"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

" - हिन्दी भारत - " (भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों, हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ), भाषिक मंतव्यों, जीवनमूल्यों, पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु) ***** हिन्दी भारत ***** "

प्रवासी हिन्दी साहित्य : परिचर्चा में आए मित्रों के पत्र और विचार (1)

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प्रवासी हिन्दी साहित्य


परिचर्चा में आए मित्रों के पत्र और विचार (1)


गत दिनों हिन्दी भारत समूह पर आरम्भ हुई परिचर्चा का उल्लेख करते हुए हिन्दी के प्रवासी साहित्य को परिभाषित करने के एक उपक्रम की जानकारी दी थी।

उसी क्रम में प्राप्त प्रतिक्रियाओं को यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है व सभी पाठकों से भी आग्रह है कि वे भी अपने विचार आलेख रूप में या प्रतिक्रिया रूप में अवश्य दें।

अब तक ७-८ आलेख हमें मिल चुके हैं जिन्हें क्रम से यहाँ प्रस्तुत करना आज से आरम्भ कर रही हूँ। ये प्रतिक्रियाएँ जिस क्रम से आई हैं उसी क्रम से प्रस्तुत की जा रही हैं.

- कविता वाचक्नवी



)

डॉ.दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी ने लिखा
Thursday, April 2, 2009 10:32:05 PM



विचार के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।

पहली बात तो मुझे यह लगती है कि प्रवासी साहित्य को ठीक उस तरह से नहीं देखा जा सकता है जैसे हम दलित साहित्य को या महिला लेखन को देखते हैं। दूसरी बात, क्या प्रवासी साहित्य को साहित्य से अलग करके देख भी जाना चाहिए?


कभी कभी मुझे लगता है कि जब हम प्रवासी साहित्य की बात करते हैं तो उन लेखकों का भला नहीं, बल्कि उनका अहित ही करते हैं। कभी मन में यह बात होती होगी, कि ये लोग देश से दूर रहकर हिन्दी में लिख रहे हैं, तो इन्हें थोड़ी रियायत दी जाए. जैसे कभी कभी दलित साहित्य के सन्दर्भ में होता है, कि इन लेखकों से भाषा के उसी परिष्कार की अपेक्षा न की जाए. और यह सोच मुझे तो ठीक नहीं लगता. दलित साहित्य के सन्दर्भ में भी और प्रवासी साहित्य के सन्दर्भ में भी. साहित्य को साहित्य की तरह ही देखा जाना चाहिए.


हां, यह अवश्य है कि जिस साहित्य में प्रवासी भारतीयों की ज़िन्दगी का चित्रण है, उसे एक अलग वर्ग के रूप में विश्लेषित किया जा सकता है. लेकिन ऐसा करना असल में विषय वस्तु के आधार पर एक अंश का विश्लेषण करने जैसा होगा. यह तो वैसे भी होता है. जैसे हिन्दी की ग्रामीण जीवन की कहानियां, या हिन्दी उपन्यासों में कामकाजी महिला, वगैरह. इउसी तरह हिन्दी कहानी में प्रवासी भारतीय जैसी कोई बात की जा सकती है. लेकिन महज़ इस आधर पर कि एक व्यक्ति अमरीका में रह कर कुछ लिख रहा है, उसके साहित्य को अलग करके देखना मुझे तो उपयुक्त नहीं लगता. यह व्यावहारिक भी नहीं है. लोग कभी भारत से विदेश चले जाते हैं, कभी विदेश से भारत आ जाते हैं. भीष्म साहनी और निर्मल वर्मा लम्बे समय तक विदेश में रहे. क्या उनके साहित्य को प्रवासी भारतीयों का साहित्य कहा जाना चाहिए? मैं अभी कुछ महीनों के लिए अमरीका में हूं. यहां रहकर अगर कुछ लिखता हूं तो क्या उसे प्रवासी भारतीय साहित्य के खाते में डाला जाएगा?
क्या हर्ज़ है, साहित्य को साहित्य ही रहने दिया जाए?





)


चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी ने कहा
Thursday, 2 April, 2009, 8:56 PM



प्रवासी साहित्य वही होगा जो प्रवासी भारतीय लिख रहे हैं और जिस में वे ऐसी भाषा का प्रयोग कर रहे हैं जो सभी को सम्प्रेषित हो- भले ही उसमें देशज शब्द हों या विदेशी शब्द जो समझ में आएं। यहां भारत में ही अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि दलित साहित्य क्या है-वो जो दलित साहित्यकार लिख रहा है या वह जो दलित परिस्थितियों पर लिखा जा रहा है!! यह तो आवश्यक नहीं लगता कि मानक हिंदी ही हो। हां, सम्प्रेषणीय अवश्य हो।
शुभकामनाएँ
चंद्र मौलेश्वर

प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता

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पुस्तक चर्चा : ऋषभ देव शर्मा



प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता*






भाषा रूपों का अध्ययन करने की आधुनिक प्रणालियों में एक यह मान कर चलती है कि प्रयोजनवती होकर ही कोई भाषा व्यापक प्रचार-प्रसार को प्राप्त होती है. ये प्रयोजन मोटे तौर पर दो प्रकार के हो सकते हैं.एक हैं सामान्य प्रयोजन ,जैसे दैनंदिन व्यवहार में वार्तालाप द्वारा विचारों का आदान -प्रदान . इन प्रयोजनों की सिद्धि के लिए प्रयुक्त भाषा को 'सामान्य प्रयोजनों की भाषा' कहा गया है. दूसरे प्रकार का सम्बन्ध विशिष्ट व्यवहार क्षेत्र में प्रयुक्त भाषा रूपों से है, जैसे अलग अलग विज्ञान शाखाओं में अलग अलग भाषा रूप का प्रयोग होता है अथवा कार्यालय या प्रशासन के कामकाज को अंजाम देने के लिए खास तरह के भाषाप्रयोग में दक्ष होना ज़रूरी होता है. अलग अलग प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले इन विशिष्ट भाषा रूपों को 'विशिष्ट प्रयोजनों की भाषा ' या प्रयोजनमूलक भाषा कहा जा सकता है.किसी प्रयोजनक्षेत्र की भाषा के वैशिष्ट्य के आधार पर उसकी प्रयुक्ति [रजिस्टर] का निर्धारण होता है. प्रयुक्ति विशेष के अभ्यास द्वारा उस क्षेत्रविशेष या ज्ञानशाखाविशेष के भाषिक व्यवहार में दक्ष हुआ जा सकता है. यहाँ यह भी साफ़ करना उचित होगा कि सामान्य प्रयोजन की भाषा को निष्प्रयोजन या प्रयोजनातीत नहीं कहा जा सकता ,बल्कि वह भी प्रयोजनाधारित एक प्रकार ही है. इसी तरह ललित या साहित्यिक भाषा को भी अलगाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह कहना अधिक सटीक होगा कि साहित्य भी एक विशिष्ट प्रयोजन है तथा उसकी अपनी अनेक प्रयुक्तियाँ और उपप्रयुक्तियाँ हैं.



यहाँ तनिक रुक कर भारत के स्वातंत्र्योत्तर भाषिक परिवेश पर विचार करें तो पाते हैं कि यद्यपि भारत में राजभाषा के रूप में जनभाषाओं के प्रयोग का लम्बा इतिहास रहा है ,तथापि ब्रिटिश काल में उन्हें अपदस्थ करके अंग्रेजी को कार्यालय, प्रशासन और शिक्षा की भाषा बना दिया गया . ऐसा करना सर्वथा अवैज्ञानिक था परन्तु भारतीयों को गुलाम बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया था. अतः स्वतंत्रताप्राप्ति के साथ ही यह आशा जगी कि अब भारत की राजभाषा हिंदी होगी.संविधान ने हिंदी को भारत संघ की राजभाषा घोषित कर भी दिया. लेकिन जहाँ जहाँ जिन जिन प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता था वहां वहां उन उन प्रयोजनों के लिए देश भर में हिंदी के प्रयोग को संभव बनाने की चुनौती आज भी हमारे सामने विद्यमान है. कार्यालयों में, व्यवसायों में, शिक्षालयों में और न्यायालयों में जब तक हिंदी प्रतिष्ठित नहीं हो जाती तब तक यही समझना चाहिए कि यह देश भाषिक तौर पर आजाद नहीं हुआ है. इस भाषिक आजादी को हासिल करने के लिए विविध प्रयोजनों की हिंदी के व्यापक अध्ययन और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है.



संभावनाओं से परिपूर्ण व्यवहार क्षेत्र के रूप में राजभाषाक्षेत्र अर्थात कार्यालय और प्रशासन का अपना महत्व है ,लेकिन लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के रूप में पत्रकारिता ने हिंदी की विविध प्रयुक्तियों को लोकप्रिय बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई है. आज यदि खेल के मैदान से लेकर राजनीति के मैदान तक और व्यापर-वाणिज्य से लेकर कम्प्युटर के भूमंडलीय स्वरूप तक को सहेजने में हिंदी के विविध प्रयोजनमूलक रूप सक्षम दिखाई दे रहे हैं तो इसका श्रेय बड़ी सीमा तक हिन्दी पत्रकारिता को जाता है क्योंकि उसने राजकाज, शिक्षा,न्यायव्यवस्था और अन्य अनेक क्षेत्रों में राजभाषा हिंदी की घोर उपेक्षा के बावजूद जनभाषा के रूप में उसकी व्यापक जनसंचार की शक्ति को पहचाना तथा नित-नूतन प्रसार पाते ज्ञानाधारित समाज की स्थापना में हिंदी को समृद्ध करते हुए स्वयं समृद्धि प्राप्त की.



वस्तुतः हिंदी के प्रयोजनमूलक रूपों के सन्दर्भ में पत्रकारिता की हिंदी के वैशिष्ट्य को समझना समसामयिक संचारयुग मेंअत्यंत प्रासंगिक विषय है. इसीलिए नीलम कपूर और सुनीता भाटिया ने अपनी पुस्तक ''प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता''[२००७] में इस विषय का सांगोपांग विवेचन किया है जो भाषा और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं वरन सामान्य अध्येता के लिए भी रोचक और उपयोगी है.






*प्रयोजनमूलक हिंदी और पत्रकारिता ,
नीलम कपूर एवं सुनीता भाटिया ,
कान्ती पब्लिकेशन्स ,ए - ५०७/१२, साउथ गांवडी एक्सटेंशन , दिल्ली - ११००५३,
२००७, ४९५ रुपए ,सजिल्द. ३५० पृष्ठ .

प्रवासी साहित्य की परिभाषा क्या होनी चाहिए?

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प्रवासी साहित्य की परिभाषा? भाषा?
क्षेत्र? सरोकार? ...?



मित्रो एवं साथियो !



अभी दिन पूर्व प्रो. कृष्णकुमार जी (यूके) ने अपने एक ईमेल सन्देश में बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है, बल्कि कहना चाहिए कि विचार करने की आवश्यकता बताई है. उन्होंने "प्रवासी हिन्दी साहित्य" की परिभाषा पर अपने विचार लिख भेजने, एक परिचर्चा आयोजित करने की आवश्यकता व इच्छा प्रकट की है । परस्पर विचार करने के लिए आप सभी अपने अपने मत को देवनागरी में टंकित कर भेजें ताकि आलेखात्मक विचारों को समूह से इतर पाठकों के लिए उपलब्ध करवाने की दृष्टि से पुन: समूह के ब्लॊग पर भी प्रकाशित किया जा सके।

प्रो. कृष्ण कुमार जी ने लिखा है कि -

" एक व्यापक परिभाषा की जरूरत है।

१) क्या जब तक प्रवासी रचनाओं में रचनाकार के स्थान के सरोकार न हों, तब तक वह प्रवासी साहित्य नहीं होगा?

२) क्या प्रवासी हिन्दी को तथाकथित मानक हिन्दी ही होना चाहिए ? या फिर जन-जन की हिन्दी?"

उन्होंने एक अन्य सन्देश में थोड़ा और स्पष्ट करते हुए यह प्रश्न भी उठाया है कि-

‘विदेशों में बसे भारतीयों द्वारा भारत की आँचलिक बोलियों में लिखे गए साहित्य को क्या इसकी परिधि में रखा जाना चाहिए या उसे इसकी परिधि से निष्कासित रखा जाए?’


मैं आप सभी से प्रो. कृष्णकुमार जी द्वारा आहूत विषय पर अपने विचार प्रकट करने का आग्रह करती हूँ, कि कृपया उपर्युक्त बिन्दुओं को पढ़ें व हम से अपना मत बाँटें कि क्षेत्र, भाषा, सरोकार या कुछ अन्य वे तत्व क्या हैं, जो हिन्दी के प्रवासी साहित्य को परिभाषित कर सकते हैं।

आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।


- कविता वाचक्नवी


पुनश्च-
इस सन्देश के जो पाठक हिन्दीभारत समूह के सदस्य नहीं हैं, वे सीधे मेरे आईडी पर( साईडबार में एकदम ऊपर बने contact me द्वारा ) भी अपने विचार लिख कर भेज सकते हैं, उनके आलेखात्मक विचारों को भी प्रकाशित किया जाएगा व चर्चा समूह पर सभी को पठनार्थ अग्रेषित किया जाएगा।
.वा.
Thursday, 2 April, 2009, 6:35 PM





From: Prof. Dr Krishna Kumar <.........>



Dear Kavita Jee
pata naheeN kyoN Hindi meiN type naheeN ho rahaa hai. Kyaa aap ek charcha praarambh karaa saktee haiN. pravasi Hindi Saahitya kee paribhaashaa kyaa honee chaahiye. Ek vyaapak definition kee zaroorat hai. Kyaa jab tak pravasi rachnaaoN meiN rachnaakar ke sthaan ke sarokaar naa hoN tab tak woh pravasi saahitya naheeN hogaa. Kyaa pravasi Hindi ko tathaa kathit Maanak Hindi hee honaa chaahiye yaa phir jan-jan kee Hindi. Time has come to look at it more seriously and academically.
with regards.
Krishna

आमंत्रण

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प्रभु जोशी जी के लेखक रूप से हिन्दी के पाठक अच्छी प्रकार परिचित हैं हिन्दी भारत के पाठकों के लिए उनकी कहानी ( एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी ) लेखमाला (इसलिए बिदा करना चाहते हैं हिन्दी को हिन्दी के अखबार , , ) तथा एक महत्त्वपूर्ण आलेखक्रम ( कंडोम प्रोमोशन कार्यक्रम ) को यहाँ प्रस्तुत किया गया थाजो मित्र उनकी कहानी आलेख किन्हीं कारणों से नहीं पढ़ पाए वे इस पूरी सामग्री को यहाँ पढ़ सकते हैं

जोशी जी लंबे समय तक नई दुनिया के सम्पादक भी रहेआजकल वे इंदौर दूरदर्शन का दायित्व सम्हाले हुए हैं

इन सब उत्तरदायित्वों विविध पक्षों के बीच उनके व्यक्तित्व में निहित रंगों के चितेरे चित्रकार होने का एक ऐसा अद्भुत रूप है, जिसे देश - दुनिया में बड़े सम्मान से देखा माना जाता हैरंग-प्रयोग में विरलता उनकी विशेषता है. गत दिनों जयपुर में हुई उनकी चित्र प्रदर्शनी मीडिया में बहुत चर्चा का विषय रही चित्रकला के मर्मज्ञों द्वारा अत्यन्त सराही गयी

जोशी जी के चित्रों की एक प्रदर्शनी मुम्बई की जहांगीर आर्ट गैलरी में (१५ एप्रिल से २१ एप्रिल तक ) आयोजित होने जा रही है, जिसका उद्घाटन १५ एप्रिल की सायं .३० बजे प्रसिद्ध पत्रकार प्रीतीश नंदी करेंगेसभी सादर आमंत्रित हैं

कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी के लिए यहाँ नीचे देखें






बड़े आकार में देखने-पढने के लिए इमेज पर क्लिक करें











कार्यक्रम : आमंत्रण


परिचय

हंगरी और हिंदी

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हंगरी और हिंदी


प्रमोद कुमार शर्मा, बुदापैश्त




हंगरी में हिंदी अध्ययन-अध्यापन की परंपरा से पहले भारोपीय अध्ययन की और संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन की परंपरा थी। इसकी शुरुआत 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में हुई थी। इस परंपरा की शुरुआत करने का श्रेय ऑलैक्सांदैर चोमा को जाता है। प्रारंभ में संस्कृत की पुस्तकों का अनुवाद संस्कृत से न करके तुर्की, लैटिन और अंग्रेजी भाषाओं के अनुवादों से किया जाता था। पर अब स्थिति बदल गई है। आजकल हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं से सीधे अनुवाद कार्य किए जा रहे हैं। इसके साथ ही हिंदी में भी सीधे ही हंगेरियन भाषा से अनुवाद किए जा रहे हैं। संस्कृत अध्ययन की परंपरा की शुरुआत और उसका विकास ओत्वोश लोरांद विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो। तोत्तोशि चाबा के प्रयासों से हुआ।


हिंदी अध्ययन-अध्यापन की परंपरा पाँचवें दशक में हुई थी। हंगेरी के भारतीय दूतावास में कार्यरत डॉ.दैबरैत्सैनी आर्पाद ने स्वयं हिंदी सीखकर विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन करने का कार्य किया था। हिंदी अध्ययन अध्यापन की परंपरा के विकास का पूरा श्रेय सुश्री मारिया नेज्यैशी को जाता है। पिछली शताब्दी के नौवें दशक में जब उन्होंने पढ़ाना प्रारंभ किया था तब विश्वविद्यालय में पाठ्यपुस्तकों का अभाव था। न तो हंगेरियन में न ही हिंदी या अंग्रेजी में कोई भी पाठ्यपुस्तक उपलब्ध थी। उस समय बुदापैश्त में हिंदी बोलने वालों की संख्या नहीं के बरावर थी। मारिया नेज्यैशी ने कुआँ खोदकर पानी पीने जैसा कार्य किया। वे हर सप्ताह पढ़ाने के लिए नया पाठ तैयार करती थीं और फिर उस पाठ की सहायता से अध्यापन कार्य करती थीं।


भारत सरकार आईसीसीआर के माध्यम से विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए छात्रवृत्ति भी प्रदान करता है। हंगरी के एक या दो छात्र प्रतिवर्ष यह छात्रवृत्ति लेकर केंद्रीय हिंदी संस्थान में हिंदी का अध्ययन करने के लिए जाते हैं।


इस दौरान भारत सरकार और राजदूतावास के सहयोग से हिंदी की पुस्तकें ऐल्ते विश्विद्यालय के हिंदी विभाग को मिलने लगीं। इससे हिंदी अध्ययन और अध्यापन का कार्य थोड़ा सा आसान हो गया। 1992 में एक महत्वपूर्ण घटना घटी। इस वर्ष भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से ऐल्ते विश्वविद्यालय के भारोपीय भाषाविज्ञान विभाग में हिंदी के एक अतिथि प्रोफेसर के पद का सृजन किया गया। हिंदी के एक जाने माने साहित्यकार डॉ. असगर वजाहत ने हिंदी के साथ-साथ उर्दू पढ़ाने का कार्य प्रारंभ किया और मारिया नेज्यैशी के साथ मिलकर हिंदी अध्यापन की पाठ्यपुस्तक का निर्माण किया। इस परंपरा को डा. लक्ष्मण सिंह बिष्ट “बटरोही”, डा. रविप्रकाश गुप्ता, डॉ. उमाशंकर उपाध्याय और आजकल डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा आगे बढ़ा रहे हैं। डॉ. बटरोही ने आधुनिक काव्य संकलन, डॉ. रविप्रकाश गुप्ता ने बोलचाल की हिंदी और डॉ. उपाध्याय ने मध्यकालीन काव्य संकलन शीर्षक पाठ्यपुस्तकों का निर्माण किया। डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा विभाग के लिए उच्च स्तरीय वार्तालाप पुस्तक का निर्माण कर रहे हैं। गत शैक्षिक सत्र (2007-08) में एक नए प्रयोग के तौर पर छात्रों को कंप्यूटर का हिंदी अध्ययन-अध्यापन में प्रयोग करना सिखाया गया । वर्तमान सत्र (2008-09) में उच्च स्तर के छात्रों को मीडिया की भाषा का अध्ययन कर उसकी समझ विकसित की गई। इस वर्ष के छात्रों ने मारिया नेज्यैशी के निर्देशन में भीष्म साहनी की अनेक कहानियों का हिंदी से हंगेरियन अनुवाद कार्य भी किया। वर्तमान सत्र में छात्रों ने हंगेरियन भाषा से हिंदी में अनुवाद करना भी प्रारंभ कर दिया है। अपने ग्रीष्मावकाश के दौरान भी कुछ छात्रों ने हिंदी के अन्य लेखकों की कुछ प्रसिद्ध कहानियों का अनुवाद किया। इस सत्र की विशेषता यह रही विभाग ने पहली बार छात्रों व हिंदी प्रेमियों में हिंदी में साहित्य सृजन की रुचि का विकास करने के लिए एक त्रैमासिक भित्ति पत्रिका “प्रयास” प्रारंभ कर दी है। इसका लोकार्पण हंगरी में भारत के राजदूत महामहिम रंजीत रे ने विश्व हिंदी दिवस के अवसर (हंगरी में मार्च में आयोजित) पर किया।


विभाग के प्रतिभाशाली छात्रों में मारिया नेज्यैशी, इम्रे बंघा, फैरेस रुज़ा, दानियल बलोग, युदित तोरजोक, कोरत्वैयेशी तिबोर, जुजाना रेनर, दैजो चाबा, किश चाबा और शांतो पेतर आदि के नाम उल्लेखनीय है, ये सभी आजकल यूरोप के विभिन्न देशों व हंगरी के विभिन्न महत्पूर्ण संस्थानों में उच्च पदों पर पदस्थ या शोधरत हैं। मारिया नेज्यैशी आजकल ऐल्ते विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्षा हैं। इम्रे बंघा ऑक्सफोर्ड विश्विद्यालय में हिंदी भाषा और साहित्य का अध्यापन करते हैं। इसके अलावा चीकसैरैदा (रोमानिया) के सपिऐंत्सिया विश्वविद्यालय में भी अध्यापन कार्य करते हैं। ऐल्ते विश्वविद्यालय मे इम्रे बंघा के निर्देशन में एक महत्वपूर्ण शोध कार्य जारी है। इसमें तुलसीदास कृत कवितावली के पाठालोचन का कार्य किया जा रहा है। वर्ष 2007 से ऐल्ते विश्विद्यालय में आईसीसीआर की और से टैगोर फैलोशिप आरंभ की गई है। इस विभाग के ही एक अन्य छात्र हिदाश गैर्गैय इस फैलोशिप के अंतर्गत शोध कार्य कर रहे हैं।


ऐल्ते विश्वविद्यालय के स्नातक व स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के अलावा बुदापैश्त में भारतीय दूतावास के सहयोग से तीन स्तरों पर हिंदी अध्यापन की नियमित कक्षाएँ चलती हैं। ये कक्षाएँ भी ऐल्ते विश्वविद्यालय के प्रांगण में आयोजित की जाती हैं। इन कक्षाओं की शोभा हिंदी प्रेमी ही नहीं बल्कि भारत-प्रेमी भी बढ़ाते हैं। इन तीन कक्षाओं का स्तर क्रमशः प्रारंभिक, माध्यमिक और उच्च है।


पिछले 16 वर्षों से चल रही इन कक्षाओं में लगभग 1500 लोग हिंदी के साथ-साथ भारत और भारतीय संस्कृति से परिचय प्राप्त कर चुके हैं। इसके अलावा दूतावास के सहयोग से भारतीय समाज और संस्कृति से संबंधित विषयों पर व्याख्यानमाला को भी आयोजन किया जाता है। इस व्याख्यानमाला मे भारतीय व हंगेरियन भारतविद् भारतीय संस्कृति से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चापरक व्याख्यान देते हैं। व्याख्यान के बाद श्रोता और छात्र अपनी जिज्ञासाओं को प्रश्न पूछकर शांत कर सकते हैं। इस व्याख्यानमाला में भारतीय दर्शन, इतिहास, समाज, कला, खान-पान, पहनावा आदि जैसे विषयों पर बल दिया जाता है। इन कक्षाओं में पढ़नेवाले छात्र प्रतिवर्ष विश्व हिंदी दिवस (या हिंदी दिवस) के अवसर पर हिंदी कविताओं को पाठ करते हैं व लघु नाटकों का मंचन करते हैं।


इन कक्षाओं के छात्र 1995 व 2000 में भारत की शैक्षणिक यात्राएँ भी कर चुके हैं।

हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की इस परंपरा के अलावा कुछ और भी तथ्य ऐसे हैं जिनका उल्लेख इस प्रपत्र में करना आवश्यक है-

-हंगरी में अनेक लोग योग सीखकर इसे अपने जीवन का अनिवार्य अंग बना चुके हैं। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है। हंगरी में अनेक योग सिखाने वाली संस्थाएँ हैं।

-हंगरी में कुछ हंगेरियन भारतीय शास्त्रीय व लोक नृत्य करने वाली नृत्यांगनाएँ हैं जिनके अपने विद्यालय भी हैं, जिनमें हंगेरियन लोग भारतीय शास्त्रीय नृत्य सीखते हैं।

-हंगेरियन लोगों में भारतीय व्यंजन लोकप्रिय हैं। भारतीय रेस्तराओं में हंगेरियन लोगों की भरमार रहती है।

-बुदापेश्त में लगभग प्रतिमाह एक बॉलीवुड पार्टी होती है, जिसमें अनेक हंगेरियन युवक-युवतियाँ (भारतीय भी) हिंदी के लोकप्रिय हिंदी पंजाबी फिल्मी गानों पर देर रात तक थिरकते रहते हैं।


-इसी तरह बुडापेस्ट में दूतावास की कक्षाओं से जुड़ा एक हिंदी फिल्म क्लब भी है जो प्रति माह एक हिंदी फिल्म का प्रदर्शन करता है। इसमें दर्शकों की संख्या पर्याप्त होती है।

-हंगेरियन दूरदर्शन पर हिंदी फिल्में डब करके दिखाने की एक लंबी परंपरा है।

-हंगरी में रहने वाले भारतीयों व हंगेरियन लोगों में एक याहू ग्रुप (indianinhungary.com) भी लोकप्रिय है। इसके सदस्य भारतीय भी हैं और हंगेरियन भी। हंगेरियन भाषा की भारत विषयक एक साइट हंगरी में बहुत ही लोकप्रिय है। इसका वेब पता है- ये इंडिया (http://jeindia.hu)

-कभी-कभी हंगेरियन एफ.एम. रेडियो पर भी हिंदी गाने सुनने को मिल जाते हैं पर यह यदा-कदा ही होता है। एक दिन अपने परिवार के साथ बुदापैश्त की सड़कों पर घूमते हुए एक दृश्य देखा जिसकी चर्चा हिंदी फिल्मों व गानों के संदर्भ में जरूरी है। हमने देखा कि एक हंगेरियन युवती अपनी कनवर्टिबल मर्सीडीज़ में गैंगस्टर फिल्म का गाना ‘या अली मदद या अली’ सुनती जा रही है। हम लोग आश्चर्य से उसे देखते ही रह गए और उसकी कार फुर्र से निकल गई।


-इस्कोन, साईंबाबा और प्रजापिता ब्रह्मकुमारी जैसे संप्रदायों व बुद्ध धर्म को मानने वाले लोगों की हंगरी में संख्या पर्याप्त है। इनके शिष्य हिंदी व भारतीय संस्कृति को अपनाने की ओर अग्रसर हैं। हंगरी में एक बुद्धधर्म की आस्थाओं पर आधारित एक महाविद्यालय भी है जिसमें संस्कृत व पालि आदि का अध्यापन किया जाता है।

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करगिल, जो सिर्फ मुहावरा नहीं है (यात्रावृत्तांत ) : आलोक तोमर

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यात्रावृत्तांत )



करगिल, जो सिर्फ मुहावरा नहीं है
आलोक तोमर




करगिल सिर्फ एक शहर का नाम या छोटी सी संज्ञा नही है। वैसे भी और 1999 के भारत-पाक युद्ध, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पता नहीं क्या सोच कर झगड़ा कहा था, के बाद करगिल का नाम लेते ही बोफर्स तोपों, सैनिकों की लाशों, नवाज शरीफ, परवेज मुशर्रफ और ओपरेशन विजय का नाम याद आ जाता है।



लेकिन यह बाद में। दुनिया के सबसे ऊँचे और संभवतः सबसे छोटे हवाई अड्डे पर जब आपका जहाज उतरता है, उसके पहले ही थकी हुई परिचालिकाएँ आपको याद दिला देती हैं कि यहाँ ऒक्सीजन का स्तर बहुत कम है और धीमी गति से चलिए और जितनी लंबी साँस ले सकते हैं, उतनी लीजिए। जहाँ आप ठहरते हैं, वहाँ के शुभचिंतक पूरे आठ घंटे तक सोने की सलाह देते हैं ताकि देह संसार की छत कहे जाने वाले इस इलाके से अच्छी तरह परिचित और अभ्यस्त हो सके।



लेह से करगिल का रास्ता काफी दूरी तक सिंधू नदी के किनारे चलता है और एक तरफ पहाड़ हैं और नीचे बहुत नीचे नदी बह रही है, जिसकी गति इतनी तेज है कि आवाज आप तक पहुँचती है। रास्ते में ढाबों और तिब्बती स्थानीय व्यंजनों के होटलों वाला एक बाजार आता है और उसके बाद सिर्फ ऒक्सीजन की कमी ही आपको दुखी नहीं करती। एक बहुत सँकरी सड़क पर लगातार आप ऊपर बढ़ते जाते हैं। पहाड़ का शिखर दिखाई पड़ता है और जब तक आप यह सोचे कि यह कितना ऊँचा होगा, तब तक आप इस पर होते हैं। फिर नीचे का सर्पित इलाका आपको समतल लगने वाले लेकिन लगभग उतनी ही ऊँचाई पर मौजूद गाँवों से होते हुए रास्ते के स्तूपों और कभी कभार दिखाई पड़ जाने वाली मस्जिदों वाले इलाकों में ले जाता है। बीच-बीच में बर्फ से पिघल कर आ रहे बने झरने आपको एकदम ठंडे और असली मिनिरल वाटर का स्वाद देते हैं और आगे जा कर लामा यारू गोंपा नाम का बौद्ध तीर्थ है, जहाँ आज के जमाने में भी डबल बैड का एक कमरा खाने के साथ दो सौ रुपए में मिल जाता है। लद्दाख की लोकल बीयर यानी छाँग पीना चाहें तो पच्चीस रुपए में एक पूरा जग प्लास्टिक वाला भर कर मिलता है। ठंडा करने की जरूरत नहीं क्योंकि दिन में भी मौसम दो या तीन डिग्री के आसपास होता है और रात में तो जून के महीने में भी दो मोटे कंबल ओढ़ कर सोना पड़ता है। प्रंसगवश लद्दाख ऐसा इलाका है, जहाँ अगर आपका सिर छाया में हो और पाँव धूप में तो पाँव झुलस जाएँगे और सिर ठंड पकड़ लेगा।



आगे आपकी मर्जी है कि बटालिक से होते हुए जाएँ या सीधे करगिल का पहाड़ी रास्ता पकड़ें। बटालिक से होते हुए जाने में लाभ यह है कि आप वे पहाडियाँ देख सकते है, जहाँ करगिल झगड़े के दौरान सबसे पहले चरवाहों की शक्ल में पाकिस्तानी सेना के घुसपैठियों को भारतीय चरवाहों ने पकड़ा था और इसी छावनी में खबर दी थी। यहाँ सिंध नदी पार करनी पड़ती है और वह भी एक झूलते हुए पुल से और जब तक यह हिंडोला खत्म नहीं हो जाता, तब तक बड़े-बड़े बहादुरों की साँस हलक में अटकी रहती है। चाहें जिस तरफ से जाएँ, पहाड़ से करगिल शहर बिछा हुआ दिखता है। एक लगभग नामालूम सा देहाती कस्बा, सिंध नदी जिसके किनारे से बह रही है और जिसके पार पाकिस्तान है। 1971 के युद्ध में भारत ने नदी के पार वाला इलाका भी जीत लिया था लेकिन रोते हुए जुल्फिकार अली भुट्टो को देख कर शिमला में इंदिरा गांधी का मन पसीज गया और यह हिस्सा उन्होंने पाकिस्तान को वापस कर दिया। तर्क समझ में नहीं आता। जब वह भी विवादित कश्मीर है तो उसे वापस करने की ऐसी क्या जल्दी आ पड़ी थी? दिलचस्प बात यह है कि सिंध नदी के पार जो करगिल है, वहाँ के लोग यहाँ के लोगों के लगातार संपर्क में रहते हैं और उन्होंने नदी पार करने के लिए बाँस के पुल बना रखे हैं। सेना के लोग कई बार आ कर इन पुलों को तोड़ जाते हैं लेकिन पुल नए सिरे से बन जाते हैं।



करगिल शहर में या उसे कस्बा कहिए, सबसे बड़ी मुसीबत शाकाहारी होना है। सड़क पर सरेआम बकरे और भेड़ की आंतों से बना हुआ कबाब बिकता है और लोगों की भीड़ लगी रहती है। उत्तर प्रदेश के जिला फर्रूखाबाद के एक भूतपूर्व फौजी की मेहरबानी है कि वह करगिल का एकमात्र शाकाहारी ढाबा चलाता है। इसके अलावा शहर के सबसे बड़े होटल सियाचिन में मिलने को शाही पनीर मिल जाता है लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि उसके अंदर से हड्डियाँ नहीं निकलेंगी। करगिल में एक डिग्री कॊलेज है और सुना है कि लेह की तरह दिल्ली पब्लिक स्कूल की शाखा भी खुलने वाली है। मगर जो शहर शुरू होने से पहले खत्म हो जाता है और जहाँ आधुनिकता का प्रतीक दुकानों में बिकते हुए डीवीडी प्लेयर और एयरटेल तथा बीएसएनएल के सिम कार्ड हैं, वहाँ इतने अभिजात स्कूल में पढ़ने कौन आएगा?



करगिल से द्रास गए बगैर न पर्यटन और न ज्ञान दोनों के हिसाब से यह यात्रा संपन्न नहीं होगी। करगिल की असली लड़ाई तो द्रास के पहाड़ों और मैदानों में हुई थी और क्योंकि जिला करगिल पड़ता है इसीलिए इसे करगिल युद्ध की संज्ञा दी गई थी। द्रास में टाइगर हिल के ठीक नीचे और थ्री पीमपल्स यानी तीन मुहाँसे के नाम से चर्चित पहाड़ियों की श्रृंखला की तलहटी में एक स्मारक उन शहीदों का बनाया गया है, जो इस पागलपन के दौर में शहीद हुए। 26 जुलाई को हर साल यहाँ विजय दिवस मनाया जाता है। इस स्मारक में काले पत्थर पर सुनहरे अक्षरों से उन शहीदों के नाम भी लिखे हैं, जिन्होंने अपनी जान गँवाई और एक पत्थर युवा शहीद बिजयेंद्र थापर के पिता के हाथ का भी लगाया हुआ है। अटपटा सिर्फ यह लगता है कि स्मारक चिन्ह के नाम पर बीयर के मग मिलते हैं, जिनमें एक तरफ तोलोलिंग पहाड़ का चित्र है और दूसरी ओर टाइगर हिल का। शहीदों के नाम पर लोग उनकी अंतिम स्थली के चित्रों के साथ बीयर पीएँ, यह कुछ समझ में नहीं आता।



करगिल पहुँचाने के लिए लेह ही एकमात्र रास्ता नहीं है। एक रास्ता श्रीनगर से सोनमर्ग होते हुए, जो-जिला दर्रे में से जाता है और सोलह किलोमीटर का यह इलाका इतना भयानक है कि वहाँ पहुँचते ही आप भगवान को याद करने लगेंगे। नीचे बहुत गहरी खाई और वह भी इतनी गहरी कि वहाँ से गिरे तो आप सीधे अमरनाथ के रास्ते में आने वाले उस बालटाल में गिरेंगे, जहाँ से अमरनाथ का रास्ता जाता है। गिरे तो हड्डियाँ भी नहीं मिलेंगी। लेकिन यह रास्ता भी खूब चलता है। जम्मू कश्मीर राज्य परिवहन की बसों से ले कर पर्यटकों की गाडियाँ लदी-फदी करगिल की ओर जाती हैं। करगिल, जो हमारा सामरिक तीर्थ है। चलते-चलते करगिल की संस्कृति के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि वहाँ एक ही दुकान पर दलाई लामा और सद्दाम हुसैन दोनों के फोटो लगे मिल जाएँगे। यह बौद्ध और शिया पंथ को मानने वाले लोगों का इलाका है।

वैदिक धर्म और इस्लाम : अ ग्रेट इंटरफेथ डॊयलॊग (कलकत्तावासी भाग लें )

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वैदिक धर्म और इस्लाम : अ ग्रेट इंटरफेथ डॊयलॊग




आज कलकत्ता में आयोजित होने जा रहे वैदिक धर्म और इस्लाम : अ ग्रेट इंटरफेथ डॊयलॊग कार्यक्रम में



इन दिनों भारत प्रवास पर आए



को सुनें



















समय - २९ मार्च २००९, रविवार, सायं बजे
स्थल - कला कुञ्ज (कला मन्दिर), ४८ शेक्सपियर सरणी, कलकत्ता -१७


नीचे इमेज पर क्लिक कर बड़ा कर देखें


डॉ. मारिया नेज्यैशी की 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' संपन्न

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डॉ. मारिया नेज्यैशी की 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' संपन्न









हैदराबाद, २७ मार्च २००९



"हंगरी की जनता को अपनी भाषा से अत्यधिक लगाव है। वह अपनी भाषा को सम्मान का प्रतीक मानती है इसीलिए उसने उसे बचा कर रखा है तथा सभी स्तरों पर सारे काम काज वहां हङ्गेरियन भाषा में ही किये जाते हैं। प्रारम्भिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की सभी विषयों की शिक्षा हङ्गेरियन में ही दी जाती है - चाहे वह अर्थ शास्त्र हो या भौतिक विज्ञान। वहां के छात्र भारत और भारतीय संस्कृति को समझने के लिए अत्यंत समर्पण भाव से हिंदी भाषा और साहित्य का अध्ययन करते हैं। हंगरी के लोगों को हिंदी सीखने में अधिक कठिनाई नहीं होती और वे जल्दी ही अधिकार पूर्वक हिंदी में वार्तालाप करना सीख जाते हैं॥ मैं भारत की अपनी यात्राओं में सर्वत्र हिंदी में ही बोलती हूँ। और मेरी राय है कि हिंदी के सम्बन्ध में असुरक्षा भाव नहीं रखना चाहिए।"


ये विचार यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मलेन कक्ष में आयोजित विशेष कार्यक्रम 'साहित्यकारों से गुफ्तगू' में नगरद्वय के विविध भाषाभाषी लेखकों से बात करते हुए तथा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए डॉ.मारिया नेज्यैशी ने व्यक्त किये. डॉ. मारिया नेज्यैशी हंगरी के युटोस लोरांड विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रीडर हैंतथा इन दिनों भारत प्रवास पर हैं. उनके नगरागमन पर आयोजित इस कार्यक्रम में हैदराबाद के हिंदी सेवियों और रचनाकारों की ओर से पुस्तकें समर्पित कर उनका सम्मान किया गया. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सचिव के.विजयन ने सभा-चिह्न से अलंकृत शाल पहनाकर डॉ.मारिया नेज्यैशी का अभिनन्दन किया.


आयोजन की अध्यक्षता करते हुए 'स्वतंत्र वार्ता ' के सम्पादक डॉ.राधे श्याम शुक्ल ने यूरोप में हंगरी तथा भारत में हैदराबाद की तुलना करते हुए कहा कि ये दोनों ही अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण अपने अपने क्षेत्र में दिल के समान माने जाते हैं. अतः यह आयोजन दो दिलों के मिलन जैसा आह्लादकारी और रोमांचक है. उन्होंने भाषा, साहित्य और संस्कृति के परस्पर संबंधों की चर्चा करते हुए बल देकर यह कहा कि भारतीयों को हंगरी से भाषा प्रेम और सांस्कृतिक स्वाभिमान की प्रेरणा लेनी चाहिए.


आरम्भ में मुख्य अतिथि डॉ. मारिया नेज्यैशी ने दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार, शिक्षण, प्रशिक्षण और शोध के सम्बन्ध में कई प्रकार की जिज्ञासाएँ प्रकट कीं जिनका समाधान करते हुए उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने हिंदी भाषा आन्दोलन के इतिहास, लक्ष्य, स्वरूप और संभावनाओं पर प्रकाश डाला. डॉ. मारिया नेज्यैशी ने हिंदी प्रचार में महिलाओं की भूमिका तथा द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी की पाठ्य पुस्तकों के निर्माण की प्रक्रिया में विशेष रुचि प्रकट की.


'गुफ्तगू' के दौरान डॉ.कविता वाचक्नवी, डॉ. रोहिताश्व, डॉ. राजकुमारी सिंह, डॉ. धर्म पाल पीहल और डॉ. पी माणिक्याम्बा ने मुख्य अतिथि से हंगरी भाषा, वहां के जनजीवन, रीति रिवाज़, साहित्य की प्रवृतियों, साहित्यकारों के सम्मान तथा हिंदी सीखने की सुविधा और बाधा जैसे विविध विषयों पर सवाल किए.


बातचीत में डॉ.तेजस्वी कट्टीमनी, डॉ. बी बालाजी, डॉ.रोहिताश्व, डॉ.कविता वाचकनवी, डॉ.रेखा शर्मा, डॉ..बलविंदर कौर, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.कांता बौद्ध, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल,, पवित्रा अग्रवाल, डॉ. अहिल्या मिश्र, संपत देवी मुरारका, डॉ. करण सिंह ऊटवाल , सीमा मेंडोस, श्रीनिवास सोमानी, आशादेवी सोमानी, पुष्पलता शर्मा, सविता सोनी, उमा देवी सोनी, डॉ.सुरेश दत्त अवस्थी. डॉ.आनंद राज वर्मा, डॉ.भास्कर राज सक्सेना, डॉ.विजय कुमार जाधव, के.नागेश्वर राव, रामकृष्णा तथा भगवान दास जोपट आदि ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.खुर्शीदा बेगम ने गीत प्रस्तुत किया.


कार्यक्रम के संयोजक तथा उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाधाक्ष्य प्रो. तेजस्वी कट्टीमनी के धन्यवाद प्रस्ताव के उपरांत ''साहित्यकारों से गुफ्तगू'' का यह विशेष आयोजन युगादि की शुभकामनाओं के आदान प्रदान के साथ संपन्न हुआ.

- ऋषभ देव शर्मा


हिंदी भाषा चिंतन : विरासत से विस्तार तक

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पुस्तक चर्चा : ऋषभ देव शर्मा


हिंदी भाषा चिंतन : विरासत से विस्तार तक






यह संभव है कि विश्व की रचना किसी ईश्वर ने की हो , फिर भी यह तयशुदा है कि इसमें निहित वस्तुओं को नाम हम मनुष्यों ने दिए हैं और इसी से ये वस्तुएं हमारी चेतना का अंग बन पाई हैं. अलग अलग शब्दों में भारतीय भाषा चिंतन में यह दोहराया गया है कि हमारी शब्दावली को हमारे बाहरी और भीतरी विकास के साथ कदम से कदम मिला कर चलना पड़ता है. ऐसा न होने पर हमारी संकल्पनात्मक शक्ति धुंधली और अस्पष्ट होने लगती है.इस बात को आधुनिक भाषा चिंतकों ने भी माना है कि किसी समाज की प्रगति उसकी भाषा के आधुनिकीकरण से ही निर्धारित और निर्दिष्ट होती है. इसलिए भाषा विकास की यात्रा में हमें अपनी विरासत को संभालते हुए नै चुनौतियों के अनुरूप परिवर्तनों को आत्मसात करते चलना पड़ता है. हिन्दी इन दोनों पक्षों का संतुलन साधने में सक्षम होने के कारण ही स्थानीयता और वैश्विकता की शर्तों को एक साथ पूरा कर रही है..इसके लिए वह एक ओर जहाँ सस्कृत और लोकभाषा में निहित अपनी जड़ों से जुडी हुई है ,वहीं दूसरी ओर आधुनिक ज्ञान विज्ञान और व्यापार वाणिज्य के निमित्त अन्य देशी विदेशी भाषाओँ से भी शब्द ग्रहण करने में परहेज़ नहीं करती.


प्रो. दिलीप सिंह [१९५१] ने अपने ग्रन्थ ''हिन्दी भाषा चिंतन'' में हिन्दी भाषा के इस सतत विकासमान स्वरूप का सम्यक भाषावैज्ञानिक विवेचन किया है.


ग्रन्थ के पहले खंड 'धरोहर' में हिंदी के शब्द संसार की व्यापकता और शक्ति को डॉ. रघुवीर के कोष पर पुनर्विचार के सहारे रेखांकित करने के बाद हिन्दी व्याकरण के तीनों कालों का लेखा जोखा प्रस्तुत किया गया है. विषद व्याकरण की ज़रुरत बताते हुए लेखक ने सावधान किया है कि हमें एक तो केवल स्थितियों को नियंत्रित करनेवाले भाषा के कामचलाऊ स्टार से बचना होगा तथा दूसरे,सामर्थ्यहीन, बनावटी, निर्जीव और संकीर्ण भाषा और शुद्धतावादी दृष्टिकोण के प्रति भी सावधान रहना होगा. ठीक भी है , वरना भाषा तो अपनी गति से प्रगति करती पहेगी और व्याकरण जड़ होकर पिछड़ जाएगा. यहीं लिखत और मौखिक भाषारूपों की भी चर्चा की गई है. इस खंड की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में हिन्दीभाषा विज्ञान में महिलाओं के योगदान के मूल्यांकन की चर्चा की जा सकती है.एक सुलझे हुए समाजभाषावैज्ञानिक के रूप में लेखक ने इस मूल्यांकन द्वारा स्त्री-विमर्श को भी व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ा है।


दूसरे खंड में समाज भाषा विज्ञान के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए भाषा प्रयोग की दिशाओं का जायजा लिया गया है. तीसरा खंड मानकीकरण को समर्पित है जबकि चौथे खंड में हिंदी भाषा और साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दो मुद्दे उठाए गए हैं.यहाँ लेखक ने ''दक्खिनी'' को हिंदी के विकास की मजबूत कड़ी के रूप में प्रस्तावित किया है और हिंदी तथा उर्दू के विवाद को बेमानी माना है.पांचवें खंड में स्वतंत्र भारत के सन्दर्भ में भाषा नियोजन का पक्ष विवेचित है. लेखक ने प्रयोजनमूलक हिंदी के नए नए रूपों के विस्तार को भी नियोजन का व्यावहारिक आयाम मानते हुए विविध ज्ञान शाखाओं और रोजगारपरक क्षेत्रों में प्रयुक्त भाषारूपों को भाषा की संप्रेषण शक्ति और जिजीविषा का प्रतीक माना है.इसीलिये हिन्दी की प्रयोजन मूलक शैलियों की विस्तृत चर्चा करते हुए छठे खंड में जहाँ व्यावसायिक हिंदी के विविध रूप वर्णित हैं , वहीं पत्रकारिता और साहित्य समीक्षा की भाषा के साथ पहली बार पाक-विधि की भाषा का सोदाहरण विवेचन करते हुए आधुनिक हिंदी के अभिव्यक्ति-सामर्थ्य का दृढ़ता पूर्वक प्रतिपादन किया गया है.


सातवें और अंतिम खंड ''हिंदी का विस्तार'' में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के योगदान का तटस्थ मूल्यांकन करने के साथ हिंदी भाषा के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य पर विचार किया गया है. इस प्रकार यहाँ हिंदी के स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक सभी सन्दर्भ विविध पक्षों के साथ उभर कर सामने आ सके हैं. इस प्रकार यह कृति इस तथ्य को भली भाँति असंदिग्ध रूप में प्रतिपादित करती है कि -


''हिंदी भाषा मात्र एक व्याकरणिक व्यवस्था नहीं है, वह हिंदी भाषा समुदाय में व्यवस्थाओं की व्यवस्था के रूप में प्रचलित और प्रयुक्त है ; इस तथ्य के प्रकाश में निर्मित हिंदी-व्याकरण ही भाषा के उन उपेक्षित धरातलों पर विचार कर सकेगा जो वास्तव में भाषा प्रयोक्ता के भाषाई कोष की धरोहर हैं. कोई भी जीवंत शब्द और जीवंत भाषा एक नदी की तरह विभिन्न क्षेत्रों से गुजरती और अनेक रंग-गंध वाली मिटटी को समेटती आगे बढ़ती है. हिंदी भी एक ऐसी ही जीती जागती भाषा है. इसके व्यावहारिक विकल्पों को व्याकरण में उभारना , यही एक तरीका है कि हम हिंदी को उसकी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय भूमिका में आगे ले जा सकते हैं.''




हिंदी भाषा चिंतन / प्रो. दिलीप सिंह /
वाणी प्रकाशन,
२१-ऐ, दरियागंज , नई
दिल्ली - ११०००२ /
२००९ / ४०० रुपये /
२८८ पृष्ठ -सजिल्द।

२३ मार्च की चिट्ठाचर्चा : कही न जाए, का कहिए

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२३ मार्च की चिट्ठाचर्चा : कही न जाए, का कहिए

कविता वाचक्नवी




कल
२३ मार्च बलिदान दिवस के दिन सोमवार होने के कारण चिट्ठाचर्चा का नियत दिन मेरा था,जिसके लिए मनोयोगपूर्वक तैयार की गयी सामग्री को प्रकाशित करने में नाकों चने चबाने पड़ गएएक पोस्ट के लिए निरंतर लगभग ३२ घंटे की सिटिंग देना भी मेरा निरर्थक हो जाता, यदि अनूप जी ने अंत में उसे अपने यत्न से हल कर के रात को अंततः प्रकाशित करने में सफलता पाई होतीजाने क्या तकनीकी समस्या गयी थी कि बार बार एरर और ब्लोगर की अक्षमता का संदेश रहा था तथा पब्लिश या सेव करने पर संदेश उड़ जाता थाअस्तुसंभवतः कोई अज्ञातशक्ति ऐन मौके पर लगन और प्रतिबद्धता की सच्चाई की परीक्षा ले रही होगी| २३ मार्च व्यतीत होने से कुछ पूर्व ही प्रविष्टि लग पाई

किंतु उस प्रविष्टि के जिस दूसरे भाग को कल सायं लगाने की दृष्टि से मैंने सँजो कर रख लिया था, वह चित्रावली थीअब इसे आगामी सोमवार तक टालने की अपेक्षा यहीं प्रस्तुत कर रही हूँआशा है, सभी इस ऐतिहासिक महत्व की सामग्री को उपयोगी पाएँगे










भगतसिंह का परिवार (बाएँ से) -
माता हुकमकौर (चाची), माता विद्यावती(माँ), माता जयकौर (दादी), माता हरनामकौर (चाची)








माता विद्यावती का युवकों को संदेश






























भगतसिंह को मृत्युदंड के आदेश
































भगतसिंह के trial के आधिकारिक दस्तावेज़

































भगतसिंह का पंजाबी(गुरुमुखी) में लिखा पत्र















भगतसिंह का उर्दू में लिखा पत्र ----------------------भगतसिंह का गुरुमुखी पंजाबी में लिखा पत्र


























क्रांतिकारी सुखदेव की माँ----------------- क्रांतिकारी राजगुरु की माँ




























वीरबलिदानी चंद्रशेखर आजाद -------------------------------- चन्द्रशेखर आजाद की माँ




























हिन्दी हस्तलेख में लिखा गत सिंह का पत्र------------ उर्दू हस्तलेख में गतसिंह की प्रिय पंक्तियाँ *

















*
उर्दू हस्तलेख में भगतसिंह की प्रिय पंक्तियों का देवनागरी पाठ


यह न थी हमारी किस्मत जो विसाले यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तेज़ार होता

तेरे वादे पर जिऐं हम तो यह जान छूट जाना
कि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहदे फ़र्दा
कभी तू न तोड़ सकता अगर इस्तेवार होता

यह कहाँ की दोस्ती है (कि) बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म गुसार होता

कहूँ किससे मैं के क्या है शबे ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता
(ग़ालिब)

इशरते कत्ल गहे अहले तमन्ना मत पूछ
इदे-नज्जारा है शमशीर की उरियाँ होना

की तेरे क़त्ल के बाद उसने ज़फा होना
कि उस ज़ुद पशेमाँ का पशेमां होना

हैफ उस चारगिरह कपड़े की क़िस्मत ग़ालिब
जिस की किस्मत में लिखा हो आशिक़ का गरेबाँ होना
(ग़ालिब)

मैं शमाँ आखिर शब हूँ सुन सर गुज़श्त मेरी
फिर सुबह होने तक तो किस्सा ही मुख़्तसर है

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबाने अक़्ल
लेकिन कभी – कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

न पूछ इक़बाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ियत है उस की
कहीं सरेराह गुज़र बैठा सितमकशे इन्तेज़ार होगा

औरौं का पयाम और मेरा पयाम और है
इश्क के दर्दमन्दों का तरज़े कलाम और है
(इक़बाल)
अक्ल क्या चीज़ है एक वज़ा की पाबन्दी है
दिल को मुद्दत हुई इस कैद से आज़ाद किया

नशा पिला के गिराना तो सबको आता है
मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साकी
(ग़ालिब)

भला निभेगी तेरी हमसे क्यों कर ऍ वायज़
कि हम तो रस्में मोहब्बत को आम करते हैं
मैं उनकी महफ़िल-ए-इशरत से काँप जाता हूँ
जो घर को फूँक के दुनिया में नाम करते हैं।

कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले महफ़िल
चरागे सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।

आबो हवा में रहेगी ख़्याल की बिजली
यह मुश्ते ख़ाक है फ़ानी रहे न रहे

खुदा के आशिक़ तो हैं हजारों बनों में फिरते हैं मारे-मारे
मै उसका बन्दा बनूँगा जिसको खुदा के बन्दों से प्यार होगा

मैं वो चिराग हूँ जिसको फरोगेहस्ती में
करीब सुबह रौशन किया, बुझा भी दिया

तुझे, शाख-ए-गुल से तोडें जहेनसीब तेरे
तड़पते रह गए गुलज़ार में रक़ीब तेरे।

दहर को देते हैं मुए दीद-ए-गिरियाँ हम
आखिरी बादल हैं एक गुजरे हुए तूफाँ के हम

मैं ज़ुल्मते शब में ले के निकलूँगा अपने दर मांदा कारवाँ को
शरर फशाँ होगी आह मेरी नफ़स मेरा शोला बार होगा

जो शाख-ए- नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना पाएदार होगा।


सौजन्य : प्रो.चमनलाल



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