"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

" - हिन्दी भारत - " (भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों, हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ), भाषिक मंतव्यों, जीवनमूल्यों, पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु) ***** हिन्दी भारत ***** "

बीबीसी हिन्दी (व अन्य)की विष्णुप्रभाकर जी के सम्बन्ध में भारी भूल

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कई लोगों ने आज बीबीसी हिन्दी पर इस समाचार को देखा होगा

जिसका आरम्भ कुछ यों है -

"साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का निधन

जाने-माने हिंदी साहित्यकार पद्म विभूषण विष्णु प्रभाकर का
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शनिवार को दिल्ली में निधन हो गया. पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के एक अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था.

विष्णु प्रभाकर 97 वर्ष के थे. उनके परिवार में उनकी दो बेटियाँ और दो बेटे है. विष्णु प्रभाकर का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा क्योंकि उन्होंने मृत्यु के बाद अपना शरीर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को दान करने का फ़ैसला किया था.

उन्हें उनके उपन्यास अर्धनारीश्वर के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था. उनका लेखन देशभक्ति, राष्ट्रीयता और समाज के उत्थान के लिए जाना जाता था.

उनकी प्रमुख कृतियों में 'ढलती रात', 'स्वप्नमयी', 'संघर्ष के बाद' और 'आवारा मसीहा' शामिल हैं. इनमें से 'आवारा मसीहा' प्रसिद्ध बंगाली उपन्यासकार शरतचंद्र चटर्जी की जीवनी है जिसे अब तक की तीन सर्वश्रेष्ठ हिंदी जीवनी में एक माना जाता है.

विष्णु प्रभाकर का जन्म 29 जनवरी 1912 को उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर ज़िले के मीरापुर गाँव में हुआ था. उनकी माता महादेवी एक शिक्षित महिला थीं जिन्होंने अपने समय में परदा प्रथा का विरोध किया था.

हिंदी में प्रभाकर

उनकी पहली नौकरी एक चतुर्थ श्रेणी की थी और उन्हें मात्र 18 रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था. उन्होंने अपनी इस नौकरी के साथ पढ़ाई भी जारी रखी और हिंदी में प्रभाकर और हिंदी भूषण की डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने अंग्रेज़ी में भी स्नातक किया.

बाद में अपनी नौकरी के साथ ही उन्होंने एक नाटक कंपनी में भी भाग लिया और 1939 में 'हत्या के बाद' नामक एक नाटक लिखा जो उनका पहला नाटक था.

बीच में कुछ समय के लिए उन्होंने लेखन को अपना पूरा समय दिया. उन्होंने 1938 में सुशीला नामक युवती के साथ विवाह किया.

स्वतंत्रता के बाद उन्होंने 1955 से 1957 तक आकाशवाणी, नई दिल्ली में ड्रामा निर्देशक के रूप में काम किया. वर्ष 2005 में उन्होंने राष्ट्रपति भवन में दुर्व्यवहार होने का आरोप लगाते हुए अपना पद्मविभूषण सम्मान लौटाने की बात कही थी."


आश्चर्य अत्यन्त दुःख की बात है कि उपर्युक्त समाचार में "पद्मविभूषण "जाने कितने बजे से यहाँ ऐसे ही लगा है और किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। समाचार में लाल रंग से बोल्ड किए शब्दों को ध्यान से पढ़िए। इनमें बताया गया है कि प्रभाकर जी को पद्म विभूषण सम्मान दिया गया जबकि तथ्य कुछ और हैं। मैंने अभी देखा तो तुंरत जो टिप्पणी उन्हें शिकायत के रूप में क्षमा माँगने के लिए कहते हुए लिखी, उसे अभी तक बीबीसी द्वारा पारित नहीं किया गया। आप उसकी एक कॉपी नीचे देख सकते हैं



" विष्णु प्रभाकर जी के देहावसान के समाचार में आपने एक भारी भूल की है।
विष्णु प्रभाकर जी को पद्मविभूषण नहीं अपितु पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया था।

भले ही पद्म सम्मानों की साईट पर जा कर देख लें,या अपने यहाँ के २००५ में छ्पे समाचार की आवृत्ति कर लें। यह राष्ट्रीय मानापमान का मामला है, आपको क्षमा माँगते हुए तुरन्त सुधार करना चाहिए"
. वा.



मेरे उक्त तथ्य की पुष्टि के लिए आप निम्न आधिकारिक साईट पर देख सकते हैं-

This page in Hindi (External website that opens in a new window)

Padma Bhushan Awardees

Search Awardees

Showing 141 to 150 of 1003

  • Shri Madurai Thirumalai Nambi Seshagopalan
    Arts : 2004 : India : Tamil Nadu
  • Dr. Smt. N. Rajam
    Arts : 2004 : India : Uttar Pradesh
  • Smt. Poornima Arvind Pakvasa
    Social Work : 2004 : India : Gujarat
  • Prof. Sardara Singh Johl
    Science & Engineering. : 2004 : India : Punjab
  • Shri Soumitra Chatterjee
    Arts : 2004 : India : West Bengal
  • Shri Thoppil Varghese Antony
    Civil Service : 2004 : India : Tamil Nadu
  • Shri Tiruvengadam Lakshman Sankar
    Civil Service : 2004 : India : Andhra Pradesh
  • Shri Vishnu Prabhakar
    Literature & Education : 2004 : India : Delhi
  • Shri Yoshiro Mori
    Public Affairs : 2004 : Japan :
  • Shri Ammannur Madhava Chakyar
    Arts : 2003 : India : Kerala



ऐसी ही स्थिति और ग़लत जानाकारियोम की उपस्थिति नेट पर और कई जगह है, जहाँ जगह जगह `आवारा मसीहा' को उनकी अपनी जीवनी बताया गया है , यहाँ तक कि हिन्दी विकीपीडिया तक पर भी ऐसी ही चूक आज दोपहर तक चली रही थी।जो परिवर्तन मैंने किए उन्हें यद्यपि अब पूरी तरह हटाया जा चुका है,हिन्दीभारत के गत लेख के सन्दर्भ सहित|



ऐसे ही तीसरी घटना - इस लिंक पर जाकर देखें तो पाएँगे कि यहाँ उनका नाम तक प्रभाकरन कर दिया गया है और आवारा मसीहा को `उनकी' जीवनी बताया गया है। कुछ अंश देखें -

Prabhakaran was born on January 29, 1912 in the Mirapur village of Muzaffarnagar district in Uttar Pradesh.

Writer of over 50 published works, Dr Prabhakaran had written novels, plays and story collections in his lifetime.

A unique characteristic of his works is that it had elements of patriotism, nationalism and messages of social upliftment.

Dr Prabhakar was awarded Padma Bhushan and the Sahitya Akademi Award for his novel Ardhanarishvara (The Androgynous God or Shiva).

He had also won lot of acclaim for his biography ''Awara Maseeha''. (ANI)


यहाँ भी मैंने टिप्पणी करके भूल सुधार के लिए आग्रह किया है, किंतु अभी तक न तो सुधार किया गया है व न ही टिप्पणी को ही पारित किया गया है।

आप भी यदि हिन्दी के इन कृती लेखक के प्रति अपना ऋण चुकाने की भावना रखते हैं तो कृपया ऐसे लिंक खोजिए उन्हें भूल सुधार के लिए बाध्य करिएताकि आने वाली पीढियों को नेट खंगालने पर हिन्दी के ऐसे अमर साहित्यकार तक की जानकारी भ्रामक, झूठी, अधूरी, अंतर्विरोधों से भरी ग़लत मिले। शायद इसी तरह हम अपने मन का बोझ कुछ कम कर सकें।


- कविता वाचक्नवी





विष्णु प्रभाकर जी की पार्थिव देह दान की गई

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विष्णु प्रभाकर जी का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर जिले के मीरापुर गाँव में २९ जनवरी १९१२ को हुआ। पिता दुर्गाप्रसाद धार्मिक व रूढ़िवादी संस्कारों वाले थे जबकि माता महादेवी कुल की सबसे अधिक पढ़ी-लिखी स्त्री थीं, जिन्होंने पारम्परिक हिन्दू परिवार में घूँघट प्रथा का विरोध करने का साहस दिखाया।


विष्णु प्रभाकर जी ने १२ वर्ष की आयु तक प्राईमरी शिक्षा मीरापुर में ही रह कर ली। पश्चात् उनकी माता जी ने उन्हें तत्कालीन पंजाब के हिसार ( अब हरयाणा में ) में उनके मामा के पास भेज दिया, जहाँ १९२९ में १६ वर्ष की आयु में इन्होंने मैट्रिक उतीर्ण किया। मीरापुर के अपने परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण आगे पढ़ने की अपनी इच्छा को इन्हें विराम देना पड़ा। मामा की सहायता से एक सरकारी नौकरी ली, जिसका वेतन उन दिनों मात्र १८ रुपए हुआ करता था। अपनी पढ़ाई को समानान्तर जारी रखते हुए इन्होंने हिन्दी से प्रभाकर व हिन्दीभूषण की उपाधि अर्जित की,साथ ही संस्कृत से प्राज्ञ भी किया। तत्पश्चात अंग्रेज़ी में बी.ए.भी हुए।


नौकरी व शिक्षार्जन के मध्य अपनी साहित्यिक रुचि को बनाए रखते हुए ये हिसार में एक नाटक कम्पनी से भी जुड़े़। १९३९ में इनका पहला नाटक ‘हत्या के बाद’ लिखा गया। २७ वर्ष की वय तक मामा के परिवार के साथ ही रहे व १९३८ में सुशीला प्रभाकर जी से वैवाहिक बन्धन में बँधे। विष्णु प्रभाकर जी के दो पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं।


इस बीच भी कुछ समय ये पूर्णकालिक लेखन से जुड़े रहे। कहानियाँ, उपन्यास, नाटक व यात्रा वृतान्त विधाओं में विष्णु प्रभाकर जी ने अमर साहित्य रचा है।


स्वातंत्र्योत्तर भारत में (सितम्बर १९५५ से मार्च १९५७ तक) इन्होंने नाटक -निर्देशक के रूप में आकाशवाणी दिल्ली में कार्य किया। तत्पश्चात् वे पूर्णत: पूर्णकालिक लेखक के रूप में कार्य करने लगे।


२००५ में राष्ट्रपति भवन के कर्मचारियों के दुर्व्यवहार के परिणामस्वरूप जब इन्होंने अपने पद्मभूषण को लौटाने की इच्छा व्यक्त की तो तत्कालीन राष्टपति अब्दुल कलाम ने स्वयं आकर इन्हें सम्मानित किया। किसी भी हिन्दी लेखक के स्वाभिमान का ऐसा उदाहरण २१वीं शती की पीढ़ी के सामने कोई दूसरा नहीं है।


इनके उपनाम प्रभाकर बनने के पीछे एक रोचक कथा है। वस्तुत: मीरापुर के प्राईमरी विद्यालय में इनका नाम विष्णु दयाल के रूप में दर्ज़ हुआ। पश्चात् आर्यसमाज के विद्यालय में वर्ण पूछे जाने पर इन्होंने अपना वर्ण वैश्य बताया, तो वहाँ इनका नाम विष्णु गुप्ता के रूप में लिख लिया गया। सरकारी नौकरी में आने पर अधिकारी ने अपनी सुविधा के लिए इनका नाम विष्णु धर्मदत्त इसलिए लिख दिया क्योंकि वहाँ पहले से ही कई विष्णु गुप्ता कार्यरत थे।

इन सब के बीच वे अपने लेखकीय नाम विष्णु के रूप में निरन्तर लेखन करते रहे। एक बार एक सम्पादक द्वारा इतने छोटे नाम के प्रयोग का कारण जानने के लिए हुए वार्तालाप में सम्पादक ने इनकी परीक्षा और उपाधि की बात पूछी व हिन्दी में प्रभाकर उपाधि प्राप्त किए हुए जानकर इनका नाम विष्णु प्रभाकर के रूप में लिखना आरम्भ कर दिया।

विष्णु प्रभाकर जी का समस्त लेखन राष्ट्रीयता, देशभक्ति व सामाजिक उत्थान को समर्पित व्यक्ति का लेखन है।


‘अर्द्धनारीश्वर’ के लिए इन्हें साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया। २००५ में पद्मभूषण से सम्मानित हुए। इसके अतिरिक्त इन्हें सोवियत लैंड नेहरु अवॉर्ड भी प्रदान किया गया।


११ अप्रैल को तड़के दिल्ली के एम्स अस्पताल में इनका स्वर्गवास हो गया।

विष्णु प्रभाकर जी अपनी देहदान करना चाहते थे। अत: उनके पुत्र ने पिता द्वारा व्यक्त इच्छा के कारण एम्स अस्पताल को इनकी पार्थिव देह दान कर दी है।


कृतियाँ

ढलती रात , स्वप्नमयी, नव प्रभात, डॉक्टर, संघर्ष के बाद, प्रकाश और परछाइयाँ, बारह एकांकी, अशोक, जाने-अनजाने, आवारा मसीहा, मेरे साक्षात्कार, मेरा वतन, और पंछी उड़ गया, मुक्त गगन में, एक कहानी का जन्म, पंखहीन (आत्मकथा -३ खंडों में), सुनो कहानी आदि ४० पुस्तकों की रचना की| ३ पुस्तकें अभी प्रकाशनाधीन भी हैं।

`अर्द्धनारीश्वर' तो उर्दू, पंजाबी, तमिल, कन्नड़ व तेलुगु आदि भाषाओं में अनूदित भी हो चुका है।

ईश्वर उनकी पवित्र सात्विक आत्मा को चिर शान्ति प्रदान करे।


सच्चे साहित्यकारों की कापियाँ डाक्साबों से चेक कराने के बजाय......

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च्चे साहित्यकारों की कापियाँ डाक्साबों से चेक कराने के बजाय




प्रवासी हिन्दी साहित्य पर आरम्भ हुई परिचर्चा में आए विचारों की श्रृंखला में इस बा प्रस्तुत हैं, ललित जी के विचार। इस परिचर्चा के प्रसंग, प्रारम्भ आदि के विषय में पूरी जानकारी के लिए भा - तथा प्राप्त विचारों की प्रस्तुति की श्रृंखला में पहले भाग में व्यक्त विचारों को आप भाग - में पढ़ सकते हैं। आप के विचारों की भी प्रतीक्षा है।


प्रवासी हिन्दी साहित्य





कविता जी ने एक ऐसा विषय सामने ला दिया है कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। मैं हिन्दी साहित्य का एक अदना-सा पाठक हूँ। अभी-अभी ईमेल देखा और पहली प्रतिक्रिया लिख रहा हूँ। कविता जी ने "रचनाकार के स्थान के सरोकार" की बात की है। क्यों न प्रवासी की परिभाषा तय करने से पहले हिन्दी पट्टी की ही स्थिति देख ली जाए। महानगरों में रहते हुए अपने सुदूर गाँव, कस्बे, शहर की अतीत की स्मृतियों की सुंदर पैकेजिंग कर और विदेशी साहित्य से कुछ सुंदर चिप्पियाँ लेकर परोसे जाने वाले साहित्य को क्या कहेंगे। 'प्रवासी हिन्दी साहित्य' आदि आदि श्रेणीकरण करते हुए इसे किस श्रेणी में रखेंगे।


साहित्य में "स्थान के सरोकार" रचना में इस ढंग से प्रवेश कर सकते हैं यह नुस्ख़ा यदि तॉल्स्तॉय को पता होता तो उन्हें भेष बदलकर गरीब किसानों के बीच घूमना न पड़ता। या फिर महानगर की साहित्यिक चौपालों में पंचों द्वारा समय-समय पर घोषित प्रेमचंद के उत्तराधिकारियों में से किसी एक का नाम इस समय जेहन में कौंध रहा होता।


भाषा जन-जन की समझ में आने वाली ही हो यह आग्रह समझ से परे है, रचना देश में रची जाए या विदेश में। वह भी हिन्दी भाषा। हिन्दी हो कि हिन्दुस्तानी। उर्दू का प्रयोग। संस्कृत। (वैसे, आंकड़ों के अनुसार आम जन में सुरेन्द्र मोहन पाठक बहुत लोकप्रिय हैं।) निश्चित ही रचना आम जन के सरोकारों, इंसानियत के पक्ष में हो। मैं डाक्साबों, परोफेसरों के हिन्दीवाद का समर्थक नहीं हूँ। लेकिन भाषा की बात हल हो जायेगी। मूलतत्व की तो बात हो।


अब प्रवासी साहित्य पर नजर दौड़ाएँ। दुनिया के महानगरों और कस्बों में फ़र्क करना ही पड़ेगा। अमेरिका, ब्रिटेन आदि और सूरीनाम, फिजी, त्रिनिडाड, गयाना में एक समय ख़ूब चले गीत "चिट्ठी आयी है...वतन से चिट्ठी आयी है..." को एक ही रिस्पॉस मिला होगा, यह कहना कठिन है। बहरहाल...


"सरोकार", जी हाँ सरोकार। यही तय करेगा कि परिभाषा क्या हो। भाषा को निखारने और उसे मानक बनाने का महती कार्य तो हमारा हिन्दी अकादमिक जगत कर ही रहा है। फ़िलवक्त सच्चे साहित्यकारों की कापियाँ डाक्साबों से चेक कराने के बजाय उन्हें छूट दी जाये कि वे इंसानी जीवन की अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी के किसी भी रूप को, माध्यम को अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं।

अभी इतना ही
ललित

Friday, 3 April, 2009 1:29 AM


माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही

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राग दरबारी


माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही





वरुण गांधी की गिरफ्तारी के बाद मायावती और मेनका गांधी के वाग्युद्ध के बारे में पढ़ने के बाद से ही मैथिलीशरण गुप्त के प्रबंध काव्य 'साकेत' की यह पंक्ति बार-बार याद आ रही है -- माता न कुमाता पुत्र कुपुत्र भले ही। यह पंक्ति कैकेयी ने राम को अयोध्या वापस लौट आने की मनुहार करते हुए कही थी। कैकेयी भी उ अयोध्या वासियों में थीं जो राम के वन गमन को रोकने के लिए उनके पीछे-पीछे गए थे। कैकेयी ने आत्मभर्त्सना करते हुए कहा कि 'माता न कुमाता' की मान्यता सदा से ही चली आई है, पर मेरे मामले में उलटा हो गया है। कुमाता मैं हूँ, भरत तो सुपुत्र है। जाहिर है, भरत को गद्दीनशीन करने की जिद के कुपरिणाम कैकेयी ने देख लिए था। सबसे पहले तो वह दो अन्य रानियों के साथ विधवा हुईं, फिर भरत ने उन्हें ऐसा झाड़ा कि उनके होश उड़ गए। इस तरह, पति गए, पुत्र हाथ में न रहा और पूरी अयोध्या में कैकेयी की ऐसी बदनामी हुई जैसी रघुकुल में किसी और स्त्री की कभी नहीं हुई थी। लालच का शिकार हो कर मूर्खता सभी करते हैं, विपत्ति सब पर आती है, लेकिन बुद्धिमान उन्हें कहते हैं जो विपत्ति से सीख लेते हैं। कैकेयी को स्वयं द्वारा आमंत्रित विपत्ति से सबक लेते हुए दिखा कर मैथिलीशरण गुप्त ने बड़ा काम किया है, वरना पूरी रामकथा में न तो कोई अपने किए पर पछताता है और न अपना परिमार्जन करता है। समुद्र का मामला अलग है, क्योंकि वह राम को लंका तक जाने का उपाय तब बताता है जब क्रुद्ध राम उसे सुखाने के लिए तीर उठा लेते हैं।


मेनका गांधी कुछ वर्षों से उस पार्टी में हैं जो हिन्दू धर्म और संस्कृति का नाम लेते हुए नहीं थकती। इस पार्टी ने अपने इस बार के चुनाव घोषणापत्र में फिर दावा किया है कि हम अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बनाने के लिए कृतसंकल्प हैं। मेरे मन में सवाल उठता है कि भाजपा और उसकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सिर्फ राम का मंदिर चाहिए या राम के चरित्र जैसे व्यक्ति भी। राम को मर्यादा इतनी प्रिय थी कि उनके लिए अयोध्या का सिंहासन संभालने और वनवास करने में कोई फर्क नहीं जान पड़ा। यहाँ भाजपा के वयोवृद्ध नेता कई महीनों से चीख रहे हैं कि मुझे प्रधानमंत्री बनाओ। प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को इतने बलवान ढंग से प्रगट करनेवाली दूसरी नेता उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती हैं। मायावती को राम की कथा या राम की परंपरा में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनकी सहानुभूति होगी तो रावण के साथ होगी, राम के साथ नहीं। फिर भी उन्होंने मातृत्व की परिभाषा को व्यापक कर कई महीनों में पहला अच्छा काम किया है। मगर अफसोस, माता और पुत्र के रिश्ते पर उनकी टिप्पणी भूल भरी और अवैज्ञानिक है।


सबसे पहले वरुण की माँ मेनका गांधी की मानसिकता पर विचार करना चाहिए। मेनका को भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं तो कुछ जानकारी होनी चाहिए। वे मायावती पर लांछन लगाती हैं कि मायावती माँ होती, तो उन्हें माँ की वेदना का पता होता। एक मायने में यह सच है। कहा गया है, जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। लेकिन बिवाई फटना एक बात है और विपथगामी पुत्र द्वारा किए गए गलत कार्य के परिणामस्वरूप पुत्र को और उसके नतीजे में माँ को मिलनेवाला कष्ट दूसरी बात। मेनका अच्छी माँ होतीं, तो वे सबसे पहले अपने बेटे को ही डांटतीं कि वरुण, यह तुमने क्या कह डाला? हम लोग एक पढ़े-लिखे परिवार के हैं, मैं संजय गांधी की पत्नी और इंदिरा गांधी की बहू हूँ। जवाहरलाल नेहरू का वंश वृक्ष बनाया गया, तो उसमें मेरा और तुम्हारा दोनों का नाम होगा। चुनाव जीतने के लोभ में तुमने यह सब भुला दिया और मुसलमानों के लिए ऐसे अपशब्द कह डाले जो हत्यारी मानसिकता का आदमी ही कह सकता है! वरुण बेटे, मुझे तुमसे इसकी कतई उम्मीद न थी।


मेनका गांधी के मन में ये अथवा इस तरह के विचार आए होते, तो आज उनकी जयजयकार हो रही होती। इन दिनों लोगों में पुत्र या पुत्री मोह इतना ज्यादा दिखाई देता है कि लोग अपने हत्यारे और बलात्कारी बेटे तथा पति या प्रेमी की हत्या करनेवाली बेटी को अपराध-मुक्त कराने के लिए बड़े-बड़े वकीलों को नियुक्त करते हैं। यह हो रहा है उस देश में जहाँ रानी कैकेयी सबके सामने अपना अपराध स्वीकार करते हुए अपने बेटों भरत और राम से करुणा की भीख माँगती हैं। फिर भी भारत की जनता ने कैकेयी को उसके अंध पुत्र प्रेम के लिए माफ नहीं किया है। वरुण के प्रति मेनका का प्रेम ऐसा ही है। पुत्र प्रेम में अंधी हो कर वे अपनी वेदना तो प्रगट करती हैं, पर अपने पुत्र का कोई दोष नहीं देख पातीं।


पर मायावती का यह कहना भी पूरा तरह सही नहीं है कि मेनका ने वरुण को अच्छे संस्कार दिए होते, तो वरुण गांधी ने पीलीभीत में ऐसे विनाशकारी बयान नहीं दिए होते। दुनिया में कौन-सी माँ अपने पुत्र को विपथगामी बनाना चाहती है? फिर भी बेटे कुपथगामी हो जाते हैं तो इसलिए कि उनके व्यक्तित्व पर और भी अनेक चीजों का असर पड़ता है। इसका सबसे ज्यादा चर्चित उदाहरण हरिलाल थे, जो महात्मा गांधी जैसे पिता और कस्तूरबा जैसी माँ के बेटे थे। हरिलाल ने क्या नहीं किया -- वे लोगों से रुपया उधार ले कर लौटाते नहीं थे, जीविकोपार्जन नहीं करते थे, शराब पीते थे, वेश्यागमन करते थे, एक बार तो अपना धर्म छोड़ कर वे मुसलमान भी हो गए! क्या इस सबके लिए उनकी माँ कस्तूरबा ही जिम्मेदार थीं? अगर ऐसा था, तो उनका कुप्रभाव उनके अन्य बेटों पर क्यों नहीं पड़ा? उनका एक ही बेटा नालायक क्यों निकला? इसलिए पुत्र या पुत्री के विपथगामी हो जाने की सारी जिम्मेदारी उसकी माँ पर थोप देना सही नहीं है।


मायावती का यह कहना वाजिब है कि किसी का दर्द समझने को लिए उसकी माँ होना जरूरी नहीं है। मदर टेरेसा कभी माँ नहीं बनीं, पर उनके लिए सभी उनकी संतान की तरह थे। बहुत ठीक। इस तर्क से मायावती को चाहिए कि वे वरुण गांधी को अपने बेटे के समान ही मानें। अगर वे वरुण गांधी की माँ होतीं और वरुण ने वैसा अपराध किया होता जैसा उन्होंने किया, क्या तब भी वे वरुण को रासुका में गिरफ्तार करवा कर जेल में डाल देतीं? अभी तक तो किसी राजनेता ने ऐसा किया नहीं है। इसका उलटा जरूर होता रहा है। मायावती में मदर टेरेसा के व्यक्तित्व का जर्रा भर भी अंश होता, तो वे सबसे पहले वरुण से मिलतीं और उसे प्रेम से समझातीं कि बेटे, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसके बाद कहतीं कि राजधर्म निभाने के लिए तुम्हें गिरफ्तार करवाना मेरा फर्ज है, पर तुम्हें इसका बुरा नहीं मानना चाहिए, बल्कि इस बात पर गर्व करना चाहिए कि तुम्हारी माँ निष्पक्ष प्रशासक है। तुम्हें भी एक दिन ऐसा ही बनना है।


जाहिर है, यह सब मेरी खुशखयाली है। लेकिन यथार्थ और खुशखयाली के बीच मीलों की दूरी होने लगे, तो यह दुनिया कितने दिन चल सकती है?

- राजकिशोर

प्रवासी हिन्दी साहित्य : परिचर्चा में आए मित्रों के पत्र और विचार (1)

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प्रवासी हिन्दी साहित्य


परिचर्चा में आए मित्रों के पत्र और विचार (1)


गत दिनों हिन्दी भारत समूह पर आरम्भ हुई परिचर्चा का उल्लेख करते हुए हिन्दी के प्रवासी साहित्य को परिभाषित करने के एक उपक्रम की जानकारी दी थी।

उसी क्रम में प्राप्त प्रतिक्रियाओं को यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है व सभी पाठकों से भी आग्रह है कि वे भी अपने विचार आलेख रूप में या प्रतिक्रिया रूप में अवश्य दें।

अब तक ७-८ आलेख हमें मिल चुके हैं जिन्हें क्रम से यहाँ प्रस्तुत करना आज से आरम्भ कर रही हूँ। ये प्रतिक्रियाएँ जिस क्रम से आई हैं उसी क्रम से प्रस्तुत की जा रही हैं.

- कविता वाचक्नवी



)

डॉ.दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने लिखा
Thursday, April 2, 2009 10:32:05 PM



विचार के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

पहली बात तो मुझे यह लगती है कि प्रवासी साहित्य को ठीक उस तरह से नहीं देखा जा सकता है जैसे हम दलित साहित्य को या महिला लेखन को देखते हैं। दूसरी बात, क्या प्रवासी साहित्य को साहित्य से अलग करके देख भी जाना चाहिए?


कभी कभी मुझे लगता है कि जब हम प्रवासी साहित्य की बात करते हैं तो उन लेखकों का भला नहीं, बल्कि उनका अहित ही करते हैं। कभी मन में यह बात होती होगी, कि ये लोग देश से दूर रहकर हिन्दी में लिख रहे हैं, तो इन्हें थोड़ी रियायत दी जाए. जैसे कभी कभी दलित साहित्य के सन्दर्भ में होता है, कि इन लेखकों से भाषा के उसी परिष्कार की अपेक्षा न की जाए. और यह सोच मुझे तो ठीक नहीं लगता. दलित साहित्य के सन्दर्भ में भी और प्रवासी साहित्य के सन्दर्भ में भी. साहित्य को साहित्य की तरह ही देखा जाना चाहिए.


हां, यह अवश्य है कि जिस साहित्य में प्रवासी भारतीयों की ज़िन्दगी का चित्रण है, उसे एक अलग वर्ग के रूप में विश्लेषित किया जा सकता है. लेकिन ऐसा करना असल में विषय वस्तु के आधार पर एक अंश का विश्लेषण करने जैसा होगा. यह तो वैसे भी होता है. जैसे हिन्दी की ग्रामीण जीवन की कहानियां, या हिन्दी उपन्यासों में कामकाजी महिला, वगैरह. इउसी तरह हिन्दी कहानी में प्रवासी भारतीय जैसी कोई बात की जा सकती है. लेकिन महज़ इस आधर पर कि एक व्यक्ति अमरीका में रह कर कुछ लिख रहा है, उसके साहित्य को अलग करके देखना मुझे तो उपयुक्त नहीं लगता. यह व्यावहारिक भी नहीं है. लोग कभी भारत से विदेश चले जाते हैं, कभी विदेश से भारत आ जाते हैं. भीष्म साहनी और निर्मल वर्मा लम्बे समय तक विदेश में रहे. क्या उनके साहित्य को प्रवासी भारतीयों का साहित्य कहा जाना चाहिए? मैं अभी कुछ महीनों के लिए अमरीका में हूं. यहां रहकर अगर कुछ लिखता हूं तो क्या उसे प्रवासी भारतीय साहित्य के खाते में डाला जाएगा?
क्या हर्ज़ है, साहित्य को साहित्य ही रहने दिया जाए?





)


चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी ने कहा
Thursday, 2 April, 2009, 8:56 PM



प्रवासी साहित्य वही होगा जो प्रवासी भारतीय लिख रहे हैं और जिस में वे ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जो सभी को सम्प्रेषित हो- भले ही उसमें देशज शब्द हों या विदेशी शब्द जो समझ में आएं। यहां भारत में ही अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि दलित साहित्य क्या है-वो जो दलित साहित्यकार लिख रहा है या वह जो दलित परिस्थितियों पर लिखा जा रहा है!! यह तो आवश्यक नहीं लगता कि मानक हिंदी ही हो। हां, सम्प्रेषणीय अवश्य हो।
शुभकामनाएँ
चंद्र मौलेश्वर

प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता

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पुस्तक चर्चा : ऋषभ देव शर्मा



प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता*






भाषा रूपों का अध्ययन करने की आधुनिक प्रणालियों में एक यह मान कर चलती है कि प्रयोजनवती होकर ही कोई भाषा व्यापक प्रचार-प्रसार को प्राप्त होती है. ये प्रयोजन मोटे तौर पर दो प्रकार के हो सकते हैं.एक हैं सामान्य प्रयोजन ,जैसे दैनंदिन व्यवहार में वार्तालाप द्वारा विचारों का आदान -प्रदान . इन प्रयोजनों की सिद्धि के लिए प्रयुक्त भाषा को 'सामान्य प्रयोजनों की भाषा' कहा गया है. दूसरे प्रकार का सम्बन्ध विशिष्ट व्यवहार क्षेत्र में प्रयुक्त भाषा रूपों से है, जैसे अलग अलग विज्ञान शाखाओं में अलग अलग भाषा रूप का प्रयोग होता है अथवा कार्यालय या प्रशासन के कामकाज को अंजाम देने के लिए खास तरह के भाषाप्रयोग में दक्ष होना ज़रूरी होता है. अलग अलग प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले इन विशिष्ट भाषा रूपों को 'विशिष्ट प्रयोजनों की भाषा ' या प्रयोजनमूलक भाषा कहा जा सकता है.किसी प्रयोजनक्षेत्र की भाषा के वैशिष्ट्य के आधार पर उसकी प्रयुक्ति [रजिस्टर] का निर्धारण होता है. प्रयुक्ति विशेष के अभ्यास द्वारा उस क्षेत्रविशेष या ज्ञानशाखाविशेष के भाषिक व्यवहार में दक्ष हुआ जा सकता है. यहाँ यह भी साफ़ करना उचित होगा कि सामान्य प्रयोजन की भाषा को निष्प्रयोजन या प्रयोजनातीत नहीं कहा जा सकता ,बल्कि वह भी प्रयोजनाधारित एक प्रकार ही है. इसी तरह ललित या साहित्यिक भाषा को भी अलगाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह कहना अधिक सटीक होगा कि साहित्य भी एक विशिष्ट प्रयोजन है तथा उसकी अपनी अनेक प्रयुक्तियाँ और उपप्रयुक्तियाँ हैं.



यहाँ तनिक रुक कर भारत के स्वातंत्र्योत्तर भाषिक परिवेश पर विचार करें तो पाते हैं कि यद्यपि भारत में राजभाषा के रूप में जनभाषाओं के प्रयोग का लम्बा इतिहास रहा है ,तथापि ब्रिटिश काल में उन्हें अपदस्थ करके अंग्रेजी को कार्यालय, प्रशासन और शिक्षा की भाषा बना दिया गया . ऐसा करना सर्वथा अवैज्ञानिक था परन्तु भारतीयों को गुलाम बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया था. अतः स्वतंत्रताप्राप्ति के साथ ही यह आशा जगी कि अब भारत की राजभाषा हिंदी होगी.संविधान ने हिंदी को भारत संघ की राजभाषा घोषित कर भी दिया. लेकिन जहाँ जहाँ जिन जिन प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता था वहां वहां उन उन प्रयोजनों के लिए देश भर में हिंदी के प्रयोग को संभव बनाने की चुनौती आज भी हमारे सामने विद्यमान है. कार्यालयों में, व्यवसायों में, शिक्षालयों में और न्यायालयों में जब तक हिंदी प्रतिष्ठित नहीं हो जाती तब तक यही समझना चाहिए कि यह देश भाषिक तौर पर आजाद नहीं हुआ है. इस भाषिक आजादी को हासिल करने के लिए विविध प्रयोजनों की हिंदी के व्यापक अध्ययन और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है.



संभावनाओं से परिपूर्ण व्यवहार क्षेत्र के रूप में राजभाषाक्षेत्र अर्थात कार्यालय और प्रशासन का अपना महत्व है ,लेकिन लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता ने हिंदी की विविध प्रयुक्तियों को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई है. आज यदि खेल के मैदान से लेकर राजनीति के मैदान तक और व्यापर-वाणिज्य से लेकर कम्प्युटर के भूमंडलीय स्वरूप तक को सहेजने में हिंदी के विविध प्रयोजनमूलक रूप सक्षम दिखाई दे रहे हैं तो इसका श्रेय बड़ी सीमा तक हिन्दी पत्रकारिता को जाता है क्योंकि उसने राजकाज, शिक्षा,न्यायव्यवस्था और अन्य अनेक क्षेत्रों में राजभाषा हिंदी की घोर उपेक्षा के बावजूद जनभाषा के रूप में उसकी व्यापक जनसंचार की शक्ति को पहचाना तथा नित-नूतन प्रसार पाते ज्ञानाधारित समाज की स्थापना में हिंदी को समृद्ध करते हुए स्वयं समृद्धि प्राप्त की.



वस्तुतः हिंदी के प्रयोजनमूलक रूपों के सन्दर्भ में पत्रकारिता की हिंदी के वैशिष्ट्य को समझना समसामयिक संचारयुग मेंअत्यंत प्रासंगिक विषय है. इसीलिए नीलम कपूर और सुनीता भाटिया ने अपनी पुस्तक ''प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता''[२००७] में इस विषय का सांगोपांग विवेचन किया है जो भाषा और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं वरन सामान्य अध्येता के लिए भी रोचक और उपयोगी है.






*प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता ,
नीलम कपूर एवं सुनीता भाटिया ,
कान्ती पब्लिकेशन्स ,ए - ५०७/१२, साउथ गांवडी एक्सटेंशन , दिल्ली - ११००५३,
२००७, ४९५ रुपए ,सजिल्द. ३५० पृष्ठ .

प्रवासी साहित्य की परिभाषा क्या होनी चाहिए?

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प्रवासी साहित्य की परिभाषा? भाषा?
क्षेत्र? सरोकार? ...?



मित्रो एवं साथियो !



अभी दिन पूर्व प्रो. कृष्णकुमार जी (यूके) ने अपने एक ईमेल सन्देश में बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है, बल्कि कहना चाहिए कि विचार करने की आवश्यकता बताई है. उन्होंने "प्रवासी हिन्दी साहित्य" की परिभाषा पर अपने विचार लिख भेजने, एक परिचर्चा आयोजित करने की आवश्यकता व इच्छा प्रकट की है । परस्पर विचार करने के लिए आप सभी अपने अपने मत को देवनागरी में टंकित कर भेजें ताकि आलेखात्मक विचारों को समूह से इतर पाठकों के लिए उपलब्ध करवाने की दृष्टि से पुन: समूह के ब्लॊग पर भी प्रकाशित किया जा सके।

प्रो. कृष्ण कुमार जी ने लिखा है कि -

" एक व्यापक परिभाषा की जरूरत है।

१) क्या जब तक प्रवासी रचनाओं में रचनाकार के स्थान के सरोकार न हों, तब तक वह प्रवासी साहित्य नहीं होगा?

२) क्या प्रवासी हिन्दी को तथाकथित मानक हिन्दी ही होना चाहिए ? या फिर जन-जन की हिन्दी?"

उन्होंने एक अन्य सन्देश में थोड़ा और स्पष्ट करते हुए यह प्रश्न भी उठाया है कि-

‘विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भारत की आँचलिक बोलियों में लिखे गए साहित्य को क्या इसकी परिधि में रखा जाना चाहिए या उसे इसकी परिधि से निष्कासित रखा जाए?’


मैं आप सभी से प्रो. कृष्णकुमार जी द्वारा आहूत विषय पर अपने विचार प्रकट करने का आग्रह करती हूँ, कि कृपया उपर्युक्त बिन्दुओं को पढ़ें व हम से अपना मत बाँटें कि क्षेत्र, भाषा, सरोकार या कुछ अन्य वे तत्व क्या हैं, जो हिन्दी के प्रवासी साहित्य को परिभाषित कर सकते हैं।

आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।


- कविता वाचक्नवी


पुनश्च-
इस सन्देश के जो पाठक हिन्दीभारत समूह के सदस्य नहीं हैं, वे सीधे मेरे आईडी पर( साईडबार में एकदम ऊपर बने contact me द्वारा ) भी अपने विचार लिख कर भेज सकते हैं, उनके आलेखात्मक विचारों को भी प्रकाशित किया जाएगा व चर्चा समूह पर सभी को पठनार्थ अग्रेषित किया जाएगा।
.वा.
Thursday, 2 April, 2009, 6:35 PM





From: Prof. Dr Krishna Kumar <.........>



Dear Kavita Jee
pata naheeN kyoN Hindi meiN type naheeN ho rahaa hai. Kyaa aap ek charcha praarambh karaa saktee haiN. pravasi Hindi Saahitya kee paribhaashaa kyaa honee chaahiye. Ek vyaapak definition kee zaroorat hai. Kyaa jab tak pravasi rachnaaoN meiN rachnaakar ke sthaan ke sarokaar naa hoN tab tak woh pravasi saahitya naheeN hogaa. Kyaa pravasi Hindi ko tathaa kathit Maanak Hindi hee honaa chaahiye yaa phir jan-jan kee Hindi. Time has come to look at it more seriously and academically.
with regards.
Krishna

आमंत्रण

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प्रभु जोशी जी के लेखक रूप से हिन्दी के पाठक अच्छी प्रकार परिचित हैं हिन्दी भारत के पाठकों के लिए उनकी कहानी ( एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी ) लेखमाला (इसलिए बिदा करना चाहते हैं हिन्दी को हिन्दी के अखबार , , ) तथा एक महत्त्वपूर्ण आलेखक्रम ( कंडोम प्रोमोशन कार्यक्रम ) को यहाँ प्रस्तुत किया गया थाजो मित्र उनकी कहानी आलेख किन्हीं कारणों से नहीं पढ़ पाए वे इस पूरी सामग्री को यहाँ पढ़ सकते हैं

जोशी जी लंबे समय तक नई दुनिया के सम्पादक भी रहेआजकल वे इंदौर दूरदर्शन का दायित्व सम्हाले हुए हैं

इन सब उत्तरदायित्वों विविध पक्षों के बीच उनके व्यक्तित्व में निहित रंगों के चितेरे चित्रकार होने का एक ऐसा अद्भुत रूप है, जिसे देश - दुनिया में बड़े सम्मान से देखा माना जाता हैरंग-प्रयोग में विरलता उनकी विशेषता है. गत दिनों जयपुर में हुई उनकी चित्र प्रदर्शनी मीडिया में बहुत चर्चा का विषय रही चित्रकला के मर्मज्ञों द्वारा अत्यन्त सराही गयी

जोशी जी के चित्रों की एक प्रदर्शनी मुम्बई की जहांगीर आर्ट गैलरी में (१५ एप्रिल से २१ एप्रिल तक ) आयोजित होने जा रही है, जिसका उद्घाटन १५ एप्रिल की सायं .३० बजे प्रसिद्ध पत्रकार प्रीतीश नंदी करेंगेसभी सादर आमंत्रित हैं

कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ नीचे देखें






बड़े आकार में देखने-पढने के लिए इमेज पर क्लिक करें











कार्यक्रम : आमंत्रण


परिचय

हंगरी और हिंदी

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हंगरी और हिंदी


प्रमोद कुमार शर्मा, बुदापैश्त




हंगरी में हिंदी अध्ययन-अध्यापन की परंपरा से पहले भारोपीय अध्ययन की और संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन की परंपरा थी। इसकी शुरुआत 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में हुई थी। इस परंपरा की शुरुआत करने का श्रेय ऑलैक्सांदैर चोमा को जाता है। प्रारंभ में संस्कृत की पुस्तकों का अनुवाद संस्कृत से न करके तुर्की, लैटिन और अंग्रेजी भाषाओं के अनुवादों से किया जाता था। पर अब स्थिति बदल गई है। आजकल हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं से सीधे अनुवाद कार्य किए जा रहे हैं। इसके साथ ही हिंदी में भी सीधे ही हंगेरियन भाषा से अनुवाद किए जा रहे हैं। संस्कृत अध्ययन की परंपरा की शुरुआत और उसका विकास ओत्वोश लोरांद विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो। तोत्तोशि चाबा के प्रयासों से हुआ।


हिंदी अध्ययन-अध्यापन की परंपरा पाँचवें दशक में हुई थी। हंगेरी के भारतीय दूतावास में कार्यरत डॉ.दैबरैत्सैनी आर्पाद ने स्वयं हिंदी सीखकर विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन करने का कार्य किया था। हिंदी अध्ययन अध्यापन की परंपरा के विकास का पूरा श्रेय सुश्री मारिया नेज्यैशी को जाता है। पिछली शताब्दी के नौवें दशक में जब उन्होंने पढ़ाना प्रारंभ किया था तब विश्वविद्यालय में पाठ्यपुस्तकों का अभाव था। न तो हंगेरियन में न ही हिंदी या अंग्रेजी में कोई भी पाठ्यपुस्तक उपलब्ध थी। उस समय बुदापैश्त में हिंदी बोलने वालों की संख्या नहीं के बरावर थी। मारिया नेज्यैशी ने कुआँ खोदकर पानी पीने जैसा कार्य किया। वे हर सप्ताह पढ़ाने के लिए नया पाठ तैयार करती थीं और फिर उस पाठ की सहायता से अध्यापन कार्य करती थीं।


भारत सरकार आईसीसीआर के माध्यम से विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए छात्रवृत्ति भी प्रदान करता है। हंगरी के एक या दो छात्र प्रतिवर्ष यह छात्रवृत्ति लेकर केंद्रीय हिंदी संस्थान में हिंदी का अध्ययन करने के लिए जाते हैं।


इस दौरान भारत सरकार और राजदूतावास के सहयोग से हिंदी की पुस्तकें ऐल्ते विश्विद्यालय के हिंदी विभाग को मिलने लगीं। इससे हिंदी अध्ययन और अध्यापन का कार्य थोड़ा सा आसान हो गया। 1992 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। इस वर्ष भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से ऐल्ते विश्वविद्यालय के भारोपीय भाषाविज्ञान विभाग में हिंदी के एक अतिथि प्रोफेसर के पद का सृजन किया गया। हिंदी के एक जाने माने साहित्यकार डॉ. असगर वजाहत ने हिंदी के साथ-साथ उर्दू पढ़ाने का कार्य प्रारंभ किया और मारिया नेज्यैशी के साथ मिलकर हिंदी अध्यापन की पाठ्यपुस्तक का निर्माण किया। इस परंपरा को डा. लक्ष्मण सिंह बिष्ट “बटरोही”, डा. रविप्रकाश गुप्ता, डॉ. उमाशंकर उपाध्याय और आजकल डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा आगे बढ़ा रहे हैं। डॉ. बटरोही ने आधुनिक काव्य संकलन, डॉ. रविप्रकाश गुप्ता ने बोलचाल की हिंदी और डॉ. उपाध्याय ने मध्यकालीन काव्य संकलन शीर्षक पाठ्यपुस्तकों का निर्माण किया। डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा विभाग के लिए उच्च स्तरीय वार्तालाप पुस्तक का निर्माण कर रहे हैं। गत शैक्षिक सत्र (2007-08) में एक नए प्रयोग के तौर पर छात्रों को कंप्यूटर का हिंदी अध्ययन-अध्यापन में प्रयोग करना सिखाया गया । वर्तमान सत्र (2008-09) में उच्च स्तर के छात्रों को मीडिया की भाषा का अध्ययन कर उसकी समझ विकसित की गई। इस वर्ष के छात्रों ने मारिया नेज्यैशी के निर्देशन में भीष्म साहनी की अनेक कहानियों का हिंदी से हंगेरियन अनुवाद कार्य भी किया। वर्तमान सत्र में छात्रों ने हंगेरियन भाषा से हिंदी में अनुवाद करना भी प्रारंभ कर दिया है। अपने ग्रीष्मावकाश के दौरान भी कुछ छात्रों ने हिंदी के अन्य लेखकों की कुछ प्रसिद्ध कहानियों का अनुवाद किया। इस सत्र की विशेषता यह रही विभाग ने पहली बार छात्रों व हिंदी प्रेमियों में हिंदी में साहित्य सृजन की रुचि का विकास करने के लिए एक त्रैमासिक भित्ति पत्रिका “प्रयास” प्रारंभ कर दी है। इसका लोकार्पण हंगरी में भारत के राजदूत महामहिम रंजीत रे ने विश्व हिंदी दिवस के अवसर (हंगरी में मार्च में आयोजित) पर किया।


विभाग के प्रतिभाशाली छात्रों में मारिया नेज्यैशी, इम्रे बंघा, फैरेस रुज़ा, दानियल बलोग, युदित तोरजोक, कोरत्वैयेशी तिबोर, जुजाना रेनर, दैजो चाबा, किश चाबा और शांतो पेतर आदि के नाम उल्लेखनीय है, ये सभी आजकल यूरोप के विभिन्न देशों व हंगरी के विभिन्न महत्पूर्ण संस्थानों में उच्च पदों पर पदस्थ या शोधरत हैं। मारिया नेज्यैशी आजकल ऐल्ते विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्षा हैं। इम्रे बंघा ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय में हिंदी भाषा और साहित्य का अध्यापन करते हैं। इसके अलावा चीकसैरैदा (रोमानिया) के सपिऐंत्सिया विश्वविद्यालय में भी अध्यापन कार्य करते हैं। ऐल्ते विश्वविद्यालय मे इम्रे बंघा के निर्देशन में एक महत्वपूर्ण शोध कार्य जारी है। इसमें तुलसीदास कृत कवितावली के पाठालोचन का कार्य किया जा रहा है। वर्ष 2007 से ऐल्ते विश्विद्यालय में आईसीसीआर की और से टैगोर फैलोशिप आरंभ की गई है। इस विभाग के ही एक अन्य छात्र हिदाश गैर्गैय इस फैलोशिप के अंतर्गत शोध कार्य कर रहे हैं।


ऐल्ते विश्वविद्यालय के स्नातक व स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के अलावा बुदापैश्त में भारतीय दूतावास के सहयोग से तीन स्तरों पर हिंदी अध्यापन की नियमित कक्षाएँ चलती हैं। ये कक्षाएँ भी ऐल्ते विश्वविद्यालय के प्रांगण में आयोजित की जाती हैं। इन कक्षाओं की शोभा हिंदी प्रेमी ही नहीं बल्कि भारत-प्रेमी भी बढ़ाते हैं। इन तीन कक्षाओं का स्तर क्रमशः प्रारंभिक, माध्यमिक और उच्च है।


पिछले 16 वर्षों से चल रही इन कक्षाओं में लगभग 1500 लोग हिंदी के साथ-साथ भारत और भारतीय संस्कृति से परिचय प्राप्त कर चुके हैं। इसके अलावा दूतावास के सहयोग से भारतीय समाज और संस्कृति से संबंधित विषयों पर व्याख्यानमाला को भी आयोजन किया जाता है। इस व्याख्यानमाला मे भारतीय व हंगेरियन भारतविद् भारतीय संस्कृति से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चापरक व्याख्यान देते हैं। व्याख्यान के बाद श्रोता और छात्र अपनी जिज्ञासाओं को प्रश्न पूछकर शांत कर सकते हैं। इस व्याख्यानमाला में भारतीय दर्शन, इतिहास, समाज, कला, खान-पान, पहनावा आदि जैसे विषयों पर बल दिया जाता है। इन कक्षाओं में पढ़नेवाले छात्र प्रतिवर्ष विश्व हिंदी दिवस (या हिंदी दिवस) के अवसर पर हिंदी कविताओं को पाठ करते हैं व लघु नाटकों का मंचन करते हैं।


इन कक्षाओं के छात्र 1995 व 2000 में भारत की शैक्षणिक यात्राएँ भी कर चुके हैं।

हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की इस परंपरा के अलावा कुछ और भी तथ्य ऐसे हैं जिनका उल्लेख इस प्रपत्र में करना आवश्यक है-

-हंगरी में अनेक लोग योग सीखकर इसे अपने जीवन का अनिवार्य अंग बना चुके हैं। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। हंगरी में अनेक योग सिखाने वाली संस्थाएँ हैं।

-हंगरी में कुछ हंगेरियन भारतीय शास्त्रीय व लोक नृत्य करने वाली नृत्यांगनाएँ हैं जिनके अपने विद्यालय भी हैं, जिनमें हंगेरियन लोग भारतीय शास्त्रीय नृत्य सीखते हैं।

-हंगेरियन लोगों में भारतीय व्यंजन लोकप्रिय हैं। भारतीय रेस्तराओं में हंगेरियन लोगों की भरमार रहती है।

-बुदापेश्त में लगभग प्रतिमाह एक बॉलीवुड पार्टी होती है, जिसमें अनेक हंगेरियन युवक-युवतियाँ (भारतीय भी) हिंदी के लोकप्रिय हिंदी पंजाबी फिल्मी गानों पर देर रात तक थिरकते रहते हैं।


-इसी तरह बुडापेस्ट में दूतावास की कक्षाओं से जुड़ा एक हिंदी फिल्म क्लब भी है जो प्रति माह एक हिंदी फिल्म का प्रदर्शन करता है। इसमें दर्शकों की संख्या पर्याप्त होती है।

-हंगेरियन दूरदर्शन पर हिंदी फिल्में डब करके दिखाने की एक लंबी परंपरा है।

-हंगरी में रहने वाले भारतीयों व हंगेरियन लोगों में एक याहू ग्रुप (indianinhungary.com) भी लोकप्रिय है। इसके सदस्य भारतीय भी हैं और हंगेरियन भी। हंगेरियन भाषा की भारत विषयक एक साइट हंगरी में बहुत ही लोकप्रिय है। इसका वेब पता है- ये इंडिया (http://jeindia.hu)

-कभी-कभी हंगेरियन एफ.एम. रेडियो पर भी हिंदी गाने सुनने को मिल जाते हैं पर यह यदा-कदा ही होता है। एक दिन अपने परिवार के साथ बुदापैश्त की सड़कों पर घूमते हुए एक दृश्य देखा जिसकी चर्चा हिंदी फिल्मों व गानों के संदर्भ में जरूरी है। हमने देखा कि एक हंगेरियन युवती अपनी कनवर्टिबल मर्सीडीज़ में गैंगस्टर फिल्म का गाना ‘या अली मदद या अली’ सुनती जा रही है। हम लोग आश्चर्य से उसे देखते ही रह गए और उसकी कार फुर्र से निकल गई।


-इस्कोन, साईंबाबा और प्रजापिता ब्रह्मकुमारी जैसे संप्रदायों व बुद्ध धर्म को मानने वाले लोगों की हंगरी में संख्या पर्याप्त है। इनके शिष्य हिंदी व भारतीय संस्कृति को अपनाने की ओर अग्रसर हैं। हंगरी में एक बुद्धधर्म की आस्थाओं पर आधारित एक महाविद्यालय भी है जिसमें संस्कृत व पालि आदि का अध्यापन किया जाता है।

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करगिल, जो सिर्फ मुहावरा नहीं है (यात्रावृत्तांत ) : आलोक तोमर

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(
यात्रावृत्तांत )



करगिल, जो सिर्फ मुहावरा नहीं है
आलोक तोमर




करगिल सिर्फ एक शहर का नाम या छोटी सी संज्ञा नही है। वैसे भी और 1999 के भारत-पाक युद्ध, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पता नहीं क्या सोच कर झगड़ा कहा था, के बाद करगिल का नाम लेते ही बोफर्स तोपों, सैनिकों की लाशों, नवाज शरीफ, परवेज मुशर्रफ और ओपरेशन विजय का नाम याद आ जाता है।



लेकिन यह बाद में। दुनिया के सबसे ऊँचे और संभवतः सबसे छोटे हवाई अड्डे पर जब आपका जहाज उतरता है, उसके पहले ही थकी हुई परिचालिकाएँ आपको याद दिला देती हैं कि यहाँ ऒक्सीजन का स्तर बहुत कम है और धीमी गति से चलिए और जितनी लंबी साँस ले सकते हैं, उतनी लीजिए। जहाँ आप ठहरते हैं, वहाँ के शुभचिंतक पूरे आठ घंटे तक सोने की सलाह देते हैं ताकि देह संसार की छत कहे जाने वाले इस इलाके से अच्छी तरह परिचित और अभ्यस्त हो सके।



लेह से करगिल का रास्ता काफी दूरी तक सिंधू नदी के किनारे चलता है और एक तरफ पहाड़ हैं और नीचे बहुत नीचे नदी बह रही है, जिसकी गति इतनी तेज है कि आवाज आप तक पहुँचती है। रास्ते में ढाबों और तिब्बती स्थानीय व्यंजनों के होटलों वाला एक बाजार आता है और उसके बाद सिर्फ ऒक्सीजन की कमी ही आपको दुखी नहीं करती। एक बहुत सँकरी सड़क पर लगातार आप ऊपर बढ़ते जाते हैं। पहाड़ का शिखर दिखाई पड़ता है और जब तक आप यह सोचे कि यह कितना ऊँचा होगा, तब तक आप इस पर होते हैं। फिर नीचे का सर्पित इलाका आपको समतल लगने वाले लेकिन लगभग उतनी ही ऊँचाई पर मौजूद गाँवों से होते हुए रास्ते के स्तूपों और कभी कभार दिखाई पड़ जाने वाली मस्जिदों वाले इलाकों में ले जाता है। बीच-बीच में बर्फ से पिघल कर आ रहे बने झरने आपको एकदम ठंडे और असली मिनिरल वाटर का स्वाद देते हैं और आगे जा कर लामा यारू गोंपा नाम का बौद्ध तीर्थ है, जहाँ आज के जमाने में भी डबल बैड का एक कमरा खाने के साथ दो सौ रुपए में मिल जाता है। लद्दाख की लोकल बीयर यानी छाँग पीना चाहें तो पच्चीस रुपए में एक पूरा जग प्लास्टिक वाला भर कर मिलता है। ठंडा करने की जरूरत नहीं क्योंकि दिन में भी मौसम दो या तीन डिग्री के आसपास होता है और रात में तो जून के महीने में भी दो मोटे कंबल ओढ़ कर सोना पड़ता है। प्रंसगवश लद्दाख ऐसा इलाका है, जहाँ अगर आपका सिर छाया में हो और पाँव धूप में तो पाँव झुलस जाएँगे और सिर ठंड पकड़ लेगा।



आगे आपकी मर्जी है कि बटालिक से होते हुए जाएँ या सीधे करगिल का पहाड़ी रास्ता पकड़ें। बटालिक से होते हुए जाने में लाभ यह है कि आप वे पहाडियाँ देख सकते है, जहाँ करगिल झगड़े के दौरान सबसे पहले चरवाहों की शक्ल में पाकिस्तानी सेना के घुसपैठियों को भारतीय चरवाहों ने पकड़ा था और इसी छावनी में खबर दी थी। यहाँ सिंध नदी पार करनी पड़ती है और वह भी एक झूलते हुए पुल से और जब तक यह हिंडोला खत्म नहीं हो जाता, तब तक बड़े-बड़े बहादुरों की साँस हलक में अटकी रहती है। चाहें जिस तरफ से जाएँ, पहाड़ से करगिल शहर बिछा हुआ दिखता है। एक लगभग नामालूम सा देहाती कस्बा, सिंध नदी जिसके किनारे से बह रही है और जिसके पार पाकिस्तान है। 1971 के युद्ध में भारत ने नदी के पार वाला इलाका भी जीत लिया था लेकिन रोते हुए जुल्फिकार अली भुट्टो को देख कर शिमला में इंदिरा गांधी का मन पसीज गया और यह हिस्सा उन्होंने पाकिस्तान को वापस कर दिया। तर्क समझ में नहीं आता। जब वह भी विवादित कश्मीर है तो उसे वापस करने की ऐसी क्या जल्दी आ पड़ी थी? दिलचस्प बात यह है कि सिंध नदी के पार जो करगिल है, वहाँ के लोग यहाँ के लोगों के लगातार संपर्क में रहते हैं और उन्होंने नदी पार करने के लिए बाँस के पुल बना रखे हैं। सेना के लोग कई बार आ कर इन पुलों को तोड़ जाते हैं लेकिन पुल नए सिरे से बन जाते हैं।



करगिल शहर में या उसे कस्बा कहिए, सबसे बड़ी मुसीबत शाकाहारी होना है। सड़क पर सरेआम बकरे और भेड़ की आंतों से बना हुआ कबाब बिकता है और लोगों की भीड़ लगी रहती है। उत्तर प्रदेश के जिला फर्रूखाबाद के एक भूतपूर्व फौजी की मेहरबानी है कि वह करगिल का एकमात्र शाकाहारी ढाबा चलाता है। इसके अलावा शहर के सबसे बड़े होटल सियाचिन में मिलने को शाही पनीर मिल जाता है लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उसके अंदर से हड्डियाँ नहीं निकलेंगी। करगिल में एक डिग्री कॊलेज है और सुना है कि लेह की तरह दिल्ली पब्लिक स्कूल की शाखा भी खुलने वाली है। मगर जो शहर शुरू होने से पहले खत्म हो जाता है और जहाँ आधुनिकता का प्रतीक दुकानों में बिकते हुए डीवीडी प्लेयर और एयरटेल तथा बीएसएनएल के सिम कार्ड हैं, वहाँ इतने अभिजात स्कूल में पढ़ने कौन आएगा?



करगिल से द्रास गए बगैर न पर्यटन और न ज्ञान दोनों के हिसाब से यह यात्रा संपन्न नहीं होगी। करगिल की असली लड़ाई तो द्रास के पहाड़ों और मैदानों में हुई थी और क्योंकि जिला करगिल पड़ता है इसीलिए इसे करगिल युद्ध की संज्ञा दी गई थी। द्रास में टाइगर हिल के ठीक नीचे और थ्री पीमपल्स यानी तीन मुहाँसे के नाम से चर्चित पहाड़ियों की श्रृंखला की तलहटी में एक स्मारक उन शहीदों का बनाया गया है, जो इस पागलपन के दौर में शहीद हुए। 26 जुलाई को हर साल यहाँ विजय दिवस मनाया जाता है। इस स्मारक में काले पत्थर पर सुनहरे अक्षरों से उन शहीदों के नाम भी लिखे हैं, जिन्होंने अपनी जान गँवाई और एक पत्थर युवा शहीद बिजयेंद्र थापर के पिता के हाथ का भी लगाया हुआ है। अटपटा सिर्फ यह लगता है कि स्मारक चिन्ह के नाम पर बीयर के मग मिलते हैं, जिनमें एक तरफ तोलोलिंग पहाड़ का चित्र है और दूसरी ओर टाइगर हिल का। शहीदों के नाम पर लोग उनकी अंतिम स्थली के चित्रों के साथ बीयर पीएँ, यह कुछ समझ में नहीं आता।



करगिल पहुँचाने के लिए लेह ही एकमात्र रास्ता नहीं है। एक रास्ता श्रीनगर से सोनमर्ग होते हुए, जो-जिला दर्रे में से जाता है और सोलह किलोमीटर का यह इलाका इतना भयानक है कि वहाँ पहुँचते ही आप भगवान को याद करने लगेंगे। नीचे बहुत गहरी खाई और वह भी इतनी गहरी कि वहाँ से गिरे तो आप सीधे अमरनाथ के रास्ते में आने वाले उस बालटाल में गिरेंगे, जहाँ से अमरनाथ का रास्ता जाता है। गिरे तो हड्डियाँ भी नहीं मिलेंगी। लेकिन यह रास्ता भी खूब चलता है। जम्मू कश्मीर राज्य परिवहन की बसों से ले कर पर्यटकों की गाडियाँ लदी-फदी करगिल की ओर जाती हैं। करगिल, जो हमारा सामरिक तीर्थ है। चलते-चलते करगिल की संस्कृति के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि वहाँ एक ही दुकान पर दलाई लामा और सद्दाम हुसैन दोनों के फोटो लगे मिल जाएँगे। यह बौद्ध और शिया पंथ को मानने वाले लोगों का इलाका है।

वैदिक धर्म और इस्लाम : अ ग्रेट इंटरफेथ डॊयलॊग (कलकत्तावासी भाग लें )

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वैदिक धर्म और इस्लाम : अ ग्रेट इंटरफेथ डॊयलॊग




आज कलकत्ता में आयोजित होने जा रहे वैदिक धर्म और इस्लाम : अ ग्रेट इंटरफेथ डॊयलॊग कार्यक्रम में



इन दिनों भारत प्रवास पर आए



को सुनें



















समय - २९ मार्च २००९, रविवार, सायं बजे
स्थल - कला कुञ्ज (कला मन्दिर), ४८ शेक्सपियर सरणी, कलकत्ता -१७


नीचे इमेज पर क्लिक कर बड़ा कर देखें


डॉ. मारिया नेज्यैशी की 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' संपन्न

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डॉ. मारिया नेज्यैशी की 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' संपन्न









हैदराबाद, २७ मार्च २००९



"हंगरी की जनता को अपनी भाषा से अत्यधिक लगाव है। वह अपनी भाषा को सम्मान का प्रतीक मानती है इसीलिए उसने उसे बचा कर रखा है तथा सभी स्तरों पर सारे काम काज वहां हङ्गेरियन भाषा में ही किये जाते हैं। प्रारम्भिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की सभी विषयों की शिक्षा हङ्गेरियन में ही दी जाती है - चाहे वह अर्थ शास्त्र हो या भौतिक विज्ञान। वहां के छात्र भारत और भारतीय संस्कृति को समझने के लिए अत्यंत समर्पण भाव से हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन करते हैं। हंगरी के लोगों को हिंदी सीखने में अधिक कठिनाई नहीं होती और वे जल्दी ही अधिकार पूर्वक हिंदी में वार्तालाप करना सीख जाते हैं॥ मैं भारत की अपनी यात्राओं में सर्वत्र हिंदी में ही बोलती हूँ। और मेरी राय है कि हिंदी के सम्बन्ध में असुरक्षा भाव नहीं रखना चाहिए।"


ये विचार यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में आयोजित विशेष कार्यक्रम 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' में नगरद्वय के विविध भाषाभाषी लेखकों से बात करते हुए तथा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए डॉ.मारिया नेज्यैशी ने व्यक्त किये. डॉ. मारिया नेज्यैशी हंगरी के युटोस लोरांड विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर हैंतथा इन दिनों भारत प्रवास पर हैं. उनके नगरागमन पर आयोजित इस कार्यक्रम में हैदराबाद के हिंदी सेवियों और रचनाकारों की ओर से पुस्तकें समर्पित कर उनका सम्मान किया गया. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सचिव के.विजयन ने सभा-चिह्न से अलंकृत शाल पहनाकर डॉ.मारिया नेज्यैशी का अभिनन्दन किया.


आयोजन की अध्यक्षता करते हुए 'स्वतंत्र वार्ता ' के सम्पादक डॉ.राधे श्याम शुक्ल ने यूरोप में हंगरी तथा भारत में हैदराबाद की तुलना करते हुए कहा कि ये दोनों ही अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण अपने अपने क्षेत्र में दिल के समान माने जाते हैं. अतः यह आयोजन दो दिलों के मिलन जैसा आह्लादकारी और रोमांचक है. उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति के परस्पर संबंधों की चर्चा करते हुए बल देकर यह कहा कि भारतीयों को हंगरी से भाषा प्रेम और सांस्कृतिक स्वाभिमान की प्रेरणा लेनी चाहिए.


आरम्भ में मुख्य अतिथि डॉ. मारिया नेज्यैशी ने दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार, शिक्षण, प्रशिक्षण और शोध के सम्बन्ध में कई प्रकार की जिज्ञासाएँ प्रकट कीं जिनका समाधान करते हुए उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने हिंदी भाषा आन्दोलन के इतिहास, लक्ष्य, स्वरूप और संभावनाओं पर प्रकाश डाला. डॉ. मारिया नेज्यैशी ने हिंदी प्रचार में महिलाओं की भूमिका तथा द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी की पाठ्य पुस्तकों के निर्माण की प्रक्रिया में विशेष रुचि प्रकट की.


'गुफ्तगू' के दौरान डॉ.कविता वाचक्नवी, डॉ. रोहिताश्व, डॉ. राजकुमारी सिंह, डॉ. धर्म पाल पीहल और डॉ. पी माणिक्याम्बा ने मुख्य अतिथि से हंगरी भाषा, वहां के जनजीवन, रीति रिवाज़, साहित्य की प्रवृतियों, साहित्यकारों के सम्मान तथा हिंदी सीखने की सुविधा और बाधा जैसे विविध विषयों पर सवाल किए.


बातचीत में डॉ.तेजस्वी कट्टीमनी, डॉ. बी बालाजी, डॉ.रोहिताश्व, डॉ.कविता वाचकनवी, डॉ.रेखा शर्मा, डॉ..बलविंदर कौर, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.कांता बौद्ध, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल,, पवित्रा अग्रवाल, डॉ. अहिल्या मिश्र, संपत देवी मुरारका, डॉ. करण सिंह ऊटवाल , सीमा मेंडोस, श्रीनिवास सोमानी, आशादेवी सोमानी, पुष्पलता शर्मा, सविता सोनी, उमा देवी सोनी, डॉ.सुरेश दत्त अवस्थी. डॉ.आनंद राज वर्मा, डॉ.भास्कर राज सक्सेना, डॉ.विजय कुमार जाधव, के.नागेश्वर राव, रामकृष्णा तथा भगवान दास जोपट आदि ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.खुर्शीदा बेगम ने गीत प्रस्तुत किया.


कार्यक्रम के संयोजक तथा उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाधाक्ष्य प्रो. तेजस्वी कट्टीमनी के धन्यवाद प्रस्ताव के उपरांत ''साहित्यकारों से गुफ्तगू'' का यह विशेष आयोजन युगादि की शुभकामनाओं के आदान प्रदान के साथ संपन्न हुआ.

- ऋषभ देव शर्मा


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