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बाजार बनाम साहित्य


बाजार बनाम साहित्य


राजकिशोर




पहले जिस तरह पूँजी और पूँजीवाद के खिलाफ कविताएँ लिखी जाती थीं, वैसे ही आजकल बाजार और बाजारवाद के विरुद्ध लिखी जा रही हैं--हालाँकि ये उनसे काफी बेहतर हैं, क्योंकि इस बीच हिंदी कविता कई तरह से प्रौढ़ हुई है। चूँकि प्रगतिशील लोगों के लिए आज का युग बोध यही है, इसलिए कहानियाँ भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। उदय प्रकाश की पैनी दृष्टि ने काफी पहले ही इस विषय के महत्व को समझ लिया था। अपनी प्रसिद्ध कहानी "पीली छतरी वाली लड़की' में उन्होंने बाजार के इस दर्शन का मार्मिक चित्रण किया है। जिन्होंने यह कहानी नहीं पढ़ी है, उनके लिए : "इससे ज्यादा मत खाओ, इससे ज्यादा मत कमाओ, इससे ज्यादा हिंसा मत करो, इससे ज्यादा संभोग मत करो, इससे ज्यादा मत सोओ, इससे ज्यादा मत नाचो ... वे सारे सिद्धांत, जो धर्म ग्रंथों में भी थे, समाजशास्त्र या विज्ञान अथवा राजनीतिक पुस्तकों में भी, उन्हें कूड़ेदान में डाल दिया गया था। इस आदमी ने बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में पूँजी, सत्ता और तकनीक की समूची ताकत को अपनी मुट्ठियों में भर कर कहा था : स्वतंत्रता! चीखते हुए, आजादी! अपनी सारी एषणाओं को जग जाने दो। अपनी सारी इंद्रियों को इस पृथ्वी पर खुल्ला चरने और विचरने दो। इस धरती पर जो कुछ भी है, तुम्हारे द्वारा भोगे जाने के लिए है। कोई राष्ट्र है, कोई देश। समूचा भूमंडल तुम्हारा है।' अगले परिच्छेद में इसके भारतीय संदर्भ को भी स्पष्ट कर दिया गया है : "उस ताकतवर भोगी लोंदे ने एक नया सिद्धांत दिया था, जिसे भारत के वित्त मंत्री ने मान लिया था और खुद उसकी पर्स में जा कर घुस गया था।"



सच तो यह है कि कोई भी सच्चा लेखक बाजारवाद का समर्थक नहीं हो सकता, क्योंकि बाजार व्यावसायिक विनिमय का एक तंत्र है और साहित्य में वस्तुओं या सेवाओं का विनिमय नहीं, भावों का आदान-प्रदान होता है। कबीर जरूर बाजार में खड़े थे--बाजार ने ही उन्हें स्वतंत्रता का यह तोहफा दिया था कि वे किसी भी झूठ या मिथक का मजाक उड़ा सकें, लेकिन हाथ में लुकाठी लिये हुए। बाजार की संस्कृति जिस घर को भरने के लिए दृढ़ की गयी है, उसे जला देने के आह्वान के साथ। लेकिन बाजार और साहित्य का रिश्ता उतना सरल नहीं है, जैसा कुछ लोग समझते हैं। उदाहरण के लिए, कवि मिथिलेश श्रीवास्तव ने पहले कविता संकलन "किसी उम्मीद की तरह' की पहली कविता ही "बाजार के खिलाफ' है। कविता की पंक्तियाँ है : मैं इनकार करता हूँ कि मैं जो भी बना रहा हूँ/बेचने की खातिर बना रहा हूँ।



कविता के 'मैं' को यदि कवि का सर्वनाम माना जाए, तो आशय यह निकलेगा कि मिथिलेश जो कुछ भी लिख रहे हैं या जो कविता बना रहे हैं, वह बेचने की खातिर नहीं है। कुछ लोगों को 'कविता बनाना' मुहावरे पर एतराज हो सकता है। वे कहेंगे, कविता हृदय से निकलती है कि बनाई जाती है। पर मुझे ऐसा कोई एतराज नहीं है। बोधा जैसे भावुक कवि ने भी कविता बनाना का प्रयोग किया है। जब चित्र बनाया जा सकता है, तो कविता भी क्यों नहीं बनायी जा सकती? खैर, इसमें कोई शक नहीं कि कविता बेचने की खातिर नहीं लिखी जाती। अच्छी होने के बावजूद आजकल वह बिकती भी नहीं। सिर्फ इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह बाजार की संस्कृति के खिलाफ है या बाजार के लिए नहीं है। तथ्य यह है कि जब वह संकलित की जाती है और उसे पुस्तक रूप में छपाने में सफलता प्राप्त कर ली जाती है, तो वह अर्थशास्त्र के नियमों के अधीन हो जाती है और बाजार के दर्शन का उल्लंघन नहीं कर सकती। आखिर प्रकाशक जब कविताओं की पुस्तकें छापते हैं और विभिन्न कारणों से छापते ही हैं, तो उस पर प्रकाशन व्यवसाय के नियम लागू होने लगते हैं। जिनके कविता संकलन इस गए-गुजरे जमाने में भी बिक ही जाते हैं -- जैसे केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी, उन्हें रॉयल्टी भी मिलती ही है। दुष्यंत कुमार का गजल संकलन "साये में धूप ' किसी भी बेस्ट सेलर से ज्यादा हिट हुआ है और आज भी बिकता ही रहता है। दुष्यंत भी बाजार और बाजारवाद के खिलाफ थे, पर उनकी इस अद्भुत कृति को बाजार में अद्भुत सफलता मिली। जिन किताबों को ऐसी सफलता नहीं मिलती या पूरी तरह से विफलता ही मिलती है, उनके बारे में भी किताब में यह घोषणा छपी रहती है कि कॉपीराइट कवि के पास ही है। बाजारवाद (तथा कई अन्य वादों) के खिलाफ लंबी कहानी "पीली छतरी वाली लड़की' पुस्तकाकार प्रकाशित हुई, तब उसमें भी यह घोषणा थी। सिर्फ इन घोषणाओं से ये लेखक बाजारवादी नहीं हो जाते। लेकिन यह सच्चाई जरूर प्रमाणित होती है कि आदमी के विचार जो भी हों, उसकी जीवन पद्धति अपने समय की राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था से ही निर्धारित होती है। दूसरे शब्दों में, संस्कृति का एक पक्ष हमेशा भौतिक होता है और अपने समय के वर्चस्वशाली भौतिक नियमों से ही परिचालित होता है। गांधी जैसा कोई आदमी ही, किसी हद तक, अपनी अलग लीक बना सकता है।



यही कारण है कि समाजवादी व्यवस्था में, जिसमें निजी संपत्ति नही होती, विश्वास करनेवाला व्यक्ति भी पूँजीवादी व्यवस्था में रहते हुए अपना निजी जीवन पूँजीवादी नियमों के तहत बिताता है। बाजारवाद का उपहास करनेवाला लेखक या कलाकार बाजार तंत्र के माध्यम से अपना साहित्यिक उत्पादन वितरित करता है। विवाह संस्था में विश्वास करनेवाले स्त्री-पुरुष वैवाहिक जीवन में सुख खोजते हैं। अंग्रेजी का विरोध करनेवाले माँ-बाप--नेता ही नहीं, लेखक भी--अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में भेजते हैं। महात्मा गाँधी ने "हिन्द स्वराज' में, जिसके महत्व का आविष्कार करनेवाले विचारकों की संख्या इस तरह बढ़ रही है कि डर लगता है, पाखंड की कोई सीमा रहने दी जायेगी या नहीं, रेल, डॉक्टर आदि के खिलाफ लिखा है, पर उन्हें अकसर रेल यात्रा करनी पड़ती थी और अनेक बार डॉक्टरों की शरण में भी जाना पड़ा। किसी के विचार और जीवन में इस स्तर पर अंतर्विरोध दिखाई पड़ता है, तो वह क्षमा का अधिकारी है। हाँ, क्षमा करने के पहले यह जरूर देखा जाना चाहिए कि उसका हृदय किधर है--मौजूदा व्यवस्था का अधिकाधिक लाभ उठाते जाने और फिर भी प्रगतिशील बने रहने की तरफ या मौजूदा व्यवस्था के साथ कम से कम समझौता करते हुए अपने मूल्यों के अनुसार जीवन जीने की तरफ। एक में वंचना है, दूसरे को व्यावहारिकता कहते हैं।




यह हमेशा विवादास्पद रहेगा कि लेखन और जीवन में फर्क को नजरअंदाज किया जाना चाहिए या नहीं। उदार लोग लेखक को कुछ छूट देना चाहेंगे; नैतिकतावादी उससे माँग करेंगे कि वह जैसा लिखता है, उसी तरह जिए भी। दोनों आग्रहों के पीछे ठोस तर्क हैं। इस प्रसंग में यह स्मरणीय है कि लेखन एक प्रकार का स्वप्न भी है--यथार्थ के कीचड़ में खिलनेवाला कमल। इस पुरानी उपमा के लिए माफ किया जाये, पर कीचड़ अब भी है और कमल भी इतने जिद्दी हैं कि खिलते ही रहते हैं। दुहराना जरूरी है कि यह स्वप्नदर्शिता ही लेखक को आदरणीय बनाती है--उसका निजी जीवन जैसा भी हो। लेकिन आज की समस्या कुछ और है। सवाल यह नहीं रह गया है कि कौन लेखक कैसा है। मामला यह है कि एक वर्ग के तौर पर लेखक समुदाय को उसी तरह सामान्य प्राणी माना जाने लगा है जैस दूसरे पेशों के लोग होते हैं। जब लेखक वर्ग की एक नकारात्मक छवि बन जाती है, तो समाज पर साहित्य का वह असर पड़ना बंद हो जाता है, जो अपेक्षित है। जब लोग देखते हैं या सुनते हैं कि लेखकों का बैलेंस शीट उनकी पुस्तक सूची से भारी है, या वे भी एक-दूसरे से कुंजड़ों की तरह लड़ते हैं, उनकी वासनाओं की धधक वही है, जो समाज के अन्य वर्गों की, जो लिखा जाता है, वह महज स्वादिष्ट माल बन कर रह जाता है। जब पाठक को एहसास होता है कि उत्कृष्टतम उपन्यास, कविता या कहानी भी महज एक साहित्यिक उत्पाद है, तो वह भी पाठक से उपभोक्ता में बदलने लगता है। ट्रेजेडी यह है कि सभ्यता जिधर बढ़ रही है, साहित्य की उसकी जरूरत बढ़ती जाती है, पर साहित्य खुद इस सभ्यता के मूल्यों का शिकार हो रहा है। वृंदावन बचा हुआ है, पर कृष्ण द्वारका के लिए कूच कर चुके हैं।



अगर लेखक बिरादरी सचमुच बाजार और बाजारवाद के विरुद्ध है, साहित्य की यह आकांक्षा और शक्ति अगर अभी भी बची हुई है कि वह मनुष्य के नैतिक आयाम को उद्बुद्ध कर सकता है, तो लेखकों को केवल अपने लेखन के माध्यम से इस वाणिज्यिक संस्कृति के मूल्यों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए, बल्कि अपनी जीवन शैली के माध्यम से भी अपना संदेश फैलाना चाहिए। जैसे किसी संन्यासी को देखते ही हम समझ जाते हैं कि वह हमारी दुनिया का जीव नहीं है, वैसे ही लेखक की उपस्थिति मात्र से यह प्रभाव पैदा होना चाहिए कि वह एक भिन्न तरह का व्यक्ति है।

०००



बाजार बनाम साहित्य बाजार बनाम साहित्य Reviewed by Kavita Vachaknavee on Wednesday, November 25, 2009 Rating: 5

3 comments:

  1. बहुत अच्छा आलेख। मैं आपकी बातों से सहमत हूं।
    ख़ुश्बू के बिखरने में ज़रा देर लगेगी
    मौसम अभी फूलों के बदन बांधे हुये है।

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  2. आज के साहित्यकार ही नहीं किसी से भी यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि वह अपनी आवाज़ से समाज का उद्धार करेगा। कितने ऊंचे स्वरों में हर कोने से आवाज़ आ रही है कि भ्रष्टाचार रोका जाना चाहिए... और परिणाम है सुखराम व मधुकोडा जैसे कई कई कई....

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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