"अक्ष्णोर्मे चक्षुरस्तु"

हिन्दी भारत

" - हिन्दी भारत - " (भारत व भारतीयता से जुड़े सभी साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक प्रयासों, हिन्दी में रचनात्मक लेखन (विविध विधाएँ), भाषिक मंतव्यों, जीवनमूल्यों, पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिवृद्धि हेतु) ***** हिन्दी भारत ***** "

मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में - डॉ. देवराज

1 COMMENTS

मणिपुरी कविता : मेरी दृष्टि में

- डॉ. देवराज

======================

(१९)




नवजागरणकालीन मणिपुरी कविता

-------------------------------------




मणिपुर के साहित्यकार न केवल देश की मूक जनता को आज़ादी के लिए ललकार रहे थे बल्कि उन्हें अपने आध्यात्मिक इतिहास की भी याद दिला रहे थे। इस संदर्भ में डॉ. देवराज ने मणिपुरी कविता को खंगाला है और ऐसी कविताएँ प्रस्तुत की हैं जो मिथकों को उजागर करती हैं :

"आध्यात्मिक, दार्शनिक और रहस्यवादी भावना की व्यापक अभिव्यक्ति नवजागरणकालीन कविता की महत्वपूर्ण विशेषता है। ऐतिहासिक कारणों से मणिपुरी साहित्य का मध्यकाल बंगाल के मार्ग से आई वैष्णवी चेतना से अतिशय प्रभावित रहा है।

इस मिथ्या माया के मरीचिका-जाल में ही सारा संसार डूब रहा है, क्योंकि माया ने उसे इस क्षण मात्र में मोहित करके विवेकहीन बना दिया है :


मोहित कर लिया क्षण मात्र में

मिथ्या पवन बाँसुरी ने

डूब रहा है दुख में

संसार मृग मूर्खता से

[अशाङ्बम मीनकेतन सिंह]

"इस प्रतिकूल वातावरण में केवल ईश्वर ही वह सत्ता है, जो व्यक्ति का कल्याण कर सकती है, अत: उसी का गुणगान करना अनिवार्य है :


कहाँ है सच्चा मित्र

शक्ति-भर खोजा

शक्ति-भर सोचा

कोई नहीं ईश्वर के सिवा

बिना भेद किए काल का

विभक्त किए बिना मन को

करो स्मरण स्वामी का।

[चिङाखम मयुरध्वज]

"तत्कालीन कवियों ने इस प्रकार की अनेक रचनाओं के माध्यम से ईश्वर, प्रकृति, आत्मा आदि के स्वरूप और गुणों का वर्णन किया है। अध्यात्म और रहस्यवाद संबन्धी नवजागरणकालीन साहित्य की प्रकृति बहुत कुछ हिन्दी और बंगला कवियों से मेल खाती है। कबीर, मीरा, जयशंकर प्रसाद और रवीन्द्र के यहाँ इसके समतुल्य भाव खोजना कठिन नहीं है। कुछ कवियों ने तो ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं, जिन्हें पढ़ते समय गीता के श्लोक स्मृति में उभरने लगते हैं :


नाशवान है शरीर, अमर है आत्मा

आसान है नए वस्त्र धारण करना, पुराने छोड़

कर्म ही है करणीय, नहीं खोजो फल को

तुम सिर्फ़ हो कर्मी मैं हुं करने वाला

[राजकुमार शीतलजीत सिंह]

"दर्शन को प्रकृति के सहारे सहज रूप में प्रस्तुत करने वाली ऐसी अभिव्यक्तियाँ पाठक का ध्यान बरबस आकृष्ट करनी हैं :


प्रिय पुष्प हे कमल

हम भी तुम्हारी तरह हैं

इस भवसागर में

लिखते हैं बिखरने के लिए

[ख्वाइराकुपम चाओबा सिंह]

"नवजागरणकालीन मणिपुरी कविता में अपूर्व सौंदर्य दृष्टि दिखाई देती है। यह आश्चर्यचकित कर देनेवाला तथ्य है कि इन कवियों ने सौंदर्य तत्व का भावात्मक संवेगों के सहारे काव्य और कल्पना का विषय बनाया है। यह इन कवियों की निजी विशेषता ही कही जाएगी कि उनके पास सौंदर्य एक सांस्कृतिक दृष्टि के रूप में है, जिसके कारण वे अपनी रोमानी आदर्श प्रधान प्रवृत्ति के होते हुए भी सामान्य जीवन की सहजता और यथार्थ से विलगाव नहीं रखते। उनके लिए निर्धन श्रमजीवी नारी का जीवन कुछ इस प्रकार का है :

अनेक बहनें

बारिश-धाम से बे-परवाह

नहीं उतारतीं चावल की टोकरी सिर से

कमर में बाँध फेंटा

तज कर लोक लाज

सोचो भाग-दौड़ कर रही हैं किस के लिए।

[हिजम अङाङ्हल]

"इन समस्त विशेषताओं के साथ नवजागरणकालीन मणिपुरी कविता में मानवतावाद का स्वर अत्यन्त उज्ज्वल है। कवियों ने व्यक्ति के हृदय के प्रेम को मानवता की कसौटी पर कसकर अद्भुत साहस का परिचय दिया है :


स्वर्ण-हार प्रेम का

उतार कर गले से प्रिय के

पहना सके जो शत्रु को

कहलाता है व्यक्ति वही सच्चा-प्रेमी


यह एक प्रकार से नवजागरणकालीन मणिपुरी कविता के उदात्त सांस्कृतिक चरित्र का प्रमाण है।"

.....क्रमश:

(नेटप्रस्तुति:चंद्रमौलेश्वर प्रसाद)



यों मना समारोह : विश्वम्भरा

1 COMMENTS
षष्ठ `विश्वम्भरा' स्थापना दिवस समारोह संपन्न








षष्ठ 'विश्वम्भरा' स्थापना दिवस व्याख्यान संपन्न

हैदराबाद, 13 नवंबर 2008 .



भारतीय जीवन मूल्यों के अंतर्राष्ट्रीय प्रचार प्रसार के लिए समर्पित सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था "विश्वम्भरा" का छठा वार्षिकोत्सव और स्थापनादिवस व्याख्यान १२ नव. २००८, बुधवार को आन्ध्रप्रदेश हिन्दी अकादमी के गगनविहार, नामपल्ली, हैदराबाद स्थित सभागार में आयोजित किया गया।


कार्यक्रम की अध्यक्षता दैनिक समाचारपत्र 'स्वतन्त्रवार्ता' के सम्पादक डॊ. राधेश्याम शुक्ल ने की तथा संस्था के मानद मुख्य संरक्षक ज्ञानपीठ पुरस्कार गृहीता प्रसिद्ध साहित्यकार पद्मभूषण डॊ. सी.नारायण रेड्डी विशेष रूप से उपस्थित रहे। ( उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर प्रसिद्ध चित्रकार एवं कला समीक्षक पद्मश्री जगदीश मित्तल विशेष अतिथि के रूप में पधारने वाले थे, परन्तु भ्रमवश वे आन्ध्रप्रदेश हिन्दी अकादमी के बजाय दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा में पहुँच गए और प्रतीक्षा करते रहे; क्योंकि विगत वर्षों में यह आयोजन वहीं सम्पन्न होता आ रहा था)


" विश्वम्भरा : भारतीय जीवनमूल्यों की संकल्पना " के छठे वार्षिकोत्सव के अवसर पर अंग्रेजी व विदेशी भाषा विश्वविद्यालय (EFLU) के रूसी भाषा विभाग के आचार्य प्रोफ़ेसर जगदीश प्रसाद डिमरी ने "संस्कृति और संस्कृत" विषय पर "विश्वम्भरा स्थापनादिवस व्याख्यान" दिया।


उल्लेखनीय है कि डॊ. जगदीश प्रसाद डिमरी भारतीय व रूसी भाषाविज्ञान के मर्मज्ञ विद्वान हैं। उन्होंने १९७३ में मॊस्को से पीएच.डी. की तथा केन्द्रीय अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा संस्थान, हैदराबाद में विभिन्न शैक्षणिक एवं प्रशासनिक पदों पर नियुक्त रहे। प्रो. डिमरी इस समय भारत में रूसी के वरिष्ठतम प्रोफ़ेसर हैं तथा २००५ में केन्द्रीय अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा संस्थान, हैदराबाद के कुलपति भी रह चुके हैं। उन्हें पाणिनि के व्याकरण, पतंजलि के महाभाष्य,भारतीय काव्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र तथा सांस्कृतिक भाषा शिक्षण के पाठ्यक्रम आरम्भ करने का भी श्रेय प्राप्त है।


अतिथियों के मंचासीन होने के उपरान्त 'विश्वम्भरा' के वार्षिकोत्सव का श्रीगणेश दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। प्रख्यात पर्यावरणविद् तथा उस्मानिया विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. किशोरी लाल व्यास ने मंगलाचरण किया तथा सुषमा बैद ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।


संस्था की ओर से अतिथियों का चंदन, हल्दी और कुंकुम के तिलक, अक्षत, अंगवस्त्र औरश्रीफल द्वारा पारंपरिक ढंग से स्वागत किया गया।


संस्था की संस्थापक-महासचिव डॉ. कविता वाचक्नवी ने 'विश्वम्भरा' के उद्देश्यों व गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि २००२ में गठित यह संस्था जनसंचार के सभी पारम्परिक व आधुनिक माध्यमों का प्रयोग करके सम्पूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति द्वारा प्रतिष्ठित जीवनमूल्यों का प्रचार-प्रसार करने के लिए संकल्पबद्ध है। उन्होंने जानकारी दी कि विश्वम्भरा ने नई पीढ़ी को लक्षित करके प्राईवेट और पब्लिक स्कूलों में भारतीय जीवनमूल्यों और शारीरिक, आत्मिक व सामाजिक उन्नति से सम्बन्धित पाठ्यक्रमों, व्याख्यानों तथा कार्यशालाओं का आयोजन किया है । डॊ. वाचक्नवी ने यह भी बताया कि भाषा और संस्कृति के अन्योन्याश्रय सम्बन्ध में विश्वास करने के कारण "विश्वम्भरा" हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में भी संलग्न है तथा इसके लिए इंटरनेट के माध्यम का बखूबी उपयोग कर रही है।


तदनन्तर मुख्य वक्ता प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी ने सभा को "संस्कृति और संस्कृत"विषय पर सम्बोधित किया। उन्होंने कहा कि, ''संस्कृति समस्त मानवता को विशेषता और भूषण प्रदान करती है । वह जनसमुदाय के उन उच्च विचारों और आदर्शो का समन्वित रूप होती है जिनसे संपन्न होने पर किसी व्यक्ति अथवा समाज को सुसंस्कृत माना जाता है। सदाचार और सद्बुद्धि से लेकर समस्त प्रकार के आचार-व्यवहार और नैतिक विचार संस्कृति में समाविष्ट होते हैं।''


प्रो. डिमरी ने संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'संस्कृति' की व्युत्पत्ति पर विचार करते हुए बल देकर कहा कि अंग्रेज़ी का 'कल्चर' शब्द इसका सटीक पर्याय नहीं है। उन्होंने भारतीय संस्कृति की परंपरा का उल्लेख करते हुए बताया कि वैदिक साहित्य के समान सर्वधर्मसमभाव से संपन्न साहित्य विश्व में अन्यत्र उपलब्ध होना दुर्लभ है।


प्रो.जगदीश प्रसाद डिमरी ने अपने व्याख्यान में संस्कृति की नित्यता का प्रतिपादन किया और कहा कि वह रूढ़िवादिता कदापि नहीं है। उन्होंने भारतीय संस्कृति में सहअस्तित्व के विचार को रेखांकित करते हुए कहा कि उसका स्वरूप बहुलतावादी है और अपनी 'अनेकता में एकता' एवं 'एकता में अनेकता' को साधने की शक्ति के कारण ही वह समग्र मनुष्य जाति के लिए ग्राह्य है। उन्होंने भारतीय संस्कृति को जातिवाद से जोड़ने के विचार का खंडन करते हुए आंध्रप्रदेश, उत्तराखंड और बंगाल में 'महाभारत' की मूल भावना को सुरक्षित रखने में सामाजिक दृष्टि से पिछड़ी समझी जानेवाली जातियों के योगदान की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि इन सब सांस्कृतिक धरोहरों को सुरक्षित बनाए रखना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है।


संस्कृति और साहित्य के संबंध की चर्चा करते हुए डॉ. डिमरी ने आगे कहा कि रीति-रिवाजों और साहित्य से संस्कृति का घनिष्ठ संबंध है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी माना कि भारतीय परंपरा में पर्वत, वृक्ष और नदी आदि समस्त प्राकृतिक संपदा को सांस्कृतिक संपदा का स्थान प्राप्त है इसीलिए हिमालय को यहाँ 'देवतात्मा' तथा गंगा को 'देवनदी' कहा गया है। उन्होंने सांस्कृतिक अनेकता को भारत की प्रगति और सार्वभौमिकता का आधार बताते हुए कहा कि इसे स्वानुभूति और लोक व्यवहार द्वारा ग्रहीत और पुष्ट किया जा सकता है।


संस्कृति को मनुष्य का 'संस्कार' और 'परिमार्जन' करने वाली साधना का प्रतीक मानते हुए डॉ. जगदीश प्रसाद डिमरी ने कहा कि भाषा और साहित्य के विविध रूपों में हमारी यह संस्कृति लंबी कालयात्रा करके हम तक पहुँची है और हमारा दायित्व है कि हम इसे और भी पुष्ट रूप में अगली पीढ़ियों को सौंपें।


इस अवसर पर 'विश्वम्भरा' की ओर से स्थापनादिवस व्याख्यानदाता प्रो. डिमरी का सारस्वत अभिनंदन किया गया तथा उन्हें संस्था का रजत स्मृतिचिह्न भेंट किया गया।


संस्था के मानद मुख्य संरक्षक ज्ञानपीठ पुरस्कार ग्रहीता साहित्यकार पद्मभूषण डॉ. सी.नारायण रेड्डी ने 'विश्वम्भरा' की गतिविधियों पर प्रसन्नता प्रकट की और आशा व्यक्त की कि भविष्य में भारतीय संस्कृति और भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में यह संस्था और भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने ध्यान दिलाया कि संस्कृति हमारे `होने' का पर्याय है तथा सभ्यता हमारी `भौतिक उपलब्धियों' का द्योतन कराती है। उनके अनुसार संस्कृति का क्षेत्र अत्यन्त विशाल है जिसके अन्तर्गत समस्त कलाओं से लेकर आचार-व्यवहार तक सब कुछ समा जाता है।


पर्यावरणविद् कथाकार एवं कवि प्रोफ़ेसर किशोरीलाल व्यास ने बलपूर्वक कहा कि भारतीय संस्कृति जिन अनेक कारणों से आज सारे विश्व के लिए प्रासंगिक है उनमें से एक हमारी पर्यावरण सम्बन्धी चेतना है क्योंकि हम प्रकृति से प्रतियोगिता नहीं मानते और न ही उसे जीतने में विश्वास रखते हैं, बल्कि हमारा विश्वास 'जियो और जीने दो' की नीति में है।


समारोह की अध्यक्षता करते हुए 'स्वतंत्रवार्ता' के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने इस बात पर हर्ष व्यक्त किया कि विश्व सूचना के माध्यम इंटरनेट को अपना कर विगत वर्ष में 'विश्वम्भरा' ने भारतीय संस्कृति और हिंदी की सेवा के क्षेत्र में सराहनीय उपलब्धि दर्ज की है। उन्होंने संस्कृति की व्याख्या संस्कृत परम्परा के आधार पर करने की सराहना की और कहा कि विविध भारतीय भाषाओं में व्यक्त चिन्तन परम्परा मूलत: एक है। भिन्नता के बीच एकता को पहचानने पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी देश के लिए सांस्कृतिक अहंकार से दूर रहना ही श्रेयस्कर होता है क्योंकि स्थानीय संस्कृतियाँ नहीं बल्कि मानव-संस्कृति सर्वोपरि है।


संस्था के उत्स से ही अपना मार्गदर्शन देते आ रहे "विश्वम्भरा" के संवीक्षक वरिष्ठ कवि-समीक्षक ( तेवरी काव्यान्दोलन के प्रणेता) दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय खंड ( स्नातकोत्तर और शोध संस्थान) के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर ऋषभदेव शर्मा ने अपनी अत्यंत चिन्तनधर्मी व सहज शैली में कार्यक्रम का संचालन करते हुए संस्था को उसके लक्ष्यों के प्रति सावधान व सचेत रहने की अपनी अपेक्षा दुहराई और उत्तरोत्तर नए संसाधनों के प्रयोग के प्रति जागरूक रह कर कार्यक्षेत्र का निरन्तर विस्तार करने को सराहते हुए नई योजनाओं की रूपरेखा के अनुपालन पर भी बल दिया।


'निर्दोष सोशल सर्विसेज़' के अध्यक्ष डॊ. रामकुमार तिवारी ने संस्था को शुभकामनाएँ देते हुए सभासदों व सहयोगियों का "विश्वम्भरा" की ओर से आभार व्यक्त किया।


इस अवसर पर चंद्रमौलेश्वर प्रसाद (कोषाध्यक्ष), द्वारका प्रसाद मायछ ( संरक्षक), गुरुदयाल अग्रवाल, श्रीनिवास सोमानी, वीरप्रकाश लाहोटी सावन, वेणुगोपाल भट्टड़ (ख्यातकवि), भँवरलाल उपाध्याय, रामजी सिंह उदयन( सम्पादक - डेली हिन्दी मिलाप), एफ।एम। सलीम (पत्रकार), के. प्रवीण, शिवकुमार राजौरिया, के. दास, कैलाशवती, आर. सुरेंद्र, श्रद्धा तिवारी, के. रवि, आनंद लालाजी, पी.आर. घनाते (सं.- मिलिन्द), पवित्रा अग्रवाल ( कथाकार), लक्ष्मीनारायण अग्रवाल ( कवि कथाकर), रूबी मिश्र, अभिषेक दाधीच, आशादेवी सोमानी(सम्पादक- अहिल्या), तुलजाप्रसाद विमल, जी. परमेश्वर, डॉ. अनुपमा, डॉ. बी. सत्यनारायण( अकादमी के शोध सहायक), डॉ. बी.बालाजी, डॉ.प्रभाकरत्रिपाठी (अध्यक्ष-हिन्दीविभाग, हि.महावि.), डॉ.रेखा शर्मा (अध्यक्ष, हिं. विभाग विवेकवर्धिनी ), डॉ. अहिल्या मिश्र, डॉ. टी. मोहन सिंह(पूर्व प्राचार्य व अध्यक्ष हि.वि. उस्मानिया वि.वि.), डॉ. जे.वी.कुलकर्णी, शेखर, रामकृष्णा आदि ने अपनी सक्रिय भागीदारी से चर्चा-परिचर्चा और समारोह को जीवंत बनाया।



- डॉ. कविता वाचक्नवी
महासचिव, "विश्वम्भरा"





चर्च : व्यवसाय और विदेशी धन

4 COMMENTS
धर्म और पैसा
- राजकिशोर



मेरे एक लेख पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पुवर क्रिश्चियन लिबरेशन फ्रंट के अध्यक्ष एल आर फ्रांसिस ने ईसाई चर्चों की अनेक विसंगतियों की ओर संकेत किया है। जैसे चर्च के अंदर शोषण, अत्याचार और दमन। यहां मैं धर्म और पैसे से जुड़े हुए मामलों तक सीमित रहना चाहता हूं।


फ्रांसिस के अनुसार, इस वर्ग में तीन तरह के सवाल आते हैं -- विदेशी पैसा, चर्च की संपत्ति और चर्च अधिकारियों द्वारा अपने कर्मचारियों का आर्थिक शोषण। ये तीनों ही मामले गौरतलब हैं। इनके बीच आपसी रिश्ता भी है।


फ्रांसिस के अनुसार, 'हाल ही में रतलाम (मध्य प्रदेश) की एक रेलवे कॉलोनी में स्थित 85 वर्ष पुराने चर्च में आग लगा दी गई। इस घटना को सीधे हिन्दू संगठनों से जोड़ा गया। मामला तुरंत अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया गया। बाद में पता चला कि उक्त घटना की तह में था उसी चर्च का चौकीदार -- नोएल पारे। चर्च की 86वीं वर्षगांठ मनाई जानेवाली थी। बड़े समारोह की तैयारियां थीं। किन्तु उस चर्च के चौकीदार पर आठ हजार का कर्ज था। कर्ज था बनियों का, जिनसे वह पेट भरने के लिए जरूरी नून-तेल उधार लेता था।


'चर्च प्रशासन उसे मात्र 1,000 रुपए मासिक वेतन देता था। कितना बड़ा अंतर है सरकारी नियमों में न्यूनतम मजदूरी को ले कर और चर्च प्रशासन द्वारा दी जाने वाली मजदूरी के बीच। देश की राजधानी दिल्ली में ही चर्च द्वारा चलाए जाने वाले अधिकतर संगठनों में भी ऐसा ही हाल है। सरकारी आदेश पोप पोषित धर्मराज्य के प्रशासकों के ठेंगे पर होते हैं। चर्च का गुलाम कर्मचारी 24 घंटे काम करके एक हजार रुपए अर्थात 33 रुपए प्रतिरोज पाता है। ऐसी स्थिति में क्रिया की प्रतिक्रिया अर्थात शोषण का परिणाम आक्रोश होगा ही। आक्रोशवश ऐसा कर्मचारी कुछ भी कर सकता है -- हत्या या आत्महत्या या फिर तोड़फोड़, मारपीट, आगजनी कुछ भी।'


आंतरिक शोषण का यह मामला ईसाई धर्म की खूबी नहीं है। मेरा अनुमान है कि सभी धार्मिक संगठनों में इस तरह का आर्थिक शोषण होता है। असल में, यह समुचित नौकरी नहीं होती, जिसमें डीए, पीएफ, ग्रेट्युटी आदि का प्रावधान हो। यह चाकरी श्रद्धा की है। श्रद्धा ज्ञान और भक्ति देती है, तो गरीब को भौतिक स्तर पर गुलाम भी बनाती है। इस तरह की गुलामी राजनीतिक संगठनों के तंत्र में भी दिखाई देती है। शायद ही कोई राजनीतिक दल अपने कर्मचारियों को नियम-संगत और जायज पैसे देता हो। इससे यह भी पता चलता है कि जो धर्म या राजनीति ऐसा करते हैं, वे वास्तव में कितने नैतिक हैं। नैतिकता का मूल आधार छोड़ देने के बाद कैसा धर्म और कैसी राजनीति।


फ्रांसिस का दूसरा मुद्दा है चर्च की संपत्ति का। वे लिखते हैं, 'मलयाली मूल और मंगलूर-कर्नाटक-गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे हैं। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की ओर लौटे तो भारत की ईसाई चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों - बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रूप में ही चर्च के सदस्य हैं।' कहने की जरूरत नहीं कि संपत्ति अकसर विषमता पैदा करती है। इसीलिए सभी धर्मों में संपत्ति को हिकारत की निगाह से देखा गया है। जाहिर है, आप या तो कुबेर के दास बन सकते हैं या भगवान के भक्त। दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। लेकिन सभी धर्म संस्थान ऐश्वर्य की खोज में रहते हैं। वे अपने मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों को आलीशान से आलीशान रूप देना चाहते हैं। इससे इन संगठनों में चरित्र वालों को नहीं, पैसे वालों को महत्व मिलता जाता है। जैसे-जैसे पैसे की आपूर्ति बढ़ती है, धार्मिक संगठन के भीतर तानाशाही का तत्व मजबूत होता है और धर्म धुआं बन कर उड़ने लगता है। इसलिए इस पर विचार होना चाहिए कि धार्मिक संगठनों के पास संपत्ति होनी चाहिए या नहीं और होनी चाहिए तो कितनी तथा उसके प्रबंधन का तरीका क्या हो। इतिहास बताता है कि अकूत संपत्ति पर कब्जा करने के लिए धार्मिक संगठनों में हत्याएं तक हुई हैं। पैसा बारूद की तरह ही खतरनाक चीज है। जीविका के लिए जितना धन चाहिए, उससे अधिक धन-संपत्ति होने से धार्मिक संगठन पूरी तरह धार्मिक नहीं रह जाते। आज जब धर्म की भूमिका पर पुनर्विचार चल रहा है, यह प्रश्न उठाने लायक है कि धार्मिक संगठनों के लोग आर्थिक दृष्टि से परजीवी या उपजीवी क्यों हों। वे भी क्यों अपनी कमाई हुई रोटी ही खाएं और तब दूसरों को सीख दें कि धर्मपूर्वक जीने का मतलब क्या होता है।


विदेशी पैसे का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं। फ्रांसिस के अनुसार, 'चर्च अधिकारी आज विभिन्न तरीकों से अथाह दौलत कमा रहे हैं। उनका पूरा व्यवसाय इस देश के करोड़ों वंचितों के नाम पर चल रहा है।' इस अथाह दौलत का एक बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से आता है। भारत में या किसी भी लोकतांत्रिक देश में धर्म प्रचार करने का अधिकार सभी को है, लेकिन इस सिलसिले में विदेशी पैसे की खतरनाक भूमिका को नहीं भूलना चाहिए। आप इटली, अमेरिका या इंग्लैंड के पैसे से भारत के आदिवासियों के लिए स्कूल और अस्पताल बनाते हैं, तो उनका भला नहीं करते। पहली बात तो इसमें करुणा का तत्व कहीं नहीं है। यह निवेश की तरह दिखाई देता है। दूसरी और ज्यादा मारक बात यह है कि आप आदिवासियों को आत्मनिर्भर होने का पाठ नहीं पढ़ा रहे होते हैं। धार्मिक व्यक्ति अगर आत्मनिर्भर नहीं है, तो वह धर्म का पालन कर ही नहीं सकता। इसलिए सामाजिक कल्याण के कामों के पीछे भी राष्ट्रीय या सामुदायिक आत्मनिर्भरता होनी चाहिए। लोग अपने श्रम और योगदान से अपना जीवन संवारें। मुफ्त में मिलने वाला विदेशी पैसा कामचोर और लालची बनाता है तथा स्वाभिमान की जड़ खोद देता है। प्रदूषण उन तक भी फैलता है जिनके माध्यम से यह विदेशी पैसा आता है। दलाली की संस्कृति से कोई ऊंची धर्म भावना नहीं पनप सकती।


कुल मिला कर कहना यह है कि धर्म और पैसे के रिश्तों पर गहराई से विचार होना चाहिए। पैसे ने धर्म का बहुत अपकार किया है। पैसे की अधीनता स्वीकार कर लेने के बाद धर्म की मौलिकता नष्ट हो जाती है और वह संपन्न लोगों के निहित स्वार्थों का औजार बन जाता है। अगर भारत की ईसाई मिशनरियां अमीर नहीं होतीं, तो उनसे किसी समुदाय को ईर्ष्या भी नहीं होती। मैं नहीं जानता कि गरीब ईसाइयों के बीच एल आर फ्रांसिस की साख कैसी है, लेकिन उन्होंने जो प्रश्न उठाए हैं, वे महत्वपूर्ण हैं। अन्य धर्मों के लोगों के मन में भी इस तरह के प्रश्न उठने चाहिए।

एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी - प्रभु जोशी (अंतिम भाग)

1 COMMENTS
अन्तिम भाग ()
गतांक (५) से आगे

पिछले अंक (क्लिक कर पढ़ें) - , , , ,




एक चुप्पी क्रॉस पर चढ़ी
प्रभु जोशी


आँख खुली, तब सुबह हो चुकी थी। धूप चढ़ने लगी व चढ़ती चली गयी। मगर अमि नहीं उठी। रम्मी ऊपर आकर आवाज़ देने लगा। उसके जी में आया कि वह जवाब ही न दे और न ही दरवाज़ा खोले। आखि़ उठना ही पड़ा। झुंझलाहट में भरकर सिटकनी हटायी। पापा खड़े थे। अमि घबरा-सी गयी। यह पहला मौका था, जब पापा ने उसे ख़ुद उठाया था,‘‘अमि, क्यों क्या बात है, तबीयत तो ठीक है ?’’ पापा ने अतिरिक्त रुचि ली। अमि और भी अधिक असहज हो उठी। लड़खड़ाते हुए बोली-‘‘जी, नहीं, पापा जी, ...जी ठीक है।’’ पापा लौट गये। वह आगे कुछ बोले इसके लिए जगह ही नहीं बनने दी, उन्होंने। अमि सोचती रही। पहले तो पापा ने कभी नहीं पूछा कि अमि क्या करती है ? कैसी है ? अब ये आरोपित चिंताएँ, आरोपित आत्मीयता क्यों ? आखि़र क्यों ? यह अतिरिक्त परवाह और प्यार क्यों ?

अमि बेमन से नहाई। तैयार हुई और कॉलेज चली गई। यह वही महीना था, जब हवा ख़ुद ठिठुरती तथा ठिठुराती हुई घूमने लगती है। चारों तरफ। ऊपर-नीचे। बाहर-भीतर। लड़कियों की गुलाबी ऐड़ियों को दरकाती हुई। कॉलेज की लैब्स में शुरू हो जाती हैं, प्रैक्टिकल एक्साम्स की तैयारियाँ। कैम्पस में चारों ओर यूकेलिप्टस के पत्ते शाखों और टहनियों से अलग होकर उड़ने लगते हैं।

कॉलेज में कैमिस्ट्री व फिजिक्स के तो पीरियड्स भी अटैण्ड नहीं किए। देर तक लायब्रेरी की अल्मारियों और शेल्फों में कहानियों की किताबें उलटती-पलटती रही- फिर लेबोरेट्री में बैठ कर रिकार्ड बुक्स में डायग्राम्स बनाती रही। घर के लिए कॉलेज से ही देर से निकली। पापा, लोकेश व मिसेज नरूला रोज़ की तरह लॉन की अंतिम व दम तोड़ती धूप में बैठे बतिया रहे थे। रम्मी पौधों को पानी दे रहा था। वह उनकी उपस्थिति की उपेक्षा करती हुई
अपने कमरे की ओर जाने लगी। पापा ने आवाज़ दी। पापा की आवाज़ अमि को हमेशा आदेश लगती है। आदेश भी नहीं सिर्फ कॊशन । अमि चुपचाप उन लोगों के पास पहुँच गयी।


मिसेज नरूला पूछ बैठी, ‘‘अमिया, लोकेश और हम अंग्रेज़ी-पिक्चर देखने जाने की सोच रहे हैं, तुम भी चलोगी न ! गर्ल ऑन मोटर साइकिल।’’

अमि न कर गयी। पापा के चेहरे की ओर देखा। पापा का चेहरा एकदम सख़्त व आँखों में वर्जना की लाल रेखाएँ खिंच उठी थीं-जैसे, कहना चाहते हों कि वह ख़ुद के विषय में निर्णय लेने वाली ख़ुद कौन ? अमि अपने नकारात्मक उत्तर को लेकर भयभीत-सी हो उठी। हाय ! पापा के सामने वह ऐसा कैसे कह गयी। अमि ने अत्यन्त दयनीय मुद्रा में, अपराधी-मन से सफाई पेश करना चाही कि उसके कॉलेज में आज फंक्शन था। सो काफी थक गयी है। मगर, पापा ने उसका वाक्य भी पूरा कहाँ होने दिया। बीच में ही बोले-‘‘रहने दीजिए, मिसेज नरूला, इसके लिए तो इसके कमरे से बढ़ कर दुनिया में कोई भी चीज़ बेहतर नहीं है। चलिये हम चलते हैं।’’ और इन शब्दों के साथ पापा उठ कर अंदर कपड़े बदलने चले गये। तेज़ कदमों से। उनके कदम, कदम नहीं लग रहे थे, बल्कि जैसे मोर्चे की तरफ लपकता कोई बंदूक धारी हो।


अमि का मन डूब-सा गया। हाय, अब वह क्या करे। पापा को कहे कि नहीं, वह जाने को तैयार है या रोने लग जाये। पता नहीं, वह वाक्य कहते समय पापा का चेहरा कैसा विकृत व क्रूर रहा होगा। अमि केवल गर्दन नीचे किये लॉन की घास देखती रही और सामने की कुर्सियों पर बैठे लोकेश व मिसेज नरूला के अस्तित्व का तीखा व व्यंग्यात्मक एहसास करती रही। जूतों की आहट लौट आयी। पापा तैयार होकर लौट आये थे। तीनों हँसते हुए गेट की ओर बढ़ गये। अमि भीतर की तिलमिलाहट दबाये वहीं उसी मोढ़े में धँसी रही। कार की भरभराहट.... गेट छूटा.... और तीनों दूर हो गये। अमि चुपचाप थके कदमों से, आँखों का गीलापन लिये ऊपर अपने कमरे में आ गयी। कमरे में लौटना उसे अपने में लौटना लगता है। वह पलंग से सटी दीवार से पीठ टिका कर, काफी देर तक निर्विकार सी बैठी रही। उसके दिमाग में दीवार के उस पार का कमरा घूमता रहा, जो कभी माँ का था और जिसमें माँ की किताबें और कपड़ों की अल्मारियाँ थीं-जिन्हें वह आज तक नहीं देख पाई। उसे माँ की याद आई और आने लगी उसी के साथ ऊपर उठती हुई एक अदीप्त व्यथा, जिसको उसने कच्ची उम्र से ही अंतस के अछोर अंधेरे में रख छोड़ा था। सामने की खिड़की से अंधेरा और हवा का झोंका एक साथ दाख़िल हो रहा था, जिसमें दीवार पर लटका कैलेण्डर हिल रहा था- उसकी निगाह 28 फरवरी पर रूक गई, जिसे उसने स्याही से लाल घेरे में क़ैद कर दिया था। यह माँ की मृत्यु की तिथि थी- पापा, इस दिन प्रतिवर्ष मोमबत्ती जलाते हैं। उसने माँ के प्रति आर्द्रता के साथ सोचा-’काश माँ ने 29 फरवरी को आत्महत्या की होती तो उसकी पुण्यतिथि चार साल बाद आती। पापा को चार साल तक मोमबत्तियाँ जलाने से मुक्ति मिली रहती।


एक तेज़ भरभराहट। गाड़ी गैराज़ में रखी जा रही है। टिक-टिक, मिसेज नरूला के हाई-हील के सैंडल और इसी स्वर के साथ रिटायर्ड आई.पी.एस. अफसर के जूतों का ठण्डा मार्चिंग स्टेपवाला स्वर। शायद लोकेश नहीं है। फिल्म से लौट आये हैं। रात काफी बीत चुकी है।


अमि की आँख अभी तक नहीं लगी। फिर काफी देर तक ड्राइंग-रूम से बातचीत के अस्पष्ट-स्वर रात की ठण्डी और बेआवाज़ हवा में फैलते रहे। अमि के भीतर एक अज़ीब-सा सी.आई.डी. उभर आया। एकबारगी तो इच्छा हुई कि दबे-पाँव जीने में जाकर सुने कि आखि़र ये लोग क्या बातें करते हैं ? मगर, यह सिर्फ सोच ही पायी। उस स्थिति में
पापा द्वारा पकड़े जाने के बाद की कल्पना ने अमि के ज़िस्म में एक गहरा लिजलिजा कम्पन पैदा कर दिया। फिर कुछ देर बाद सब कुछ चुप। सब दूर अंधेरा। अमि के मन में भय की एक वीभत्स आकृति उभर कर बुरी तरह छाने लगी। उसकी इच्छा हुई कि बेड-स्विच ऑन कर के ख़ुद को स्वस्थ कर ले। मगर, ऐसे में उसका अभी तक जागते रहना उजागर हो जायेगा। अमि ने कँपकँपी रोकते हुए रज़ाई के पल्ले से कस कर ख़ुद को सुरक्षित अनुभव करने की कोशिश की। उसे अक्सर ऐसे त्रस्त क्षणों में भैया की याद आती है। वह आज कॉलेज में आये, भैया के खत की पंक्तियाँ दुहराने लगी, ‘‘अमि, तू चाहे तो एकाध हफ़्ते के लिए यहाँ चली आ न ! बम्बई देख-दाख कर लौट जाना।’’ अमि को भैया के चेहरे की आग्रह करती प्यारी-प्यारी मुद्राएँ याद आने लगीं। वह ज़रूर जायेगी। लेकिन, क्या पापा
उसके प्रस्ताव को अनुमति दे देंगे....? यह सवाल बार-बार अमि के उत्साह पर चोट करने लगा। ज़्यादा से ज़्यादा डाँटेंगे ही न ? भैया कहा तो करते थे-’डाँट पापा के पाठ्यक्रम का अनिवार्य अध्याय।’


और अब अमि घर से भी कतराने लगी थी। ‘घर’ शब्द उसके लिए निहायत ही त्रासद व अर्थहीन हो गया था। घर से कॉलेज के लिए निकलते समय, क्षण भर के लिए उसे लगता कि वह घुटते दायरों में से एक अज़नबी फैलाव के सुखद व आकारहीन अंतराल में आ गयी है। मगर, कुछ मिनटों बाद ही उसे कॉलेज भी एक तहख़ाना लगने लगता। धीरे-धीरे घर और कॉलेज दोनों से ही उसकी आसक्ति टूटने लगी थी। हर समय भैया के पास जाने का
ख़याल मँडराता रहता।


और आज एक हफ़्ते बाद कॉलेज गयी। आज भी न जाती, मगर, पापा ने पता नहीं किसे ‘इनवाइट’ किया था, जो सुबह से ही ‘ड्राइंगरूम’ को व्यवस्थित करने में लगे थे। पापा के परिचितों के बीच अमि हमेशा हीन-भाव से भर उठती है। पापा ने कॉलेज लिए निकलते समय आदेश दिया कि वह ठीक समय पर कॉलेज से लौट आये। अमि हामी में सिर हिला कर कॉलेज आ गयी।

अब पीरियड में बैठे-बैठे भी बोर होने लगी, तो उठ कर लायब्रेरी में आ गयी। वहाँ भी मन न लगा, तो कॉमन रूम में आ गयी। कॉमन रूम में पहुँचते ही अमि खिल उठी। बोर्ड पर उसके नाम का ख़त था। अमि ने बेकाबू उत्सुकता के साथ निकाल लिया। अमि के चेहरे पर फैली इतनी असामान्य उत्सुकता को देख कर पास ही बैठे लड़कियों के झुंड में से एक ने फब्ती कसी-‘‘कहो, अमि डियर, किसे उलझा रखा है, जो ख़त पर ख़त दागता रहता है ? घर के बजाय कॉलेज के पते पर।’’ अमि बिंध-सी गयी। एक चुप्पी थी, एक मौन था, जिसके भीतर कोई तीखी और धारदार चीज़ घोंप दी हो। जी में आया कि बढ़कर तड़ाक् से एक थप्पड़ जमा दे। मगर, सिर्फ ग्लानि-पूरित मन से उनकी तरफ देखती हुई बाहर निकल आयी।


बाहर आ कर उसने ख़ुद को फिर फटकारा कि उसने उस लड़की को डाँट क्यों नहीं दिया। आखि़र, इस प्रकार सब कुछ चुपचाप सहते जाना व एक घोंघे की जिंदगी में क्या फर्क़ रह जाता है ? वह, मुँह में ज़ुबान रखते हुए भी इतनी गूँगी क्यों है ? क्यों नहीं चीख़ पड़ती ? अमि की आँखें डबडबा आयीं। बहुत धीमे से भीतर खौलती वेदना को काबू करने की कोशिश में होठों का एक कोना दाँतों के नीचे दबा लिया और चुपचाप ख़त खोलने लगी। ख़त खोला, तो पता चला कि आठ दिन पहले का लिखा हुआ है। भैया ने बीमार रहते हुए लिखा था। वह आ जाये। उनकी अपनी छोटी बहन अमि से मिलने की बहुत इच्छा है। अमि पढ़ कर विचलित-सी हो उठी। मन शंका-कुशंकाओं की लहरों पर डूबने-उतराने लगा। वह तेज कदमों से टैक्सी स्टैंड पर आ गयी।कॉलेज से घर के रास्ते के बीच पूरे समय आँसुओं को रोकने की कोशिश करती रही। ड्रायवर न उसे सामने के मिरर में रोते देख लिया, तो अमि ने पर्स से गॊगल्स् निकाल कर आँखों पर चढ़ा लिये। अवचेतन में जमे, भैया से जुड़े न जाने कितने ममत्व भरे संदर्भ उभरते रहे। लगा, जैसे वे तेज़ बुखार में हैं और उसका नाम बड़बड़ा रहे हैं।


घर आते ही किराया चुका कर सीधी तेज़ कदमों से अपने कमरे में चढ़ आयी। अमि ने अंदर पहली बार पापा के सामने ख़ुद का निर्णय सुनाने का साहस भर आया था। ज़ल्दी से सूटकेस निकाल कर अपने तमाम ज़रूरी कपड़े जमा लिये। आंसुओं से तरबतर आँखें ऐसी लग रही थीं, जैसे खौलते खारे पानी में दो कच्ची कलियाँ उबल रही हों। बार-बार ख़त में भैया के हर्फ़ों से निकलकर एक आहत आग्रह आ रहा था।

पूरा सूटकेस तैयार हो गया।

अमि ने सूटकेस बंद करके एक गहरी साँस लेकर फेफड़ों में साहस भरने की कोशिश की। तभी उसने नीचे से पापा की गरजती आवाज़ सुनी। वे रम्मी को पता नहीं कौन-सी बात पर डाँट रहे थे, ‘‘नानसेंस, तुम्हें इतना नहीं समझता कि मेहमान आ रहे हैं, और तुमने इम्पोर्टेड ग्लास का फ्लावर पॊट तोड़ दिया, ब्लडी रास्कल।’ फिर एक आवाज़ आई सटाऽक !।’’ जैसे पुलिस के अधिकारी ने अपराधी से मनचाहा उत्तर पाने के लिए उसके जबड़े पर जड़ दिया
हो, ज़ोरदार तमाचा।


अमि भीतर ही भीतर डूबने लगी। रम्मी को थप्पड़ मारने के बाद, अब पापा फनफनाते ऊपर आ रहे हैं। यह सीढ़ियों पर गिरते बूटों की पदचापों से स्पष्ट हो रहा था। अमि के भीतर क्षण भर में ढेर सारी उथल-पुथल मच गयी। लो पापा आ ही गये। आते ही अपनी उस तिक्तता से भरे, स्वर में बोले। बोले नहीं, जैसे बस उसे आदेशित किया - ‘‘अमि, ज़रा ज़ल्दी से तैयार होकर नीचे आओ, हमें लोकेश के पापा-मम्मी को लिवाने स्टेशन चलना है।’’ पापा जिस तेजी से ऊपर आये थे, ठीक उसी तेज़ी से नीचे उतर गए। अपने बूटों की पदचापों के साथ।


अमि की समझ में ही न आया कि अब वह क्या करे ? सूटकेस का एक-एक कपड़ा निकाल कर फेंक दे या ज़ोर-ज़ोर से चीख़ कर रोना शुरू कर दे या ममी की तरह दौड़ कर टैरेस से फ्लैट के पिछले पथरीले फर्श पर कूद पड़े। फरवरी की एक और तारीख कैलेण्डर में फिर घिर जाएगी, लाल स्याही से, मोमबत्ती जलाने के लिए। अमि रोते-रोते साड़ी बदलने लगी। साड़ी बदलते हुए, इस पल में भी उसके सामने सब कुछ गड्डमड्ड था। यह भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं था कि साड़ी बदल कर, जब सीढ़ियाँ उतरेगी तो वह सूटकेस को हाथ में लेकर उतरेगी कि सूटकेस को वहीं छोड़कर।


4, संवाद नगर,
इन्दौर (म.प्र.)
भारत

आगामी अंक में पढ़ें - पहली कहानी के लिखे जाने की कहानी : प्रभु जोशी की ज़ुबानी







"विश्वम्भरा" का वार्षिक अधिवेशन एवम् ‘स्थापना दिवस व्याख्यान’

0 COMMENTS


"विश्वम्भरा" का वार्षिक अधिवेशन एवम् ‘स्थापना दिवस व्याख्यान" 12 नव. को
-------------------------------------------------------------------------------------------------



भारतीय जीवनमूल्यों के लिए समर्पित साहित्यिक,सामाजिक,सांस्कृतिक संस्था "विश्वम्भरा" का वार्षिकोत्सव 12 नव. 2008 बुधवार को सायं (ठीक 5 बजे) गगन विहार, नामपल्ली स्थित आ.प्र. हिन्दी अकादमी के सभाकक्ष में संपन्न होगा।


इस अवसर पर संस्था के मानद मुख्य संरक्षक डॊ. सी. नारायण रेड्डी ( ज्ञानपीठ सम्मान गृहीता,पद्मभूषण) उपस्थित रहेंगे तथा सीफ़ेल (अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय ) के रूसी विभाग के आचार्य डॊ. जगदीश प्रसाद डिमरी "संस्कृत और संस्कृति" विषय पर "विश्वम्भरा-स्थापनादिवस व्याख्यान" देंगे। समारोह की अध्यक्षता "स्वतन्त्र वार्ता" के सम्पादक डॊ. राधेश्याम शुक्ल करेंगे। मुख्य अतिथि के रूप में आ.प्र. हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री डॊ. यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद तथा विशेष अतिथि के रूप में प्रसिद्ध चित्रकार एवं कलासंग्राहक पद्मश्री जगदीश मित्तल आसन ग्रहण करेंगे। इस अवसर पर विशेष रूप से भाग लेने के लिए जबलपुर से नगर पधार रहे कवि समीक्षक आनन्द कृष्ण भी संस्था का आतिथ्य ग्रहण करेंगे।

विश्वम्भरा की संस्थापक महासचिव डॊ. कविता वाचक्नवी ने सभी साहित्य व संस्कृतिप्रेमियों को इस अवसर पर आमन्त्रण व उपस्थित रहने का अनुरोध किया है




आलूरि बैरागी चौधरी का कवि कर्म - 3

0 COMMENTS
पुस्तक चर्चा

आलूरि बैरागी चौधरी का कवि कर्म - 3
डॉ.ऋषभ देव शर्मा





`वसुधा का सुहाग’ (2007) में प्रयोगवादी और नई कविता शैली में लिखित आलूरि बैरागी की 45 कविताएँ सम्मिलित हैं. जिनका रचनाकाल 1945 से 1966 तक फैला हुआ है। संग्रह की शीर्ष कविता ‘वसुधा का सुहाग’ अपने बिंब विधान के कारण खासतौर पर आकर्षित करती है। सूर्य और पृथ्वी के प्रणय को कवि ने अत्यंत सघन बिंबों में इस प्रकार रूपायित किया है -


गहरे कुहरे की चादर से सालस सूर्य
अंगडाई-सी लेकर उठ बैठा
सेंक रहा अपने को अपना ही ताप ज्यों लगता मीठा।
तुहिन-कण के मोतियों की झालर हटा
झाँक रही ज्यों वसुधा
काल की विनील अवधि चीर खिलती
किसी प्रिय-वदन-स्मृति की व्यथा!
आँसुओं के गुलाब-जल में नहायी मुस्कान!’


साथ ही कवि ने यह भी प्रश्न उठाया है कि इतने दिन तक मैं कहाँ रहा या इतने दिन तक मैं क्यों नहीं जिया। आज जब इस प्रातःकालीन वेला में जीवन की सार्थकता और ऊर्जस्विता का बोध हुआ है तो यह अलसाया सूर्य एक भारतीय कवि को अफ्रीका के आदिम राग से जोड़ता हुआ प्रतीत होता है -


रुधिर-परमाणुओं के गर्भ-गेह में
अनंत शक्ति-पूजा
सुरंगों में बजते सहस्र मृदंग
प्रबल चुंबक के तरंग।
मेरी नस नस में
अफ्रीका के आदिम पादपों के वेदना-रस का राग,
नीग्रो-सूरज का रुधिर यह वसुधा का सुहाग!’


कविवर आलूरि बैरागी चौधरी के बिंब विधान के वैशिष्ट्य को संग्रह की अधिसंख्य कविताएँ प्रमाणित करती हैं। महात्मा गाँधी को समर्पित ‘राजघाट’ में वे हिंसा-प्रतिहिंसा के भीषण दृश्य को बिंबित करते हुए अकरुण नर के उर की वेदी पर तांडव करते अकाल-महाकाल को देखते हैं और गीध काग सियारों का भैरव रव उन्हें इस तांडव के अवसर पर ताल देता प्रतीत होता है। महात्मा के पवित्र रक्त को पीने वाली कर्कश वसुधा पर हिंसा-प्रतिहिंसा के पिशाचगण आज खून की होली खेल रहे हैं और विगत पाप, विकृत शाप, ज्वाला-जिह्वा पसार लहलही नई पौध को लील रहे हैं। ऐसे में कवि यह व्यवस्था देता है कि मानवी विवेक के मरण से नीच अन्य मरण नहीं तथा पिशाचों के वसंत पर्व हेतु नरपशु की बलि से श्रेष्ठ अन्य उपकरण नहीं। इससे कवि के सात्विक क्रोध और हताशा का अनुमान लगाया जा सकता है। वह अमृत मंत्रों से गाँधी का आवाहन करता है और कोटि कोटि करुण नयन भारत जनगण के साथ एकाकार होकर उस अमृतात्मा के अवतार की प्रतीक्षा करता है।


बैरागी को हर तरह के पाखंड से बड़ी चिढ़ है - चाहे उसका संबंध राजनीति से हो, समाज से या धर्म से। ‘योग समाधिमें उनके व्यंग्य का निशाना तथाकथित पाखंडी जन हैं जिन्हें वे आँखें मूंदे पागुर करते लेटे हुए भैंसे के रूप में देखते हैं। यह भैंसाअज्ञेयकी कविता के ‘धैर्यधनगदहे की याद दिलाता है। गदहा रात में खड़ा है तो भैंसा दिन में सोया है। वह मूत्र सिंचित मृत्तिका के वृत्त में अनासक्त रहता है तो यह -


चारों ओर प्रगल्भ विश्व-कोलाहल,
जगा जीवन का हालाहल,
पर भैंसा योग-समाधि-लग्न तद्गत तल्लीन,
आँखें मूँदे कर रहा ध्यान निज में विलीन।


स्त्री जाति के प्रति आलूरि बैरागी की संवेदनशीलता कई स्थलों पर व्यक्त हुई है। ‘वेश्या के प्रति’ कविता में वे अभागिन वेश्या को ऐसी मीराँ के रूप में देखते हैं जिसे अपना गिरिधर नागर नहीं मिलता उनके लिए वह प्रेम की ऐसी साधिका है जो जोगिन होते हुए भी नागिन समझी जाती है। वह ईश्वर की ऐसी प्राणप्रिया है जिसे स्वयं उसके पति ने कौडी के मोल सट्टा-बाजार में खड़ा कर बेच दिया है यही कारण है कि कवि जब-जब प्रेयसी पर गीत लिखना चाहता है तो विश्वप्रेयसी उर्वशी बनकर वेश्या उनकी आँखों के आगे जाती है और प्रणय गीतों में अनल और गरल घोल जाती है। ऐसे में स्वाभाविक है प्रेम के प्रति कवि का यह आक्रोश कि -


‘मैं कहता हूँ ; सभी जूठ है,
प्यार छार है, फूल धूल है।
एक ढोंग है, एक स्वांग है।’

निस्संदेह जगत इस स्त्री से घृणा कर सकता है लेकिन ऐसा करना कवि के लिए संभव नहीं है। वह तो पुरुष जाति की कृतघ्नता के लिए जगन्माता के समक्ष क्षमाप्रार्थी है -


‘आओ देवी!
अकरुण सकल मनुष्य-जाति का प्रतिनिधि बनकर,
तेरे धूसर पद-तल में मैं होता नत-सिर!
क्षमा करो माते!
हम सब तो तेरे बच्चे हैं!
क्षमा करो जननी!
क्षमा करो भगिनी!
क्षमा करो सजनी!
तुम न करोगी हमें क्षमा तो कौन करेगा?
शोक और लज्जा की ज्वाला में
तिल तिल जल कौन मरेगा?
है कोई जो सूली ऊपर सेज करेगा?’

शोक और लज्जा की इस ज्वाला का जिस दिन समाज अनुभव कर लेगा वह दिन निश्चय ही नए युग का प्रस्थान बिंदु होगा।


जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है आलूरि बैरागी चौधरी विषय और शैली दोनों की विविधता के धनी रचनाकार हैं।वसुधा का सुहागसंग्रह की कविताएँ भी इसे प्रमाणित करती हैं। इस संग्रह की कई कविताओं में कवि ने फैंटेसी का अत्यंत सफल प्रयोग किया है। प्रसिद्ध कविता ‘पलायन’ इसका उत्तम उदाहरण है। यह कविता दो सूक्तियों से आरंभ होती है -

- जिंदगी की भूख ऐसी है कि वह अपने आपको खा जाती है,

-प्यास ऐसी है कि वह मोमबत्ती सी अपने आपको पी जाती है।

आगे चलकर कविता संपूर्ण शून्य की ओर प्रस्थान करती है जहाँ कोई कैदी करवट बदलकर नींद में गुनगुना रहा है - क्या प्रभात नहीं आया? और सब तरफ एक डायन का खर्राटा गूँज रहा है। अंधेरा गहराता जाता है। प्रेमीजन भाग जाना चाहते हैं पर भागकर जाएँ कहाँ? सब जेल में बंद कैदी हैं - कैसे भागें, कैसे जागें। फिर भी यह इच्छा तो है ही कि इस अमानुषिक अंधेरे से दूर किसी बेहतर दुनिया में चला जाए -

‘चलो, चलें!
भूखे भेड़िये-से टूट पड़ने वाले कल से
गोंद-से, कालिख-से चिपकने वाले कल से
बागों से, लोगों से,
रोशनी से, सनसनी से,
चेहरे! ये सब चेहरे!
चलती पुतलियों के भाव-हीन चेहरों से
चलो कहीं दूर चलें!
चलो, कुछ न कुछ करें!
चलो! चलो! चलो! चलो! चलें!’


‘स्वर्गवासी की स्मृति में’ जहाँ एक ओर भारतीय लोकतंत्र के विधाता मंत्रियों पर व्यंग्य है, वहीं परिवर्तनशील समय और मृत्यु का बोध भी इस कविता में ध्वनित होता है। मृत्यु की ध्वनि-प्रतिध्वनियाँ अनेक स्थलों पर इन कविताओं में हैं। जैसे,


फिर से लगेगी जीवन की फेरी
सोने में न हो देरी
सो जा, ओ पगले,
तू सो जा अब (स्वर्गवासी की स्मृति में)




प्यारे मित्र! अब कविता नहीं रही!
दिन दिन की उदय-कांति में नवता नहीं रही!
मत पूछो तुम कारण। (कविता नहीं रही)।


यहाँ इस तथ्य की ओर भी संकेत करना आवश्यक है कि कवि मृत्यु से पराभूत नहीं है। जब वर्षा होती है तो राख में से भी नया जीवन फूट पड़ता है। जीवन की इस शाश्वत विजय के प्रति कवि की पूर्ण आश्वस्ति उसे आत्मा की अमरता में विश्वास करने वाली भारतीय चिंताधारा का प्रतिनिधि बना देती है -


‘बरखा रुकी
मानों बरस बरस थकी!
भीजे हर पात पर
किरण खिलखिला उठी!
गंजे सर भीतों पर, रुखे ठूँठों पर
धूप तिलमिला उठी!
विषन्न विश्व के छायाछिन्न वदन पर
सहसा मुसकान झिलमिला उठी!
अंदर बाहर बस, एक-सी प्रशांति
झीनी भीनी कांति!
हाँ, मैं इस क्षण
नहीं जानता कि क्या है मरण।’


कवि की इस अदम्य जिजीविषा को प्रणाम करते हुए हम यह आशा कर सकते है कि हिंदी जगत इस बिसराए हुए महान कवि आलूरि बैरागी चौधरी (५.९.१९२५ - ९.९.१९७८) की रचना शक्ति को पहचानेगा और साहित्य के इतिहास में उचित स्थान पर उस पहचान को अंकित करेगा।





’वसुधा का सुहाग/
आलूरि बैरागी/
मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/
2007/
125 रुपये/
120 पृष्ठ सजिल्द





ओबामा और अमेरिका का पुनर्जन्म : डॉ. वेदप्रताप वैदिक

1 COMMENTS

ओबामा और अमेरिका का पुनर्जन्म
डॉ. वेदप्रताप वैदिक




बराक हुसैन ओबामा की विजय अमेरिकी इतिहास की विलक्षण घटना है। यह वास्तव में अमेरिका का पुनर्जन्म है। अब्राहम लिंकन के बाद अमेरिका जड़ हो गया था। समता की फिल्म इतिहास के पर्दे पर ही अटक गई थी। 50 साल पहले मार्टिन लूथर किंग ने उसे हिलाया-डुलाया जरूर लेकिन उसे चलाने की चाबी अब बराक ओबामा के हाथ लगी है। इसीलिए ओबामा सिर्फ अमेरिका के 44 वें राष्ट्रपति ही नहीं होंगे, इतिहास-पुरूष भी होंगे। राष्ट्रपति के तौर पर वे कोई क्रांति कर देने का दम नहीं भर रहे हैं लेकिन उनका व्हाइट हाउस में होना अपने आप में एक मौन क्रांति है। ओबामा के नाना-नानी चाहे गोरे रहे हों, माँ भी गोरी रही हो और लोग उन्हें अफ्रीकन-अमेरिकन कहकर संबोधित करते रहे हों लेकिन यह सत्य एवरेस्ट पर गड़ी पताका की तरह लहरा रहा है कि वे काले हैं। उनके पिता का जन्म केन्या में हुआ था और उनकी माँ के दूसरे पति इंडोनेशियाई थे और मुसलमान थे। पिछले सवा दो सौ साल के इतिहास में क्या अमेरिका में कोई राष्ट्रपति ऐसा हुआ है, जिसकी पृष्ठभूमि इतनी विविध और जटिल हो ? जैसे ओबामा बाल्यकाल में दस साल तक इंडोनेशिया में रहे और इस्लामी मजहब और हिंदू संस्कृति से ओत-प्रोत हुए, क्या कोई अन्य राष्ट्रपति हुआ है ? विश्व-सिंहासन पर विराजमान होनेवाला ओबामा ऐसा पहला नेता होगा, जिसके जेब में सदा हनुमान की मूर्ति रहती है और दफतर की दीवार पर महात्मा गाँधी सुशोभित होते हैं।


41 वर्षीय ओबामा के व्यक्तित्व की यह रूपरेखा आशा जगाती है कि वे थियोडोर रूजवेल्ट, आइजनहावर, रिचर्ड निक्सन, लिंडन जॉन्सन और जार्ज बुश की तरह अहमन्य और संकीर्णमना राष्ट्रपति नहीं होंगे। उनकी दृष्टि उदार होगी और वे सारी दुनिया को अमेरिकी छाते के नीचे धकेलने की कोशिश नहीं करेंगे। आर्थिक संकट में फँसा अमेरिका यदि अब भी एकध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था लादने पर आमादा रहेगा तो न केवल वह खुद का नुकसान करेगा बल्कि दुनिया में तबाही के एक नए दौर की शुरूआत करेगा। ओबामा को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी विजय उनकी उम्र, योग्यता, अभियान-कौशल आदि के कारण अवश्य हुई है लेकिन बुश के कारण भी हुई है। बुश ने अपनी दोनों अवधियों में सारे संसार पर अमेरिका को थोपने की जो कोशिश की है, उसने अमेरिका की अच्छाइयों पर पर्दा डाल दिया और उसे सर्वत्र घृणा का पात्र बना दिया। अमेरिका जनता को बुश ने आर्थिक संकट में फँसा दिया। बेचारे मैककैन को बुश का क्रॉस ढोना पड़ा। ओबामा चाहें तो अमेरिकी विदेश नीति ही नहीं, विश्व-राजनीति को भी रचनात्मक दिशा दे सकते हैं।


यह ठीक है कि चुनावी भाषणों को, जीतने के बाद, नीतियों में बदल देना आसान नहीं होता लेकिन ओबामा से उम्मीद की जाती है कि राष्ट्रपति के रूप में वे ऐसी नीतियों का सूत्रपात करेंगे, जिससे अमेरिकी समाज में खिंची रंगभेद की खाई पटने लगे। आज भी अमेरिका के काले, हिस्पानी और अश्वेत लोग, जिनकी संख्या लगभग 30 प्रतिशत है, घोर विषमता, गरीबी और उपेक्षा के शिकार हैं। ओबामा के राष्ट्रपति बनने से उनके मन में आशा की एक तेज किरण फूटी जरूर है लेकिन किरण के चाँदनी बनने का फासला बहुत लंबा है। इस लंबाई को घटाने में डेमोक्रेटिक पार्टी को सीनेट और प्रतिनिधि सदन में मिलनेवाले बहुमत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। अमेरिका के अंदर ही नहीं, ओबामा को यूरोप में भी लाखों श्रोताओं ने सुना है। अफ्रीका, एशिया और लातीनी अमेरिका की सहानुभूति उनके साथ है। फिदेल कास्त्रो ने उन्हें बधाई दी है। इस अपूर्व विश्व-सहानुभूति के आधार पर वे अमेरिका को नए रूप में ढाल सकते हैं।


जहाँ तक अमेरिका के आर्थिक संकट का सवाल है, ओबामा के पास जादू की कोई छड़ी नहीं है। भोगवाद में डूबे अमेरिका को वे कौनसी आध्यात्मिक बेसाखी पकड़ाएँगे ? खरबों डॉलर के कर्ज में डूबे अमेरिकियों को, ऋण करो और घी पीओ की सभ्यता में विश्वास करनेवालों को वे यदि त्याग और बचत का उपदेश देंगे तो शीघ्र ही अलोकप्रिय हो जाएँगे। ओबामा की चुनौतियाँ लिंकन की चुनौतियों से कम नहीं हैं, लेकिन आशा की किरण यही है कि बाल्यकाल में अनाथ का जीवन बितानेवाले ओबामा पूंजीवाद की चकाचौंध में मस्ता रहे अमेरिकियों को जरा कमर कसने का आह्‌वान कर सकेंगे। वे अमेरिकियों को जरा बताएँ कि उनकी जेबें भरने के लिए ही बुश ने एराक़ पर हमला किया था। सद्दाम के विध्वंसकारी हथियारों के कारण नहीं, सस्ते तेल के कारण अमेरिका एराक़ के दलदल में फँस गया है। अरबों डालर और सैकड़ों सैनिकों को खोकर भी बुश ने कोई सबक नहीं सीखा। अब यह सलीब ओबामा के कंधे पर आ गया है। एराक से अमेरिकी फौजों की वापसी क्या आसानी से हो सकेगी ? ओबामा अपना वादा कैसे पूरा करेंगे ?


अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बारे में ओबामा का सोच बिल्कुल सही है। जब तक तालिबान के विरूद्ध जोरदार अभियान पूरी ताकत से नहीं चलेगा, अफगानिस्तान अमेरिकी इज्जत की कब्रगाह बनता चला जाएगा। पाकिस्तानी सरकार में वह माद्दा नहीं कि वह अपने कबाइली क्षेत्रों को काबू कर सके। अमेरिकी फौज को सीधी कार्रवाई के लिए तैयार होना होगा। अपना काम पूरा करके अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजें शीघ्रातिशीघ्र वापस हों, यह देखना ओबामा की जिम्मेदारी होगी। अगर अमेरिकी फौजें एराक़ और अफगानिस्तान में फँसी रहीं तो अमेरिका नए-नए आर्थिक संकटों में फँसता चला जाएगा। जैसे अफगानिस्तान पर हुए सोवियत कब्जे ने साम्यवादी व्यवस्था को चरमरा दिया, वैसे ही अमेरिकी पूंजीवादी व्यवस्था भी भरभरा सकती है। ओबामा अगर ईरान को धमकियाँ देने की बजाय बातचीत का रास्ता पकड़ें तो उन्हें अपूर्व सफलता मिलेगी। तीस साल से बंद पड़े ताले खुल उठेंगे।


ओबामा ने अपने चुनाव-अभियान में भारत के प्रति विशेष मैत्री-संकेत दिए हैं। उनके अभियान में प्रवासी भारतीयों ने जमकर सहयोग भी किया है। लेकिन उन्हें ध्यान रखना होगा कि वे परमाणु-सौदे के बहाने भारत पर अनावश्यक शर्ते थोपने की कोशिश नहीं करें। उन्होंने हाइड एक्ट बनवाने में विशेष भूमिका अदा की थी लेकिन अब उन्हें अपने परमाणु सामंतवाद या परमाणु अप्रसारवाद पर थोड़ी लगाम लगानी होगी। उन्होंने पाकिस्तान को सही सलाह दी है कि उसे भारत से कोई खतरा नहीं है। आतंकवाद ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। वे राष्ट्रपति के तौर पर इसी नीति को चलाएँ तो दक्षिण एशिया में अमेरिका नीति काफी सफल हो सकती है। भारत को क्षेत्रीय महाशक्ति स्वीकार कर लेने पर अमेरिका को अनेक आर्थिक और सैनिक लाभ स्वतः ही मिलने लगेंगे। कश्मीर का सवाल बहुत नाजुक है। ओबामा को फूंक-फूंककर कदम रखना होगा। यदि बुश ने इस मुद्दे पर परिपक्वता का परिचय दिया है तो ओबामा से तो काफी चतुराई की उम्मीद की जाती है। ओबामा चाहें तो दक्षिण एशिया में अमेरिकी नीतियों का पुनर्जन्म हो सकता है। भारत में जो दर्जा कभी सोवियत संघ को प्राप्त था, वह अमेरिका को मिल सकता है।


Office Secretary
Mohan Suryawanshi

साभार
नवभारत
टाईम्स नव. 2008








गुप्त गोदावरी

0 COMMENTS
यात्रावृत्तांत

राम का सीता को उपहार : गुप्त गोदावरी

- डॉ. अजित गुप्ता




पर्वतों के मध्य बनी एक गुफा में दो से तीन फीट तक पानी कलकल की ध्वनी के सा प्रवाहमान था। गुफा की चट्टानें हल्के पीले रंग की एकदम चिकनी थीं। चट्टानों से बनी दीवार सम नहीं होकर कटी हुई थीं, जैसे कारीगर ने काट-काटकर गुफा बनायी हो। गुफा की चैड़ाई कहीं पाँच फीट तो कहीं दो या तीन फीट त थी। गुफा के मुहाने पर एक कुण्ड जैसा बन गया था जिसमें दो-तीन फीट पानी भरा था। पानी का बहाव लगातार था और कुण्ड से पानी छलक कर पहाड़ों से होता हुआ बाहर जा रहा था।

गाइड कम ऑटो वाले ने मुझे कहा कि पानी में उतर जाइए, और आगे बढ़िए। यह छोटा सा कुण्ड आगे जाकर सुरंगनुमा है। अन्दर गुप्त गोदावरी प्रवाहित है।

आगे कितनी लम्बी सुरंग है? और पानी कितना है? साड़ी गीली हो जाएँगी। नहीं, मैं आगे नहीं जा पाऊँगी। सभी धार्मिक स्थानों पर ढेरों आख्यान सुनते हैं। गीले कपड़ों को लेकर ऑटो में बैठना सम्भव नहीं होगा।

अरे कोई यहाँ तक आने के बाद भी गुफा में नहीं जाएगा, ऐसा कैसे हो सकता है? साथी महिला-मित्र ने हाथ पकड़ा और पानी में कुदा दिया। कहा कि साड़ी को ऊपर बाँध लो।

पैरों के नीचे खुरदरी जमीन थी, लगातार पानी के बहाव के बावजूद वहाँ फिसलन नहीं थी। अन्दर सूर्य की किरण भी नहीं पहुँच पाती थी, फिर भी ‘काई’ का नामोनिशान तक नहीं था। हम एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़े। प्रकाश व्यवस्था वहाँ पर थी अतः गुफा का सौंदर्य दमक रहा था। हम चिकनी दीवारों को सहलाते हुए, पैरों को साधते हुए आगे बढ़ रहे थे। पानी तकरीबन हर जगह दो फीट तक तो था ही, बस कहीं-कहीं तीन फीट भी हो जाता था और हमारे घुटने तक आ जाता था। जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए, मार्ग कई जगहों से सकड़ा होता गया। लोगों की तादाद भी बढ़ती जा रही थी, कई जगह मार्ग इतना संकरा था कि एक बार में एक व्यक्ति ही आ-जा सकता था। लेकिन गोदावरी मैया की जय और सीता माता की जय के साथ सभी धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे।

पर्वतों से घिरी इस गुफा में कई मोड़ों और संकरे रास्तों से गुजरकर हम ऐसे स्थान पर थे जहाँ गुफा समाप्त हो रही थी। वहाँ एक पण्डितजी बैठे हुए मिले और एक छोटा सा मंदिर बनाकर वे लोगों की मनोकामना पूर्ण करा रहे थे। वापसी भी उसी रास्ते से थी। लोगों की भीड़ भी बढ़ती जा रही थी। पानी का आनन्द लेने का समय ही नहीं था। अन्दर गुफा संकरी हो गयी थी और अधिक लोग वहाँ ठहर नहीं सकते थे। बस हमने तो पानी को अपने सर पर छिड़का, पण्डितजी से आशीर्वाद लिया और वापस मुड़ गए। पण्डितजी सभी को इस गुफा का इतिहास बताने में कोताही नहीं बरत रहे थे।


जब रामचन्द्रजी अपने भ्राता लक्ष्मणजी के साथ चित्रकूट में आए थे तब उन्होंने सीता मैया के स्नान के लिए यहाँ गोदवरी मैया को प्रकट किया था। इसे गुप्त गोदावरी कहा जाता है। यह सीता मैया का स्नान कुण्ड था। पाताल तोड़ गोदावरी तभी से लगातार प्रवाहमान है। पण्डितजी अपनी बात बहुत ही श्रद्धा के साथ यात्रियों को बता रहे थे।


पहाड़ों के मध्य बनी यह गुफा प्राकृतिक स्नान कुण्ड है। गुफा के बाहर बोर्ड लगा है कि राम-लक्ष्मण द्वारा निर्मित सीता-कुण्ड। वनवासी राम ने अपनी पत्नी के स्नान के लिए इतना सुंदर और सुरक्षित स्थान का निर्माण किया, जिसकी तुलना किसी भी निर्माण से नहीं की जा सकती। तैरने का मन हो तो आप तैर सकते हैं, पानी के उद्गम से स्नान का मन हो तो आप स्नान कर सकते हैं, आप क्रीड़ा कर सकते हैं, आमोद-प्रमोद कर सकते हैं। चट्टानें किस पत्थर की बनी हैं? लगता है जैसे पीलाभ ग्रेनाइट यहाँ लगा हो। जमीन एकदम समतल नहीं है, कहीं-कहीं चट्टानों के कारण उबड़-खाबड़ भी है अतः पैरों को जमाकर चलना पड़ता है। फिर साड़ी पहनी हो तो एक हाथ तो साड़ी सम्भालने में ही लग जाते हैं। दूसरे हाथ में केमरा था, लेकिन अन्दर फोटो लेने का जुगाड़ ही नहीं बन पाया।


श्रीराम सरयू को पार कर चित्रकूट में माता अनुसुइया और अत्रि ऋषि के आश्रम में रहते हैं। चारों तरफ वन ही वन। एक तरफ मंदाकिनी बह रही है तो दूसरी तरफ पर्वत मालाएं भी उपस्थित हैं। सम्पूर्ण क्षेत्र में वनवासी ही वनवासी। महलों में पली-बड़ी सीता का मन होता झरनों के मध्य स्नान का। लेकिन सुरक्षित स्थान का अभाव। केवल मंदाकिनी का तट ही ऐसा स्थान था जहाँ सीता मैया स्नान कर सकती थीं।


एक दिन घूमते-घूमते लक्ष्मण को दिखा वह पर्वत। लक्ष्मण ने देखा कि इसमें एक गुफा भी है। बस फिर क्या था श्रीराम ने उस गुफा में तीर से ऐसा संधान किया कि गोदावरी की निर्मल धारा बह निकली। इतनी अद्भुत स्नान-गृह की कल्पना तो सीता को भी नहीं थी। पूरे ग्यारह वर्ष और छः माह के चित्रकूट के आवास में सीता मैया ने न जाने कितने पल यहाँ गुजारे होंगे? वहाँ की मखमली चट्टानी दीवारें सीता मैया के स्पर्श की साक्षी बनी हुई हैं। श्री राम और लक्ष्मण भी तो अपने आपको रोक नहीं पाते होंगे! वे भी तो इस गोदावरी के चरणों में बैठकर उसके पवित्र जल से स्वयं को पावन बने रहने का संकल्प लेते होंगे!


चित्रकूट से 20 कि.मी. दूर स्थित इस मनोरम स्थान को देखने के लिए कई प्रयास करने पड़े। नानाजी देशमुख ने चित्रकूट को नवीन स्वरूप प्रदान किया है। इससे पूर्व बस वहाँ एक जंगल था और था वहाँ वनवासी जनजातियों का बसेरा। नानाजी ने वहाँ के पाँच सौ ग्रामों को दीनदयाल शोध संस्थान के अन्तर्गत समग्र ग्रामीण विकास के लिए चयन किया। मुझे भी अभी सितम्बर मास में उस परिसर में जाने का अवसर मिला।


सितम्बर मास में जहाँ मौसम सुहावना होने लगता है वहीं चित्रकूट में सूर्य भगवान की पूर्ण कृपा थी। भास्कर अपने प्रखर तेज के साथ प्रातः छः बजे ही उपस्थित हो जाते और सायम् छः साढ़े छः बजे तक बने रहते। चित्रकूट स्टेशन जहाँ उत्तर-प्रदेश में है वहीं यह परिसर मध्य-प्रदेश में है। बिजली की आँख-मिचौनी दोनों ही प्रान्तों में समान है। भला जेनेरेटर भी कब तक साथ देगा? पसीने से नहाया हुआ बदन, ऊपर से चिलचिलाता सूर्य, मन कहीं भी भ्रमण के लिए जाने को मंजूरी नहीं दे रहा था। भ्रमण के लिए बस लगी हुई थी, लेकिन गर्मी से बेहाल बनी मैं कहीं भी जाने को समर्थ नहीं थी। देखते ही देखते बस भर गयी और हमारे लिए स्थान नहीं बचा। सोचा कि चलो जान छूटी, लेकिन साथी भला कब मानने वाले थे। फिर ढूंढ प्रारम्भ हुई टेक्सी की। लेकिन चित्रकूट में टेक्सी मिलना इतना आसान नहीं, हाँ ऑटो मिल सकता है। खैर हम भी ऑटो की तलाश में ही निकले और एक ऑटो मिल भी गया। भाव-ताव करके हम भी भ्रमण के लिए निकल ही पड़े। गुप्त गोदावरी बीस कि.मी. दूर थी, रास्ते में केवल जंगल ही जंगल और उनके किनारे बसे थे कुछ झोपड़े। हम तीन महिलाएं, ऑटो से सवार होकर निकल पड़े थे चित्रकूट का चक्कर लगाने। ऐसा लग रहा था कि हम मेवाड़ के वन्यप्रदेश में आ गए हों। यदि झोपड़ियों का स्वरूप पृथक नहीं होता तो हम यही समझते रहते कि हम कोटड़ा जा रहे हैं। वहाँ झोपड़ियों और उनकी छत का आकार गोल होता है। जैसे छाता तान दिया हो। कोई पक्का मकान नहीं, बस झोपड़ियां ही झोपडियाँ।


कभी राम ने अपने कदमों से इस स्थान को पवित्र किया था और आज हम उनकी चरण-धूलि लेने निकल पड़े थे इस बीस कोसी परिक्रमा के लिए। अनुसूइया मंदिर, कामद पर्वत, मंदाकिनी नदी, सभी कुछ तो देखा लेकिन मन मोह लिया इस गुप्त गोदावरी ने। मुझे लगा कि प्रेम का उपहार शायद यह भी कम तो नहीं, जो श्रीराम ने सीता मैया को प्रदान किया था। इतनी सुंदर कंदरा में उन्होंने गोदावरी को प्रकट करा दिया और निर्मित कर डाला एक स्नान पथ। हम तो उस जल की निर्मलता को अनुभव करते रहे, सीता मैया का सान्निध्य महसूसते रहे और राम के उस प्रेम को अपने अन्दर समेटकर अपने साथ ले आए।


दीवाली पर आप सभी वैभव का स्मरण करते हैं, रोशनी और पटाखों की बाते करते हैं लेकिन कभी उस प्रेम का स्मरण भी कीजिए, कभी उस त्याग का स्मरण भी कीजिए। फिर देखिए दुनिया कितनी सुन्दर लगेगी। आज दीपावली पर्व पर हम भी भातृ-प्रेम और दम्पत्ती-प्रेम का स्मरण करें और फिर से इस दुनिया को प्रेममय बनाने की पहल करें। चित्रकूट जाने के लिए आगरा या दिल्ली से रेलमार्ग है। स्टेशन का नाम है चित्रकूट कर्वी धाम। लोग कामद गिरी की परिक्रमा भी करते हैं लेकिन मेरे आकर्षण का बिन्दु यह गुप्त गोदावरी कुण्ड बना। बरसों से गोदावरी गुप्त रूप से यहाँ कन्दराओं के मध्य प्रवाहित है। इसका निर्मल जल सभी को पावन करता है। अन्दर से बहकर आते पानी को बाहर भी एक कुण्ड में समेटा गया है, जिसमें सभी लोग स्नान कर सकते हैं। चित्रकूट जाएं तो गुप्त गोदावरी जरूर जाएं। यह प्रेम का प्रतीक है। एक अनोखा उपहार है, राम का सीता को।



लेखिका राजस्थान साहित्य अकादमी की चेयरमैन `मधुमती 'की सम्पादक हैं.
Related Posts with Thumbnails