शून्य में किरण के पथ : मौलिक विज्ञान-लेखन


मौलिक विज्ञान-लेखन


क्या अन्तरिक्ष के शून्य में प्रकाश सरल रेखा में गमन करता है ?

विश्व मोहन तिवारी, एयर वाइस मार्शल (से.नि.)



इस प्रश्न का तो उत्तर कब का दिया जा चुका है ! हमें तो यही पढाया गया है. आज भी यही पढाया जा रहा है. क्या उस उत्तर में संदेह है ?


हम तो बचपन से देखते आ रहे थे कि प्रकाश की किरणें जब बादल के किसी छिद्र में से निकलकर कोहरे में से या छप्पर के किसी छिद्र में से निकलकर धुएँ या धूल में से गुज़रती हैं तब वे एकदम सीधी रेखा में गमन करती हैं. हमने प्रयोग शाला में भी परखा था कि उसके पथ के माध्यम में जब तक बदलाव न आए तब तक वह सरल रेखा में ही गमन करता है. जैसे कि पानी में एक सीधी छड़ी डालने पर वह हमें मुड़ी हुई दिखती है. और, कि उसका मुड़ना अपवर्तन के नियम का पालन करता है. अर्थात् किरण के पथ में माध्यम में बदलाव आने पर ही वह दिशा बदलती है. अपने मन की प्रयोग शाला में सोच कर भी देखा कि अंतरिक्ष के शून्य में किरण के पथ में माध्यम के बदलने या अपवर्तनांक (रिफ्रेक्टिव इंडैक्स ) के बदलने का भी प्रश्न नहीं और इसलिए प्रकाश किरण के अपवर्तन की भी संभावना नहीं. अर्थात शून्य में प्रकाश के सरल रेखा में गमन का नियम ब्रह्माण्ड में भी सही है .   


यह नियम केवल हमने ही सही पाया हो ऐसी बात नहीं. १९०५ तक सभी वैज्ञानिक भी इसे बिलकुल सही मान रहे थे. १९०५ में जब आइंस्टाइन ने अपना विशेष सापेक्षिकी का सिद्धांत प्रस्तुत किया था तब ही यह प्रश्न उठा था. और सच तो यह है कि १९१९ में जाकर ही वैज्ञानिकों ने जब पूर्ण सूर्यग्रहण के समय एक अद्भुत प्रयोग में देखा, परखा और मापा तब कहीं यह माना कि शून्य में भी प्रकाश किरण का सरल रेखा में गमन करना आवश्यक नहीं है ! तब प्रश्न उठता है कि यह कैसे हो सकता है कि बिना माध्यम में परिवर्तन हुए प्रकाश किरण का अपवर्तन हो ?   


अपने १९०५ के क्रांतिकारी प्रपत्र में आइंस्टाइन ने विश्व में संभवतः सबसे प्रसिद्ध सूत्र E = mCsquared का आविष्कार (खोज?) किया था. यह इतना क्रांतिकारी था कि बड़े बड़े वैज्ञानिक उनके इस सूत्र को और उसी सुनहरे वर्ष में प्रकाशित उनके (विश्व के) सर्वाधिक क्रांतिकारी आविष्कारी प्रपत्र 'विशेष सापेक्षिकी सिद्धांत' को नहीं समझ पा रहे थे और इसीलिए उन्हें प्रसिद्धि मिलने में बहुत विलंब हुआ.   


आइंस्टाइन के उस क्रांतिकारी सूत्र का निष्कर्ष था कि पदार्थ और ऊर्जा वस्तुतः भिन्न नहीं हैं. वे एक दूसरे में परिवर्तित होते रहते हैं. पदार्थ को ऊर्जा में बदला जा सकता है जैसे एटम बोम्ब  में , और ऊर्जा को पदार्थ में जैसे कि सृष्टि सृजन के समय महान विस्फोट के प्रारंभ में केवल ऊर्जा ही थी किन्तु जैसे ही तापक्रम थोड़ा कम हुआ ऊर्जा इलैक्ट्रोन प्रोटोन आदि पदार्थों में बदलने लगी थी. उसमें दूसरी क्रांतिकारी खोज यह थी कि प्रकाश की किरणें पदार्थ के कणों का प्रवाह हैं. तब तक वैज्ञानिक प्रकाश को विद्युत चुम्बकीय तरंग ही मान रहे थे. और क्यों नहीं ! आखिर एक अत्यंत सम्माननीय वैज्ञानिक जेम्स मैक्सवेल ने 1864 में विद्युतचुम्बकीय तरंग के अस्तित्व की भविष्य वाणी की थी. उन्होंने घोषणा की थी कि ऐसी तरंगें होना चाहिए जिनमें विद्युतचुम्बकीय गुण होना चाहिए तथा जिनका वेग तीन लाख किलो मीटर प्रति सैकंड होना चाहिए. उस समय वैज्ञानिकों को ज्ञात था कि प्रकाश का वेग भी इतना ही है. किन्तु उन्हें यह नहीं ज्ञात था कि प्रकाश तरंगें विद्युतचुम्बकीय तरंगें ही हैं. विद्युतचुम्बकीय तरंगें सर्व प्रथम १८७५ में हर्ट्ज़ ने प्रयोगशाला में प्रर्दशित की थीं जो तरंगें रेडियो तरंगें थीं. और फिर यह भी समझ मैं आ गया कि प्रकाश तरंगें भी विद्युत चुम्बकीय तरंगे हैं. १९०५ तक प्रकाश किरणों के इस तरंग रूप से प्रकाश तथा अनेक अन्य विद्युत चुम्बकीय तरंगों की अनेक घटनाओं की सही व्याख्या हो चुकी थी. जैसे कि प्रकाश की किरण माध्यम के बदलने पर अपवर्तन करती हैं, कि जब दो किरणें टकराती हैं तब उनमें व्यतिकरण होता है, इत्यादि. यह कैसे हो सकता है कि प्रकाश एक बहुरूपिये के समान कभी तरंग तो कभी कण का रूप रख ले !! तरंग और कण तो एक दूसरे से नितांत भिन्न होते हैं. आश्चर्य सभी को हो रहा था कि यथार्थ में प्रकाश एक बहुरूपिये के समान कभी तरंग तो कभी कण का रूप रख रहा था. विज्ञान जगत में आइंस्टाइन ने पदार्थ और ऊर्जा के एक बड़े द्वैत को तो मिटाया किन्तु यह एक नया अजूबा खड़ा कर दिया था.  


प्रकाश की व्यतिकरण क्रिया में प्रकाश की दो किरणें आपस में टकराती हैं तब उसके फलस्वरूप कहीं प्रकाश की तीव्रता  बढ़ जाती है और कहीं पर कम हो जाती है, इस व्यवहार को तरंगों द्वारा ही समझाया जा सकता है, कणों के द्वारा नहीं. तरंगों में जल की लहरों के समान शीर्ष (crests) तथा द्रोनिकाएँ  (troughs) होती हैं . यदि एक तरंग की द्रोणी दूसरी तरंग के शीर्ष से मिलेगी तब मिली हुई किरणों की तीव्रता में कमी होगी और यदि एक किरण का शीर्ष दूसरी किरण के शीर्ष से मिलेगा तब उनकी तीव्रता  बढ़ेगी. इस व्यवहार को और अनेक व्यवहारों को किरण को कणों का प्रवाह मानकर नहीं समझ सकते, तरंगें मानकर ही समझ सकते हैं.   


वैज्ञानिक कोई भी नियम बनने के पहले तो बहुत सी परीक्षाएँ करते ही हैं किन्तु नियम बन जाने के बाद भी उसकी परीक्षा करते रहते हैं क्योंकि विज्ञान का एक सिद्धांत है कि प्रमाणित नियम भी भविष्य में गलत सिद्ध हो सकता है. इसी तरह की परीक्षा करते समय एक और विचित्र पहेली ने वैज्ञानिकों को उलझा कर रख दिया था. कुछ विशेष पदार्थों पर जब प्रकाश की किरणें पड़ती हैं तब वह पदार्थ कुछ मात्रा में इलेक्ट्रा^नों का उत्सर्जन करता है इस प्रक्रिया को प्रकाश विद्युत (photoelectric) प्रक्रिया कहते हैं. प्रकाश विद्युत (photoelectric) की प्रक्रिया को भी १९०२ तक प्रकाश को 'विद्युतचुम्बकीय तरंग' मानकर ही समझे जाने की कोशिश की जा रही थी. वैज्ञानिकों की समझ यही कहती थी कि उत्सर्जित इलेक्ट्रानों की ऊर्जा उस विशेष पदार्थ पर पड़ती - किरणों की तीव्रता पर निर्भर करेगी, अर्थात जितना तेज प्रकाश होगा उत्सर्जित एलेक्ट्रोनो की ऊर्जा या वेग उतना ही अधिक होगा क्योंकि प्रत्येक इलेक्ट्रोन को प्रकाश की तरंग अधिक ऊर्जा दे सकेगी. यह निष्कर्ष विद्युतचुम्बकीय तरंग सिद्धांत के आविष्कारक जेम्स मैक्सवेल के सिद्धांत के अनुकूल भी है, जिस के अनुसार प्रकाश किरण की ऊर्जा उसकी tIva`ta  तीव्रता (तरंग के आयाम के) के अनुपात में होती है. किन्तु प्रयोगों में ऐसा देखने में नहीं आ रहा था. १९०२ में प्रकाश विद्युत प्रक्रिया का एक विचित्र व्यवहार सामने आया. विज्ञान की यही तो विशेषता है कि वे सत्य की खोज में प्रयोग करते रहते हैं. लेनर्ड ने देखा कि उत्सर्जित इलेक्ट्रानों की ऊर्जा उस विशेष पदार्थ पर पड़ती प्रकाश की तीव्रता पर नहीं वरन उनके रंग अर्थात आवृत्ति पर निर्भर करती है. यह व्यवहार जैसा कि ऊपर समझाया है, वैज्ञानिक समझ तथा मैक्सवेल के सिद्धांत के प्रतिकूल है. इसे उस काल के वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर यह ऊर्जा रंग पर क्यों निर्भर कर रही है ! यह एक पहेली बन गयी थी.   


१९०५ में आइंस्टाइन ने अपने विश्व प्रसिद्ध प्रपत्र में प्रकाश को किरणों की तरंग न मानकर, कणों का प्रवाह मानकर इस घटना को समझाया. उन्होंने मैक्स प्लांक की अवधारणा को समुन्नत कर यह क्रांतिकारी अवधारणा प्रस्तुत की. १९०१ में मैक्स प्लांक ने कृष्णिका (Black Body) द्वारा ताप विकिरण के नियम को समझाने के लिए एक नई अवधारणा प्रस्तुत की थी. कृष्णिका वह पिंड होता है जो ताप को ज़रा भी परावर्तित नहीं करता है अर्थात उस पिंड पर पड़ने वाली सभी ताप की तरंगों को सोख लेता है. उस समय तक सभी वैज्ञानिक ताप किरणों को तरंगों का सतत् प्रवाह मानते थे. मैक्स प्लांक ने ताप किरणों को लहर तो माना किन्तु उन्हें सामान्य लहरों के समान सतत प्रवाह न मानते हुए रेलगाडी के डिब्बों के समान( बिना उन डिब्बों के बीच के जोड़ के) निश्चित खंडों में प्रवाहित माना, किन्तु उन्होंने उसे कणों का प्रवाह नहीं कहा. अर्थात वे उसे तरंगों के छोटे छोटे टुकडों में बहता हुआ तरंगों का प्रवाह ही मान रहे थे. पदार्थों के कणों का प्रवाह नहीं. उस प्रवाह का एक खंड ऊर्जा का क्वांटम कहलाया. आइंस्टाइन ने भी एक AaOr baD,a क्रांतिकारी कदम रखा. उन्होंने प्लांक की कल्पना को समुन्नत कर साक्षात रूप दिया , और समझाया कि प्रकाश किरण के वे खंड कण हैं और कण अर्थात क्वांटम की ऊर्जा उनकी आवृत्ति के अनुपात में होती है. अर्थात नीले प्रकाश के क्वांटम में लाल प्रकाश के क्वांटम से अधिक ऊर्जा होती है. आधुनिक क्वांटम भौतिकी का जन्म इसी क्वांटम की अवधारणा से होता है. ( इस रोचक विषय पर बातचीत बाद में.)   


अब तो लेनर्ड के प्रयोग को समझना सरल हो गया था. जिस किरण की आवृत्ति जितनी अधिक होगी उसके प्रकाश कण की ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी और ऐसा कण जिस भी एलेक्ट्रोंन से टकराएगा उसे उतनी ही अधिक ऊर्जा दे सकेगा. और साथ ही उत्सर्जित इलेक्ट्रानों की संख्या उस प्रकाश की तीव्रता अर्थात क्वाnTमों की संख्या पर निर्भर करेगी. अर्थात आइंस्टाइन ने सिद्ध कर दिया कि प्रकाश क्वांटम कणों का प्रवाह है, इन कणों को 'फोटोन'   कहते हैं. अर्थात्  प्रकाश किरण की स्थिति 'द्वैतमय' हो गयी - कण भी और तरंग भी, क्योंकि कोई भी एक मान्यता अर्थात तरंग या कण से प्रकाश के सभी व्यवहार समझ में नहीं आते.  


मजे की बात यह है कि आधुनिक भौतिकी में प्रकाशविद्युत प्रभाव को समझाने के लिए प्रकाश को कणों का प्रवाह न मानकर तरंग भी माना जाता है ! वैसे भी, आज की भौतिकी मैं यह कण तरंग द्वैत समाप्त हो गया है.( इस रोचक विषय पर बातचीत बाद में.) अन्तरिक्ष में विराट शून्य के सागर में मंदाकिनियाँ तथा निहारिकाएँ छोटे छोटे द्वीपों के समान हैं. तब पदार्थ के वितरण की दृष्टि से तो अधिकाँश अन्तरिक्ष शून्य ही है. तब प्रकाश की किरण को सरल रेखा में ही गमन करना चाहिए, इसमें संदेह क्यों ? इस पर संदेह सबसे पहले आइंस्टाइन ने ही किया था ! संदेह ही नहीं वरन घोषणा की थी कि अंतरिक्ष के तथाकथित शून्य में प्रकाश किरण वक्र पथ पर चलती है. यदि अंतरिक्ष शून्य है तब क्या प्रकाशकिरण संत तुलसीदास की जोंक के समान कुटिल स्वभाव वाली है जो जल के सीधेपन के बावजूद आड़ी तिरछी चलती है! नहीं विज्ञान में ऐसी कुटिलता की बात नहीं. एक सच्चे वैज्ञानिक की तरह आइंस्टाइन ने एक निर्दिष्ट तारे से सूर्य के निकट से आने वाली किरण की वक्रता का कोण भी घोषित कर दिया था. वैज्ञानिक जगत में तहलका मच गया था. सभी वैज्ञानिकों ने उनकी घोषणा पर लगभग ८ वर्ष तक घोर संदेह व्यक्त किया था. प्रथम विश्व युद्ध के कारण प्रयोग नहीं हो पा रहे थे. क्योंकि जर्मनी की एक ऐसी टीम को रूस ने १९१४ में गिरफ्तार कर लिया था जिसे युद्ध के चार वर्षों बाद मुक्त किया गया था ! यहाँ तक कि जब विश्व प्रसिद्ध ब्रिटिश वैज्ञानिक एडिंग्टन ने द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् उस वक्रता को मापने के लिए दो अभियान भेजे तब तक भी उनके मन में आइंस्टाइन की भविष्यवाणी पर कुछ संदेह तो था.  


और वैज्ञानिकों की दुनिया का यह एक अद्भुत उदाहरण है कि एक देश के वैज्ञानिक अपने शत्रु देश के वैज्ञानिक के सिद्धांत को परखने के लिए पहल कर रहे थे. ऐसे प्रयोग मैं जब दो स्थानों से यह वक्रता मापी गयी तब आइंस्टाइन की भविष्य वाणी सत्य सिद्ध हुई, और तब रातों रात आइंस्टाइन विश्व प्रसिद्ध हो गए. और १९०५ में प्रकाशित शोध प्रपत्र में प्रस्तुत अवधारणा ' प्रकाशविद्युत प्रक्रिया' पर, देर से ही सही, १९२१ में जाकर आइंस्टाइन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यह भी एक अजूबा है कि उन्हें भौतिकी की सर्वाधिक क्रांतिकारी खोज पर नोबेल पुरस्कार नहीं मिला.


ऐसी अवधारणा कि अंतरिक्ष के तथाकथित शून्य में प्रकाश किरण वक्र पथ पर चलती है , आइंस्टाइन ने किस आधार पर प्रस्तुत की थी ? उन्होंने कहा कि प्रकाश किरण ऊर्जा कणों (फोटानों) से बनी है, 'फोटोन' यदि ऊर्जा का कण है तब उसमें द्रव्य की मात्रा भी होगी. और जब यह द्रव्य सूर्य के निकट से निकलेगा तब वह उस भारी सूर्य के द्बारा गुरुत्वाकर्षण शक्ति से आकर्षित भी किया जाएगा. और जब वह कण आकर्षित होगा तब वह अपना सरल रेखा वाला पथ छोड़कर वक्र पथ में आ जाएगा. अर्थात प्रकाश किरण के अपवर्तन के अब दो कारण हो गए, एक, माध्यम के अपवर्तनांक में परिवर्तन, तथा दूसरा, गुरुत्वाकर्षण की शक्ति का होना. समस्त अन्तरिक्ष में द्रव्य पिंडों के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र हैं. अतः प्रकाश किरण अन्तरिक्ष के शून्य में हमेशा सरल रेखा में गमन नहीं कर सकती, हां अन्तरिक्ष में पिंडों से दूर प्रकाश किरण सरल रेखा में गमन करेगी !! यह भी सच है कि यह वक्रता अधिकतर नगण्य होती है क्योंकि अन्तरिक्ष के विराट सागर में मंदाकिनियाँ तथा नीहारिकाएं विरल द्वीपों के समान हैं जिनके निकट ही किरण पथ में मापने योग्य वक्रता आएगी. वैज्ञानिक इस प्रक्रिया का उपयोग एक लैंस की तरह भी करते हैं.


प्रश्न उठता है, विज्ञान में प्रश्न उठते ही रहते हैं, कि क्या अन्तरिक्ष शून्य है ? या इस विराट अंतरिक्ष में जो शून्य है वह सचमुच ही शून्य है. आखिर, क्या है अन्तरिक्ष? अन्तरिक्ष का ओर छोर कहाँ है? 






6 comments:

  1. सार्थक शब्दों के साथ तार्किक ढ़ंग से विषय के हरेक पक्ष पर प्रकाश डाला गया है।

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  2. बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातों को बताने वाली बोधगम्य पोस्ट। प्रस्तुति का धन्यवाद।

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  3. हाइज़ेन्बेर्ग के तरंगपिंड [wavecle]सिद्धांत ने भी इस विषय की व्याख्या में योग किया.हम भारतीयों को ये बातें जीव और ब्रह्म की अद्वैत चर्चा जैसी रोचक लगती हैं! लेखक को अनेकशः साधुवाद!

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  4. विस्तृत विवेचन अच्छा लगा ! गंभीर मनन को मजबूर कर गया !! पुराने वैज्ञानिक फार्मूले भी याद आये!!

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  5. (ईमेल से प्रेषित सन्देश)


    सम्मान्य तिवारी जी ,
    अभिवादन स्वीकार करें

    हिंदी में विज्ञान का गंभीर लेख देख कर प्रसन्नता हुई .सुन्दर भाषा में अच्छाआलेख. लेकिन एक निवेदन . आप समकालीन विज्ञान पर अधिक लिखें . जो बातें किताबों में दसकों पहले आ चुकी हैं उन्हें दोहराना बहुत उपादेय नहीं .फिर भी सुखद अनुभव .लेखन जारी रखें .अगले आलेख की प्रतीक्षा है .

    आपका
    राधेश्याम शुक्ल

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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