा विषय से न्याय संगत नहीं होगी ।

 

पैराग्राफ के शीर्षक सरस और सार्थक हों । विषयानुसार वैज्ञानिकों के प्रयोग-प्रसंग पाठक को प्रेरक-प्रसंग बन सकते हैं । प्रस्तुति में अतीत की उपलब्धि और अपनी संस्कृति के मूल्यों को जोडते हुए वर्तमान का विशद् विवेचन हो । भविष्य में संभावनाओं के बारे में संक्षिप्त उल्लेख देना भी सराहनीय होगा ।

 

  लेखक में अधिगम सिद्धांत (Learning Theory) के आधार पर संरचनात्मक पद्धति (Constructivist Approach) को अपनाना उचित होगा । इसमें विषय-प्रतिपादन कड़ी-दर-कड़ी आत्मसात कराते हुए किया जाए । तकनीकी लेखन बालकों के लिए सुबोध और स्नातक/स्नातकोत्तर विद्यार्थियों के लिए उच्च स्तर का हो ।

 


3. सामाजिक मूल्य समावेशन 


सांस्कृतिक, सामाजिक एवं मानव मूल्य.

प्रयोजनमूलक लेखन में सावधानी बरती जाए कि सांस्कृतिक, सामाजिक एवं मानव मूल्य आहत न हों। अपितु अपेक्षा है कि ये मूल्य सबल बनें ।  कुछ विज्ञापनों में भाषा खिचड़ी होती है, चित्र संस्कृति से मेल नहीं खाते, इन बातों पर ध्यान देना उचित होगा ।  लेखन में उदाहरण समाज में स्वीकार्य हों ।  सेक्स, ड्रग्स, नशा, हिंसा आदि का अतिरेक न हों । पीत पत्रकारिता से बचा जाए । आविष्कारोन्मुखी समाज बनाने के लिए साहित्य सृजन भी तदनुसार हो, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हो, वैज्ञानिकों और उद्यमियों के बारे में प्रेरक प्रसंग  दिए जाएँ ।


आवश्यक है कि प्रयोजन मूलक हिन्दी में रचना, निबन्ध, विज्ञापन, फिल्म, विडियो गेम्स संवाद, समाचार पत्र, मेग्जीन आदि में प्रस्तुति की स्वस्थ समीक्षा भी होती रहे । इस समय ऐसी समालोचनाओं का नितांत अभाव है ।

प्रयोजनमूलक हिन्दी में प्रशिक्षण

स्कूली स्तर पर हिन्दी का पाठ्यक्रम प्रयोजनमूलक बनाया जाए । पाठों में विज्ञान प्रयोग-प्रसंगों, वैज्ञानिकों की जीवनी और खोजी प्रसंग कथाओं का समावेश किया जाए । विज्ञान, वाणिज्य आदि विषयों के प्रोजेक्ट इस प्रकार डिजाइन किए जाएं कि वे हिन्दी को व्यवहार में लाएँ, अभिव्यक्ति कौशल का विकास करें । इंजीनियरी, मेडिकल और प्रबंधन में स्नातक स्तर पर हिन्दी भाषा में जन संपर्क प्रोजेक्ट अनिवार्य हों जिससे वे लोक भाषा हिन्दी में सूचना संग्रह कर सकें, सामाजापयोगी कार्यक्रमों को आम लोगों को समझाने में समर्थ हो सकें । विचारणीय है कि हमारे इंजीनियर, डाक्टर, प्रबंधक, उपयुक्त टैक्नोलॉजी और तकनीकों को जानकारी और विकास में जन सामान्य की भागीदारी जितनी तेजी से बना सकेंगे, देश की समुन्नति उतनी ही तेज गति से संभव होगी । देश की प्रगति और लोकभाषा में सकल जन संप्रेषण क्षमता के बीच सीधा संबंध है । आज जितनी आवश्यकता इंजीनियरी, मेडिकल, प्रबंधन के विशेषज्ञ प्रशिक्षकों की है, उतनी ही महत्ता है इन विषयों के लोकभाषा हिन्दी में प्रस्तुति संप्रेषण की भी । जो विशेषज्ञ सरकार, उद्योग, शिक्षा-संस्थाओं में कार्यरत हैं, उनके लिए लोकभाषा हिन्दी में संप्रेषण प्रशिक्षण योजना चलाई जाए, आवश्यक प्रशिक्षण सामग्री तैयार कराई जाए, और इन विषयों में हिन्दी में लेखों / पुस्तकों के प्रकाशन को प्रोत्साहित किया जाए । अधिक से अधिक टैक्नोलॉजी संगोष्टियां आयोजित की जाएँ जिनका माध्यम व्यावहारिक हिन्दी हो । सरकार से वित्त पोषित सभी संगोष्ठियों और कार्यशालाओं में कम से कम 30% चर्चाएँ / प्रस्तुतियाँ हिन्दी में हों ।

 


प्रयोजनमूलक हिन्दी का पाठ्यक्रम
  प्रयोजनमूलक हिन्दी के बी.ए. (स्नातक) और एम.ए. (स्नातकोत्तर) पाठ्यक्रम उत्तर और दक्षिण के राज्यों के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों तथा IGNOU में चलाए जा रहे हैं ।


बी.ए./एम.ए. के बाद रोजगार संभावनाएं :
 
स्वयं रोजगार : ट्यूटर, स्वतंत्र अनुवादक/दुभाषिया, भाषिक इंटरफेस ।
 

वैतनिक रोजगार : हिन्दी अनुवादक/दुभाषिया, उद्घोषक (टी.वी., रेडियो), हिन्दी रिपोर्टर, स्वागत डेस्क पर सहायक, कंप्यूटर सहायक ।


बी.ए. (प्रयोजनमूलक हिन्दी) का प्रस्तावित  पाठ्यक्रम
    प्रति सेमेस्टर

   विषय    पेपर   अंक   वर्ष-1   वर्ष-2    वर्ष-3

प्रयोजनमूलक हिन्दी 2 2X50 200 200 200
अंग्रेजी 1 50 100 100 100
अन्य भाषा/विषय 1 50 100 100 100
----------------------------------------------------------------------
200 400 400 400
----------------------------------------------------------------------


 

प्रयोजनमूलक हिन्दी के 12 पेपर इस प्रकार प्रस्तावित है:

सेमेस्टर 1.1
पेपर 1 : व्यावहारिक हिन्दी व्याकरण और वार्तालाप – पाणिनी वर्ण सारणी, वर्तनी, शब्द-युग्म, प्रयुक्तियाँ, पारिभाषिक वाक्यांश  
पेपर 2 : IT-1 सूचना टैक्नोलॉजी – (विहंगम परिचय, शब्द संसाधन, स्प्रैडशीट, डेटाबेस, प्रेजेंटेशन, ओ सी आर, संक्षेपण), कंप्यूटर अनुप्रयोग एवं इंटरनेट सेवाएं
प्रोजेक्ट : टंकण, आशुलिपि

 


सेमेस्टर 1.2
पेपर 3 : राजभाषा नीति एवं कार्यालयी हिन्दी
पेपर 4 : वाणिज्यिक, बैंकिंग एवं व्यापारिक हिन्दी
प्रोजेक्ट : सरकारी कार्यालयों एवं उद्योगों में प्रशिक्षण भ्रमण


सेमेस्टर 2.1
पेपर 5 : IT-2 विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी – विहंगमदृष्टि (ओवरव्यू) एवं तकनीकी हिन्दी (इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट)
पेपर 6 : टिप्पणी, रिपोर्ट लेखन चर्चा, संक्षेपण
प्रोजेक्ट : कंप्यूटर पर रिपोर्ट तैयार करना

सेमेस्टर 2.2
पेपर 7 : IT-3 सुबोध अनुवाद (इंटेलीजेंट ट्रांसलेशन) एवं संप्रेषण जाँच
पेपर 8 : मीडिया जन संचार एवं विज्ञापनिक हिन्दी
प्रोजेक्ट : दूरदर्शन, रेडियों और प्रकाशन केन्द्रों का प्रशिक्षण-भ्रमण

 


सेमेस्टर 3.1
पेपर 9 : आशु अनुवाद (इंटरप्रेटेशन) (संक्षेपण, विस्तारण, संपादन, चर्चा-सार)
पेपर 10 : स्व-व्यवसाय प्रशिक्षण (एंट्रेप्रेन्यूरशिप प्रोजेक्ट योजना)
प्रोजेक्ट : कार्यालयीन, वाणिज्यिक, तकनीकी, मीडिया जनसंचार हिन्दी लेखन व अनुवाद /    अनुसृजन की केस स्टडी

सेमेस्टर 3.2
 

पेपर 11 : कंटेंट क्रिएशन,  शब्द-संहिता (लेक्सिकॉन), अनुवाद प्रारूप और शैली सुधार
पेपर 12 : IT-4 इंडस्ट्री में ट्रेनिंग (क्षेत्र-विशेष में टिप्पणी, प्रतिवेदन, अनुवाद, संप्रेषण क्षमता)
प्रोजेक्ट : हिन्दी व्यवहार तंत्र डिजाइन पर थीसिस (पेपर 12 के आधार डेटा का विश्लेषण, सिस्टम (तंत्र) डिजाइन और कंप्यूटर से रिपोर्ट

 

एम.एम. (प्रयोजनमूलक हिन्दी) का पाठ्यक्रम

बी.ए. के बाद एम.ए. की उच्च शिक्षा पाने का भी प्रावधान हो ।  प्रयोजनमूलक हिन्दी में बी.ए. देने वाले कॉलेजों की कुल संख्या की 20 प्रतिशत संख्या के कॉलेजों में प्रयोजनमूलक हिन्दी में एम.ए. के प्रशिक्षण की भी सुविधा उपलब्ध हो । IT-1 का पूर्व ज्ञान अपेक्षित है ।  एम.ए. (प्रयोजनमूलक हिन्दी) का पाठ्यक्रम इस प्रकार प्रस्तावित है:

 

सेमेस्टर 1.1
पेपर 1 : कार्यालयी, वाणिज्यिक, तकनीकी और जन संचार हिन्दी
पेपर 2 : IT-2 प्रौद्योगिक विहंगम परिचय  और केस स्टडी का तुलनात्मक अध्ययन


सेमेस्टर 1.2
पेपर 3 : IT-3 अनुवाद / अनुसृजन केस स्टडी
पेपर 4 : आशु अनुवाद केस स्टडी
प्रोजेक्ट : हिन्दी व्यवहार में अनुवाद/लेखन की संप्रेषणीयता का मापन
 


सेमेस्टर 2.1
पेपर 5 : अंतरराष्ट्रीय राजनयिक और व्यापार अनुबंध
पेपर 6 : IT- योजित भाषा शिक्षण, अनुवाद एवं लेखन
 


सेमेस्टर 2.2
पेपर 7 : IT-4 इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग
पेपर 8 :  विस्तृतकेस स्टडी (क्षेत्र विषयक)
प्रोजेक्ट : थीसिस (इंडस्ट्री से सह-गाइड)

 


पाठ्यक्रम की विशेषताएं
 

वर्ष में दो सेमेस्टर, 2 पेपर प्रति सेमेस्टर, इस प्रकार बी.ए. में 12 पेपरों (प्रश्न पत्रों) का प्रावधान, और एम.ए. में 8 पेपरों का ।  पाठ्यक्रम में चार IT प्रश्न पत्रों का समावेश है जिससे रोजगार मिलने, बदलने और स्वयं कुछ कर सकने की उद्यमिता  क्षमता पैदा होगी ।

 


IT-1  इन्फोर्मेशन टैक्नोलॉजी (सूचना प्रौद्योगिकी)


  कंप्यूटर-कम्यूनिकेशन और सूचना माध्यम के एकीकरण से इन्फॉर्मेशन टैक्नोलॉजी का तेजी से विकास हो रहा है। हिन्दी व्यवहार में इसकी जानकारी और अनुप्रयोगों का अभ्यास आवश्यक हो गया है। वर्ड प्रोसेसिंग, डेटाबेस डिजाइन, स्प्रैडशीट, इंटरनेट सर्विस, वेब सर्विस आदि सूचना संसाधन के प्रभावी साधन (टूल्स) है।

 


IT-2  इंट्रोडक्शन-टु-टैक्नोलॉजी (प्रौद्योगिकी विहंगम परिचय)
 

टैक्नोलॉजी जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित कर रही है। प्रयोगशाला से जन सामान्य तक की टैक्नोलॉजी का यात्रा काल उत्तरोतर वर्षों से घटकर माह और माह से घटकर सप्ताह तक होने लगा है। ऐसी स्थिति में इंजीनियरी, मेडिकल और मैनेजमेंट की टैक्नोलॉजी के विहंगम परिचय मदद मिलेगी।


IT-3  इंटेलिजेंट ट्रांसलेशन (संबोध अनुवाद)
 

सुबोध अनुवाद हिन्दी व्यवहार को लोकप्रिय बनाने और बढ़ाने के लिए आवश्यक है। शब्दानुशब्द अनुवाद बोझिल और अटपटा बन पड़ता है। पाठक के स्तर और विषय स्पष्टता को ध्यान में रखकर अनुवाद को सुबोध, उपादेय और भाव संप्रेषणीय बनना आवश्यक है। विधि (कानून) के क्षेत्र को छोड़कर अन्य कई बड़े-बड़े क्षेत्रों में सुबोधता और संप्रेषणीयता पर बल देना प्राथमिक आवश्यकता है। अनुवाद की संप्रेषणीयता जांच के उपायों से भी छात्रों को अवगत कराया जाए। सुबोध अनुवाद के साथ अनुसृजन की ओर भी प्रेरित किया जाए। अनुसृजन से उपादेयता बढ़ेगी।


IT-4 इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग

व्यावहारिक ज्ञान और विविध प्रचलित पद्धतियों की जानकारी के लिए सरकारी कार्यालयों, वाणिज्यिक, वाणिज्यिक बैंक और व्यापार केन्द्रों, तकनीकी विकास संस्थानों और जन संचार केन्द्रों के प्रशिक्षण-भ्रमण से हिन्दी व्यवहार की समस्याएँ, नवीन उपायों/पद्धतियों की जानकारी हो सकेगी। इससे हिन्दी व्यवहार के समस्या के समाधान की क्षमता पैदा होगी।

शोध की नई दिशाएं  - प्रयोजनमूलक हिन्दी में ( एम.फिल./पीएच.डी. )

 


तकनीकी हिन्दी
 
1. हिन्दी के लिए टैक्नोलॉजी विकास का इतिहास

2. कंप्यूटर से हिन्दी भाषा शिक्षण
3. कंप्यूटर से हिन्दी भाषा विश्लेषण और संप्रेषणीयता का आकलन
4. सुबोध अनुवाद (इंटेलिजेंट ट्रांसलेशन) – सिद्धांत, संप्रेषणीयता एवं मूल्यांकन
5. मशीनी अनुवाद – प्रारूप लेक्सिकॉन निर्माण, प्रयोक्ता – मशीन संवाद
6. हिन्दी में इंटरनेट – समस्याएँ, संभावनाएँ और समाधान
7. हिन्दी की बेसिक तकनीकी शब्दावली
8. हिन्दी के लिए  टैक्नोलॉजी–वैविध्य का अध्ययन  
9. विज्ञान एवं  तकनीकी लेखन की समालोचना/समीक्षा
10. तकनीकी विषयक शब्दावली एवं प्रयुक्तियों की समीक्षा
11. प्रमुख वैज्ञानिकों की जीवनी एवं संस्मरण संग्रह


 

वाणिज्यिक हिन्दी
 
1. हिन्दी में इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स – समस्याएँ, संभावनाएँ और समाधान

2. वाणिज्यिक, बैंकिंग, व्यापार में हिन्दी व्यवहार – बाजार प्रसार
3. हिन्दी की बेसिक वाणिज्यिक शब्दावली की समीक्षा
4. हिन्दी प्रयोग और वाणज्यिक लाभ – एक अध्ययन
5. पर्यटन में हिन्दी संवाद
6. प्रमुख उद्योगपतियों की जीवनी एवं संस्मरण संग्रह

 


प्रशासनिक हिन्दी

1. हिन्दी में इलेक्ट्रॉनिक गवर्नेंस

2. हिन्दी को बेसिक प्रशासनिक शब्दावली की समीक्षा
3. हिन्दी व्यवहार और प्रशासनिक सक्षमता
4. हिन्दी में कार्यरत प्रशासक – परिचय एवं संस्मरण संग्रह

 


जनसंचार की हिन्दी
 
1. दूरदर्शन पर हिन्दी प्रयोग – विश्लेषण, समाज पर प्रभाव और नीति

2. रेडियों पर हिन्दी प्रयोग – विश्लेषण , प्रभाव और नीति
3. मल्टीमिडिया  गेम्स और एनिमशन फिल्मों में हिन्दी प्रयोग
4. इंटरनेट एवं सोशल नेटवर्किंग पर हिन्दी प्रयोग
5. हिन्दी में सुबोध इंटेलिजेन्ट सूचना लेखन/उद्घोषणाएँ
6. जनसंचार की हिन्दी : संक्रमण काल में
7. जनसंचार में श्रेष्ठ रचनाएँ

 


अन्य
 
1. स्कूलों में व्यावसायिक (वोकेशनल) शिक्षा में हिन्दी प्रयोग – स्वरूप एवं सिद्धांत

2. सार्क (SAARC) , नैम (NAM) और संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी प्रयोग – समस्याएँ व समाधान
3. विदेशी छात्रों के प्रशिक्षण की विधाएँ
4. मशीनी अनुवाद की व्यापारिक संभावनाएँ
5. मशीन सह मानव अनुसृजन
6. राष्ट्रीय भाषायी नीति समीक्षा
 


और आगे सार में ...
मानव-मशीन की परस्परता  और निर्भरता बढ़ रही है । लेकिन मानव-मानव संबंधों में शिथिलता आ रही है ।  बेरोज़गारी बढ़ी है ।  नई सोच की जरूरत है, जिससे मानव को रचनात्मकता और नवाचार में प्रौद्योगिकी / मशीन की मदद आसानी से मिल सके ।  प्रौद्योगिकी और संस्कृति (Technology and Culture) का वृहद क्षेत्र प्रशस्त किए जाने की आवश्यकता है । सरकार ने 2010-2020 दशक को नवाचार दशक ( डिकेड ऑफ इन्नोवेशन ) घोषित किया है । आम आदमी की  नवाचारयुत  भागेदारी आवश्यक है । ब्रेन ड्रेन की अपेक्षा ब्रेन ड्रॉप  अर्थात् कुंठित प्रतिभा बहुत अधिक है । ब्रेन ड्रॉप को लोकभाषा के माध्यम से प्रशिक्षण देकर ही ब्रेन गेन में बदल सकते हैं । भारत में वैज्ञानिक सोच के साथ साक्षरता का नितांत अभाव  है, प्रतिद्वंदता और उद्यमता की भी कमी है ।


सूचना प्रौद्योगिकी से योजित प्रयोजनमूलक हिन्दी (IT-enabled Functional Hindi) का विकास एवं प्रयोग संवर्धन आधुनिक सामाजिक तंत्र की नितांत आवश्यकता है । मुक्त अर्थव्यवस्था के संदर्भ में प्रयोजनमूलक हिन्दी उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ाने के लिए व्यापारी वर्ग के लिए आवश्यक है, साथ ही राजतंत्र में सामाजिक मूल्यों की रक्षा करते हुए प्रयोजनमूलक हिन्दी का विकास आवश्यक है । इसमें प्रशिक्षित लोग महत्वपूर्ण इंटरफेस का काम करेंगे । शिक्षकों को ट्रेनिंग देनी होगी । सरकारी कार्यालयों, वाणिज्य केन्द्रों, तकनीकी शोधशालाओं में प्रशिक्षणार्थियों के लिए प्रशिक्षण भ्रमण कार्यक्रमों का समन्वयन करना होगा । प्रस्तावित बी.ए. और एम.ए. के पाठ्यक्रमों में IT-1: इन्फोर्मेशन टैक्नोलॉजी, IT-2: इंट्रोडक्शन-टु-टैक्नोलॉजी, IT-3: इंटेलिजेंट ट्रांसलेशन, IT-4: इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग प्रस्तावित हैं । इससे कम्प्यूटर पर कार्य निपुणता, विविध प्रौद्योगिकी का विहंगम परिचय और उद्योगों में विमर्श विधि का परिचय बहुत उपयोगी होगा । प्रयोजन मूलक हिन्दी साहित्य की स्वस्थ समीक्षा भी आवश्यक है । मूल्यांकन 3 स्तरों पर हो – वाक्य-पदीय, शैली, सामाजिक मूल्य समावेशन । हिन्दी के लिए विविध सॉफ्टवेयर बने हैं, कई ऑपेन डोमेन में हैं । उन सभी में संगतता / कंपेटिबिलिटी नहीं है, टैक्नोलॉजी–वैविध्य का अध्ययन और समाधान निकालने की आवश्यकता है । सरकारी सहायता से बनी बेसिक टैक्नोलॉजी प्राइवेट कंपनियों को भी मुफ्त / सांकेतिक कीमत पर मिलें जिससे विविधतापूर्ण उपलब्धि सर्वत्र सुलभ हो । टोल-फ्री तकनीकी सहायता केन्द्र हो, जहां से तुरंत मदद मिल सके ।




 

संदर्भ :
1. ओम विकास, ‘हिन्दी का वर्तमान और भविष्य की दृष्टि’, गर्भनाल,  जनवरी 2010,  अंक 38,  पृष्ठ 4-6
2. ओम विकास, ‘बहुभाषिकता : संदर्भ सिमटती दूरियाँ सूचना क्रांति में’, गवेषणा, 2010
3. ओम विकास, ‘भाषा, राजतंत्र, टैक्नोलॉजी और व्यापार’, विज्ञान गरिमा सिंधु, वर्ष 1999, अंक 29, पृष्ठ 22-30
4. ओम विकास, ‘हिन्दी के विकास में टैक्नोलॉजी का योगदान’, प्रयोजनमूलक हिन्दी विशेषांक, गवेषणा, 67-68/1996/55-60
5. ओम विकास, ‘मशीनी अनुवाद की समस्याएँ’ (अनुवाद, सं. डॉ. नागेन्द्र), 1993
6. ओम विकास, ‘तकनीकी हिन्दी का विकास : शोध की नई दिशाएँ’, गवेषणा के.हि. संस्थान, 1984, राजभाषा तकनीकी विशेषांक 1984, तकनीकी हिन्दी का विकास कार्यशाला, रूड़की, 1984
7. ओम विकास, ‘विज्ञान और हिन्दी प्रयोग की संभावनाएँ’, तकनीकी हिन्दी का विकास कार्यशाला, रूड़की, 1984
8. ओम विकास, ‘हिन्दी के प्रचार-प्रसार में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का प्रयोग’, तकनीकी रिपोर्ट, इलेक्ट्रॉनिकी विभाग, 1984
9. ओम विकास, ‘तकनीकी हिन्दी का प्रादुर्भाव’ इलेक्ट्रॉनिकी भारती, इलैक्ट्रॉनिकी विभाग, अक्तूबर, 1983
10. ओम विकास, ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हिन्दी अनुवाद’, बहुभाषिक अनुवाद संगोष्ठी, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, फरवरी, 1983 (प्रो. आर. एन. श्रीवास्तव का ‘अनुवाद सिद्धांत’ और प्रो. भोलानाथ तिवारी की ‘वैज्ञानिक सामग्री का अनुवाद’) में पुन: प्रकाशित)
11. ओम विकास, ‘तकनीकी लेखन का माध्यम हिन्दी’, अनुवाद त्रैमासिक, जन-मार्च 1984, पृ. 60-65

भारत में अन्तरिक्ष युग का उदय : मौलिक विज्ञानलेखन

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गतांक पर उठे कुछ प्रश्नों के समाधान तिवारी जी ने ईमेल से सीधे प्रश्नकर्ताओं को भी यद्यपि भेज दिए हैं पुनरपि उन शंकाओं के उत्तर उस आलेख से अगली इस कड़ी के साथ भी देने की अनिवार्यता के कारण प्रथम उन उत्तरों को ही देखें, पश्चात अगली कड़ी को यहाँ प्रश्नोत्तर के नीचे  पढ़ें |  


सत्यनारायण शर्मा कमल जी ने  हिन्दी-भारत याहूसमूह  में ईमेल द्वारा  पूछा था -
 क 
 डा० रघुनाथन ने क्वेसार से निकले तापक्रम की जब खोज की थी  बताया जा रहा है की उस समय ब्रह्माण्ड  की आयु आज की पंचमांश थी | यह कथन  समझ में न आया |

क्या ब्रह्माण्ड की आयु में डा० रघुनाथन के प्रयोगों के समय से अब तक की अल्पावधि में ब्रह्माण्ड की आयु पंचगुनी बढ़ गई है ? ऐसा संभव तो नहीं लगता | इसका स्पष्टीकरण आवश्यक है |
कमल 

प्रश्नोत्तर  हैं

१) 
डा० रघुनाथन ने क्वेसार से निकले तापक्रम की जब खोज की थी  बताया जा रहा है की उस समय ब्रह्माण की आयु आज की पंचमांश थी | यह कथन समझ में न आया |

उत्तर : आज ब्रह्माण्ड की आयु १३.७ अरब वर्ष है, अत: उस समय उसकी आयु २.७ अरब वर्ष थी.

२)
क्या ब्रह्माण्ड की आयु में डा० रघुनाथन के प्रयोगों के समय से अब तक की अल्पावधि में ब्रह्माण्ड की आयु पंचगुनी बढ़ गई है ? ऐसा संभव तो नहीं लगता | इसका स्पष्टीकरण आवश्यक है |
उत्तर :  उपरोक्त उत्तर से इस शंका का भी निवारण हो जाता है. पंचमांश कहने का अर्थ उसकी शिशुता के  बोध को दर्शाना था कि इतनी कम आयु में ऐसा हुआ. क्वेसार ब्रह्माण्ड कि शैशव अवस्था में अधिक मिलते हैं..

धन्यवाद कि आपने यह प्रश्न पूछा क्योंक शायद अन्य के मन में ऐसे प्रश्न हो सकते हैं.
विश्व मोहन तिवारी 

 ख
अर्कजेश ने पूछा -

लेकिन आइन्स्टीन को नोबेल पुरस्कार फोटो इलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट पर मिला था, जिसका आधार क्वांटम सिद्धान्त था। न कि ई = एमसी स्क्वायर पर । 

उत्तर :  
अर्कजेश का कथन सत्य है।
उऩ्हें नोबेल पुरस्कार प्रकाश विद्युत प्रभाव पर ही मिला था।शायद यहाँ यह बतलाना उचित होगा कि ई = एम सी स्क्वएअर सूत्र का उऩ्होने प्रकाश विद्युत प्रभाव वाले प्रपत्र भेजने के तुरंत बाद ही उसी के सिद्धान्त पर आविष्कार किया था। और उसे तुरंत ही प्रकाशन के लिये भेज दिया था इस अनुरोध के साथ कि उसे प्रकाश विद्युत प्रभाव के प्रपत्र के साथ ही प्रकाशित किया जाए। किन्तु तब तक वह प्रपत्र प्रकाशित हो चुका था अतएव वह एक स्वतंत्र प्रपत्र के रूप में प्रकाशित हुआ। 

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भारत में अन्तरिक्ष युग का उदय



मानव जाति का अन्तरिक्ष में विचरण आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की महानतम उपलब्धि है। इससे पहले अन्तरिक्ष सम्बन्धी अनेक किंवदन्तियाँ तथा काल्पनिक अथवा पौराणिक कथाएँ प्रचलित थीं।ऋग्वेद के दसवें मंडल के एक सौ इक्कीसवे सूक्त का दूसरा मंत्र जो अर्थ देता है, उस पर सहसा विश्वास नहीं होता। उसका जो भाष्य मैंने किया है उसे मानक अर्थ के बाद दिया है : पहला मानक अर्थ‘जहाँ सूर्य चंद्रादि पिण्ड विद्यमान हैं, जहाँ सूर्य रश्मियो का क्षय नहीं होता, ऐसे अन्तरिक्ष में चमकरहित विशिष्ट गेरुए वस्त्र धारण कर, मुनि वायु की रस्सी द्वारा प्रदत्त संवेग के अनुसार गमन करते हैंमेरा भाष्य - जहाँ  सूर्य चंद्रादि पिण्ड विद्यमान हैं, जहाँ वातावरण न होने के कारण सूर्य की रश्मियों का क्षय नहीं होता, ऐसे अन्तरिक्ष में सूर्य किरणो को सोखकर, उनसे सौर पटलो की तरह अधिकांश ऊर्जा सोखने वाले चमकरहित विशिष्ट गेरुए स्पेस धारण कर मुनि निर्गत गैसो का रस्सी के समान अथार्त निर्गत गैसो के बल का उपयोग कर गमन करते हैं।



वैदिक युग में राकैट की अभिकल्पना :

     इस मंत्र के अर्थ में आधुनिक विज्ञान के मूलभूत सिद्वान्त छिपे लगते हैं। ‘सूर्यरश्मियों का क्षय नहीं होता’ इससे दो अर्थ निकल सकते हैं, एक तो यह कि ऊर्जा का विनाश नहीं होता और दूसरा यह कि जैसे प्रकाश किरणों का पृथ्वी पर वायुमण्डल के कारण क्षय होता है, वैसा क्षय अन्तरिक्ष में नहीं होता अथार्त वहाँ शून्य है। ‘मुनि वायु की रस्सी के द्वारा’ इसका अर्थ अतिशक्तिशाली रॉकेटो के प्रमोचन को देखने के पहले वैज्ञानिक ढंग से समझ में नहीं आता। किन्तु जिसने भी उपग्रहो का रॉकेट द्वारा प्रमोचन देखा है वह समझ जायेगा कि रॉकेट वास्तव में निर्गत गैसो (वायु की रस्सी) पर कैसे चढ़ता है। इस अर्थ की पुष्टि आगे फिर होती है – ‘वायु द्वारा प्रदत्त संवेग के अनुसार गमन करते हैं’ अथार्त रॉकेट से निर्गत गैसें जो प्रतिक्रिया (वेग तथा दिशा में) रॉकेट को देती हैं, रॉकेट उसी के अनुसार गमन करता है। यहाँ न्यूटन का तीसरा नियम लग रहा है जो कहता है कि प्रत्येक क्रिया की ठीक बराबर ही प्रतिक्रिया होती है। इस अर्थ की गहराई पर सहसा विश्वास नहीं होता, इसे पुष्ट करने के लिए और भी शोध की आवश्यकता है कि क्या उऩ्हे सच ही न्यूटन के इस तीसरे नियम का ज्ञान था



अन्तरिक्ष में यात्रा करने के लिए हमें यह अहसास तो होना चाहिए कि अन्तरिक्ष में जो नक्षत्र टिमटिमा रहे हैं वे मात्र प्रकाश–पिण्ड नहीं हैं वरन उनमें लोको की संभावना है। यह अनुभूति तो हमारे ऋषियों को विश्व में सर्वप्रथम हुई किन्तु तब भी यह अन्तरिक्ष के विभिन्न लोकों में विचरण की कथाएँ मिथक ही हैं, वे मिथक चाहे मिथक के रूप में प्रातिभ रुप से अत्यंत शक्तिशाली क्यो न हो। यह भी कम आश्चर्य नहीं कि उन्हें समय के सापेक्ष होने का स्पष्ट आभास भी था। हमारे हजारों वर्ष पुराने मिथको में अन्तरिक्ष यात्राओं के वर्णन के बरअक्स यूनान में ईसा की दूसरी शती में सामीसटा के लूसियन ने चन्द्रयात्रा पर पूर्णत: काल्पनिक व्यंगात्मक पुस्तिका लिखी थी। बारहवीं शती में भास्कराचार्य ने पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति के होने की घोषणा की थी किन्तु वह एक वैचारिक अवधारणा थी चाहे वह कितनी भी अद्भुत, मौलिक एवं क्रांतिकारी थी। उन्होने गुरुत्वाकर्षण को गणितीय नियमो में पूर्णत: व्याख्यायित नहीं किया था।



न्यूटन का अंतरिक्ष में प्रवेश :  
जो नियम न्यूटन (1642–1727) ने सत्रहवीं शती में खोजे थे वह पृथ्वी पर होने वाली घटनाओं के लिए पूर्ण सत्य उतरते थे किन्तु पृथ्वी से थोड़ी दूर, उदाहरणार्थ बुध ग्रह की गतियो के लिए भी वे कामचलाऊ हो जाते थे। पूर्ण परिशुद्धता के लिए बीसवीं शती में आइन्स्टाइन द्वारा खोजे गए नियमो की आवश्यकता थी, बिना इन नियमों की जानकारी के अन्तरिक्ष में निकटतम पिण्ड चन्द्र तक भी यात्रा नहीं की जा सकती। अतएव अब तक की वैज्ञानिक सोच समझ से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि पुरातन शास्त्रो, मिथको, महाकाव्यो में वर्णित विमान तथा अन्तरिक्ष यात्राएं यथार्थ नहीं कल्पना अथवा मिथक हैं, जिनका उस पुरातन काल में वर्णन अद्वितीय कल्पना शक्ति के होने को प्रमाणित अवश्य करता है।



प्रौद्योगिकी को कितना उन्नत होना चाहिए अन्तरिक्ष में उड़ान भरने के लिए, उसका अनुमान रॉकेटों से तो लगता ही है, एक और छोटी सी बात से भी लगता है कि एक प्रक्षेपकयान में 5–6 लाख कलपुर्जे होते हैं और इनका संयोजन जटिल होता है। आज के अन्तरिक्ष उड़ान की नींव, ऐसा कह सकते हैं, लगभग एक हजार वर्ष पूर्व पड़ी थी जब बारूद से उड़ने वाला रॉकेट बना। हम गर्व से कह सकते हैं कि विस्फोटक पदार्थों का निर्माण भारत में ईसा से 200 वर्ष पूर्व हो चुका था। शुक्रनीति ग्रन्थ में अग्नि चूर्ण नाम से इसका वर्णन है। रॉकेट विज्ञान के विषय में निश्चित प्रमाण भारत में नहीं मिलते यद्यपि अग्नि बाण अथवा अग्नि–आयुधो की चर्चा पुराणो में मिलती है। 1232 ई. में चीन के होनान प्रांत की राजधानी काई फैंग को जब मंगोलो ने घेर लिया था तब चीनियो ने प्राथमिक रॉकेट तथा बमो का उपयोग किया था और इसके तुरंत बाद ही रॉकेट यूरोप में उपयोग किए गए थे। मानव की अन्तरिक्ष में विचरण करने की मिथकीय एवं उदात्त महत्वाकांक्षा, तथा पिछली शताब्दी की चांद तक उड़ने की मूखर्तापूर्ण लगने वाली कथाएं अब अदम्य साहसी वास्तविकता में बदल चुकी हैं और साहसी एवं जिज्ञासु मानव की ज्ञान–पिपासा को पूर्ण करने के लिए अब अन्तरिक्ष खुल गया है। यही शुद्ध जिज्ञासा मनुष्य के ज्ञानवृद्धि के विकास एवं सभ्यता के विकास की आधारशिला है। विज्ञान–गल्प और तथ्य साहित्यिको की कल्पना की उड़ानें यदा–कदा बाद में वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक तथ्य बन जाते हैं। सन् 1865 में जूल्सवर्न ने ‘पृथ्वी से चन्द्र तक’ नामक उपन्यास लिखा और उसमें जो अनुमान उसने लगाए उनमें से अनेक बाद में सत्य निकले। इसके कुछ वर्षों बाद एक और लेखक एडवर्ड हेल ने सन् 1870 में ‘ब्रिकमून’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें उसने पहली बार कृत्रिम उपग्रहो की स्थापना की बात की और सुझाया कि इनका उपयोग समुद्र यात्रा में दिक्–संचालन के लिए किया जा सकेगा। सन् 1901 में एच. जी. वैल्स की प्रसिद्ध पुस्तक ‘चन्द्र पर पहला आदमी’ आई।



विज्ञान का अंतरिक्ष में प्रवेश : 
सन 1895 में एक रूसी वैज्ञानिक तथा गणित के शिक्षक त्सिओलकोव्स्की ने एक आलेख प्रकाशित किया था, जिसमें उसने सर्वप्रथम ठोस ईंधन के स्थान पर तरल ईंधन के उपयोग को अधिक प्रभावी सिद्ध किया। उसने अन्तरिक्षयानों के अभिकल्प सिद्धान्त स्थापित किए तथा बहुत लम्बी अन्तरिक्ष यात्राओं के लिए अन्तरिक्षयानो में आक्सीजन प्राप्त करने के लिए पौधो के उगाने का भी सुझाव दिया। अमेरिका में गोडार्ड ने भी स्वतंत्र रूप से इसी दिशा में क्रांतिकारी अनुसंधान किए तथा नवीन रॉकेटो की रचना की । सन् 1926 में उसने सर्वप्रथम तरल–ईंधन का उपयोग करने वाले रॉकेट का प्रमोचन किया। बाद में एक आलेख में चन्द्र तक पहुँचने की संभावना दर्शाई। लगभग इसी काल में एक जर्मन आविष्कारक गांसविन्ट ने प्रमोदन का नया तरीका सुझाया और वह पहला वैज्ञानिक है जिसने रॉकेटो द्वारा पृथ्वी से ‘पलायन–वेग’ (वह वेग जिसे प्राप्त कर रॉकेट या अन्तरिक्षयान पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के बाहर जा सकते हैं। यह वेग 40,000 किमी प्रति घंटा या 11 किमी प्रति सैकेंड है) की संभावना की वैज्ञानिक चर्चा की।सन 1928 में त्सिओल्कोवस्की ने सौरमंडल में भ्रमण की भविष्यवाणी की गोडार्ड , त्सिओल्कोवस्की तथा वॉन ब्राउन की त्रिमूर्ति को अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी का पायोनियर माना जाता है। रॉकेट प्रौद्योगिकी ने सबसे अधिक प्रगति द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी में वान ब्राउन के नेतृत्व में की। वी–2 रॉकेट के निर्माता वान ब्राउन ने अमेरिका जाकर महत्वपूर्ण कार्य किए और फिर निर्माण हुआ भयंकर अन्तर्महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों का यथा पोलेरिस, माइन्यूटमैन, पोज़ाइडान आदि का । इन्हीं अन्तर्महाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रो का अन्तरिक्षयानो के लिए अभिवर्धक (बूस्टर इंजन) की तरह उपयोग किया गया । पृथ्वी की सतह से लगभग 400–500 किमी की ऊँचाई अर्थात वायुमंडल के बाद अन्तरिक्ष ही अन्तरिक्ष माना जाता है। मौसम की जानकारी के लिए भी रॉकेटों का उपयोग सन् 1946 से प्रारंभ हुआ। परिज्ञापन रॉकेट द्वारा वायुमंडल में तापक्रम, दबाव, वायुवेग इत्यादि गुणों को मौसम की जानकारी के लिए मापा जाता है।



थुम्बा गाँव का अंतरिक्ष : 
भारत में सन् 1963 में संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता से अरब सागर के तट पर त्रिवेन्द्रम शहर से 10 किलोमीटर दूर थुम्बा भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रमोचन केन्द्र स्थापत किया गया। चुम्बकीय भूमध्यरेखा के अत्यन्त समीप होने के कारण इस स्थान से पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का अध्ययन करना एक विशेष महत्व रखता है। थुम्बा से सर्वप्रथम अमेरीका से प्राप्त रॉकेट, नाइक–अपाची को 21 नवम्बर, 1963 को प्रमोचित किया गया। थुम्बा के इस प्रमोचन स्थल को सन् 1968 में संयुक्त राष्ट्र संघ को समर्पित किया गया। भारत में रोहिणी शृंखला के अनेक मॉडल के परिज्ञापन रॉकेटों का विकास किया गया, जिनमें से प्रमुख हैं आर. एच.–200, आर. एच–300 एवं आर. एच–560। इसमें आर. एच. अक्षरों को रोहिणी शब्द के लिए प्रयोग किया गया, तथा साथ अंक में दी गयी संख्या रॉकेट के व्यास (मिलीमीटर में) का सूचक है। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन का विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केन्द्र (थिरुअनन्तपुरम) परिज्ञापन रॉकेटों के विकास का मुख्य केन्द्र है। यहाँ के विकसित रॉकेटों का उपयोग जर्मनी, इंग्लैड, रुस, फ्रांस, जापान तथा बुल्गेरिया के वैज्ञानिकों ने किया है । सन १९९८ तक यहाँ से 500 से अधिक राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रयोग सम्पर्क हो चुके हैं। शार केन्द्र से 6 अप्रैल, 1997 को रोहिणी शृंखला के मॉडल के समुन्नत रॉकेट का प्रमोचन किया । यह नवीनतम उच्च–क्षमतावाला रॉकेट अपनी प्रायौगिक उड़ान में 102 किलोग्राम नीतभार 464 किलोमीटर की ऊँचाई तक ले गया । आर. एच. – 200 की क्षमता 10 किलोग्राम नीतभार को 75 किलोमीटर तक तथा आर. एच.–300 की क्षमता 60 किलोग्राम ऊँचाई तक ले जाने की है।





‘अन्तरिक्ष–युग’ : 
  4 अक्तूबर, 1957 को अन्तरिक्ष–विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली जब सोवियत संघ ने पहला अन्तरिक्ष यान ‘स्पुतनिक–1’ अन्तरिक्ष में भेजा। कुछ ही महीनो के अन्दर, जनवरी 1958 में अमेरिका ने भी एक उपग्रह ‘एक्सप्लोरर’ अन्तरिक्ष में भेजा। इसके बाद तो सिलसिला चल पड़ा और अन्तरिक्ष में विभिन्न प्रकार के उपग्रहो की बाढ़ सी आ गई। फ्रांस, जापान, चीन, ब्रिटेन और भारत आदि देशो ने भी अन्तरिक्षयान बनाए और अन्तरिक्ष में पदार्पण किया। बाद में विशेष प्रयोजनो के लिए विशिष्ट उपग्रहो का विकास किया गया। पृथ्वी तथा जीव की उत्पत्ति, मौसम, प्राकृतिक विपदाओं की पूर्व—सूचना, संचार व्यवस्था, टी. वी. प्रसारण सेवा, आसूचना एकत्र करना, सामरिक सर्वेक्षण तथा निरीक्षण इत्यादि कार्यों में उपग्रह प्रणाली ने क्रांति ला दी। आज उपग्रह–संचार–व्यवस्था ने इस विशाल विश्व को एक गांव–सा बना दिया है। वह दिन दूर नहीं जब भारत में एक सुदूर गांव में बैठा व्यक्ति सैकड़ो–हजारो मील दूर वांछित व्यक्ति से केवल फोन पर बात ही नहीं कर सकेगा, वरन पर्दे पर उसका चित्र भी देख सकेगा–जैसे आमने–सामने वार्तालाप हो रहा हो। विदेशो में तो वीडियो फोन की सुविधा उपलब्ध हो ही गई है। अत: इस युग को ‘अन्तरिक्ष–युग’ कहना उचित है। सन 1945 में विज्ञान कथाकार आर्थर क्लार्क ने लिखा था कि यदि भू–स्थिर कक्षा में समान दूरी पर मात्र तीन उपग्रह स्थापित कर दिए जाएं तो विश्व भर में दूरसंचार संभव हो सकेगा। उसने जो स्वप्न देखा था, वह तब पूरा हुआ जब उसकी इस सोच को कार्यान्वित कर सन 1964 में एक साथ लाखो अमरीकी घरो में '(रियल टाइम ) तत्काल टी. वी.' पर टोकियो ओलम्पिक देखा गया।



भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम :   
भारत ने अन्तरिक्ष अनुसंधान के कार्यक्रम का शुभारंभ सन् 1957 में किया। इस दिशा में प्रथम प्रयास था नैनीताल स्थित वेधशाला में प्रकाशीय अनुवर्तन केन्द्र की (टेलिस्कोप द्वारा उपग्रहों का अनुवर्तन करना) स्थापना। इस छोटी सी शुरूआत के बाद भारतीय वैज्ञानिको ने 23 वर्ष की अवधि में ही 18 जुलाई 1980 को रोहिणी–1, का प्रमोचन कर अन्तरिक्ष खोज की दौड़ में भारत को विकसित राष्ट्रो की श्रेणी में पहुँचा दिया। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम की योजनाबद्ध शुरूआत सन 1961 में हुई जब ‘परमाणु ऊर्जा आयोग’ में ‘अन्तरिक्ष अनुसंधान अनुभाग’ की स्थापना हुई। सन् 1969 में इसने एक विशाल संस्था का रूप ले लिया और उसका नाम रखा गया ‘भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन’ (इण्डियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइज़ेशन–आई.एस.आर.ओ.–इसरो)। सन् 1962 में ‘भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान अनुभाग’ ने थुम्बा ‘भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रमोचन केन्द्र’ का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया। सन् 1963 में थुम्बा में ‘अन्तरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केन्द्र’ की स्थापना हुई। सन् 1972 में ‘अन्तरिक्ष आयोग’ (स्पेस कमीशन) की स्थापना हुई। 1972 से 1976 तक विभिÙ वैमानिक दूर–संवेदन प्रयोग किये गये।



19 अप्रैल, 1975 को भारत ने सोवियत संघ की सहायता से अपना पहला उपग्रह आर्यभट्ट छोड़ा और उसके बाद जून 1979 में भास्कर–1 का प्रमोचन हुआ। 18 जुलाई 1980 को इसरो ने भारत भूमि से एस. एल. वी–3 की सहायता से रोहिणी–1 उपग्रह छोड़ा। सन् 1980 तक भारत ने विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयुक्त उपग्रहों के विकास की दिशा मैं पर्याप्त योग्यता प्राप्त कर ली थी परन्तु रॉकेट के विकास में हमारी क्षमता सीमित ही रही। उपग्रह प्रमोचन के क्षेत्र में हम अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग पर ही निर्भर रहे। थुम्बा में ‘भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रमोचन केन्द्र की स्थापना’, ‘उपग्रह प्रशिक्षण टी. वी – प्रयोग’ (सैटेलाइट इन्स्ट्रक्शनल. टी. वी. एक्सपैरीमेन्ट्स–साइट), ‘सिम्फोनी दूर–संचार प्रयोग’ (सिम्फोनी टेलीक्म्युनीकेशन एक्सपैरीमैन्ट–स्टैप), ‘आर्यभट्ट’, ‘भास्कर–प्रथम’ तथा ‘द्वितीय’, आई. आर. एस. श्रेणी उपग्रह, ‘एपल’, तथा ‘इन्सैट’ श्रेणी के उपग्रह छोड़ने में विभन्न देशों का सहयोग रहा। उनमें विशेष हैं अमरीका, सोवियत यूनियन, फ्रांस, जर्मनी तथा यूरोपियन स्पेस एजेन्सी। प्रारम्भिक समय में भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम की उन्नति में तत्कालीन सोवियत संघ ने विशेष सहायता की। भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम के लिए नब्बे का दशक अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।



मई 1994 में ए एस. एल. वी.–डी 4, अक्तूबर 1994 में – पोलार सैटेलाइट लांच व्हीकिल–पी. एस. एल. वी.–डी2, दिसम्बर 1995 में इन्सैट–2 सी, मार्च 1996 में पी. एस. एल. वी.–डी 3 के प्रमोचन। ए. एस. एल. वी. – डी 4 ने 115 किलोग्राम का एक उपग्रह निम्न–भू कक्षा में स्थापित किया तथा उसके प्रमोचन सम्बन्धी सभी तकनीकी कलपुर्जों का सफल परीक्षण किया। ए. एस. एल. वी. की पहली दो (1987 तथा 1988 की) असफलताओं तथा 1992 की आंशिक सफलता के पश्चात यह एक अत्यन्त हर्ष का विषय था।



दिसम्बर 1995 में इन्सैट–2सी, जून 1997 में इन्सैट–2डी, अप्रैल 1999 में इन्सैट–2 मई के सफल प्रमोचन से भारत की अन्तरिक्ष–प्रौद्योगिकी में चार चाँद लग गए। सन् 1993 में पी. एस. एल. वी–डी 1 का प्रथम परीक्षण भी असफल रहा था पर अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने हिम्मत न हारी। अक्तूबर 1994 में 283 टन के 44 मीटर लम्बे पी.. एस. एल. वी –डी 2 ने 870 किलोग्राम के भारतीय सुदूर – संवेदन उपग्रह (इण्डियन रिमोट सैन्सिंग सैटैलाइट) आई.. आर. एस. को 817 किलोमीटर ऊँची पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करके विश्व में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। ऐसी क्षमता केवल चार अन्य राष्ट्रों (रुस, पश्चिमी यूरोप, चीन, तथा अमरीका) में ही विकसित है।



मार्च 1996 में पी. एस. एल. वी. –सी 1 द्वारा आई. आर. एस. – 1 डी का प्रमोचन करके इस श्रेणी के उपग्रहों के प्रमोचन के लिए भारत की विदेशी निर्भरता समाप्त हो गई।



मई 1999 में पी. एस. एल. वी–सी 2 द्वारा एक साथ तीन उपग्रहों (दो विदेशी ) को अन्तरिक्ष में स्थापित करके विश्व में एक अग्रणी राष्ट्र हो गया। इस प्रमोचन से भारत ने इस प्रौद्योगिकी को वाणिज्यक रूप दिया।



अप्रैल २००१ में ‘भू–समकालिक उपग्रह प्रमोचनयान’ (जियोसिन्क्रोनस सैटैलाइट लांच व्हीकिल) १. के द्वारा जी सैट १ का सफ़ल प्रमोचन किया गया जिसका नियत भार था १५३० किग्रा. और इसने उस उपग्रह को ३६००० किमी. की ऊँचाई पर स्थापित किया। इसके बाद अनेक बेहतर उपग्रहों के प्रमोचन किए गए।



जनवरी २००७ की विशेषता थी कि ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान सी ७ के द्वारा चार उपग्रहो का एक साथ प्रमोचन किया गया था, जिसमें एक तो हमारा कार्टोसैट् २ था, दो विदेशी थे, और एक अति विशिष्ट प्रयोग था - अंतरिक्ष संपुट (कैप्स्यूल) के अंतरिक्ष से लौटने के पश्चात वातावरण में उसका पुनर्प्रवेश। इसी जनवरी माह उस पुनर्प्रवेश संपुटिका को सफ़लतापूर्वक बंगाल की खाडी में उतारा गया और मार्च में इन्सैट ४ बी और अप्रैल २००७ में इटली के एक खगोलीय उपग्रह का सफ़ल प्रमोचन भी किया गया । सितम्बर माह में इन्सैट ४ सी आर की सफ़ल स्थापना की ।


२००८ अत्यंत विशिष्ट था : एक उपग्रह तो वाणिज्य अनुबन्ध के अनुसार स्थापित किया गया, दूसरा, ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान के द्वारा १० उपग्रहो का एक साथ प्रमोचन किया गया । और इसी वर्ष इतिहास में स्वर्ण अक्षरो से लिखा जाने वाला 'चन्द्रयान' का सफ़ल प्रमोचन किया गया । यद्यपि चन्द्रयान अपना पूरा जीवन नहीं जी सका किन्तु उसने अल्प काल में ही अधिकांश कार्य कर लिया था, और् उसने चन्द्रयान २ के लिये भारत को बहुत उपयोगी जानकारी दी।



२००९ के अप्रैल माह में ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान 'सी १२'के द्वारा २ उपग्रहॊं का, और सितंबर माह में एक साथ ७ उपग्रहो का प्रमोचन किया गया ।



भारत निकट भविष्य में इज़राइलियो के लिये एक समुन्नत खगोलीय उपग्रह का प्रमोचन करने वाला है। चन्द्र की परिक्रमा करने के बाद अब भारत की 'आदित्य' उपग्रह के द्वारा सूर्य की परिक्रमा करने की भी योजना है।



भारत उपग्रह के अंतरिक्ष की दौड में अग्रिम पन्क्ति में आ गया है । अन्तरिक्ष अनुसंधान में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग .आनिवार्य है क्योकि इस ‘अन्तरिक्ष यान – पृथ्वी’ पर हम सब अन्तरिक्ष के यात्री हैं। अन्तरिक्ष सहयोग को पारस्परिक सामरिक स्पर्धा से पृथक रखना आवश्यक है। क्या हम आशा करें कि अन्तरिक्ष अनुसंधान तथा उपग्रह की उड़ानें सभी देशो के लिए शांति तथा सह–अस्तित्व की स्थापना करेंगी। प्रत्येक देश का आम नागरिक एक दूसरे की सहायता करने को तत्पर है, स्वयं शांति चाहता है तथा दूसरो के लिए शांति की कामना करता है। कोई युद्ध नहीं चाहता। कोई नहीं चाहता कि प्रेक्षपास्त्रो या बमो से मानव जाति का विनाश हो, परन्तु इसके लिए सभी देशो में लालच के स्थान पर आवश्यकता, प्रतियोगिता के स्थान पर सहयोग, तथा भय के स्थान पर प्रेम का होना आवश्यक है।



अन्तरिक्ष प्रयोगशालाएँ : 
अन्तरिक्ष स्टेशनो को अन्तरिक्ष प्रयोगशालाएँ, अन्तरिक्ष प्लेटफार्म आदि कई नामो से जाना जाता है। ये वे बड़े–बड़े यान हैं, जो लगातार पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं और इनके अन्दर कई यात्री महीनो तक कई तरह के प्रयोग कर अत्यन्त उपयोगी जानकारियां इकठ्ठी करते हैं। इन स्टेशनो की मुख्य विशेषता यह भी है कि इनमें ‘डॉकिंग’ (आपस में जुड़ने) की सुविधा है। पृथ्वी से भेजे यान इनसे जुड़ जाते हैं और साजो–सामान और यात्रियो की अदला–बदली के बाद ये यान पृथ्वी पर वापस आ जाते हैं। अन्तरिक्ष में तैरते इन विशाल भवनो का मुख्य उद्देश्य है, अन्तरिक्ष की व्यापक खोज। इनकी सहायता से अनेक वैज्ञानिक प्रयोग किये जाते हैं। प्रतिकूल स्थितियो में मनुष्यो, पौधो, जानवरो, और जीव–जन्तुओं पर पड़नेवाले प्रभावो का अध्ययन किया जाता है। संक्षेप में कहा जाये तो इन कामो में वे सभी अध्ययन हैं जो कि सुदूर ग्रहो की यात्रा तथा वहाँ मानव बस्तियाँ बसाना संभव बना सकेंगे, और साथ ही इस पृथ्वी की समस्याओं के हल निकालना भी। हालांकि अन्तरिक्ष स्टेशनो को पृथ्वी के इर्द गिर्द स्थापित करने की कोशिश में सोवियत संघ और अमेरिका दोनो प्रयासरत थे, फिर भी सोवियत संघ ने यहाँ भी मैदान मार लिया था किन्तु बहुत बडी कीमत पर । अप्रैल 1971 में रूस ने सल्युत–1 नामक अन्तरिक्ष स्टेशन को स्थापित करने में सफलता पायी। कुछ ही समय बाद सोयुज–11 यान द्वारा तीन यात्री इसमें पहुंचा दिये गये, जिन्होंने 24 दिनो तक मनुष्य व पौधों पर भारहीनता के प्रयोग किये। दुर्भाग्य से पृथ्वी पर वापस आते समय इन यात्रियो की मृत्यु हो गयी। 1972 में सल्युत–2 अन्तरिक्ष में गया, मगर वह भी विस्फोट में नष्ट हो गया। फिर 1984 तक सोवियत संघ ने 5 और स्थापित किये। इनमें सल्युत–4 अन्तरिक्ष में पाँच वर्षों तक रहा जिसमें 16 अन्तरिक्ष यात्रियो ने क्रिस्टल, जैवचिकित्सा तथा खगोल भौतिकी सहित कई महत्वपूर्ण काम किये। सन् 1976 एक बडा कदम सोवियत संघ ने उठाया और इन स्टेशनों में चल रहे प्रयोगों में अपने मित्र देशो के वैज्ञानिकों को भी शामिल किया।




14 मई, 1973 को अमेरिकी अन्तरिक्ष–वैज्ञानिकों ने ‘स्काईलैब’ नाम का स्टेशन अन्तरिक्ष में छोड़ा। तीन–तीन अन्तरिक्ष यात्रियो के तीन दल बारी–बारी से वहाँ गये और क्रमश: 28, 60 तथा 84 दिन रहकर प्रयोग करते रहे। बाद में सौर–झंझावातो के कारण स्काईलैब अपने परिपथ (ऑरबिट) से भटक गया और पृथ्वी के वातावरण में जलकर खाक हो गया। मगर इससे पहले कई प्रयोग सफल हुए और सूर्य की 30,000 तस्वीरें ली गयी। इन प्रयोगों से यह भी पता लगा कि अन्तरिक्ष में मांसपेशियाँ, दिल तथा हड्डडियाँ कमजोर होती हैं और इसके लिए खास व्यायामो की जरूरत है। एक बच्चे के सुझाव पर पता लगाया गया कि 'क्या मकड़ी अन्तरिक्ष में जाला बुन सकती है'। 70 के दशक में ही अमरीका और सोवियत संघ ने कुछ साझे प्रयोग भी किए। इन अन्तरिक्ष – स्टेशनो के बाद सोवियत संघ और अमरीकी प्रयास तो और भी ज्यादा बड़े और महत्वाकांक्षी हो गये। इसके तहत ‘अमेरिकी स्पेसलैब परियोजना’ उल्लेखनीय है, जिसे यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सहयोग में बनाया गया। पहली स्पेसलैब को कोलंबिया द्वारा 28 नबम्बर, 1983 को अन्तरिक्ष में भेजा गया। स्पेसलैब प्रोजेक्ट में बन्दरो, चूहो, मछलियो व मधुमक्खियों पर विशेष अध्ययन हुए। इधर सल्युत शृंखला के बाद सोवियत संघ ने ‘मीर’ नामक स्टेशन को अन्तरिक्ष में बैठा दिया। फरवरी 1986 में भेजे गए इस स्टेशन ने अद्भुत काम किये हैं। मीर 11 वर्षों तक अत्यन्त उपयोगी शोध कार्य करने के बाद जीर्ण—शीर्ण हो गया था। अमेरिका ने एक विशाल स्टेशन स्थापित करने की योजना बनाईम - ‘फ्रीडम’। यह १९८६ में प्रारम्भ की गई ।यह स्टेशन इतना बड़ा होगा कि इसे कई किश्तो में प्रक्षेपित किया जायेगा और अन्तरिक्ष में इन खंडो से समूचा अन्तरिक्ष स्टेशन बनाया जायेगा। किन्तु अरर्बों डालर खर्च करने के बाद 'फ़्रीडम' को १९९३ में बन्द करना पडा । यह स्पष्ट दर्शाता है कि खगोलीय योजनाओं के खर्च भी 'खगोलीय' मात्रा में ही होते हैं । तब भी अन्तरिक्ष स्टेशन आज उन सभी समस्याओं के निदान और समाधान में लगे हैं, जिससे मनुष्य मंगल या अन्य ग्रहों तक जा सकेगा और साथ–साथ पृथ्वी की समस्याओं के वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक हल भी खोजेगा । अन्तरिक्ष में उपग्रह छोड़ने अथवा अन्तरिक्ष से अनचाहे उपग्रह हटाने का भी काम होगा । गौरतलब है कि पौधों की नई किस्म, एकदम गोलाकार कण, अथवा एकदम शुद्ध धातुएँ हमें अन्तरिक्ष ही दे पायेगा।



सोवियत अन्तरिक्षयान में प्रथम भारतीय : 
 भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान के प्रारंभिक चरणों में सोवियत संघ की तकनीकी सहायता अत्यन्त सराहनीय रही है। भारतीय वायु – सेना के स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा तथा विंग कमाण्डर रवीश मेहरोत्रा को मास्को के पास स्थित सोवियत स्टार सिटी में एक लम्बे समय तक प्रशिक्षण दिया गया और अन्तत: राकेश शर्मा को अन्तरिक्ष यात्रा के लिए चुना गया। 13 अप्रैल, 1984 को सोयूज़ टी – 11 नामक अन्तरिक्षयान राकेश शर्मा को ले उड़ा और फलस्वरूप वह अन्तरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय हुए। उन्होंने अन्य सहयात्रियों के सहयोग से सल्युत – 7 में विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोग किए, जिनमें प्रमुख था अन्तरिक्ष में मांसपेशियों की क्षीणता रोकने के लिए योग–आसनों का प्रभाव। उन्होंने चाँदी तथा जर्मेनियम तत्वों को मिला कर एक नई मिश्र धातु का निर्माण किया, जो पृथ्वी पर नहीं हो सकता था। इस मिश्र धातु का उपयोग विद्युत–शक्ति के प्रवाह के लिए विशेष लाभदायक है। उन्होंने भारतवर्ष के साठ प्रतिशत क्षेत्र के चित्र भी खींचे। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से दूर–संचार के माध्यम से बातचीत भी की।और 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' गीत भी गाया .




स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा की अन्तरिक्ष यात्रा के तेरह वर्ष बाद डा. कल्पना चावला को भारतीय मूल की प्रथम महिला (प्रथम एशियाई महिला भी) अन्तरिक्षयात्री होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। करनाल (हरियाणा) में जन्मी कल्पना ने सन् 1982 में चंडीगढ़ से इंजिनियरी तथा सन् 1988 में कोलोरैडो (अमरीका) से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की । सन 1994 में अन्तरिक्ष अभियान के लिए नासा द्वारा 3000 अभ्यार्थियों में से चुने गये 19 विशिष्टों में से वह एक थीं। टेक्सास के जोनसन अन्तरिक्ष केन्द्र में इस विषम कार्य के लिए उन्होंने गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। डा चावला ने अभियान विशेषज्ञ की हैसियत से 19 नवम्बर, 1997 को भारतीय समयानुसार प्रात: 1:16 बजे कोलम्बिया एस. टी. एस. – 87 अन्तरिक्ष शटलयान में 16 दिनों की अन्तरिक्ष यात्रा के लिए प्रयाण किया । यह कोलम्बिया शटलयान की 88 वीं अन्तरिक्ष यात्रा थी। सोलह दिनो की यात्रा के पश्चात वह पाँच अन्य सहयात्रियो के साथ आवश्यक वैज्ञानिक परीक्षण करके पृथ्वी पर सकुशल वापस आ गयीं। इस अभियान का मुख्य ध्येय अन्तरिक्ष के सूक्ष्म–गुरुत्वीय (माइक्रो ग्रैविटी) वातावरण में विभिन्न पदार्थों के विभिन्न गुणो का अध्ययन करना था। यद्यपि पृथ्वी पर संबन्धित प्रयोग तो किये जा चुके थे पर विचार था कि पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण संभवत: प्रायौगिक परिणामो में कुछ आंशिक त्रुटि रह गई हो। अन्तरिक्षयान की भारहीनता के वातावरण में संभव है कि भौतिक गुणो तथा प्रक्रियाओं के बारे में कुछ अतिरिक्त जानकारी प्राप्त हो सके जो पृथ्वी पर संभव न हुई हो, जिससे अनुसंधानकर्त्ता को नयी राह दिखे तथा प्रकृति के कुछ अन्य गूढ़ रहस्य खुलें। इस कार्य के लिए कोलम्बिया शटलयान पृथ्वी से 10 लाख मील तथा सूर्य से 920 लाख मील दूरी पर था, जोकि ऐसा स्थान है जहाँ पृथ्वी तथा सूर्य दोनो की गुरुत्वाकर्षण शक्तियों का प्रभाव एक दूसरे को निरस्त कर देता है।


मालदीव में भारतीय सहायता से उपग्रह टी. वी सेवा मालदीव के शहर ‘माले’ में भारतीय दूरदर्शन ने 7. 5 मीटर का ‘एस –बैंड’ एन्टैना लगाया है जिससे वहाँ उपग्रह द्वारा प्रसारित टी वी कार्यक्रम देखना संभव हो सका है। दूरदर्शन अपने नैटवर्क में प्राय: 6.1 मीटर का ‘डिश एन्टैना’ लगाते हैं पर उन्होंने माले के लिए विशेष रूप से एक बड़ा एन्टैना विकसित किया जिसके द्वारा मालदीव में प्राप्त क्षीण टी वी संकेत भी ग्राह्य हों। यह भारतीय दूरदर्शन के लिए किसी भी अन्य देश के लिये प्रथम परियोजना थी।



सोवियत अन्तरिक्ष स्टेशन मीर में अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री : विश्व के इतिहास में पहली बार नासा के एक अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री नार्मन थेगार्ड को कज़ाकिस्तान के बैकोनूर अन्तरिक्ष केन्द्र से सोयूज़ नामक रूसी राकेट द्वारा 14 मार्च, 1995 को अन्तरिक्ष यात्रा पर भेजा गया। साथ में दो रूसी अन्तरिक्ष यात्री, व्लादिमीर डेजुरोव तथा गेनाडी स्ट्रेकलोव भी थे। इस यान से वे अन्तरिक्ष में स्थापित ‘मीर अन्तरिक्ष केन्द्र’ गए और तीन माह तक वैज्ञानिक प्रयोग करते रहे। अन्तरिक्ष में पूर्व-स्थापित सल्युत नामक प्रयोगशाला में कार्यरत लोगों को ‘मीर’ में स्थानान्तरित करने के लिए ‘मीर’ का केन्द्रीय सारभाग फरवरी, 1986 अन्तरिक्ष में भेजा गया था, जो कि पिछले लगभग ग्यारह वर्षों से पृथ्वी की उसी कक्षा में है। सोयूज़ निश्चित समय पर पृथ्वी की कक्षा में घूमते हुए मीर के समीप आया, अन्तरिक्ष यात्रियों ने मीर से अपने यान को जोड़ने से सम्बन्धित यंत्रों की जाँच की और यान का दरवाजा खोल कर तैरते हुए मीर में चले गए। सारी प्रक्रिया स्वचालित थी। मीर में पहले से उपस्थित तीन अन्तरिक्ष यात्रियों ने भी उल्लासपूर्वक सोयूज यान को धीरे–धीरे अपने समीप आते देखा। व्लादीमीर पोल्याकोव, (जो उस समय मीर में एक वर्ष से अधिक समय से थे) के लिए विशेष रूप से यह एक हर्ष का क्षण था। विश्व में अन्तरिक्ष में सर्वाधिक समय तक रहने का उन्होंने कीर्तिमान स्थापित किया है। अमेरिकी अन्तरिक्ष यात्री, थैगार्ड, मीर पर जाने वाले 44 वें व्यक्ति तथा 13 वें विदेशी थे। मीर (का अर्थ शान्ति) अन्तरिक्ष प्रयोगशाला में 1997 फरवरी में एक आक्सीजन उत्पादन संयंत्र में आग लग गई, जिससे अन्तरिक्ष स्टेशन में धुँआ हो गया था। इसको ठीक करने के बाद मार्च 1997 में दोनों आक्सीजन उत्पादन संयंत्रों ने फ़िर काम ही बन्द कर दिया। अप्रैल 1997 में पहले शीतकरण संयंत्र में त्रुटि आ गयी, जिससे मीर के अन्दर का तापक्रम यकायक बढ़ गया और अन्तरिक्ष यात्रियो को साँस लेने में भी कष्ट होने लगा, फिर वायु–शुद्धिकरण संयंत्र में त्रुटि आ गई। 25 जून, 1997 को तो एक बड़ी अप्रत्याशित दुर्घटना घटी। ‘प्रोग्रेस’ आपूर्ति यान, जो पृथ्वी से मीर के लिए आवश्यक सामग्री ले गया था, डाकिंग के समय टकरा गया, जिससे मीर के माड्यूल में एक छेद हो गया। अन्तरिक्ष यात्रियों ने उस छेद के रिसन को शीघ्रता से बन्द तो कर दिया परन्तु इस प्रयास में मीर अन्तरिक्ष स्टेशन को विद्युत–ऊर्जा आपूर्ति करने वाली केबल का सम्बन्ध–विच्छेद हो गया। इसकी मरम्मत करने के अथक प्रयास किये गये। भू–केन्द्र में विभिन्न तरीके सोचे गये जिन्हें अन्तरिक्ष में कार्यान्वित करने का प्रयास किया गया। चूँकि इस यान में एक अमरीकी अन्तरिक्ष यात्री भी था, रूस के अतिरिक्त अमरीका में भी बड़ी खलबली मची। सभी परेशान थे कि मीर कैसे ठीक किया जाए और अन्तरिक्ष–दल को कैसे बचा कर पृथ्वी पर वापस लाया जाए। इसी बीच मीर के कम्प्यूटर में भी खराबी आ गयी। इस बूढ़े मीर को अब तक अन्तरिक्ष में रखने के फैसले पर भी प्रश्नवाचक चिन्ह लगने लगे। रूसी वैज्ञानिकों ने हौसला रखा तथा इस कार्य को करने के लिए अगस्त 1997 में दूसरा अन्तरिक्ष–दल मीर भेजा और पुराने दल को पृथ्वी पर वापस बुला लिया। इस नये दल ने मीर को अपने साथ ले गए उपकरणों की सहायता से ठीक कर लिया। अक्तूबर 1997 में अमरीकी सहयात्री माइकेल फोल पृथ्वी पर सकुशल वापस आ गये। अक्तूबर 1997 में ही एक मानव–रहित अन्तरिक्ष–यान, प्रोगेस एम –36 नये कम्प्यूटर, विभिन्न वैज्ञानिक उपकरण, ईंधन, पेयजल तथा अन्य सामग्री लेकर मीर पहुँचा। इन सभी उपकरणों की सहायता से मीर फिर से कार्यशील हो गया। मीर का दूसरा अर्थ 'विश्व' भी‌है। विश्व में यह अकेला अन्तरिक्ष–स्टेशन है और अपने समय का सबसे विशाल था। इसमें विभिन्न राष्ट्रों के अन्तरिक्ष यात्रियो को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। रूस में जनवरी 1999 में हुए फैसले के अनुसार मीर का जीवन काल तीन वर्ष और बढ़ा दिया गया था क्योंकि इस पर होने वाले व्यय की जिम्मेदारी कुछ व्यक्तिगत संस्थाओं ने ले ली है। इसे पुन: जीवन दान दिया गया और अन्त में २३ मार्च २००१ को इस वयोवृद्ध मीर को सेवानिवृत्त किया गया। इसे अंतरिक्ष परिपथ से हटाया गया और दक्षिणी प्रशान्त महासागर में इसे जल समाधि दी गई ।




अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन :  
 मुख्यत्: यह यूएस ए की पहल से १९९८ से प्रारम्भ किया गया अंतर्राष्ट्रीय (रूस, यूरोप, कैनेडा तथा जापान आदि ) सहयोग से निर्मित विश्व का विशालतम (इसे हम बिना दूरबीनों के भी रात्रि में देख सकते हैं) अन्तरिक्ष अनुसंधान स्टेशन है, यद्यपि इसका निम्न भू कक्षा (२७८ से ४६० किमी.ऊपर) में ही निर्माण किया जा रहा है जिसके २०११ तक पूरे होने की योजना है । इसके सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में होने वाले अनुसंधान के क्षेत्र होगे - जैव शास्त्र, मानव जैव शास्त्र, भौतिकी, खगोल शास्त्र, मौसमविज्ञान। इसमें स्वभावत: अन्तरिक्ष यानों की सुरक्षा, उनकी दक्षता तथा विश्वसनीयता के परीक्षण भी होंगे। किसी भी अन्तरिक्ष यान के लिये यह तीन गुण अत्यंत मह्त्वपूर्ण हैं। कुछ उदाहरण दिये जा रहे हैं. अभी तक के अनुसंधान से यह निष्कर्ष निकला है कि दीर्घ कालीन अंतरिक्ष यात्रा के बाद यदि दिक्चालक (एस्ट्रोनाट) किसी ग्रह पर उतरेंगे तब उनकी अस्थियो के टूटने का खतरा अधिक होगा । इसमें जो दूरचालित पराश्रव्य क्रम्वीक्षण (अल्ट्रासाउन्ड् स्कैन) का अनुसंधान किया गया है उसकी जानकारी से दिक्चालकों को तो लाभ होगा ही, भूस्थित रोगियों को भी बहुत लाभ होगा। भू वातावरण में एरोसोल, ओज़ोन, वाष्प और ऒक्साइड के प्रभावों को परखा जाएगा। और निश्चित ही ब्रह्माण्ड किरणों, अन्तरिक्ष धूल, प्रति पदार्थ, अदृश्य पदार्थ आदि पर अनुसंधान होंगे । ऐसा नहीं है कि अन्तरिक्ष कार्यक्रमो का उपयोग केवल रक्षा विभाग तथा अत्यंत समृद्ध देशो की विलासिता की निशानी है; इसके अनेकनेक उपयोग समान्य जन को भी मिल रहे हैं और मिलेंगे । भारत को इस दिशा में प्रयत्नशील रहना आवश्यक है, क्योकि आज के विश्व में जो भी देश अनुसंधान में पिछड गया वह पिछडा ही रहेगा ।



इस प्रकार का संयुक्त अन्तरिक्ष कार्यक्रम, वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान–वर्धन के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग तथा मित्रता के अनूठे उदाहरण हैं। अन्तरिक्ष के रहस्योद्घाटनो के लिए परस्पर सहयोग अत्यन्त आवश्यक है। विश्व की महाशक्तियों के मध्य स्पर्धा व द्वेष समाप्त हो जाने से आशा है कि भविष्य में इस सहकारिता की दिशा में निरन्तर प्रगति होगी, और रक्षा विभाग पर कम खर्च होगा ।



द्यौ शान्ति:, अन्तरिक्षं शान्ति:, पृथिवी शान्ति:



विश्वमोहन तिवारी, पूर्व एयर वाइस मार्शल
ई 143/21, नौएडा 201301







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