आप मेरे जीवन में रंग भर सकते हैं ?




कौन करेगा काली होली को रंगीली?




सभी ओर जब रंग ही रंग छितरा हो, उमंग ही उमंग भरी हो, ऐसे में जीवन की काली कारा में बन्दी -सा जीवन ढोने वालों का स्मरण कौन करता है, जिसने कभी रंग देखे तक न हों!


कोई विरला ही ऐसे जीवन को रंग से भर सकता है।

क्या हम में से कोई है ऐसा?


- कविता वाचक्नवी






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7 comments:

  1. कविता जी, शायद कीर्ति चौधरी की इस कविता में आपके सवाल अपना उत्तर ढूंढ लें...
    शब्द पहले ही कम थे
    और मुश्किल से मिलते थे
    सुख-दुख की बातें करने को
    जैसे एक कंगाली सी छा गई है अब?
    ...सर झुकाकर निकल जाएं
    या हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें
    हवा का रुख पहचानने तक
    दबाए रहें दिल में गुबार
    होंठो को सी लें
    और चुप की दुनिया में चले जाएं
    जहां बड़े-बड़े प्रश्नचिह्नों
    और खाली सतरों की ग्रेविटी है.....

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  2. बढिया और मार्मिक चित्रण।

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  3. जीवन में उत्‍साह है, उमंग है लेकिन कभी-कभी रंग गायब हो जाते हैं और रह जाता है केवल एक रंग - काला। क्‍या रंग गायब होने से उत्‍साह समाप्‍त होता है? नहीं। हम किसी के भी जीवन को उत्‍साह से भर सकते हैं तो हम इस काले रंग को रंग-बिरंगा नहीं कर सकते? अवश्‍य कर सकते हैं। हम सभी संकल्‍प लें तो सब कुछ सम्‍भव है। यह देश अवश्‍य संकल्‍प लेगा।

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  4. सच कहा है=== कोई विरला ही ऐसे जीवन को रंग से भर सकता है.

    संतोष का विषय है की अभी दुनिया ऐसे विरलों से खाली नहीं हुई है.

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  5. कविता जी एक्स्पांड विजेट टेम्प्लेट करने की कोई जरुरत नहीं है सिर्फ ctrl+f की सहायता से ---< body >--- टैग ढूंगे और उसके ठीक निचे कोड कॉपी कर दें .कृपया --- और स्पेस हटा लें
    अपनी अपनी डगर http://sarparast.blogspot.com

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  6. शायद ही कोई हो । कहने को हो सकता है कई लोग सामने आ जाये पर हकीकत में बहुत कम है ।

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  7. कुछ कर गुजरने का हौसला हो तो क्या नहीं है संभव. ?
    आत्मविश्वास सबसे बड़ी जरुरत है . आभार.

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आपकी सार्थक प्रतिक्रिया मूल्यवान् है। ऐसी सार्थक प्रतिक्रियाएँ लक्ष्य की पूर्णता में तो सहभागी होंगी ही,लेखकों को बल भी प्रदान करेंगी।। आभार!

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